05 अप्रैल, 2018

ज्योति साह की कविताएं



ज्योति साह 

कविताएं

एक

औरतें

औरतें 
जब तकलीफ़ों में कराह नहीं  पातीं
तब जूड़े के साथ
लपेटकर बाँध लेतीं हैं सारी तकलीफ़ें
और खोंस देतीं हैं
उस पर एक काँटेदार पिन,

मुस्कुराने की तमाम कोशिशें
जब पड़ जाती है फीकी
तब लगा लेतीं हैं
गाढ़ी लाल/गुलाबी लिपस्टिक,

जब बेतरतीब  जिंदगी
स्वेटर मानिंद उघरती है
तब डाल लेती हैं
एक पतली-सी चादर,

जब एड़ी की बिवाईयाँ
औरतों  के बीच उड़ाती है  खिल्लियां
तब पहन लेती हैं
जूराबें संग जूतियाँ,

और इस तरह
औरत
बचा लेती है
मर्यादा परिवार की|
००


दो

बहुत आगे जाना है अभी

हटो
दूर हटो
कि बहुत आगे जाना है अभी..,

ना रोको  रास्ता
ना खड़ी करो दीवार
कि खुदके बनाये रास्ते पर चलकर
तोड़नी है हर दीवार अभी..,

ना बाँधों लिबास में
ना डालो पर्दे-पे-पर्दा
कि खुद की पैनी तलवार से
हर पर्दा हटाना है अभी..,

अभी नाजुक है पंख
ना जकड़ों
ना तोड़ों इसे
फैलाके पंख ऊंची उड़ान भरना है अभी..,

कर आई चुल्हा-चौका
धो आई बर्तन-कपड़ें
अब बाहर निकल
अपने सपनों को पूरा करना है अभी..,

मैं भी इंसा
तू भी इंसा
ना कर फर्क बेटा-बेटी में
नाज होगा तुमको भी
गर हौंसला तुम दो मुझे..,

ना-समझे गर तो
दूर हटो
कि बहुत आगे जाना है अभी..!!

#नोट- हरैक लड़की व बेटियों के तरफ से......!!
००


तीन

 कुछ तो ढील दो...

छोड़ों
मत बाँधों
आह.....
और गिरह मत डालो

जकड़ गया शरीर..
अकड़ गई कमर..
कुछ तो ढील दो!

सुना है आसमां पे किसी का राज नहीं?
उड़ने दो.....
हमें अपनी उड़ान
फैलाने दो परौं को
आ जाऊंगी
शाम होते ही..
याद है मुझे
किस शाख पर है घौंसला..?
कहाँ मेरा बसेरा है..?
नहीं भूलूंगी दायरे........

बच्चों के खातिर
दाना भी चुग आऊंगी
तिनका भी उठा लाऊंगी
घोंसले के मरम्मत के खातिर
थोड़ा तो ढील दो..?

और ना जकड़ों अब
घुटता है मन
खुली आसमां को देख..
फड़फड़ाते हैं पंख..
जोर ना लगाओ
आपे से बाहर हो ना जाऊं
छिल जायेंगे हाथ तुम्हारे
लग जायेगा कलंक तुमपर
गर भागी बदहवास..
कुछ तो ढील दो..

छोड़ दो स्वछन्द..
उड़ने दो उन्मुक्त..
पूरी करने दो हर ख्वाहिशें..

आह!!
कितना सुकून
कितना आनंद
कितनी ताजगी है हवाओं में..!!!!

००







चार

औरत

औरतों को आजादी,
कब मिलेगी औरतों को आजादी,
मंच पर बैठकर,
किसी सभा में,
चुनाव के भाषणों में
ये कहना....
हम औरतों के लिए ये करेंगे वो करेंगे....
कहने वाले......
स्वंय अपने ही घरों में औरतों को दबाते हैं.....

ये पुरूषों का समाज है समझ में आता है,
मगर औरतें ......
क्यूं दूसरी औरतों को इतना दबाती हैं.....
बेटी होने का मतलब - बहुत सी पाबंदियाँ.....
बहू होने का मतलब - एक गुलाम......
क्यूं है हमारा समाज ऐसा....
बहूऐ जोर से बोल नहीं सकती....
वे हँस नहीं सकती......
वे हर किसी से बात नहीं कर सकती....
चौबीसों घंटें पहरा हो जैसे
क्यूं इतनी बंदिशें हैं हम औरतों पे..............
कब टूटेगी ये परंपरा..
कब औरतें स्वछंद हवा में....
अपने मन माफिक हवा में तैर सकेंगी....
उनका भी एक मन होगा
उनसे भी उनकी इच्छा पूछी जाएगी.....

हम अक्सर ये क्यूं भूल जातें हैं....
कि औरत भी एक इंसान हैं
वो हर काम को तन्मयता से करती हैं
हर किसी के सुख - सुविधा का ख्याल रखती है
लेकिन जब उनकी बारी आती है
तो हम उनके सुख का हनन करने लगते हैं.....
हमारी सोच.....
हमारी मानसिकता.....
आखिर कब बदलेगी?????
"ये सोच बदलेगी
और ये बदलाव लायेंगी
हमारी जैसी औरतें |
तुम एक अँगुली उठाओगे
हम एक सौ कदम आगे बढ़ेंगी,
तुम दो अँगुली उठाओगे
हम दो सौ कदम आगे बढ़ेंगी,
अँगुली उठाना गर आचरण है तुम्हारी
आगे बढ़ना अब आदत बन चुकी है हमारी,
तुम गर मिटा भी दो हमारी हस्ती
फिक्र ना करो.....
वक्त ढूंढ ही लेंगे हमारे निशां...,
जरा सोच के देखो
वो देहरी
वो घूंघट
वो पायल
वो बिछुवे
हरपल की पहरेदारी देकर भी
रोक पाये क्या.......... ?

अब हंसी आती है
सोच पर तुम्हारी
मत करो ना बचपना....
पिछड़ते जा रहे हो
स्वयं से ही.........
इतना भी पीछे ना धकेलो
कि खुद ही धरासाई हो जाओ...
जगहंसाई होगी...
वर्चस्ववादी हो ना तुम...
बनाये रक्खो शान..!

हरकतें सुधारों अपनी
बंद करो घुरना
तुम्हारी भेदती नजरें भी
कुछ ना कर पायेंगी...

हुंकार भरती स्त्रियाँ
चहुओर से बढ़ रहीं हैं..
कितना भी मारोगे
हमें आने से पहले
एक दिन...............
भारी पड़ेंगी तुमपे
सौ में एक स्त्री
क्यौंकि..
सृष्टि रचना तुम्हारे वश में नहीं!

उठाओ
और उठाओ
पर हम रुकेंगी
क्षितिज के उस पार
और गाड़ आयेंगी
अपनी फतह के झंडे!

उखड़ रहें हैं
अभी से ही जड़....
डालो ना मिट्टी
छुपाओ
पर्दे लगाओ
अब मिटने को हैं
स्वयं के निशां....!

परंतु
हे पौरुष
फिक्र मत कर
उस पल भी आदतानुसार
अक्षौहिणी-सी (चतुरंगिणी सेना)
तुम्हारे इर्द-गिर्द खड़ी
तुम्हारे पौरुष को अनुत्तीर्ण होने से बचाऊंगी!!!!!!

००

   



                                  

पांच

 मुर्दा इंसान

मुर्दों के बीच
जब मुर्दा होने लगो,
जब दिन-रात
सरेआम
लुटने लगे आबरू,
जब माँऐ स्वयं ही
मार दे कोख में बेटियों को,
जब औरतें खुद लूटने लगे
इज्ज़त औरतों की,
जब मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे के
नाम पर होने लगे राजनीति,
जब गंगा मैया के
नाम पर हो करोड़ों का घोटाले,
जब बेमतलब सभा,दौरों के
नाम पर बहे पानी-सा पैसा,
जब लहलहाते फसलें
सूखे पानी बिन,
जब पेड़ों पर फल-फूलों के जगह
लटकते हों किसान,
जब नसों में खून की जगह
बहते हों नफरतों की धार,
जब लव-जिहाद के नाम पर
फैला हो देश में अराजकता,

तब कहिये
हम मनुष्य हैं
या मुर्दा इंसान।।


बद्ध में खोकर
बुद्ध हो जाना
चाहा है मैंने
कितनी बार
बंद कपाट
अंधेरों में
की है मैंने
रोशनी की तलाशी..
स्वयं से दूर
स्वयं के करीब
तुममें खोकर
बुद्ध हो जाना
चाहा है मैंने!!
००




छः

रणभूमि

रोज सुबह
खुलते ही आँख
मैं तैयार होती हूँ
रणभूमि संभालने को,
आगे-पीछे
दाँये-बाँये
हर तरफ के वार से
वाकिफ हूँ मैं,
हर शस्त्र का जवाब
बखूबी देती हूँ,
मैं आगे दौड़ाती रथ
ऊबड़-खाबर
जमीन पर
कई बार गड्ढे में
पड़ जाते हैं पहिये
हिचकोले खाती
हिलती-डूलती
हर शक्स का
वार संभालती
बढ़ जाती हूँ आगे
सिर्फ हथियारों से नहीं
आत्मविश्वास से भी
जीती जाती है बाजी__
उसी आत्मविश्वास की डोर पकड़
रणभूमि के आखरी छोर पर
परचम लहरा आती हूँ मैं!!!!!!
००



ज्योति साह

एम०ए०,एम०एड०
हिंदी अध्यापिका
रानीगंज,अररिया
बिहार,854334

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