02 नवंबर, 2017


गोविन्द सेन की कविताएं
चित्र: अवधेश वाजपेई

कविताएं



घृणा  
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घृणा बहुत प्यारा शब्द है
घृणा का मतलब
उन चीजों से प्यार करना है
जिन्हें प्यार किया जाना चाहिए
अपने फायदे-नुकसान की सोचे बगैर

घृणा का मतलब
उन मूल्यवान चीजों को बचाना है
जिन्हें रोज कचरा घोषित किया जा रहा है

ऐसे लोगों से
घृणा के सिवा और क्या किया जा सकता है
जो दिल निर्विकार भाव से ऐसे तोड़ते हैं
मानो हथोड़े से
पत्थर तोड़ रहे हों

सचमुच घृणा एक प्यारा शब्द है
यही हमें ले जाएगा प्यार की तरफ.
००

                           

  ओ अनाम पेड़                    


 तेज धूप में
अप्रैल माह में
विंध्याचल के इस वीरान जंगल में
जब सारे पेड़ सूख गए हैं
तब तुम
अपने छोटे सफेद फूलों को लेकर
हल्के हरे पत्तों के साथ
प्रसन्न खड़े हो

भाई कौन हो तुम
अपना नाम तो बताओ
पलाश नहीं हो तुम
अमलतास भी नहीं हो सकते
किसी अख़बार में भी
तुम्हारा नाम नहीं छ्पा
   ००


           
आखिर कौन हो तुम
 क्यों मौन हो तुम

मैं जानता हूँ कि
तुम अपना नाम नहीं बताओगे
क्योंकि तुम उस प्रजाति के पेड़ हो
जो चुपचाप अपना काम करते हैं
नाम या इनाम की परवाह किए बगैर

तुम शायद नहीं जानते
मैं तुम्हारा कायल हूँ
और गुप्त प्रशंसक
००
चित्र: अवधेश वाजपेई


क्लास खाली है                                          

एक शिक्षक बना रहा है
जानकारियों के पुलिन्दे
क्लास खाली है

एक शिक्षक
चला गया है खेत में
क्लास खाली है

एक शिक्षिका को
लेने आ गया है उसका पति
क्लास खाली है

एक चपरासी
लगा है साहब की अर्दली में
और फूल से बच्चे बैठे हैं धूल में

एक शिक्षक लगा है
चुनाव की ड्यूटी में
नामावली में नाम जोड़ता-घटाता

एक शिक्षक
पेपर को चाट रहा है पूरा का पूरा
जैसे किसी अधिकारी ने
लगा दी हो उसकी यही ड्यूटी

धींगामस्ती का आलम है
हर तरफ

सरकारी स्कूल के लावारिस बच्चे
आजादी का भरपूर उपयोग करते रहेंगे
एक दूसरे पर फैंकते रहेंगे किताबें

जब तक
क्लास खाली है
००


पचास की उम्र            

पचास की उम्र में
हम पाते हैं कि
हमारे सिर, कंधे और पीठ पर
बहुत बोझ है
हम झुक कर चलने लगे हैं

बचपन बहुत पीछे छूट गया है
किसी ने जोर से धक्का दे दिया है
और हम लगातार किसी खाई में
गिरते जा रहे हैं

पचास की उम्र में
कल के आराम की फिक्र में
बैल-सा कमाना है

पचास की उम्र में
लागू हो जाती हैं पचास बंदिशें
लोग करते हैं पचास अपेक्षाएँ
लद जाती हैं चाहे-अनचाहे
पचास-जिम्मेदारियाँ

पचास की उम्र में
लोग देते हैं पचास उलाहने
ठोकरें ज्यादा लगती हैं
और संभलते कम हैं

पचास की उम्र में
शरीर से चिपक जाती हैं
जोंक की तरह पचास बीमारियाँ
करते हैं पचास दर्द परेशान

पचास की उम्र में
आसमान कम दिखने लगता है
और धरती ज्यादा

पचास की उम्र
आधे सपनों का मर जाना है
बचे हुए सपनों को
जिन्दा रखने की जद्दोजहद है

पचास की उम्र
जैसे कोई अधपकी ईंट
असंतोष की कोई लपट
या आधी उधड़ी हुई
कोई सीवन!
००


कवि
नदी को माँ कहता है
और पहाड़ को पिता
न वह नदी को बचा पा रहा है
न वह पहाड़ को बचा पा रहा है
वह कविता लिख कर प्रसन्न है.

2
कवि
बीडी पी रहा है
कवि लगातार बीडी पी रहा है
एक बुझने पर दूसरी जला लेता है
बेचारा पाठक
धुँए से परेशान है
००



चित्र: अवधेश वाजपेई

गलत मात्राएँ                           

खटकती है गलत मात्राएँ
मात्र उनको
जो जानते हैं सही मात्रा

खटकता है शब्द का खामोशी से
गलत मात्रा को
अंगीकार कर लेना

जिन्हें गले लगना  था
वो पीठ पर लदी मिलती हैं
जिन्हें दाएँ जाना था
वो बाएँ चली जाती हैं
जिसे संज्ञा होना था
वह क्रिया हो जाती है

मात्राएँ बनती जा रही हैं
कठपुतलियाँ

गलत मात्राएँ
कर देती हैं  अर्थ का अनर्थ
गलत मात्राओं को
कहा जाना चाहिए गलत

अजीब लगता है कि
शब्द भी शिकायत नहीं करते
उन्हें पड़ चुकी है आदत
गलत मात्राओं की

बाद में शायद यह हो
कि गलत मात्राएँ ही लगने लगे सही

००

वह बेचती ताड़ी


वह आदिवासी स्त्री
जिसके एक पाँव में
चप्पल नहीं है
बैठी थी ताड़़ी बेचने के लिए
ताड़ी मंडी में
जेसिका शराब बेचती थी
वह बेच रही ताड़ी

आजादी के इतने साल बाद भी
उसे नसीब नहीं हो पाए
एक जोड़ी चप्पल
पे्रमचन्द का केवल एक जूता फटा था
इसकी तो गायब एक चप्पल ही

जबकि उसकी ही जात के मंत्री का
बंगला ही है करोड़ों का
वह इतना अमीर कि
उस जैसी अनेक औरतों को
कुपल्ये1 सहित खरीद ले

उसे देख शायद
निराला लिखते-भरी दुपहरी में
वह बेचती ताड़ी
अनजान पथ पर
उनकी आँखों से
उसका ‘भर बँधा यौवन’ भी
नहीं छुपता
                           
उसके खुरदरे और नंगे
पाँव पर क्या लिखते नागार्जुन ?

चिलचिलाती धूप में
एक चप्पल न होने से
है आधी राहत
पूरी राहत कब मिलेगी उसे ?
बहुत मामूली होंगे उसके सपने
रोटी से बड़े नहीं
जिसके लिए वह बेचती है ताड़ी

गरीबी मिटाने का
दावा करने वाले
क्या बता पायेंगे
कि कब मिलेगी उसे दूसरी चप्पल
या
छीन ली जाएगी यह भी।

००


चित्र: अवधेश वाजपेई

देवताओं की अप्रकट इच्छाएँ        

देवताओं की अनेक अप्रकट इच्छाएँ हैं
जिन्हें वे प्रकट नहीं करते

देवता चाहते हैं
भोग करते रहें पाँचों पकवानों का
लेकिन उन्हें खेतों में काम करने का मत कहना
वे नाराज हो जायेंगे

देवता चाहते हैं
अप्सराएँ खुद घोषित कर दें
अपनी देह की मुक्ति और सौंप दें
उन्हें अपनी चिर युवा देह
पाँचों पकवानों की तरह
ताकि वे रमण कर सकें भरपूर
मुक्तिदाताओं का इतना हक़ तो बनता ही है

देवताओं के पावन स्पर्श से
हर अपावन चीज पावन हो जाती है
देवतागण कभी रेप नहीं करते
वे केवल रमण करते हैं
रेप छोटे लोगों का काम है


देवताओं की कोई भी
बेटी या बहन नहीं होती
देवता कभी बूढ़े नहीं होते
देवता कभी शराब नहीं पीते
सदा सोमरस का पान करते हैं

देवता चाहते हैं
कि आप उन्हें मामा मानें
लेकिन वे कृष्ण जैसे भांजे नहीं चाहते

देवता चाहते हैं
आप उनके पथ पर फूल बिछाएँ
उनके ऊपर पुष्पवर्षा करें
लेकिन अपने पाँवों में चुभने वाले काँटों की शिकायत न करें

देवता चाहते हैं
खेत, कारखानें, जमीनें उनके नाम बनी रहे
लेकिन उनका पसीना उन पर नहीं टपके

देवता चाहते हैं अटूट श्रध्दा
उन्हें सर झुकाने वाले भक्त चाहिए
सवाल उठाने वाले सिरफिरे नहीं

देवता चाहते हैं
दुःख का एक भी छींटा

उनके मुखमंडल पर न पड़े
वे सदैव आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्कुराते रहें

देवता चाहते हैं
धर्म का झंडा सदा फहरता रहे
मानवता का झंडा
झुका रहे सदा

देवता चाहते हैं
विशाल नरक के समानांतर
उनका स्वर्ग बना रहे

००


घर-1                          


मैं पूरा घर नहीं हूँ
घर का एक हिस्सा भर हूँ

मेरे घर से बाहर होने से
घर हो जाता होगा आधा

बच्चों के घर से बाहर होने पर
घर सिर्फ चौथाई रह जाता है

घर में कोई न रहने पर
घर शून्य हो जाता होगा

आओ, सभी घर के भीतर आओ
घर को पूरा घर बनाएँ                        

००

घर-2

घर को छोड़ आएँ हैं
पर थोड़ा घर हम
साथ ले आएँ हैं

पत्नी की बनायी रोटियों में
घर है
पत्नी के हाथों से धुले कपड़ों में
घर है


साथ आयी बच्चों की याद में
घर है
माँ की नाराजगी में
घर है

जेब में सुबह से पड़े
खुशबू लुटाते
मोगरे के फूलों में
घर है
००

ताल में रीढ़ें                                        
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सुबह
आसमान में
कोई छोड़ गया है
अपनी रीढ़

शायद
उसने समझा हो
इस रीढ़ को
अनुपयोगी

धीरे-धीरे
अब हो रहे हैं
रीढ़ के
खूबसूरत मोतिया मणके
अलग-अलग

निराकार होकर
मणके डूब गए
अनंत के
नीले गहरे ताल में
बेआवाज

इस ताल में
गुम हो चुकी हैं
अनगिनत
रीढ़ें

००





गोविन्द सेन


गोविन्द सेन: जन्म: 15 अगस्त 1959
जन्म स्थान: राजपुरा [अमझेरा] धार [म.प्र.]
शिक्षा: एम.ए.(हिंदी, अंग्रेजी) बी.टी.
कृतियाँ: 1. चुप्पियाँ चुभती हैं(गजल संग्रह) 1988  2.अकड़ूभुट्टा (निमाड़ी हाइकु संग्रह) 2000  3. नकटी नाक (निमाड़ी हाइकु संग्रह) 2010 4.नवसाक्षरों के लिए कुछ पुस्तिकाएँ 5. बिना पते का प्रशंसा पत्र (व्यंग्य संग्रह) 2012  6.खोलो मन के द्वार (दोहा संग्रह) 2014
7. सफ़ेद कीड़े (कहानी संग्रह) 2017
पुरस्कार- ‘स्वदेश’ कहानी प्रतियोगिता-1992
में कहानी ‘बरकत’ को प्रथम   पुरस्कार
सम्मान- 1.पं. देवीदत्त शुक्ल स्मृति सम्मान-2003, 2.आंचलिक साहित्यकार सम्मान-2005-06
, 3.झलक निगम साहित्य सम्मान-2012, 4.हमजमीं सम्मान-2012, 5.साक्षरता मित्र सम्मान-2013, 6.शब्द प्रवाह सम्मान-2013 7.गणगौर सम्मान-2014  
सम्प्रति: अध्यापन
००

संपर्क:
राधारमण कालोनी, मनावर-454446 जिला-धार [म.प्र.]
ई मेल: govindsen2011@gmail.com




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