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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

04 जनवरी, 2010

अनंत में विलीन हो गई नंदाजी की वाणी




जीवन के साथ उम्र की हद तयशुदा है;नंदाजी के नाम से पूरे मालवी-निमाड़ी जनपद के लाड़ले कृष्णकांत दुबे भी उससे अछूते नहीं रहे और उस अनंत आकाश में विलीन हो गए जहाँ से अब उनकी वाणी को सुना नहीं जा सकेगा. ज़माना बड़ा बेरहम है साहब और उसकी याददाश्त और ज़्यादा ख़राब. अभी बीस बरस पहले की ही तो बात है जब मावला-हाउस का रूतबा पूरे मालवे-निमाड़ में छाया हुआ था और उसी मालवा हाउस के ईमानदार और निष्ठावान लोगों की संक्षिप्त सी सूची में कृष्णकांत दुबे आख़िरी नाम थे...यानी उनके बाद अब वैसी बलन के लोगों का नामोनिशान ही मिट गया समझिये. नंदाजी और दुबेजी आपस में ऐसे गडमड हो गए थे जैसे उस्ताद बिसमिल्ला ख़ान की शहनाई और पण्डित रविशंकर का सितार.एक प्रतिष्ठित प्रसारण संस्था के लेखक और प्रसारणकर्ता के रूप में कृष्णकांत दुबे (नंदाजी)अपने आप में एक करिश्मा ही थे.

रविवार की सुबह नईदुनिया में इसी अख़बार के दो पुराने स्तंभों के ढह जाने का समाचार पढ़ना दु:खद था. व्यवस्थापक दामोदरलाल पुरोहित और कृष्णकांत दुबे दोनो ही नईदुनिया की शुरूआत के साथी थे. दुबे जी सन ४८ से ५४ तक नईदुनिया के सम्पादकीय सहयोगी रहे. शब्द से दुबेजी का साथ जीवनपर्यंत बना रहा. वे आकाकशावाणी की वाचिक परम्परा के प्रमुख हस्ताक्षरों के रूप में कभी भी भुलाए नहीं जा सकेंगे. जो काम उन्होंने इन्दौर में रह कर किया वह यदि दिल्ली-मुम्बई में किया होता तो शायद उनका नाम भी प्रभाकर माचवे,चिरंजीत,सुरेश अवस्थी,जसदेवसिंह या पं.नरेन्द्र शर्मा से कम नहीं होता. लेकिन न जाने क्यों मालवी आदमी अपनी मिट्टी में एक किस्म का ’कम्फ़र्ट झोन’ तलाश लेता है उसी के आसरे अपनी ज़िन्दगी के सारे सुखों और उपलब्धियों को परिभाषित कर लेता है. दुबेजी भी मालवा हाउस के संतोषी और सुखी जीव बने रहे.सरलता और सौजन्यता का भाव ऐसा कि जब जिसने जो कहा;कर दिया. दुबेजी..नाट्य रूपांतर करना है...दुबे जी इस मास का गीत लिखना है...दुबे जी परिवार नियोजन पर एक एनाउंसमेंट लिखना है....दुबेजी मांडू पर एक रूपक लिखना है....कितने ही आग्रहों को दुबेजी मुस्कुराहट के साथ स्वीकार कर लेते और अपनी मातृ-संस्था का आदेश मान झटपट काम निपटा देते .मालवा हाउस परिसर में अब वह पीढ़ी ही नहीं बची जो दुबेजी या नंदाजी को शिद्दत से याद कर सके लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि दुबेजी आकाशवाणी इन्दौर के ऐसे पाने थे जो किसी भी बोल्ट पर फ़िट हो जाता था.

निर्विवाद रूप से वे खेती-गृहस्थी या ग्राम सभा कार्यक्रम का ऑक्सीजन थे और अपने अन्य दो साथियों भेराजी और कान्हाजी के साथ बरसों-बरस तक इस कार्यक्रम को निर्बाध चलाते रहे. ना कोई स्क्रिप्ट और ना कोई पूर्व-योजना. बस मौसम के मिजाज से ये तीनों जान लेते थे कि हमारे मालवा-निमाड़ के किसान भाईयों के खेत-खलिहानों में क्या हो रहा होगा और हाल-फ़िलहाल क्या कुछ बोलने की ज़रूरत है. आपको जानकर हैरत होगी कि किसान भाइयों के नब्बे फ़ी सदी कार्यक्रमों का प्रसारण लाइव हुआ है. हाँ उसमें प्रसारित होने वाली भेंटवार्ताओं,रूपकों या लोकगीतों का प्रसारण ज़रूर पूर्व-रेकॉर्डेड होता था लेकिन नंदाजी-भेराजी और कान्हा जी अमूमन बिना किसी काग़ज़ के कार्यक्रम प्रसारित कर देते थे.

इन्दौर में निकलने वाले गणेस विसर्जन की झाँकियों का सीधा प्रसारण, आकाशवाणी की काव्य-गोष्ठियों का संचालन, बच्चों के कार्यक्रम में छक्कन चाचा के रूप में दीदी रणजीत सतीश के साथ लाइव प्रसारण और हाँ उज्जैन में होने वाले सिंह्स्थ के शाही स्नान के सीधे प्रसारण और रेडियो रिपोर्ट में दुबेजी एक स्थायी स्तंभ होते थे.उन्होनें अशोक वाजपेयी के कालखण्ड में भोपाल के भारत भवन में हुए विश्व-कविता सम्मेलन को पूरे एक हफ़्ते कवर किया. कम लोगों की जानकारी में है कि वे प्रगतिशील लेखक संघ, इन्दौरे के संस्थापकों में से एक थे .जूनी इन्दौर के ओटलों पर शरद जोशी, रमेश बक्षी,प्रभाष जोशी, रामविलास शर्मा,महेन्द्र त्रिवेदी,और दुबेजी जैसे युवको का टोली खूब बतियाती और लिखने पढ़ने की दुनिया में अपनी आमद के ख़्वाब बुना करती थी.

कृष्णकांत दुबे के जाने से मालवा का एक शब्द-नायक चला गया है. उनके होने से सहजता और शालीनता का पता मिलता था. हाँ इस बात का हमेशा अफ़सोस रहेगा कि कृष्णकांत दुबे के भीतर बसे सक्षम हिन्दी कवि का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया.सुमनजी स्वयं दुबेजी कविताओं के क़ायल थे और उन्हें जब-तब लिखते रहने के लिये प्रेरित करते थे. लेकिन शायद मालवा-हाउस की की व्यस्तताओं में कवि कृष्णकांत दुबे उभर कर नहीं आ पाए. हाँ यह भी कहना चाहूँगा कि दुबेजी की प्रतिभा और सीधे-पन का सीधा लाभ उनके समकालीनों ने खूब लिया और राष्ट्रीय स्तर पर जब सम्मानों और पुरस्कारों की बात आई तो श्रेय लेने ख़ुद आगे हो गए;दुबेजी को पीछे धकेल दिया. लेकिन दुबेजी या नंदाजी का सच्चा सम्मान था ग्रामीण अंचलों के भोले और मासूम किसान भाईयों और श्रोताओं में ह्र्दय में बसी श्रध्दा. नंदाजी/भेराजी के मशवरों पर हज़ारों गाँवों के खेतो में हरियाली छाई होगी और सैकडों परिवारों को ख़ुशियाली मिली होगी. अपने जीवन के अंतिम समय तक दुबेजी के प्रिय बने रहने का एक महत्वपूर्ण कारण ये रहा कि वे आकाशवाणी के शक्तिशाली समय में भी मृदु और दंभ से परे बने रहे.अब आकाशवाणी बुरे दौर से गुज़र रहा है और जिन लोगों ने वहाँ अकड़कर काम किया उनकी क्या फ़ज़ीहत है वह पूरा शहर जानता है.

आकाशवाणी इन्दौर का वर्तमान रूखा दौर शायद मालवा हाउस के इस सपूत पर कोई रस्मी कार्यक्रम कर अपनी ज़िम्मेदारी की इतिश्री कर ले या न भी करे लेकिन बिलाशक इस परिसर के ज़र्रे ज़र्रे में मोहक मुस्कान और बड़ी-बड़ी आँखों वाले नंदाजी के किये हुए काम के सुनहरे कलेवर जगमागाते रहेंगे. दुबेजी ज़िंदगी भर अपनी माँ की नसीहत का पालन करते रहे कि ’नाना छटाक भर का मन पे...मन भर को वजन मती लीजे”(बेटा छोटे से दिल पर ज़माने भर का तनाव मत रखना) वाक़ई वे बिलकुल तनावमुक्तरह कर ख़ामोशी से अपना कर्म करते रहे और सौजन्यता की प्रतिमूर्ति बन कर मावला-निमाड़ के जनमानस पर छाए रहे.शब्द और स्वर से संगसाथ का अपना धर्म निबाहते रहे. मालवा हाउस के कर्मी उन्हें याद न करें न करें...लेकिन उस परिसर के बूढ़े पेड़ ज़रूर नंदाजी की याद में आँसू बहा रहे होंगे.राम राम हो नंदाजी

संजय पटेल