08 अगस्त, 2011

नाज़िम हिकमत की लम्बी कविता

तुर्की कवि नाज़िम हिकमत का जन्म 1902 में सलोनिका, ओट्टोमान साम्राज्य ( वर्तमान में ग्रीस का एक राज्य ) में हुआ. घर में रचनात्मक माहौल होने के कारण उन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा. कवि होने के साथ-साथ वे नाटककार और उपन्यासकार भी थे. उच्च शिक्षा के लिए नाज़िम मॉस्को गए, जहाँ रहते हुए वे दुनिया भर के कई लेखकों, कवियों और कलाकारों के संपर्क में आए. 1928 में रूस से तुर्की वापस आकर एक प्रूफरीडर, पत्रकार और अनुवादक के बतौर काम करते हुए नाज़िम के कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए. अपनी वामपंथी विचारधारा और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जीवन का एक लम्बा अरसा उन्हें जेल में ही बिताना पड़ा. 1951 में हमेशा के लिए तुर्की छोड़ कर वे तत्कालीन सोवियत संघ चले गए, कुछ समय के लिए यूरोप भी रहे और अंत तक अपनी विचारधारा के लिए काम करते रहे. 1963 में ह्रदयाघात के कारण मॉस्को में ही उनका निधन हुआ.
प्रस्तुत है, अपने जेल के दिनों में उनके द्वारा लिखी गयी एक लम्बी कविता :





जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया

नाज़िम हिक़मत











जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
पृथ्वी सूरज के गिर्द दस चक्कर काट चुकी है

अगर तुम पृथ्वी से पूछो,
वह कहेगी- यह जरा-सा वक़्त भी कोई चीज़ है भला !
अगर तुम मुझसे पूछो,
मैं कहूँगा- मेरी ज़िन्दगी के दस साल साफ़ !

जिस रोज मुझे क़ैद किया गया
एक छोटी-सी पेंसिल थी मेरे पास
जिसे मैंने हफ़्ते भर में घिस डाला।
अगर तुम पेन्सिल से पूछो,
वह कहेगी- मेरी पूरी ज़िन्दगी !
अगर तुम मुझसे पूछो, मैं कहूँगा- ले भला, एक हफ़्ता ही तो चली !

जब मैं पहले-पहल इस गड्ढे में आया-
हत्या के जुर्म में सजा काटता हुआ उस्मान
साढ़े सात बरस बाद छूट गया।
बाहर कुछ अर्सा मौज़-मस्ती में गुज़ार
फिर तस्करी में धर लिया गया
और छः महीने बाद रिहा भी हो गया
कल किसी ने सुना-उसकी शादी हो गई है
आते बसन्त में वह बाप बनने वाला है।

अपनी दसवीं सालगिरह मना रहे हैं वे बच्चे
जो उस दिन कोख में आए
जिस दिन मुझे इस गड्ढे में फेंका गया।
ठीक उसी दिन जनमे
अपनी लम्बी छरहरी टाँगों पर काँपते बछड़े अब तक
चौड़े कूल्हे हिलाती आलसी घोड़ियों में तब्दील हो चुके होंगे।
लेकिन जैतून की युवा शाखें
अब भी बढ़ रही हैं।

वे मुझे बताते हैं
नयी-नयी इमारतें और चौक बन रहे हैं
मेरे शहर में जब से मैं यहाँ आया
और उस छोटे-से घर मेरा परिवार
अब ऎसी गली में रहता है,
जिसे मैं जानता नहीं,
किसी दूसरे घर में
जिसे मैं देख नहीं सकता।

अछूती कपास की तरह सफ़ेद थी रोटी
जिस साल मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
फिर उस पर राशन लग गया
यहाँ, इन कोठरियों में
काली रोटी के मुट्ठी भर चूर के लिए
लोगों ने एक-दूसरे की हत्याएँ की,
अब हालात कुछ बेहतर हैं
लेकिन जो रोटी हमें मिलती है,
उसमें कोई स्वाद नहीं।

जिस साल मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
दूसरा विश्व युद्ध शुरू नहीं हुआ था,
दचाऊ के यातना शिविरों में
गैस भट्ठियाँ नहीं बनी थीं,
हीरोशिमा में अणु-विस्फोट नहीं हुआ था।

आह, समय कैसे बहता चला गया है
क़त्ल किए गये बच्चे के रक्त की तरह।
वह सब अब बीती हुई बात है।
लेकिन अमरीकी डालर
अभी से तीसरे विश्व युद्ध की बात कर रहा है
तिस पर भी,
दिन उस दिन से ज्यादा उलझे हैं
जबसे मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
उस दिन से अब तक मेरे लोगों ने ख़ुद को
कुहनियों के बल आधा उठा लिया है
पृथ्वी दस बार सूरज के गिर्द
चक्कर काट चुकी है………..

लेकिन मैं दोहराता हूँ
उसी उत्कट अभिलाषा के साथ
जो मैंने लिखा था अपने लोगों के लिए
दस बरस पहले आज ही के दिन

तुम असंख्य हो
धरती में चीटियों की तरह
सागर में मछलियों की तरह
आकाश में चिड़ियों की तरह
कायर हो या साहसी, साक्षर हो या निरक्षर,
लेकिन क्योंकि सारे कार्यों को
तुम्हीं बनाते या बर्बाद करते हो,
इसलिए सिर्फ़ तुम्हारी गाथाएँ
गीतों में गायी जाएँगी
बाक़ी सब कुछ
जैसे मेरी दस वर्षों की यातना
फालतू की बात है।

( अनुवाद: नीलाभ )



1 टिप्पणी:

  1. तुम असंख्य हो
    धरती में चीटियों की तरह
    सागर में मछलियों की तरह
    आकाश में चिड़ियों की तरह
    कायर हो या साहसी, साक्षर हो या निरक्षर,
    लेकिन क्योंकि सारे कार्यों को
    तुम्हीं बनाते या बर्बाद करते हो,
    इसलिए सिर्फ़ तुम्हारी गाथाएँ
    गीतों में गायी जाएँगी
    बाक़ी सब कुछ
    जैसे मेरी दस वर्षों की यातना
    फालतू की बात है।

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    बेहतरीन कविता, बधाई।
    नाजिम हिकमत की कविता है भाई।

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