01 नवंबर, 2017

विपिन चौधरी की कविताएं:

विपिन चौधरी: का जन्म 2 अप्रैल, को गाँव खरकड़ी माखवान, जिला भिवानी( हरियाणा)  में हुआ। बी.एस.सी ( प्राणी विज्ञान), एम्.ए (लोक प्रकाशन) एम्.ए ( अंतररास्ट्रीय मानव अधिकार) की शिक्षा हासिल की है। आपकी कविताओं में गहरी रुचि है। आपकी नकविताओं के क्रमशः तीन संग्रह- 'अँधेरे के मध्य से'( 2008)  एवं ' एक बार फिर'( 2008 )  नीली आंखों में नक्षत्र' कविता संग्रह ( 2017 )  प्रकाशित हैं। चर्चित हैं। आपने 2013 में अश्वेत लेखिका माया एंजेलीना की जीवनी- ' मैं रोज़ उदित होती हूँ ' लिखी है।

विपिन चौधरी
अनुवाद में रुचि के चलते रस्किन बांड, ऐमिली ब्रोंटे, मैरीवूलेनस्टोनक्राफ्ट,  सरदार अजीत सिंह की  कहानियों, जीवनी और आत्मकथाओं का अनुवाद है। आप दिल्ली में रहती है और स्वतंत्र लेखन करती है।


 कविताएं


एक

सलामत भाई

जानवरों की जमात में
सबसे शरारती प्राणी को नचाना जानते हो तुम
कितना हुनर है तुम्हारे हाथों में
सलामत भाई

तुम्हारे कहने पर बंदर टोपी पहन लेता है
आँखे छपकाता
कलाबातियाँ खाते हुए
झट से आकर तुम्हारी गोद में बैठ जाता है
एक जानवर से तुम्हारा रिश्ता
अजीब सी ठंडक देता है


ज़रा, हमारी ओर देख
तुम ओर तुम्हारा बंदर दोनों
तरस खाओ

हमारे अगल बगल जितने लोग खङे हैं
उनमें से किसी से भी
हमारा मन नहीं जुङता

गर्म देश के
बेहद ठंडे इंसान हैं हम
सलामत भाई


तुम जानते नहीं
हमारे पास
शोक मनाने तक का वक्त भी नही है
तुम अपनी गढी हुई दुनिया से
नंगे पाँव चलकर
आते हो और तमाशा
समेट कर वापिस लौट जाते हो
हमें पहले से बनी हुई
रेडिमेड दुनिया में ही जीना मरना है

तुम्हारे प्रति हमारी ईष्या लगातार
बढती ही जा रही है
तुम्हारे कलंदर का करतब देखते
हँसते-हँसते
न जाने कब हम अचानक तुम पर गुस्सा
हो उठेंगे, कहेंगे
हमनें नाहक ही वक्त बर्बाद किया
यह भी कोई खेल है
इस  मदारी का काम तो  हमें
बेवकूफ बना कर पैसे ऐंठने का है बस

००

चित्र: अवधेश वाजपेई


दो

उन खाली दिनों के नाम

जीवन की धीमी रफ्तार गिरफ़्त में नहीं आ सकी थी
नामालूम सी गतिविधियां
बेबस परेशानियाँ  खुद हो गयी थी हलकान
मन के घुड़सवारों को नहीं मिला थी ठीक से दाना-पानी
उन्हीं मंद दिनों ने बैरागी बनने की प्रबल इच्छा जगायी
उदास दिनों में मन
खुद-ब-खुद हिमालय का मानचित्र उकेरने  लगा


बेरौनक, साफ़ आहते में बिना दुशाले के निकल आते
उन दिनों हम.
पिता के संरक्षण,माँ की ममता से महरूम
दिन, अपने हाल पर जीने के अनाथ से
प्रेम की नरमाई और असमंजस से कहीं
बिखरे-छितरे दूर तक पसरे से  वे दिन

औने-पौने दिनों की फफूंदी से परे
रोज़ की गुत्थमगुत्था
उधेड़बुन से अलग
साफ़-सुथरे सुलझे
अलगनी पर टंगे

कपड़ों  जैसे दिन फैले वे खाली  दिन

उस दिनों के सिरों  पर टंगी रातों  को सपने भी भूल गए  थे  अपनी राह
दुनिया और सपनों की सांझी रणनीति का पता उन्हीं दिनों चला
दुनियादारी की तरफ पीठ मोड़ कर जा बैठे, उन  दिनों हम
सपनों  और दुनियादारी के बीच था मगर  कोई गुप्त समझौता

हर दस्तक को अनसुना करते
 एकांत हठयोगी से तने रहते
चिन्ताओं  का  कर दिया था हमने पिंडदान
मेजपोश सी  सीधी बिछी हुई प्रतीक्षा से समुचित दूरी बना
पी लेते हम ढलती गुलाबी शाम को भरपेट
सफ़ेद चादर के चारों कोनों को  मजबूती से गाँठ बाँध कर रहते सोये

पाषाण युग की निर्ममता  पर साध निशाना
उन दिनों  उड़ाया अपने पालतू सपनों को हमने बारी-बारी
यह  देखने  के लिए कि  उनके  नसीब में हैं कितना बड़ा आसमां
टपकता  था  इन सपनों  का लहू
 हमारी रूह के साफ़-सुथरे आँगन में  
इनके फलित न होने का मलाल,
मलाल बन कर ही रह गया
जाते समय अपने पदचिन्ह छोड गए थे मगर ये ढीठ सपनें

 कुछ चुनने की बारी आई तब
 कतारबद्ध दिनों की कभी न छोटी पड़ने वाली श्रंखला में
हमनें चुना इन्हीं  बेजोड खाली दिनों को
अब तक जिनका एक टुकड़ा भी हमने नहीं चबाया  था
सर पर गमछा बांधे वे दिन
गिलहरी की चपलता से  देखते  ही गुज़र जाते
गैस की गंध,
धमनियों मे उतरती और हम इन दिनों रहा करते  निश्चिन्त
कोई और दिन होते तो मारे डर के
 हमारी  गठरी बंध गयी होती
दिन थे मगर ये नायाब
इनके  नज़दीक जा बैठने का सुख भी होता था अनचखा और  सौंधा
 दिनों के दर्ज करने की कयावाद में
हमारे खाते में  शोर मचाएंगे
यही प्यारे दिन

००

चित्र: अवधेश वाजपेई

तीन

लोकतंत्र का मान

कंबल से एक आँख बाहर निकाल कर हम बाशिदों ने
इन सफेद पाजामाधारी मदारियों के जमघट का तमाशा खूब देखा
सावधानी से छोटे छोटे कदमो से ये नट उझल-कूद का अद्भुद तमाशा दिखाते
इनके मजेदार तमाशे  का लुत्फ उठा कर  घर की राह  पकडते
यह सिलसिला पूरे पाँच साल तक चलता

इसी बीच कुछ कमाल के  जादूगरों से हमारा साक्षात्कार हुआ
पचपन मे पढ़े मुहावरों को सिद्ध होते हुए हमने इन्ही से सिखा
इन जादूगरों को टेढी ऊँगली से घी निकला आता है
पलक झपकते ही मेज़ के नीचें से  अदला-बदली करना इनकें बाएँ हाथ का खेल है
पलभर में ये लोग आँखे फेरना ये जानते  है
इनकी झोली मे  ढेरों रंग मोजूद है
हर बार नऐ रंग की चमडी ओढे हुऐ मिलते ये जादूगर
भीतर से लीपा पोती कर पाक-साफ हो बाहर खुले आँगन मे निकल आते
चेहरा आम आदमी का चसपा कर
खास बनने की फिराक में लगे रहते
आँखों के काम
कानों से करने की कोशिश करते
झुठ को सच की चाशनी में ढुबा कर चहकते
आज़ादी को धोते, बिछाते, निचोड कर उसके चारों कोनों को दाँतों में दबा
ऊँची तान ले सो जाते

हम उनके जगने का इंतज़ार करते भारी आँखों से ताकते
एक टाँग पर खडे रहते
धीरे धीरे फिर  हम इनके राजदार हो चले
और न चाहते हूए भी कसूरवार बन गये
इस बीच हमारे  कई यार- दोस्त इनकी बनाई योज़नायें के तले ढहे, दबे, और कुचले गये

इधर हम अपने हिडिम्बा प्रयासों में ही उलझे रहे
आखिरी सलतन्त की कसम खाते हुऐ हमनें यह स्वीकार किया
कि हमें भी लालच इसी लाल कुर्सी का था
पर यह सब हमनें लोकतंत्र का मान रखते हुए किया
हमें गुनाहगार हरगिज़  न समझा जाए.

००

चित्र:अवधेश वाजपेई


चार

प्रथम  पुरूष यानी सिर्फ 'मैं'

जीवन की तमाम ठोकरे
'प्रथम पुरूष' के आवृत में रहकर खाने के बावजूद
इससे बाहर निकलने की ज़हमत हमनें कभी नहीं ऊठाई
निपट नौसिखिए  की तरह  प्रेम मे डूबे
रिश्तों की नुकीले शाखाओं के घायल हुये
सब कुछ देखते रहे दरीचों से
परखने की कोशिश करते रहे पर प्रथम पुरुष की चौहद्दी से  एक बार भी  ओझल नहीं हुये
घोर स्वार्थी  बन  नज़रे जमायी रखी
खुद पर ही

अपने आप को  मर्यादा  पुरूषोतम बनने का उदघोष यही से  जारी हुआ
प्रथम पुरूष की इस  बानी में कुछ बेवकूफ लोगों को माहित करने में हुए कामयाब
दोस्त बनकर पीढ पर वार करना
बाहर- भीतर, भीतर- बाहर आने जाने में
कितनी मुस्तैदी होनी चाहिए
सीखा यहीं से

कई खानों मे अपना  किया बंटवारा
कब दुबके रहना
कब  दिखानी है अपनी मक्कारी
कब करने हैं  अपने दाँत और नाखून तेज़
कब साधू का बाना ओढ घर के अँधेरे कोने में लेनी है शरण
कैसे करनी है एक साथ  डाकूपन की खुजली और ओम शांति  का जाप

घंटा और घडियाल दोनों को कब और किसके कानों के पर्दों पर दस्तक की तरह बजाना है
कब  बेहद मामूली बन कर दिखाई  देना  है
यह लंबा- चौडा गणित प्रथम पुरुष के बाने मे रहकर की अर्जित किया
यहाँ प्रथम पुरुष के आवरण मे कई सुविधाएँ एक साथ भोगने का कुटिल सुख था तभी
कई नेक आत्माओ के समझाने के  बावजूद
अंतत हमने प्रथम पुरूष के घेरे में ही जीना स्वीकार किया

००

पांच

कपालिक अघोरी की तरह

 अपने वर्तमान की थोडी-बहुत भी खबर होती
तब शायद किसी काल भैरव से भविष्य  का पता पुछने का साहस जुटाती
पर यहाँ भविष्य के साथ-साथ वर्तमान भी घने कोहरे की गिरफत में दिखा
तब पूरे ब्रम्हांड को हाजिर नाज़िर जान मैनें स्वीकार किया
कहीं से भी कुछ उगाहने के मामले में
सिफर हूँ मैं

मेरे कंधों पर अपनी ढोडी रख
जो गम रह- रह कर मुझे सालते रहे
ठेठ दुनियादारी से उनका दूर का नाता भी नहीं था
एक पारदर्शी लक्ष्मण रेखा मुझे विरासत में मिली
जो ऐन वक्त पर दुनिया में शामिल होने से रोक देती मुझे
हर बार मैं
इस बिना रीढ़ की हड्डी वाली दुनिया की लचीली पीढ पर चढने से बच जाती
इस प्रसंग की याद में
हर बार मुझे स्वामी विवेकानंद याद आये
दुनियादारी की ओर रुख करने लगे जब वे एक बार तब
गुरू परमहंस ने ठीक समय पर उनकी एक नस दबाई
और स्वामी  जी दुनिया का हरी-भरी राह  भूल गए

किसी असरदार दुआओं की तासीर के चलते
चालू समय सीधे-सीधे मेरी आँखों में आँखों डाल कर बात करने की हिम्मत नहीं कर सका
दुनिया के साँचें में न ढल पाने का सुकून सब सुकूनों पर भारी रहा
इन २०६ हडडियों,  के अलावा भीतर कुछ ऐसे बीज़ भी सिमटे रहें
जिन्हें अरमानों की उपजाऊ ज़मीन अंकुरित होने  की भारी ललक थी

ताउम्र इन्हीं को पूरी आकृति देने के प्रयास में
अपनी ताकत से बाहर निकलकर
ढेर सारी अस्फलताओं से लैस
ठीक भीगी रूई की तरह भारी होती गयी मै

तमाम बुतपरस्ती को नकारते हुये
अपने ही बनाये द्वीप में अकेली,
अनिश्चित कामना की साधनाओं में लिप्त
उज़ालों से उलटी दिशा में चलती
मन-मस्तक पर धूनी रमाये
अनजानी मंजिल तलाशती
अँधेरों की उस टोह में भी भटकती रही
जहाँ जुगनू भी गाइड बनने से कतराते रहें

लाख कोशिशों के बाद
मन की उफनती नदी का रूख कोई मोड न ले सका
बहता रहा अविरल
तमाम तटबंधन की सीमाओं को अस्वीकारते हुये

अपने ही ऊँजाले में खुद को रोशन करती
तन्हा, रात-बिरात उठ कर तीन चार पक्तियाँ लिख कर
चैन की साँस ले कर लम्बी नीदं मे अलसाई
सीप, शंख,मोती,तारों, जुगनू, फ़ाख़्ता  के साथ
किसी बंदरगाह को तराशती, तलाशती
शिव के प्यारे कापालिक अघोरियों की तरह जटाजूट
हररोज़ एक कदम शमशान की ओर  *धरती
किसी अंजाने अनदेखे मोक्ष की उम्मीद  में
 *रखती

००

चित्र: अवधेश वाजपेई

छः

सिम्फनी

क्या कहा
इस घोर कोलाहल के बीच स्वर संगति
किस मँगेरीलाल से यह सपना उधार ले आये हो
अब ज़रा ठहर कर सुनो
तीन ताल में जीने को अभ्यस्त हम
सात सुरों की बात कम ही समझ पाते हैं

भीम पलासी यहाँ काफी ऊपर का मामला है
जो हमारे सिर को बिना छुऐ गुज़र जाता है
जब हम अपने होशोहवास से बाहर होते है
तो कई बेसुरे हमारे संगी-साथी होते हैं
जिनके बीच सुरों का काम घटता जाता है

शोभा गुरट, किशोरी अमोनकर, मधुप मुदगल की
बेमिसाल रचना हमें स्पंदित न कर दे तो
जीना मरना बेकार है
इस पर विश्वास जताने वालो से हम समय रहते दूरी बना लेते हैं

हवा के ज़रिये जीवन में कंपकंपाहट ने कब प्रवेश किया
जीवन का कौन से भाग ऊपर-नीचें डोला
कौन सा भाग बिलकुल गहरी तली में बैठ गया
यह मालूम कब कर सके हम

आशुरचना हमनें ही ईज़ाद की
लोकगीतों को पुराणों के चुंगल से हमी लोगों ने आज़ाद किया
फिर भी संगीत से कोसो दूर ही रहे
किसी  प्रस्तावना के लम्बे या छोटे से अन्तराल
के बीच एक भी सुर उतर सका
तुरही, बीन, तम्बूरे, जलतरंग से हमारा रोज़-रोज़
का सरोकारी नाता नहीं रहा था कभी  

बस हमारे प्यार के पास संगीत समझने की कुछ शक्ति थी
वह भी हमसे दूर चली गई
 जब
हमनें संगीत का अर्थ मन से नहीं कानों से लेना शुरू कर लिया और
विज्ञान की दिशा को हमनें एक दिशा में भेज दिया
मन को किसी दूसरी दिशा में
यह जानते हुऐ कि हर दिशा एक दुसरे से ठीक समान्तर है

ऐसे में स्वर लहरियों की उठान के  बीच
आधे अधूरेपन से जीने वाले हम,
किसी सिम्फनी से संगत नहीं मिला पाते
स्वर की संगती हमसे नहीं बन पाती
हर कदम पर हम पिछड जाते है
संगीत की मादकता के लिये
एक पुल पर कोमलता से चलना होता है
हम हर पुल की नींव को ढहाते चलने वाले
किसी शाप की शक्ल में त्रस्त, लोथडे से, अभिशप्त।
 ००

सात

सिरफिरा

बिना नाम-पते की  चिठ्ठी की  तरह  .
वह अपने नाम के ईद -गिर्द  चार चक्कर लगाता है फिर
 बैठ जाता है
दाल भात खाने
बोलने से पहले दस बार नहीं सोचता
फिर भी उसके अंट- शंट बोलने  से पंचायत के तलवों तक में पसीना चूने लगता है
उसे  ज़रा  भी शर्म नहीं लगती
वह बिना पजामा ऊँचा किये ही  गाँव की कचरे से अटी नालियां सफा कर देता है

पडोस में पीटती हुई बहू को मारने वालों पर  बिना लाठी के ही  पिल पडता है
अँधेरे- उजाले में वह इतना ही अंतर समझता है कि
जिससे दाढ़ी  बनाना आसान हो बस

उसके दांय  हाथ की अनामिका का नाखून  कलयुग का वास्ता देता हुआ लगता है
उसे मनुष्यों की जाति  बदर करने की योजना बनाई जाती है
कभी वह अपने आप को प्रधानमंत्री या चौकदार मानने की सरल गुस्ताखी कर बैठता है
वह अपने दायें पांव की ऐडी से पानी निकालने की कोशिश करता दिखता है
वह पागलपन की इस दशा में भी वह प्यार का भूखा है
महाभारत की कुटनीतियाँ उसे कंठस्थ थी
वह बाँच सकता था आकाश के तारों की कुंडलियां
कर सकता था हस्ताक्षर

दुनियांदारी की क्रम संख्या में अकसर गलती  करता है
क से सपना और र से पेशाब पढाता है
ऐसे सिरफिरे लेकिन सभ्य नागरिक उनके अपने ही समय में  पागल करार कर दिये जाये हैं
तब एक ईमानदार  लेकिन सिरफिरा पागल आदमी देश की जनसंख्या रजिस्टर से घट जाता है

००

चित्र: अवधेश वाजपेई

आठ

टाँड पर चरखा

पुरानी चीज़ें ने समेट लिया  अपना दाना पानी
घूमना बंद कर बना ली हम से दूरी
उनसे स्नेह बना रहा तब रही वे हाथों की दूरी पर
हाथों से छुटते ही सीधे गर्त की दिशा में चली
उनसे सिर्फ यादों को मांझने का काम ही लिया जा सका

इस ख्याल को और पुखता बनाया,
अँधेरे ओबरे में रखे
आँखों से दस ऊँगल की ऊँचाई पर रखे उस चरखे ने
ढेर सारे लकडी के पायों,जेली और घर की दूसरी  गैरजरूरी हो चुकी चीज़ों के साथ



न जाने कैसा बदला लिया था हमने
पुरानी बेकाम की चीज़ों को
धूल के हवाले करके
 बिना बदले का अहसास दिलबाये
आत्मा के हर कोण पर यादों के फांस चुभा कर
वे चीज़े भी लेती रही हमसे बदला


ज्यादा दिनों तक जो चीज़ें हमारे जहन में अटकी रही जो
 धीरे-धीरे  ना बुझने वाली प्यास में तबदील हो ही  जाती है

तो चरखे की आँख में पानी था, जाले और ढेर सारी मकडियाँ
मगर अब भी वह बहुत कुछ याद दिला सकता था
उसने दिलाया भी,

गावँ के घर का लम्बा चौडा आँगन, बीस बीघा खेत, झाडियाँ, बटोडे,
चक्की, बिलोना, आधा चाँद, लुका झिपी,
मँगलू कुम्हार के हाथों बनी बाजरे की खिचडी जिससे  बचपन का सबसे घना हिस्सा आबाद था
सूरज के देर से छिपने और जल्दी ढल जाने वाले और कभी उदास न होने वाले दिन
हँसी ठठे के वे रंग जो अब तक नहीं छूट पाए है
जीवन के पक्केपन से हमारी यारी- दोस्ती नहीं हुयी थी तब
उन दिनों हमारी नाक इतनी लंबी नहीं थी जो गोबर की महक से टेडी हो जाये
तब गाय और बछडे का रिश्ते का नन्हा अकुंर कहीं भीतर पनप जाया करता था
जो दुध दुहने वक्त और भी मुखर हो ऊठता था
उस आकर्षण  में बंधे  हम देर तक बछडे को अपनी माँ का दूध पीने देते
और घर वालों की डाँट खाते, यह हररोज का क्रम था
पँचायत की ज़मीन पर लगे  बेरी के पेडों पर उछल-कुद दोहरा तिहरा मज़ा दिया करती थी

आज की तरह चरखा हमें
चौंकाता नहीं था
मन हरा कर देता था
उस हरेपन की हरितिमा के घेरे में चक्की पर गेहूँ पिसती माँ और भी नज़दीक आ जाती थी
कढावनी से मक्कन निकालती बुआ से लस्सी ले कर हम खेत खलिआनों की ओर निकल पडते थे
पाईथागोरस की थयोरंम और ई ऐम सी सकेवर का फ़ॉर्मूला याद करते करते हम
अपने रिश्तेदारों की कुटनीतियाँ स्वाहा कर देते थे

चरखे के साथ ही माँ के वे दिन भी याद आये
जब वह अपने दुख को इतनी मुशतैदी से रूई में लपेट कर सूत की शकल दे दिया  करती थी
कि हम लाख कोशिशों के बाद भी उसकी  आखो से आँसू का एक भी कतरा नहीं ढूढ पाते थे
अब तो वह दुख तो इतना आगे निकल गया है कि उसे पहचाना पाना मुमकिन नहीं
मुमकिन है तो बस जीवन और बीते वक्त की जुगलबंदी की वे यादें

चाह कर भी बचपन और आज की उम्र का  फासला गुल्ली डंडे से पूरा नहीं किया जा सकता
ना ही चरखे को वही पुराना स्थान दिया जा सकता
हमारी चेतना के ढेर सारे धागे चरखे से जुडे होने के बावजूद
उसे नीचे उतारने के ख्याल से ही  यह सोच कर कपंकपाते है
की कहाँ रखेगे इस चरखे को
पाचँवे माले के सौ गज के फलैट  में
नहीं कतई असंभव नहीं

फिर से चरखा यहीं छूट जाता है
फिर कोई हमसा ही अभागा
इस चरखे के ज़रिये यादों की धूल साफ करेगा
पर इसमें संदेह है कि यादों की धार  आज सी  ही तेज़ रह पाएंगी  ।

००

चित्र: अवधेश वाजपेई


नौ

रंगो की तयशुदा परिभाषा के विरूद्ध

पीले रंग को खुशी की  प्रतिध्वनि  के रूप में सुना था
पर कदम- कदम पर जीवन का  अवसाद
पीले रंग का सहारा लेकर ही आँखों में उतारा
किसी के बारहा याद के  पीलेपन ने आत्मा तक को
स्याह कर दिया
हर पुरानी चीज़ जो खुशी का वायस बन गयी थी
वह ही जब समय के साथ कदमताल करती हुई पीली पडने लगी तो
यह फलसफा भी हाथ से छूट गया

तब लगा की हर चीज़ को  एक टैग लगा कर कोने में रख दिया जाता है
जो बिना किसी विशेषण के अधूरी मान ली जाती है
अपनी ही कालिमा से लिप्त  अधूरा  इंसान भी
बिना विशेषण के सामने की किसी अधूरी  वस्तु के सामने आकर पलट आता है

नीले रंग की कहानी भी इसी तरह ही रही
इस रंग ने मुझे देर तक  खूब छला
मुझे अपने साथ लेकर
यह एक बार
पानी की ओर मुडा
दूसरी बार आकाश की ओर
और तीसरी बार मुझे अपने भीतर समटने की तैयारी में साँस लेता हुआ
दिखाई दिया


 लाल रंग अपनी पवित्रता को साथ लेकर
इतिहास की लालिमा   की  तरह  लपका फिर वापिस  लौटा
लहूलुहान  हो कर

कुछ ही दूरी पर खडा केसरी रंग प्रत्यंचा  पर चढा
काँपा, कभी बेहिचक हो
माथे पर बिंदु सा सिमट गया
यह ठीक है कि भूरे रंग से मुझे कभी शिकायत नहीं रही
यही मेरे सबसे नजदीक की
मिटटी में गुंधा हुआ है
अनुभव की रोशनाई में,
मैंने इसे धीमी आँच में  देर तक पकाया
यह भूरा रंग कुछ- कुछ मेरी भूख से वाबस्ता रखता है शायद
तभी जैसी ही मेरे भीतर की हाँठी रीतने लगती है उसी समय मैं
दुनियादारी से बंधन ठीले कर के इसे पकाने में जुट जाती  हूँ


दस

हमारा डम्मी

किसी अलमस्त बेहोशी मे हम कर देते है कुछ नेक काम
डाल देते हैं गाय को आटा
काले कुते को दो सुखी बासी रोटियां
धूप में पेन बेचती लडकी से  पेन खरीद कर
समाज के प्रति निभाते अपना उतरदायित्व

खुद  में कम अजूबे नहीं हम
आम  आदमी की काया की सीमा में बंध
बौने जरूर हो गए
वर्ना दुनिया का बड़ा से बड़ा अजूबाखाना हमें जगह देकर
होता धन्य

दुनिया के राहों पर खुला छोड़ दिया गया हमें
किसी चमत्कारिक काम को अंजाम देने खातिर
शतरंज के हारे हुए खिलाड़ी ही साबित हुए हम, मगर
सुबह नहा-धो,  तरोताजा हो दफ्तर जाते
शाम को मुँह लटका
महंगाई को गाली देते हुए
गाल बजाते  लौटते घर

हमारी संकीर्ण समय-सारिणी से खुदा सबक ले तो बेहतर
संभव है वह मनुष्य पर एकतरफ़ा तरस खाते हुए
मनुष्य के लिये निर्धारित समय सारिणी गढ़े
बंधी बंधायी रूढ़िगत चीजों के घोर आदी  हम

होश आने से पहले बेडियो मे बाँध दिया गया
दुबारा इस्तेमाल न आ सकने वाली प्लास्टिक की थैलियों से हम
हमारे बंधुओं की योग्यता को सींच
ऊँचे लोगों ने भरे अपने घड़े
हम बेचारे मिट्टी के माधो

हमारा 'यूज़ एंड थ्रो'  के संसाधन  में सिमट
कूड़े के ढेर पर फैंका जाना है लगभग तय
हम बेमौत मारे जाने वाले है
फिर भी हम थे
और हैं
हैं और
और रहेंगे आगे भी
अरबों-खरबों  की जनसँख्या में म
महफूज़
००

बिजूका ब्लॉग के लिए रचनाएं नीचे दी गयी आय डी पर भेजिए: bizooka2009@gmail.com
सत्यनारायण पटेल

1 टिप्पणी:

  1. सलामत भाई, सिरफिरा और रंगों की तयशुदा परिभाषाओं के विरुद्ध सबसे अच्छी कविताएं हैं।गहरे झकझोर सकने वालीं।

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