22 जनवरी, 2017

सुश्री गीतिका द्विवेदी जी का एक संस्मरण

मित्रो समूह की साथी सुश्री गीतिका द्विवेदी जी का एक संस्मरण पोस्ट कर रहा हूँ...पढ़िए

विदाई( गीतिका द्विवेदी)


• आज शाम कुछ काम से मेन रोड गई थी।वहाँ एक मंगल कार्यालय है जहाँ अकसर शादियाँ होती रहती हैं।कभी बारात आते हुए सड़क की यातायात व्यवस्था अवरुद्ध हो जाती है तो कभी विदाई के समय भीड़ के कारण आने -जाने में लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है।इस प्रकार का माहौल लगभग हमारे दिनचर्या का अंग बन गया है।परंतु आज जो दृश्य मैं मंगल कार्यालय के बाहर देखी उसके बाद मेरा मन बहुत अशांत हो गया।मन बार-बार विचलित हो उठता है।वही खुली लाल कार पर बेला फूल की लड़ियों से चारखाना सजावट।कार में रोते हुई विदा लेती दुल्हन और उसके हाथ को न छोड़ती बिलखती हुई एक औरत जो शायद उसकी बहन थी या भाभी।घर आने के बाद भी बार-बार वही दृश्य मेरे आँखों के सामने घूमता रहा और एक बहुत पुरानी घटना जो मेरे परिवार में घटित हुई थी वो सब किसी चलचित्र की भाँति मेरे समक्ष प्रकट होने लगी।
•             तब मैं आठ साल की थी मेरी मौसी की शादी होने वाली थी मेरी बड़ी मामी मेरी मौसी को बहुत प्यार करती थीं।दोनों में इतना प्यार था कि जब भी ननद और भाभी के सम्बन्ध की चर्चा होती थी तो उन दोनों का मिसाल दिया जाता था।बहुत कांटने- छांटने के बाद गौरी मामी तनु मौसी की शादी के लिए मानीं थीं क्योंकि उन्हें कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था।उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी तब भी शादी की सारी तैयारी मामी के देखरेख में हो रही थी।गौरी मामी विशाल हृदय वाली थीं।तनु मौसी भी उन्हें बहुत प्यार करती
• थीं।उन दोनों के प्यार को मेरा बाल मन महसूस तो करता था किंतु आज भी उन दोनों के बीच के रिश्ते को शब्दों के माध्यम से समझा पाने में मैं असमर्थ हूँ। विशेषकर ननद-भाभी के रिश्ते में तो अकसर कटुता के भाव ही देखने सुनने को मिलते हैं।ऐसे में आज भी उन दोनों के बीच के प्यार को मैं महसूस तो कर सकती हूँ किन्तु व्यक्त नही कर पा रही हूँ शायद मेरी पूरी रचना पढ़ने के बाद आप सभी समझ पाएं।
•           गौरी मामी का बड़े दिल का होना शायद ईश्वर को भी रास आ गया था इसलिए उस छोटी सी उम्र में उन्हें दिल की बीमारी हो गई थी।डाक्टर ने पहले से ही हिदायतें दे रक्खी थी कि मामी का बहुत ध्यान रखना होगा।उनके सेहत के लिए बहुत अधिक खुशी और गम  ठीक नहीं है।शादी वाले घर में उनके सेहत के  साथ लापरवाही हो सकती है इसलिए उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाने के मत से परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने सहमति जताई किंतु गौरी मामी इस प्रस्ताव को सुनते ही भड़क उठीं।'तनु की शादी मेरे बगैर आप लोग करने को सोच भी कैसे सकते हैं।जब से शादी करके इस घर में आई हूँ तब से तनु मेरे आँखों के सामने रही है।आप लोग जानते हैं कि मैं अपने मायके भी तनु के बिना नहीं रह पाती हूँ।एक तो मेरे मन के विरुद्ध दूसरे शहर में तनु का रिश्ता तय कर दिया गया। यह सोच कर मुझे रोना आता है कि मैं तनु से दूर कैसे रह पाऊंगी?आपलोग उसकी विदाई से पहले ही मुझे उससे दूर कर देना चाहते हैं '।गौरी मामी ने मामा से कहा-"कान खोल कर सुन लीजिए आप , तनु की शादी में एक-एक चीज़ मेरी मर्जी की होगी ऐसी शादी होगी  मेरी तनु की कि पूरा  शहर इस शादी को कभी भूल  नहीं पाएगा।उनकी तबीयत बिगड़ न जाए इस कारण मामा उनकी छोटी हो या बड़ी बात सभी को पूरा करने के लिए जी जान लगा देते थे।एक तरफ मात्र छह महीने का छोटा बच्चा दूसरी तरफ मामी की उठती-गिरती तबीयत के बीच हर दिन गौरी मामी की नित नई माँग।उन माँगों में सबसे अटल माँग ये कि तनु मौसी की बारात लाल रंग के खुली गाड़ी में आएगी और विदाई भी मौसी की उसी गाड़ी में होगी।पूरे कार की सजावट बेला फूल की लड़ियों से चारखाने डिज़ाइन में होगी।उस वक्त पूरे शहर में सिर्फ दो ऐसी गाड़ियाँ थीं। उसे भाड़े पर लेना साधारण लोगों के वश में नहीं था।मामा अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य लगा दिये उस गाड़ी को मंगवाने के लिए।मामा चाहते थे कि बस एक बार शादी अच्छे से सम्पन्न हो जाए फिर मामी को अस्पताल में भर्ती करवा कर अच्छे से इलाज करवाया जाएगा।गौरी मामी के अनुसार सारा इंतज़ाम होता रहा और शादी का वह मंगल मुहूर्त भी आ गया।हमारे यहाँ के घर इतने बड़े होते थे कि शादी के लिए मंगल कार्यालय लेने की आवश्यकता नहीं होती थी।पूरा घर मेहमानों से भरा था।एक के बाद एक शादी का कार्यक्रम होने लगा।मामी हर कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती रहीं।उत्तर भारत में बारात शाम में आती है।पूरी रात शादी होती है।दूसरे दिन बारात को दोपहर का खाना खिलाने के बाद शाम में तनु मौसी की विदाई होनी   थी क्योंकि ट्रेन रात की थी।
•         शाम को शानदार बारात लगी।खुले लाल कार पर  बेला के फूल  के चारखाने डिज़ाइन से सजे  कार को देख कर जितना अधिक गौरी मामी खुश हुई उतना ही वह सजीले दूल्हे को देख कर खुश होती हुई मामा को आँखों ही आँखों में संतुष्टि का अहसास करवाती हुई विध-व्यवहार करने के लिए आगे बढ़ गईं ।हँस-हँस कर मौसा जी की आरती उतारीं।मौसी को लेकर मंडप में गईं।एक -एक विधि मामी ने मंडप में बैठ कर करवाया।कन्यादान के समय अपने आप को संभालने के बाबजूद भी सिसकी निकल ही गई।मौसी परेशान न हो जाए इसके लिए गौरी मामी ने अपने आप को काबू में किया और गीत गातीं औरतें के साथ सुर मिलाने की असफल कोशिश करने लगीं।इस बीच कई बार मामा आ कर उन्हें आराम करने की हिदायत देते रहे किंतु हर बार मामी उनके आग्रह को ठुकरा कर थोड़ी मुहलत माँग लेती थीं और तन्मयता से विवाह के विधि में तल्लीन हो जाती थीं।
• विवाह सम्पन्न हो ही चुका था सिंदूरदान के बाद पाँच सुहागन वधु को सिंदूर लगातीं हैं।गौरी मामी सबसे पहले तनु मौसी को सिंदूर लगाईं,चुमावन किया और मौसा जी और तनु मौसी को भरपूर निहारते हुए मौसा जी को कहीं -'आज से मेरी तनु आपकी हुई।पहले मुझे लगता था कि तनु और मैं एक दूसरे के बिना नहीं रह पाएगें पर आपको देखने के बाद मैं निश्चिंत  हो गई हूँ ।अब मुझे नींद आ रही है तनु मैं सोने जा रही हूँ' ।  गौरी मामी सोने चली गईं।
•         गौरी मामी के कमरे में ही कोहबर बनाया गया था। मंडप में शादी हो जाने के बाद यहाँ तनु मौसी और मौसा जी को आना था और यहाँ भी कुछ विवाह की विधि होने वाली थी।गौरी मामी अपने छह माह के बेटे को कलेजे से चिपटा कर पलंग पर सो गईं ।वह इस तरह लेटीं थीं कि उनका पैर पलंग से बाहर था।थोड़ी ही देर में तनु मौसी और मौसा जी उस कमरे में आ गए।जमीन पर कोहबर के सामने दोनों को बिठाकर  रस्म होने लगा।कौड़ी खेलना,एक दूसरे को दहीं खिलाना।हँसी-ठहाकों के बीच रस्म चल रहा था   मैंने देखा गौरी मामी का पैर बार -बार तनु मौसी को छू जाता था।उसी बीच मामा उस कमरे में मामी को दवा देने के लिये आए।उन्हें धीरे से थपकी देते हुए उठाना चाहे किंतु कोई हरकत नहीं हुई।नाक के पास हाथ ले जाकर देखा फिर नब्ज़ टटोला,कुछ पता नहीं चल रहा था।उधर नए नबेले वर-वधु के साथ औरतों के हँसी-मजाक का माहौल गरमाता जा रहा था इधर गौरी मामी लगभग ठंडी पड़ती जा रहीं थीं।छोटे मामा को गाड़ी निकालने को कह कर मामा ने घरवालों को कहा कि अब शादी तो समाप्त हो गई है इसलिए गौरी को अस्पताल में दाखिल करवाने जा रहा हूँ।नानी ने थोड़ा विरोध किया -'जैसे इतनी देर रही है तो कुछ घंटे और बहु को रहने दे।तनु की विदाई के बाद अस्पताल में रख आना गौरी को '।तनु मौसी की कातर आँखें भी शायद यही कह रही थी कि थोड़ी देर और भाभी को मेरे पास रहने दो।मामा के ऊपर किसी के बातों का कोई असर नहीं हो रहा था।गौरी मामी को अस्पताल  ले जाया गया।डाक्टर ने देखते ही कहा कि गौरी मामी आधा घंटा पहले ही गुज़र गईं।                                                    
•        उधर एकलौती बहन की शादी की खुशी का माहौल इधर अपनी जीवन संगीनी के जीवन के अंत का अनंत,असहृय दुख।बहन को विदा होने में बारह घंटे की अवधि थी क्योंकि ट्रेन रात की थी किंतु पत्नी को अलविदा करने के लिए वक्त ही नहीं बचा था।जनमासे में बारात ठहरी हुई थी,घर में रिश्तेदारों का जमघट।तनु मौसी को गौरी मामी के निधन का समाचार मामा देना नहीं चाहते थे।वृद्ध माता -पिता को  यह खबर कैसे दें!  छह महीने के बेटे से गौरी मामी को कितनी मुश्किल से अलग कर लाए थे उनका दिल ही जानता है।मामा समस्याओं के जाल में ऐसे फंसे थे कि उन्हें अपने हमसफ़र के निधन पर शोक मनाने का भी वक्त नहीं था।मामा ने सबसे पहले यह सोचा कि सबसे पहले  घर से तनु मौसी की विदाई कर दें उसके बाद गौरी मामी के विषय में घर वालों को बताया जाए।परंतु यह काम इतना आसान नहीं था।बारह घंटे पहले मौसी की विदाई सम्भव नहीं थी।आखिरकार मामा जनमासे में जाकर बारातियों से मामी के निधन का समाचार सुना कर आग्रह किये कि शीघ्र से शीघ्र वो लोग मौसी को विदा हो कर के स्टेशन चलें जाएं ताकि गौरी मामी का  शव घर में लाया जा सके।आनन-फानन में सबेरे -सबेरे तनु मौसी की विदाई कर दी गयी।बेला फूल से सजे उस खुले लाल कार पर मौसी को विदा करने का किसी को होश नहीं था।तनु मौसी बार-बार गौरी मामी से मिलने की ज़िद करती रहीं परंतु गौरी मामी की अस्पताल में दाखिल होने की बात और खराब तबीयत का बहाना बना कर उन्हें विदा कर स्टेशन भेज दिया गया।
•        जिस आँगन में रात को सजे-धजे हरे बाँस के मंडप में शादी का माहौल था उसी आँगन ने सुबह ऐसा रूप धारण कर लिया जिसे लिखते हुए आज भी मेरी रुह कांप जाती है।गौरी मामी के शव को लाने के पहले शादी के मंडप को उखाड़ा जाने लगा।जिस गौरी मामीको रात शादी के मंडप में सुहागन के रुप में शुभ माना
• गया था आज प्राण पखेरू क्या उड़े उन्हें अशुभ मुर्दा माना जाने लगा।तभी तो उस मंडप के हरे बांस को सवा महीने के पहले ही कुछ घंटे में ही वहाँ से दूर हटा दिया गया।कुछ ही देर में कुछ और हरे बाँस आए किंतु ये खड़े रहने के लिए नहीं बल्कि अर्थी बनने के लिए , जिस पर सुहागन गौरी मामी लाल बनारसी साड़ी और सोलह श्रृंगार जिस आँगन में रात को सजे-धजे हरे बाँस के मंडप में शादी का माहौल था उसी हरे आँगन ने सुबह ऐसा रुप धारण कर लिया जिसे लिखते हुए आज भी मेरी रुह काँप जाती है।गौरी मामी के शव को लाने के पहले शादी के मंडप को उखाड़ा जाने लगा।जिस गौरी मामी को रात शादी के मंडप में सुहागन के रुप में शुभ माना गया था आज प्राण पखेरू क्या उड़े उन्हें अशुभ मुर्दा माना जाने लगा।तभी तो उस मंडप के हरे बांस को सवा महीने के पहले ही कुछ घंटे में ही वहाँ से दूर हटा दिया गया।कुछ ही देर में कुछ और हरे बाँस आए किंतु ये खड़े रह कर शुभ का प्रतीक बनने के लिए नहीं बल्कि खुद को गिरा कर अर्थी बनने के लिए थे।सुहागन गौरी मामी को लाल बनारसी साड़ी और सोलह श्रृंगार किया गया।मामा जब अंतिम बार उनकी माँग भरने लगे तो वहाँ उपस्थित सभी लोग फूट-फूट कर रो पड़े परंतु मैं रो नहीं पाई।मैं एकटक गौरी मामी को देखे जा रही थी।मुझे ऐसा लग रहा था कि अब मामी उठ जाएगीं ।पर मेरा विश्वास टूट गया।सजधज कर मामी अपनी अंतिम यात्रा के लिए निकल गईं।यह घटना याद कर आज भी मैं सोचती हूँ कि यह कैसी विदाई थी!तनु मौसी अपने मायके से विदा हुईं और गौरी मामी इस संसार से ...!!
संस्मरण
गीतिका द्विवेदी
पुणे

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