29 नवंबर, 2017

विजय गौड़ की कविताएं


देहरादून में जन्मे विजय गौड़ का एक काव्य संकलन- सबसे ठीक नदी का रास्ता, एक कहानी संग्रह- खिलंदड़ी ठाट और दो उपन्यास- फांस वह भेटकी प्रकाशित है। विजय को शतरंज खेलने और दुर्गम पहाड़ियों की यात्रा करने का शौक है। उत्तराखंड व हिमाचल की पहाड़ियों के कई द्रव्यों से गुजरने का अनुभव हासिल किया है। लद्दाख का जांस्कर इलाका ख़ास पसंद है और वहां बार- बार जाना चाहते हैं। इन अपनी इन्हीं यात्रा ओं के संस्मरण लिखने में व्यस्त हैं। आज हम इस घुमक्कड़ कवि की कविताओं से रूबरू होते हैं।

कविताएं

मौके की जगह

पुश्तैनी जमीन का बँटवारा भाइयों में कुछ इस तरह हुआ
एक तिकोना टुकड़ा ही घोलू के हाथ रहा
बड़े वाले ने अपने तीनों बेटों के नाम भी
हिस्से में लगाए
घर से लेकर गाय की गोठ और उससे छूती खेत की सरहद को भी
अपने नाम कर लिया
बीच वाले को उसने
खाने कमाने भर का एक हिस्सा दे दिया
बहन, जिसका बेटा पड़ोसी राज्य की मुख्यमंत्री का ड्राइवर है,
उस पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान रहा
बगीचे के साथ वाली जमीन जो सड़क से बिलस्त भर ऊँची है
उसके नाम कर दी;
घोलू का तिकोन दूसरी ओर की सड़क वाली उसी जमीन के ठीक सामने तय रहा
जहाँ एक छोटी सी दुकान पान की उसने खोल ली
हर आने जाने वाले को रोक-रोक कर वह न जाने क्या क्या बोलता है
राहगीर उसे पागल समझने लगे हैं
शराब के नशे में वह अपनी पत्नी का जिक्र करता है
कभी खुद को दुनिया का सबसे बेवकूफ और उसे बुद्धिमान बताता है,
कभी कहता है, देखो साहब मैं दुकान करता हूँ
फिर भी वह डिफेन्स एरिया की कोठियों की
जूठन पर आस टिकाये रहती है
बहुत भली है साहब वो
हमारा बच्चा नहीं है साहब
शादी को दस साल हो गये साहब
बहुत भली है वो
आप उसे समझा दो न साहब कि उन डिफेंस वालों के यहाँ
बर्तन माँजने मत जा
उन्‍होंने ही तो बन्द किया हुआ है हमारा रास्‍ता सामने यह जो कच्चा रास्ता है,
डिफेंस वालों के घेटो से होकर ही जाता है बड़ी सड़क तक
हमें समझते हैं चोर
बनने ही नहीं देते पक्‍की सड़क

आप तो समझ ही सकते है
यह सड़क यदि होती वहाँ तक
तो मौके की जगह पर कही जाती मेरी दुकान

पर तब मेरे पास होती क्या ये भी ?
००

के रवीन्द्र

पुस्तक मेला

खरीदी गई किताबें मित्रों की थी
अपना मामला तो मित्रों से मिलने और
पुस्तकों के संसार के बीच होना था
ऑटो से उतरा
आनन्द विहार बस-स्टैण्ड पर लदा-फदा

चौराहे के छोर पर
ठीक मुँह के आगे
सोने की घड़ी के लिए लड़ते-झगड़ते
हुए थे प्रकट वे तीन
घड़ी वाला पुकार रहा था सहायता के लिए
बाकी दोनों झपट रहे थे
चाहते थे मनमानी कीमत पर मिल जाए
सोने की घड़ी
घड़ी वाला था असहाय

जमाने को जानने की समझ ने उकसाया,
बिना दिये ध्यान अपने में ही रहूँ खामोश,
हथेली पर उड़ेली तम्बाकू
चूना निकाला
मलने लगा खूब
फटकी भी मारी खूब-खूब

अपनी होशियारी पर हुआ यकीन
जब पाया कि बेकाम का साबित हुआ उनके लिए

चाल में बढ़ी थोड़ी अकड़
किया चौराहा पार
पहुँचा दूसरे छोर,
दृश्य वही था-
सोने की घड़ी के लिए झगड़ रहे थे दूसरे तीन
चौंका-क्या पहचान लिया गया मैं-मूर्ख हूँ ?
और बेबात ही बीच में पड़ जाऊँगा ?

जतलाते हुए फिर से, मत समझो बेवकूफ
तुम लम्पटों से भी ज्यादा हूँ लम्पट
एक किनारे रुककर घूरने लगा घड़ीबाजों को

बेकाम का साबित हुआ अब भी

थैलों से लदा-फदा ही दिखा जैसे दूसरा
सोने की घड़ी की छीना-झपटी का खेल खेलते
प्रकट हुए अन्य तीन
यात्री होशियार था
तेजी से निकल गया दूसरे छोर

मन था कि रुकूं कुछ देर
देखूं कुछ और दृश्य
चौराहे पर हर दिशा में थे
छीन-झपट कर हथिया लेने वाले
सोने की घड़ी के खरीददार
और सोने की घड़ी वाला असहाय

खेल रुका होता तो दिखते
एक दूसरे में गलबहिया डाले
निगाहें ताक रही होतीं शिकार

थोड़ा अक्‍लमंद, थोड़ा चालाक और थोड़ा लम्पट
दिखते हुए
न जाने कितने गुजरे
खिलाड़ी फिर भी थे तत्पर

बेहद मासूम और प्यारे-से लगने लगे वे बीस
जो साबित हो रहे थे उन्नीस
मन हुआ फिर से गुजरूं चौराहे के एक छोर से दूसरे छोर
और लुट ही जाँऊ

जबकि उपथिति मेरी दर्ज हो चुकी थी
अनजान बने रहते हुए भी
वे नहीं थे अनजान कि ताक रहा हूँ मैं भी उन्हें
जैसे ताक रहा था मुझे प्रगति मैदान।

००

कहाँ पर

क्या आपकी जेब मार गया पॉकिट-मार
पड़ोसी ने दाब ली जमीन
या किसी हुड़दंगी मोटर-साइकिल सवार
की चपेट में आकर गंवा चुके अपना कान

आपका मामला
क्या उस बहन के मामले से ज्यादा है दिक्‍कत भरा
अब भी खड़ी है जो थाने में बिना साक्ष्य के
कि सीने पर उसके पँजे गड़ा तेजी से गुजर गया है
मोटर-साइकिल सवार

पुलिस वाला सीने पर जगह-जगह
रख-रखकर हाथ
पूछता है,
यहाँ पर, यहाँ पर,
कहाँ पर
मारा था हाथ उस हरामी ने मेडम
बताइये तो ?
००


भरे बाजार

दोहरे पल्लों के साथ
दरवाजा बंद है जाली वाले दरवाजे से अँधेरे के पार दिखता नहीं कुछ
खिड़की से दिख जाता है दृश्‍य समूचा
आगन्तुक की आहट,
कॉल बेल की आवाज,
सब सुनायी देती हैं भीतर
लेकिन कदम उठते हैं तसल्‍ली के बाद ही
खमोशी घिरी रहे तो
बना रहता है भ्रम
भीतर किसी के न होने का
लौट ही जाता है आगन्तुक

हुनरमंद सैल्समैन लेकिन, जानता है
खिड़की पर टिकी हैं निगाहें

झाड़ फानुस पर जमीं धूल के साथ
खींच लेता है वैक्यूम क्लीनर
कीमत बताने से पहले
खुले गये खिड़की के पल्‍ले  के रास्‍ते
सरका देता है गिफ्टनुमा, कुछ,
खुले अंगों को धोने वाला साबुन ही सही
एकदम मुफ्त

तुरन्‍त नहीं जरूरत, कोई बात नही नाम पता दर्ज कर लेता है मरदूद
घर में होते हुए भी खींच ही लेता है भरे बाजार।


सुना सुना ही
एक

कितना तो मुश्किल होता है, जब जान लेते हैं
परागकणों के निषेचन से कली बनती है फूल
पत्तियों का कलोरोफिल जड़ों से सोख लाये लवण की
धूप भरे आकाश के नीचे जुगाली करता है
भैसों के थनों से उतरने वाला दूध
माँ  के दूध से अलग है ही नहीं

मुश्किल हो जाती है बड़ी,
जब जान लेते हैं, अँधेरा यूंही नहीं
जगमगाते सूरज का प्रकाश कहीं ओर गिर रहा है
हम उस जगह पहुँचना भी चाहें तो
अँधेरे में डूबी वहाँ की बस्तियों में
ठहरने के लिए भी नहीं कोई ठौर
००

दो

दारा सिंह सुना गया योद्धा है
देखा गया पूँछ वाला वानर नहीं

कितनी ही बार तो बच्चे
जब आपस में खेलते हुए झगड़ रहे होते थे
तो दूसरे को कहते ही थे -
बड़ा दारा सिंह बना फिरता है, देख लूंगा तुझे तो
सचमुच के दारा सिंह को
उसने देखा नहीं होता उस वक्त तक
सुने सुनाये से ही दारा सिंह
दारा सिंह होता है

देख लेने की जितनी उत्सुकता
बच्चों को थी -
क्या दारा सिंह भी उतना ही उत्सुक था,
खुद को प्रकट कर देने के लिए
हनुमान बना उछल-कूद मचाता हुआ
टेलीविजन स्क्रीन पर दौड़ रहा दारा सिंह तो
वैसा ही बहादुर है
जैसा बादशाह का मुकुट पहना कोई फिल्मी एक्टर

बच्चा हो जाता है उदास
झूठ मूठ में ही डरता रहा और
डराता रहा वह अपने साथियों को आज तक।

००

महावीर वर्मा

भाषांतर

भाषा व्यवहार को बरतने
और व्यक्त करने का
सीधा-सीधा यंत्र है

एक ही भाषा को बरतते हुए भी
पनवाड़ी के पान का स्वाद
और पीक से दीवारें रंगने वाले
दलाल, माफिया और गुंडई का रंग
एक जैसा दिख सकता है
भाषा में चमत्कार पैदा करके
कवियों में कवि हो जाता है विशिष्ट
तराशे हुए शिल्प में चालाकियों को भी
छुपा लेता है कलाबाज

कर्ज में डूबे देश की सांख्यिकी बताती है

जो अभी-अभी पैदा हुए तीन सौ नवजात शिशु
हमारे कर्जों का बंटवारा उनके सिर भी चढ़ गया
इतराये नहीं कि औसत बिगड़ गया और कर्ज हो गया कुछ कम
एक और आंकड़ा है मरने वालों का
जिनके हिस्सों का कर्ज औसत को संतुलित कर रहा है
एक दूसरा आंकड़ा है,
दुनिया पर राज करती मुद्रा के बरक्स
हर सैकेण्ड गिरती जा रही मुद्रा का
उस पर भी गौर करें
आंकड़ों का भी पसीना छूट रहा है जिससे

एक ही भाषा में तीनों का मतलब
कैसे समझाएं कि अक्षर ज्ञान से दूर रखे गए
कारीगर को भी समझ आ जाए कि
कितनी कुशलता करोगे हासिल दोस्त
कि नयी से नयी तकनीक पिछड़ जाए
बल्ली, फट्टे, पतरें लोहे की, टिक जाएं तो छत पड़े
लुहार के छील गए हाथों से रक्त बहता नहीं
कील घुँप गई हैं पतरें सेट करने में
आच्छादित लोहे की छड़ों पर दौड़-दौड़कर
गारे-सीमेन्ट का मसाला दौड़ते-दौड़ते
धप्प गिर रहा है मिस्त्री के पांवों पर
कितनी मंजिला इमारत बनाना चाहते हो ?

तराई के लिए लबालब भरी छत पर खड़े होकर  कहो
कारीगर की आँखों में झाँककर
जो तीसरी मंजिल तक सीधी खड़ी दीवार पर
छाप रहा है अपनी कारीगरी का छपाक
पहले फंटी फिर समदा-रूसा, उसके बाद
गुरमाला से हल्के-हल्के दबाव
सूत डाल कर देख लो कितनी सीधी है दीवार
गोले-खसके जो भी चाहिए
बनाने में उसको कहाँ इतना खपना है

सिर्फ भाषा से रची नहीं जा सकती
सीधे सिर उठाकर भीतर घुसने वाली
ऊँचाई भर की देहरी भी।      



ठेकेदार
एक

राज-मिस्त्री नहीं था वह
न ही था बिजली फिटिंग करने वाला कारीगर
प्लम्बर  नहीं था, बढ़ई भी नहीं
और न ही था जाम हो गई नाली को
कीचड़-कीचड़ उतरकर साफ करने वाला

झूठ बोलना उसका पेशा है
इधर का झूठ उधर का सच
उसका कार्यव्यापार
दलाल है वह
कहलाता बिल्डर, सप्लायर और कभी ठेकेदार

दो

बोले गये उन झूठों का मत करें मिलान;
वायदे के मुताबिक काम पर न पहुँचने वाले राज-मिस्त्री ने भी बोला था जिसे,
उलझी हुई तारों को
स्विच में खोंस कर काम निपटाने की बजाय
न आने के झूठे बहाने बनाने को भी भूल जायें
जानते तो हैं ही
अगले काम की तलाश की भटकन को छुपा लेने की
बेअभ्‍यासी कोशिशें थीं वे

आपका नाराज होना वाजिब होता,
पहचाना होता जो आपने
वह कौन था जो बोल गया
बिल्कुल सफेद झूठ।



तीन

घिस रहे पत्थरों पर
उभर रही आकृति कितनी,
कितनी-कितनी चमक

और, और घिस मेरे घिसय्या
और, और, और कर साफ मेरे भय्या
चमक देख मालिक हो जाए खुश

देख न पाये कि कैसे रह गया मिलने से रेशा
भूल जा कि जमाकर निकल चुका है वह मरदूद
पत्थरों को जमाने का सौंपा था जिस मैंने काम

मालिक अनजान है
मत बोल
बता मत तू उसे
बस फिकर कर कि लगातार खुलती रहे चमक
देखने वाला हो जाए दंग
दिहाड़ी तब ही दे पाऊंगा मैं तेरी,
बदरंग !

००

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