04 फ़रवरी, 2015

कविताएँ शहनाज़ इमरानी जी की हैं और उन पर टिप्पणी श्री अरुण आदित्य ने की है..

आज मैं आपको बिजूका एक में कल पोस्ट
की गयी कविताएँ और टिप्पणी पढ़ने के लिए
पोस्ट कर रहा हूँ....
इन कविताओं और टिप्पणी पर बिजूका एक में ख़ूब बातें हुई. है...
समूह में कुछ साथी ऐसे भी हैं..जो बिजूका एक में भी है...उनसे अनुरोध है कि वे बातचीत भाग ले लेकिन कवि और टिप्पणीकार का नाम ओपन न करे

1. शब्दों का जाल
 शब्द छोटे बड़े
शब्द हलके वज़नदार
शब्द कड़वे, मीठे, तीखे
शब्द दुश्मन शब्द ही दोस्त
शब्द बोलते अन्दर और बाहर
शब्द उलझ जाते बातों में
शब्द बहे जाते भावनाओं में
शब्द फँस जाते मोह-माया में
शब्द जल जाते है नफरतों में
शब्द भाषण की आग बनते है
शब्द राजनीति कि शतरंज बनते है
शब्द फटते बम कि तरह
शब्द सवाल खड़े करते
शब्द जवाब बन जाते
शब्द सूरज में धूप बने
शब्द अँधेरों में मशालों से जले
शब्द गोल रोटी में बेले गए
शब्द बुझे चूहले की राख़ बने
शब्द स्त्री की पीड़ा में उतरे
शब्द परुष का एहम बने
शब्द ज़ंजीरों में क़ैद हुए
शब्द गुलाम बने
शब्द बने बटवारा
शब्द बने ज़ख्म
शब्द बने जंग
शब्द बने क्रान्ति
कुछ शब्द गुम हुए
कुछ नए आये
शब्द बच्चे की मुस्कान बने
शब्द लड़की कि खिलखिलाहट बने
शब्द खिलते हैं फूलों कि तरह
शब्द उड़ते है तितलियों कि तरह
शब्द मौसम में बाद जाते है
शब्द इंद्रधनुष बनाते है
शब्द उगते है प्यार की तरह।

2 . दीवारें

बरसों से बनती आ रही है दीवारें
मिट्टी गारे की, ईंट पत्थरों की
लकड़ी, मार्बल, सीमेंट की
तरह-तरह की दीवारें
कुछ सीलन से भरी ,काई लगी
झुकी हुई गिरती हुई
कुछ मज़बूत और बहुत ऊँची
छोटी और कमज़ोर दीवारों
मज़बूत दीवारें को देखती हैं
पर मज़बूत दीवारें तनी रहती है
वो झुक कर छोटी और कमज़ोर
दीवारों को नहीं देखतीं
दीवारें दिलों में नफ़रत की
दीवारें घरों में सुरक्षा की
कुछ टूटे हुए लोग रोते हैं इनसे लिपट कर
कुछ थके हुए लोगों का सहारा होती है
कुछ दीवारें फलांग जाते है और कुछ दीवारें तोड़ते है
कुछ तस्वीरें ,पोस्टर और नारो से भरी
कहीं कैनवस बनी चित्रकार का
और कहीं इंसान के हाथों दुरपयोग का
लिखी जाती है इन के ऊपर गालियाँ
अशलील शब्द और थूक दिया जाता है
यह तब भी चुप रहती है
कहते हैं इनके कान होते हैं
यह सब कुछ सुनती है
कोई विरोध नहीं गुस्सा नहीं
जब चाहो बना दो जब चाहे गिरा दो
कुछ दीवारें समय के साथ गिर गयीं
कुछ दीवारों के निशान बाक़ी हैं
कुछ अनदेखी दीवारें लगातार बन रही है।


3 . गंदी बस्ती


दौड़ती सड़कों और रौशनियों की चकाचोंध
ऊँची इमारतों के पीछे
जहाँ सभ्यता का कचरा पड़ा होता है
इस बस्ती को लोग
गंदी बस्ती के नाम से जानते हैं
कच्चे आधे अधूरे घर
बेतरतीब ऊग आई झोंपड़ियां
गन्दे पर्दों के पीछे से झाँकती औरतें और बच्चे                
बस्ती में रहने वाले लोग के
कपड़ों के नाम पर चीथड़े और
ज़ुबान के नाम पर इनके पास
बेशुमार गालियाँ हैं
इनकी एक अलग दुनिया है
जिसके सारे कायदे -कानून पेट से शुरू और
पेट ही में खत्म होते है
भूखे ,नंगे, कुपोषण और बीमारियों के बीच
बच्चे पलते और बूढ़े मर जाते
मर्द शराब और जुए में डूबे रहते है
औरतें दूसरों के घरों में बर्तन मांझतीं
कपड़े धोतीं ,पोछा लगतीं
रोज शाम को मर्द नशे में घर आते
कभी पत्नी और बच्चों को पीटते
कभी ज़्यादा पी लेने से उल्टियाँ करते
औरतें कपडे धोतीं बच्चे पालतीं
मर्दों के हाथों पिटतीं है
फिर भी उनकी सेवा करती
और उनकी इच्छायें पूरी करतीं
हर एक महानगरों के हैरान
करने वाले मंज़र और रोमांच में
यह बस्तियां भी शामिल है।

4 . हादसा

एक हादसा हुआ
कहाँ हुआ क्यों हुआ
इससे क्या फ़र्क़ पढ़ता है
हादसे के बाद
दूसरे हादसे का इंतज़ार
ज्यादा नहीं करना पढता
कुछ नाके सूंघ सकती हैं
कुछ आँखें पढ़ सकती है
कुछ साँसें तैज़ हो कर
इज़हार करती है
और कुछ साँसे
मुतावातिर चलती रहती है।



5 . हद

हद का ख़ुद कोई वजूद नहीं होता
वो तो बनाई जाती है
जैसे क़िले बनाये जाते थे
हिफ़ाज़त के लिए
हम बनाते है हद
ज़रूरतों के मुताबिक़
अपने मतलब के लिए
दूसरों को छोटा करने के लिए
कि हमारा क़द कुछ ऊँचा दिखता रहे
छिपाने को अपनी कमज़ोरियों के दाग़-धब्बे
कभी इसे घटाते हैं कभी बड़ा करते हैं
हद बनने के बाद
बनती हैं रेखाएं,दायरे
और फिर बन जाता है नुक्ता
शुरू  होता है
हद के बाहर ही
खुला आसमान , बहती हवा
नीला समन्दर , ज़मीन की ख़ूबसूरती
06:21, Jan 20 - Satyanarayan:


टिप्पणी                                                                                  

प्रसिद्ध ब्रिटिश कवि-चिंतक क्रिस्टोफर काडवेल ने लिखा है कि कविता वह है जो पढ़ते हुए पाठक के भीतर घटित होती है। एक पाठक के रूप में मुझे भी लगता है कि किसी कविता की सफलता इस बात पर निभर्र करती है कि उसे पढ़ने के बाद पाठक के मन के भीतर क्या होता है। क्या वह उसकी संवेदना के तंतुओं को कुछ और सक्रिय करती है। पढ़ते हुए उसे आनंद की कोई लय मिलती है, या उदासी के वलय में घिरा महसूस करता है। आखिर उसे पढ़ने के बाद हासिल क्या है, कोई नई दृष्टि, कोई रोष-आक्रोश, तनकर खड़े होने का आत्मबल, या कम से कम एक बेबसी या बेकली का अनुभव ही। क्या उसे पढ़ने के बाद पाठक वह नहीं रह जाता, जो कविता पढ़ने के पहले था। इन कविताओं को पढ़ने के बाद मेरा पाठक ऐसी किसी समृद्धि का अनुभव नहीं कर पा रहा है, यह मेरा पूर्वाग्रह भी हो सकता है। पर इन कविताओं में कहीं-कहीं विचार और संवेदना के जो स्फुलिंग हैं, उनके आधार पर मुझे पक्का विश्वास है कि इस कवि में श्रेष्ठ कविताएं रचने की संभावना और क्षमता है। कवि के पास दमदार कथ्य है। थोड़े से सृजनात्मक-संयम, शिल्प की थोड़ी सी सजगता से कवि अगर इन कविताओं पर फिर से कुछ काम करे तो ये महत्वपूर्ण कविताएं हो सकती हैं। बहरहाल इन कविताओं के बारे में कुछ छिटपुट बातें-
' दीवारें' कविता में दीवार के अनेक रूपक हैं। इसमें दीवार को कहीं सकारात्मक तो कहीं नकारात्मक बिम्ब के रूप में रचा गया है। यह दीवार कहीं समर्थ और असमर्थ, शक्तिशाली और कमजोर के बीच भेद करने वाली हद है तो कहीं टूटे और थके लोगों का सहारा भी है। कहीं वह नफरत की प्रतीक है तो कहीं सुरक्षा की। ' शब्दों का जाल' कविता की तरह यहां भी लगता है कि दीवार के बारे में कवि को जो कुछ सूझा, सब पंक्ति-दर-पंक्ति लिख दिया गया है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है, जिसमें शिक्षिका छात्र से कहती है, दीवार पर निबंध लिखो। चंद सेकंड्स के उस विज्ञापन में बहुत कम शब्दों में पर्याप्त खूबसूरती के साथ अपनी बात कह दी गई है। संवेदनाओं को बेचने वाले विज्ञापन के बरअक्स संवेदना को बचाने वाली कविता को ज्यादा मर्मस्पर्शी होना पडे़गा। संवेदना की नमी, विचार के ताप और शिल्प की रोशनी के बीच ही एक अच्छी कविता का अंकुरण होता है।
' हद' शीषर्क कविता मनुष्य द्वारा स्वार्थ के लिए बनाई गई सीमाओं की सीमा बताती है। कि हदें किस तरह हमारी स्वतंत्रता को बाधित करती हैं, कि किस तरह आदमी अपने कद को बड़ा दिखाने के लिए दूसरों की हदें तय करता है। कविता बताती है कि ' हद के बाहर ही शुरू होता है खुला आसमान, बहती हवा, नीला समंदर, जमीन की खूबसूरती'। इन पंक्तियों में जो कुछ कहा गया है, सब सच है, लेकिन कविता अपने कहन में इस सच की खूबसूरती को वहन नहीं कर पाती। एक अच्छा कवि इस बात को लेकर हमेशा सजग रहता है कि कविता सिर्फ अपने भाव में नहीं बल्कि अपने रचाव में भी रहती है। शिल्प की दृष्टि इस कविता पर और काम करने की जरूरत है।
' शब्दों का जाल' कविता खुद भी शब्दों का जाल बनकर रह गई है। लगता है कि शब्दों के बारे में जो भी विशेषण, भाव, विचार कवि के मन में आए, उन्हें एक के ऊपर एक ऐसे रख दिया गया है, जैसे कोई एक के ऊपर एक ईंटें रख दे। ईंटों का यह ढेर किसी सुगठित संरचना का आभास नहीं देता। इस कविता में शब्दों के बारे में तमाम बड़ी-छोटी बातें हैं, पर इस शब्द-मीमांसा से हासिल कुछ नहीं होता।
'हादसा' कविता के केंद्र में यह भाव है कि आज हमारे जीवन में हादसे इस तरह आम हो गए हैं कि किसी को किसी हादसे से कोई फर्क ही नहीं पड़ता। यह कविता बहुत सपाट तरीके से शुरू होती है -' एक हादसा हुआ, कहां हुआ, क्यों हुआ, इससे क्या फर्क पड़ता है।' सवाल यह है कि एक के बाद एक हादसे हों, तो भी क्या इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई हादसा क्यों हुआ, कहां हुआ? हर हादसा एक नया दर्द, एक नया सबक देकर जाता है। ऐसे में एक सजग कवि 'क्या पर्क पड़ता है' जैसी सरलीकृत शब्दावली से काम नहीं चला सकता है। 'कुछ सांसे मुतवातिर चलती रहती हैं', जैसे सपाट बयान के साथ यह कविता खत्म हो जाती है और पाठक अपने हासिल का हिसाब लगाता जहां का तहां खड़ा रह जाता है।
'गंदी बस्ती' कविता में कवि कहना चाहता है कि महानगरों की जो चकाचौंध है उसे बनाने संवारने में इन तथाकथित गंदी बस्ती वालों का महत्वपूर्ण योगदान है। बात में दम ह लेकिन कविता में स्थूल विवरणों को बहुत सरलीकृत ढंग से प्रस्तुत किया गया है। कविता जब चीजों को सतह पर देखकर लिखी जाती है, तो शायद इसी तरह बनती है। जबकि एक कवि को कुछ अलग तरह से चीजों को देखना होता है। इस बारे में युवा कवि काप्पुस को संबोधित प्रसिद्ध जर्मन कवि राइनेर मारिया रिल्के की पंक्तियां किसी भी युवा कवि के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकती हैं- " एक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत से नगर और नागरिक वस्तुएँ देखनी जाननी चाहिए। बहुत से पशु पक्षियों के उड़ने का ढब। नन्हे फूलो के किसी कोरे प्रात में खिलने की मुद्रा। अज्ञात प्रदेशों और अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। औचक के मिलन । कब से प्रस्तावित बिछोह। बचपन के निपट अजाने दिनों के अनबूझे रहस्य। माता-पिता, जिन्हे आहत करना पड़ा था, क्यों कि उनके जुटाए सुख उस घड़ी आत्मसात नहीं हो पाए थे। आमूल बदल देने वालीं छुटपन की रुग्णताएँ। खमोश कमरों में दुबके दिन। समुद्र की प्रात। समुद्र खुद। सब समुद्र सितारों से होड़ लगातीं यात्रा की गतिवान रातें। नहीं इतना भर नहीं। उद्दाम रातों की नेह भरी स्मृतियाँ... प्रसव में छटपटाती औरत की चीखें। पीला आलोक। निद्रा में उभरती सद्यः प्रसूता। मरणासन्न के सिरहाने ठिठकें क्षण। मृतक के साथ खुली खिड़की वाले कमरे में गुजारी रात्रि और छिटका शोर। नहीं, इन सब यादों में तिर जाना काफी नहीं। तुम्हें और भी कुछ चाहिए-इस स्मृति संपदा को भुला देने का बल। इनके लौटने को देखने का अनन्त धीरज। जानते हुए कि इस बार जब वे आएँगी तो यादें नहीं होंगी। जो अचानक अनूठे शब्दों में फूट कर, किसी भी घड़ी बोल देना चाहेंगी अपने-आप को।"


कविताएँ  शहनाज़ इमरानी जी की हैं और उन पर टिप्पणी श्री अरुण आदित्य ने की है..
.दोनों ही  साथी बिजूका एक से हैं...यह पोस्ट वहीं से ली थी....
इस टिप्पणी और कविताओं पर ख़ूब बात हुई उस समूह में....
यहाँ भी जिन्होंने अपना मत ज़ाहिर किया उनका शुक्रिया...
जिन्होंने सिर्फ़ पढ़ा उनका भी आभार....
21.01.2015

आपका साथी
सत्यनारायण पटेल

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