01 मई, 2018

आधा नहीं, पूरा युद्ध 


( इलाहाबाद में पीयूसीएल के कार्यक्रम में हिमांशु कुमार का भाषण )
                                                         
लिप्यान्तरण : शैलेश कुमार


मैं जब इस कार्यक्रम के लिए तैयारी कर रहा था तो मैं कल्पना कर रहा था कि यहां नौजवान ज्यादा होंगे। और मैंने उसी हिसाब से आज के कार्यक्रम में बोलने का तरीका तैयार किया था । लेकिन यहां हमारे पुराने साथी ही ज्यादा है । आप लोगों को तो सब मालूम ही है। मैं आपको क्या बताऊं?
 एक श्रोता: छात्र संघ चुनाव की वजह से युवा नहीं है।
 

हिमांशु कुमार

( हिमांशु कुमार एक प्रख्यात गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता,पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता है।)

मेरेरे पिताजी ने 1942 के आंदोलन में मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन को आग लगाई और फिर वह फरार हो गए। गांधी जी से पत्र व्यवहार हुआ। और उन्होंने मेरे पिताजी को सेवाग्राम में बुला लिया। और पिताजी वहां रहे। विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में भी शामिल रहे। तो एक बात पिताजी बार-बार कहा करते थे कि बापू जी कहते थे कि अगर भारत के लोकतंत्र को गुंडों का लोकतंत्र बनने से रोकना है। और भारत को सही दिशा में ले जाना है। तो नौजवानों को गांव में जाना चाहिए। और गांव में जाकर उनको रहना चाहिए । काम करना चाहिए ।  तो वह बात इतनी बार सुनी कि हमने फैसला कर लिया कि हम गांव में रहेंगे। अपनी शादी के 1 महीने के बाद मैं और मेरी पत्नी छत्तीसगढ़ तब मध्य प्रदेश था छत्तीसगढ़ तो बाद में बना और बस्तर जिला फिर दंतेवाड़ा जिला बाद में बना वहां एक गांव में जाकर एक पेड़ के नीचे हमने अपना सामान रख दिया। वहां जाकर रहने लगे। फिर 18 साल तक हम वहां रहे। 18 साल के बाद सरकार ने हमें तड़ीपार कर दिया। और इस समय मेरे ऊपर करीब 100 वारंट हैं। और सरकार की नजर में बहुत खतरनाक नक्सलवादी हूं। अलबत्ता कभी भी मैंने किसी को एक थप्पड़ भी नहीं मारा। कभी गाली नहीं दी, कभी हिंसा का समर्थन नहीं किया।
      लेकिन उस बीच क्या हुआ मैं आपको बताता हूं। जब हम वहां गए तो हमने वहां के लोगों के बीच रहना शुरू किया। जो देखा हमने कि गांव में स्कूल तो चल रहा है 40 साल से। लेकिन कोई बच्चा पांचवी पास नहीं है। राशन की दुकानें तो है पर कभी राशन ही नहीं आता है। साल में एक दो बार । स्वास्थ्य केंद्र हैं पर कभी स्वास्थ्य कार्यकर्ता वहां नहीं आती है। आंगनबाड़ी में कभी राशन नहीं आता। तो हम लोगों ने लोगों को बैठकर उसके बारे में बताना शुरू किया कि आप के अधिकार क्या हैं। क्या मिलना चाहिए और फिर उसके धरातल पर लोगों को संगठित करना शुरू किया। और उनको ले जाकर सरकारी कार्यालय पर बात करना कि स्वास्थ्य कार्यकर्ता के लिए सीएमओ के पास चलते हैं। राशन के लिए कलेक्टर के पास चलते हैं। इस तरीके से हमने किया तो धीरे-धीरे वहां के जो अधिकारी थे वह बहुत खुश हो गए कि भाई बस्तर तो काला पानी समझा जाता है। जब किसी कर्मचारी को सजा देनी होती है। तो बस्तर ट्रांसफर किया जाता है। और आप एक पति-पत्नी दिल्ली से आकर यहां बस्तर में रह रहे हैं। तो वहां के अधिकारियों की पत्नियां बस्तर रहने को तैयार नहीं होती थी। वह अपनी पत्नियों को हम से मिलवाने लाते थे कि देखिए यह वीणा जी हैं। कितनी सेवा करती हैं और यहां रह भी रही है जंगल में। आप शहर में रहने को जा रही हैं।
   तो हमसे सरकार बहुत खुश थी और हमें सरकार ने वहां की जितनी भी योजनाएं होती थी उनमें सलाहकार रखना शुरू कर दिया। शिक्षक की कमेटी बनेगी तो हिमांशु जी सदस्य होंगे। परिवार कल्याण की बनेगी तो वीणा जी सदस्य होंगी। इसी तरह  शिक्षा, स्वास्थ्य, सफाई हर चीज। राज्य स्तरीय समितियों में हम रहने लगे। मुझे ऑपरेटिव मजिस्ट्रेट नियुक्त कर दिया गया। हम जज के साथ बैठकर वहां मुकदमे सुनते थे। लोक अदालत में डायस पर बैठकर समझौते कराते थे। तब हम सरकार के आंखों का तारा NGO बन गए। भाई यहां तो कोई काम ही नहीं करता है यह कहकर सरकार ने अपनी योजनाएं हमको सौपना शुरू कर दिया। यह हमारा वीडियो काम नहीं करता है आप कर दीजिए। आपके यहां ट्रेनिंग सेंटर खोल देते हैं। सारी सरकारी ट्रेनिंग आप दीजिए। शिक्षकों को ट्रेनिंग दीजिए नर्स को ट्रेनिंग दीजिए। और हमारे एक फोन पर कलेक्टर-एसपी मिनिस्टर आ जाते थे। यह सब मैं इसलिए बता रहा हूं क्योंकि अब कहानी टर्न लेने वाली है।



 हुआ यह कि जिस समय हम बस्तर में पहुंचे। उस समय एक और प्रक्रिया चल रही थी देश में।  LPG मतलब उदारीकरण निजीकरण और वैश्वीकरण। इसमें अमीर देशों की पूजी गरीब देशों की तरफ आ रही थी। वहां जा रही थी जहां प्राकृतिक संसाधन है। अफ्रीका साउथ एशिया की तरफ आ रही थी। और यहां कहां आ रही थी? भारत के केंद्र में जहां प्राकृतिक संसाधन हैं। छत्तीसगढ़ झारखंड उड़ीसा बंगाल इन इलाकों में सरकार ने एमओयू (मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टेंडिंग) हस्ताक्षर किए। इन इलाकों में केंद्र सरकार व छत्तीसगढ़ सरकार ने 100 से ज्यादा समझौते हस्ताक्षर किए। समझौते हो जाते हैं तो जर्मनी की कंपनी टाटा के नाम से अंतरराष्ट्रीय पूंजी भारत में लगा रही है। आपको लग रहा है टाटा का पैसा है। लेकिन कंपनी जर्मनी की होगी। इस तरह इंटरनेशनल पूजी खूब आयी। शेयर मार्केट में ज्यादातर जो पैसा लगाते हैं वह दुनिया के 1% लोग हैं। जो सारी शेयर मार्केट को कंट्रोल करते हैं। 99% जो पैसा है वह 1% लोगों का है। वही तय करते हैं अब कहां पर खनन शुरू होगा कहां पर युद्ध शुरू होगा कहां पर फौजे रखी जाएंगी।
    छत्तीसगढ़ में यह सब प्रक्रिया होते-होते सन 2005 आ गया।  और सरकार ने वहां पर कंपनियों के साथ वायदे किए। और टाटा के साथ 4 जून 2005 को एक समझौता किया और 5 जून को सरकार ने सलवा जुडूम शुरू किया। सलवा जुडूम क्या था? सरकार कहती है हम नक्सलियों को इसलिए मारते हैं क्योंकि वह संविधान को नहीं मानते हैं। तो हम सरकार से पूछते हैं आप मानते हैं संविधान को? संविधान यह कहता है कि आदिवासी इलाकों में पांचवी अनुसूची लागू है। और पांचवी अनुसूची क्षेत्र में सरकार अपने पैसे से कुछ नहीं कर सकती। सरकार को अगर वहां कोई प्रोजेक्ट लगाना है। कोई कारखाना लगाना है खनन करना है कुछ भी करना है। तो सरकार ग्राम सभा को प्रस्ताव दे आवेदन दे। अगर ग्राम सभा उसे रिजेक्ट कर दे यह कह दे कि हमें नहीं चाहिए तो सरकार कुछ नहीं कर सकती। वह जबरदस्ती नहीं कर सकती। अगर हम मान लें ग्राम सभा स्वीकार करती है। इन इन शर्तों पर आप आइए तो कलेक्टर दूसरा नोटिफिकेशन निकालेगा और उसमें दूसरी ग्राम सभाओं को बुलाया जाएगा। और गांव वाले बैठकर अपना एक एक व्यक्ति का पुनर्वास व मुआवजा तय करेंगे। इनको क्या मिलेगा जमीन के बदले, कहां जमीन मिलेगी, बगीचे के बदले क्या मिलेगा, पत्नी को क्या नौकरी मिलेगी, बेटे-बेटी को कौन सी मिलेगी, फिर इनका फिर इनका ऐसे सब का पुनर्वास व मुआवजा तय करेंगे गांव वाले। और उसमें कलेक्टर मौजूद रहेगा। कलेक्टर हस्ताक्षर करेगा कि यह मेरी उपस्थिति में तय किया गया। कलेक्टर उसको राज्य की विधानसभा को भेज देगा और विधानसभा उसे अधिग्रहित करेगी। पहले पुनर्वास किया जाएगा बाद में वहां पर खनन या कारखाना शुरू हो सकता है। लेकिन सरकार ने क्या किया? सरकार ने 5000 गुंडों को इकट्ठा किया उनको राइफलें थ्री नोट की दिया और कहा कि तुम लोग स्पेशल पुलिस ऑफिसर हो। तुम्हारा काम है गांव खाली कराना और उनके साथ पैरामिलिट्री फोर्सेस को जोड़ा गया।




अब वह जो आदिवासी है वहां के कोया वह इतने सीधे हैं। उन्होंने शहरी लोगों व उनके जीवन को नहीं देखा है। जब भी कोई शहरी आदमी आया उनके लिए मुसीबत लाया। वह शहरी फुल पैंट पहने लोगों को देखकर पूरा गांव जंगल में जाकर छुप गया। यह जरूर मुसीबत लेकर आया होगा! हमारे फायदे के लिए कोई गांव में आता नहीं। यह 10000 की फौज दौड़ते हुए उनके गांव की तरफ आ रही हैं वे लोग भागते थे। यह तो नहीं है कि वह खड़े रहे सामने और कहे कि हां भाई बताइए क्या करने आए हैं। अब जवान लोग भाग सकते हैं औरतें नहीं भाग सकती बूढ़े नहीं भाग सकते। महिलाओं के साथ बड़े पैमाने पर सिक्योरिटी फोर्सेज ने बलात्कार किया। उनके बच्चों की हत्याएं, बूढ़ों की हत्याएं उनके घरों में आग लगा दी गई। फसलें जला दी गई, पानी के हैंडपंप तोड़ दिए गए, तालाबों और कुओं में जहर डाल दिया गया कि यह लोग उजड़ जाए। आदिवासी भाग जाते थे फिर वापस आते थे। जंगल से कुछ पत्ते लाए कुछ अन्य वस्तुएं जुटाए फिर से जिंदगी दोबारा शुरु करते। फिर उनसे सामना करना है एक-एक गांव पर 20 20 बार आक्रमण किया सिक्योरिटी फोर्स ने। और इस तरीके से हमारी सरकारी सिक्योरिटी फोर्स ने साढ़े छः सौ गांव जला दिए साढ़े छः सौ घर नहीं गांव।
जब आजादी आ रही थी तो गांधी ने कहा था अंग्रेजी विकास का मॉडल शैतानी मॉडल है। क्यों?  क्योंकि अंग्रेजी विकास का मॉडल कहता है आप तभी विकसित हैं जब आपके पास ज्यादा है। अगर आपके पास कम है तो आप पिछड़े हैं। आपके पास ज्यादा कपड़े हैं आप विकसित हैं। केवल दो कुर्ता पजामा है आप पिछड़े हैं। झोपड़ी है आप पिछड़े हैं। कार है तो विकसित, साइकिल है तो पिछड़े। गांधी ने कहा प्रकृति ने सबको बराबर दिया है। आपके पास ज्यादा तभी हो सकता है जब आप दूसरे का हिस्सा ले रहे हैं। और दूसरा देगा कैसे? तो आप छीन लेंगे। छीन तभी सकते हैं जबकि आपके पास ताकत हो। तो गांधी ने कहा इस विकास का मॉडल शक्तिशाली के पक्ष में काम करता है कमजोर के नहीं। अंग्रेजों के पास सबसे बड़ी सेना है। वह लगातार युद्ध करता है अपने फायदे के लिए। गांधी ने कहा लिख कर ले लो इस मॉडल से तुम अपने ही गांव पर हमला करोगे। इस विकास के मॉडल से दो चीज निकलेगी एक निकलेगा युद्ध और दूसरा निकलेगा पर्यावरण का विनाश। और इन दोनों से तुम नष्ट हो जाओगे तबाह हो जाओगे। और यह वही युद्ध है जिसके बारे में मैंने बताया। जिसमें हमारी सरकार ने हमारे ही 650 गांव जलाए। इसे भारत का छुपा हुआ युद्ध कहा जाता है। आपको पता है हमारी सुरक्षा बल सबसे ज्यादा कहां है? वह है आदिवासी इलाके में। क्या करने गई है वहां? आदिवासियों की रक्षा करने, आदिवासियों को सुरक्षा देने, जंगलों की रक्षा करने? नहीं! वह गई है जमीनों पर कब्जा करने, खदानों पर कब्जा करने। जंगलों पर कब्जा करने, समुद्र तटों पर कब्जा करने। किसके लिए? भारत के गरीबों के लिए? नहीं! भारत के मुट्ठी भर अमीरों के लिए। और उनके सेवक पढ़े-लिखे शहरी एलीट। यानी आबादी के एक ताकतवर हिस्से ने आबादी के एक कमजोर हिस्से के खिलाफ अपनी सेनाएं भेजी है। और एक देश में आबादी का एक हिस्सा आबादी के दूसरे हिस्से के खिलाफ सेनाओं का इस्तेमाल कर रहा हो क्या कोई गृहयुद्ध तो नहीं है ? भारत में एक गृह युद्ध चल रहा है। वह पूरा युद्ध है वह आधा युद्ध नहीं है। जिसमें सेनाओं का इस्तेमाल हो रहा है। जिसमें गोलियां चलती हैं,बम चलते हैं। इसमें बलात्कार होते हैं,हत्याएं होती हैं। जिसमें आबादी का सफाया किया जाता है। वह युद्ध चल रहा है।
 और हम जब लाखों लोगों को चंद मुट्ठी भर लोगों के लालच को पूरा करने के लिए उनके संसाधनों से अलग कर देते हैं। जब जमीन से अलग कर देते हैं तो क्या होता है? लोग बेजमीन हो जाते हैं। बेजमीन होकर लोग भूखे हो जाते हैं। वह बीमार हो जाते हैं। वह कमजोर हो जाते हैं, वह मर जाते हैं। यह जो विकास का मॉडल है यह जनसंहार है। इस युद्ध को हमें नहीं बताया जाता है। हमें बताया जाता है सबसे बड़ा मुद्दा है क्रिकेट में कौन सी टीम जीत रही है। आज हमारी मीडिया बताती है सबसे बड़ा मुद्दा यह है ऐश्वर्या राय को करवा चौथ का चांद दिखाई देगा कि नहीं। इस पर चर्चा करनी चाहिए इस देश के किसान आदिवासी दलित इनके क्या मुद्दे हैं यह हमें नहीं बताए जाते हैं।
तो हम वहां इस सबके बीच थे। छत्तीसगढ़ में एक लड़की एक दफा हमारे पास आई वह मेरी छात्रा है सोनिया भास्कर। मैंने पूछा क्या हुआ? तो उसने बताया कि मेरे गांव में सीआरपीएफ उस लड़की की चोटी में रस्सी बांध दी और सिपाही ने अपने पैर से बांधा और गांव की गलियों में घसीटा। मारते हुए थाने में ले गए 15 मर्दों के साथ 24 घंटे जेल में रखा। मैंने उसका वीडियो रिकॉर्ड किया YouTube पर है सोनिया के नाम से। मैंने उसका वीडियो राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष नीरजा व्यास थी उस समय उनको ले जाकर दिखाया। तो उस लड़की को हम इंसाफ नहीं दिलवा पाए लेकिन उसके बाद आदिवासियों को यह पता चल गया कि पुलिस की शिकायत किसके यहां करी जा सकती है। क्योंकि अगर कोई आपके ऊपर हमला करे तो कहां जाकर शिकायत करेंगे? पुलिस के पास। अगर पुलिस हमला करे तो कहां जाएंगे? दो विकल्प थे या तो नक्सलियों के पास जाएं। जहां वह जन अदालत लगाकर इंसाफ करते हैं या हम लोग थे। तो हमारी संस्था जो सरकार की आंख का तारा थी वहां आदिवासी पुलिस-सरकार की शिकायत लेकर आते थे। मैंने अपनी पत्नी से पूछा  कहा यह जो लड़की आई है अब तक तो हमारी संस्था बहुत अच्छी चलती थी खूब नाम है पैसा, शोहरत है। लेकिन अगर हमने यह केस ले लिया तो यह सब खत्म। तो हमारी पत्नी ने कहा आप अपने आप को गांधीवादी,समाजसेवी कहते हैं और दूसरे को बेसहारा कर रहे है, सोच विचार कर रहे हैं। तो हमने वह केश ले लिया। और हमारी संस्था में आदिवासी खूब आने लगे। फिर हम उन अधिकारियों से मिले और कहा कि देखिए यह हो रहा है। वो कब सुनने लगे भला। कहा की सरकार का आदेश था। फिर हमने मीडिया में बातें उठानी शुरू की तो सरकार थोड़ा परेशान हुई पर उससे कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। तब हम कोर्ट में घसीट लाए। तो वहां की सरकार ने हमें कहा कि जो आपका आश्रम है वह गैरकानूनी है। तभी वहां एक घटना घटी।  वहां एक गांव है वहां की 19 लड़कियों को पकड़ा और अलग-अलग ले जाकर बलात्कार कर उन्हें चाकू मार दिया और लड़कों को लाइन से खड़ा कर गोली से उड़ा दिया गया। तो उनके रिश्तेदार हमारे पास आए। उस मामले को हम हाईकोर्ट में लेकर के गए हमने पूछा क्यों मारा तो पुलिस ने कहा कि एनकाउंटर था। हमने पूछा उन्होंने कितने फायर किए पुलिस ने कहा अंधाधुंध फायरिंग किए। और आपने कितने किये तो कहे हमने 25 फायर किए। उन्होंने अंधाधुंध फायरिंग की और एक भी पुलिस को गोली नहीं लगी। और आप 25 फायर किए और 19 लोग मर गए। पांच बंदूकें दिखाए गए थे उसके बैरल में सुराख था। उससे कभी फायर नहीं हो सकता। हमें पता चला कि इनके पास ऐसे 5-7 बंदूके हैं। जिसे हर बार यह पेश कर देते हैं। हमने कहा कि ऐसा है सन 2000 में छत्तीसगढ़ बना  तब से दिन के उजाले में ऐसे कितने इनकाउंटर हैं जिसमें एक भी पुलिस को गोली नहीं लगी है। उसमें जितने हथियार बरामद हुए हैं उनकी सूची दिखाओ। तो पुलिस घबरा गई और फिर बुलडोजर,एंटी लैंड माइंस, मशीन गन लगी हुई जीपें लेकर हमारे आश्रम को घेर लिया। आश्रम में हॉस्पिटल व लाइब्रेरी थी। ऑफिस व ट्रेनिंग सेंटर था। डारमेट्री थी आदिवासियों के। सैकड़ो जवान लेकर आयी पुलिस और 2 घंटे में हमारा सब 17 साल पुराना आश्रम मिट्टी में मिला दिया। हमने कहा कोई बात नहीं। लड़ाई है हमने आप पर वार किया आपने हम पर पलटवार किया। अब एक किराए के मकान में वहां काम कर रहे हैं।
तभी चिदंबरम ने एक स्टेटमेंट दिया। उस समय गृह मंत्री हुआ करते थे कहा कि हिंसा रोक दिया जाए उन्हें 72 घंटे का समय दे तो मैं शांति बहाल कर सकता हूं। उन्होंने इंटरव्यू में कहा कि हिमांशु कुमार अगर बुलाए जनसुनवाई में तो हम आदिवासियों से बात करने जा सकते हैं। मुझे दिल्ली बुलाया गया कि आप आकर के चिदंबरम और राहुल गांधी से मिलिए। जब मैं राहुल गांधी से मिला तो उन्होंने पूछा कि आदिवासी हमसे दूर क्यों जा रहे हैं? तो मैंने उनसे मजाक में कहा आपको ब्राह्मणों की तरह करना चाहिए। जो उन्होंने बुद्ध के साथ किया। बोले क्या? मैंने कहा जब बुद्ध ब्राह्मणवाद के खिलाफ खड़े हुए तो ब्राह्मण बड़े चालाक थे। उन्होंने कहा कि बुद्ध तो विष्णु का दसवां अवतार है। फिर बौद्ध धर्म दुनिया भर में फैला। तो आप यह कहिए कि नक्सलाइट हमारे दोस्त हैं। उन्होंने हमको लोकतंत्र की कमियां बता दी हैं। अब जनता ने हमें चुना है कि हम लोकतंत्र की कमी को दूर कर दे। जब मैं चिदंबरम से मिला तो हमने कहा देखिए नक्सलियों के पास दो तरह की रणनीति है। उनके एक कंधे पर झोला होता है। उसमें किताबें होती हैं मार्क्स,लेनिन और माओ की। दूसरे पर बंदूक जब शांति होती है किताबें निकाल कर जनता को पढ़ाने लगते हैं। और जैसे सामने शत्रु आता है वह बंदूक उतारकर लड़ने लगते हैं। लेकिन सरकार के पास सिर्फ बंदूक है विचार तो है नहीं। हम आपको मौका देते हैं आप आइए और आदिवासियों से बात करिए। बोला कि मैं 7 फरवरी को आऊंगा। मैंने कहा आप को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री तो नहीं  रोकेगा? तो चिदंबरम बोला अरे भारत के गृह मंत्री को कौन रोकेगा। तो मैं वापस गया और मैंने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि भाई गांव गांव जाकर बता दो कि भारत का गृहमंत्री आ रहा है।
मैंने चिदंबरम को एक सीडी दी। उस सीडी में दो घटनाओं का जिक्र था। उसमें एक गांव था गोम्पाड। जिसमें 16 आदिवासियों को CRPF की कोबरा बटालियन ने तलवारों से काट दिया। 80 साल के बुजुर्ग का पेट काट दिया। 70 साल की महिला का स्तन काट दिया। एक डेढ़ साल का बच्चा था उसके हाथ को काट दिया। एक बच्चा मां के गोद में था उसको सिर में चाकू मार दिया। एक 8 साल की बच्ची और उसके नाना नानी को मार दिया। उस सीडी के साथ हम सुप्रीम कोर्ट में केस लेकर गए। सबसे पहले गृहमंत्री को यह बताया गया कि मैं इन लोगों को जनसुनवाई में उसके सामने पेश करूंगा। सबसे पहले पुलिस ने वह जो सुप्रीम कोर्ट में गोम्पाड के याचिकाकर्ता हैं। उन याचिकाकर्ता को किडनैप कर लिया। उस केस में मैं अकेला याचिकाकर्ता बचा। उसमें दूसरा केस था एक गांव की चार लड़कियों के साथ पुलिस वालों ने सामूहिक बलात्कार किया। और वह लड़कियां जब थाने में गई तो बलात्कारी थाने में बैठे हैं। फिर वह हमारे पास आयी। हमने एसपी को पोस्ट रजिस्टर किया। कोई जवाब नहीं आया। फिर हमने प्राइवेट शिकायत फाइल की। पुलिस ने कहा कि यह पुलिस वाले हमें मिल नहीं रहे हैं। जबकि वह थाने में रह रहे थे। नए बलात्कार कर रहे थे। नए गांव जला रहे थे। टाइम्स ऑफ इंडिया ने पूरा मुख्य पृष्ठ पर छापा कि "फरार हैं पर ड्यूटी पर है।" गृह मंत्री को पता है। वह मुख्यमंत्री को बताता है। तो मुख्यमंत्री पूरा राज्यसत्ता बलात्कारियों को ताकत प्रदान करता है। उन्हें पता था कि यह लड़कियां सामने आएंगी और 400 पुलिस वाले बलात्कारी पुलिस वालों के साथ उस गांव में जाते हैं। और उन लड़कियों को उठा कर लाते हैं। 5 दिन दोबारा उनका सामूहिक बलात्कार करते हैं। और 5 दिन बाद पुलिस जीप में लाकर बगल के गांव के चौराहे पर फेंक दिया। और कहा कि अब हिमांशु कुमार के पास गई तो पूरे गांव को आग लगा देंगे।



उसके बाद मैं उस गांव में गया मुंबई की पत्रकार प्रियंका थी, साथ में जावेद थे। उन्होंने कहा कि आपने कहा था कि सामने आओ। कानून -संविधान है। हिम्मत करो, आवाज उठाओ, डरो मत। पर आप हमें बचा नहीं सके। और मुझे लगा कि उन्हें मैं ज्यादा खतरे में डाल रहा हूं। मेरा जो भरोसा था कानून और संविधान पर पूरी तरह हिल गया। हमने आदिवासियों को उनका सम्मान, उनका जीवन, उनकी जीविका बचाने का कोई रास्ता ही नहीं छोड़ा है। पूरी राज्यसत्ता पूरी मीडिया, अदालत सब इनके खिलाफ है। कुछ नहीं है आदिवासियों के लिए। कुछ नहीं छोड़ा है हमने। आदिवासी अपनी बेटियों को कैसे बचाएं? क्या है उनके पास? सिवाय लड़ने के और लड़ते लड़ते मर जाने के। उसके 3 दिन बाद चिदंबरम को आना था 7 तारीख को। मेरे आश्रम में एक महिला रह रही थी जो गोम्पाड गांव की थी। जिसकी बाहों में CRPF ने गोली मार दी थी। उसकी बाहों की हड्डियां टूट चुकी थी। हम उसको लेकर के हॉस्पिटल गए थे। वहां उसके बाहों में रॉड डाल दी गई थी। डॉक्टर ने कहा था दोबारा इसको लेकर आइए। उसको लेकर के दिल्ली के लिए मैं निकला 4 जनवरी को। चिदंबरम के आने से कुछ दिन पहले। रास्ते में पुलिस ने हमारी गाड़ी को रोका और उस महिला का अपहरण कर लिया। शाम को अखबार में छप गया कि हिमांशु कुमार ने उस लड़की का अपहरण कर लिया है और फरार है। लेकिन पुलिस जल्दी ही उनको ढूंढ लेगी। अगले दिन सुबह मेरे पास मेरा एक साथी आया। उसने कहा कि 1 घंटे में पुलिस मेरे घर पर हमला करेगी और आज रात को पुलिस आप को मार देगी। मैं निकल रहा हूं अपनी बेटी और पत्नी को लेकर के। आप भी निकल जाइए। 1 घंटे बाद पुलिस ने उसके घर पर हमला किया। मोटरसाइकिल ले गई, टीवी फोड़ दिया, लैपटॉप उठा ले गई। मेरे घर को पुलिस ने घेर लिया था। और उस रात मुझे मारा जाना था। आधी रात को मैंने अपना हुलिया बदला। मुझे लगा कि मेरे साथी जेलों में है। मेरे सारे साथियों के घर लगभग पुलिस पहुंच चुकी थी।
मेरा जो सबसे निकट का साथी था। उस आदिवासी नेता को चिदंबरम से मिलने के बाद मानवाधिकार दिवस के दिन पुलिस उठाकर ले गई। उसके बाद हाईकोर्ट के वकील थे वह चले गए थाने। थानेदार ने कहां वकील साहब किसी वकील की हिम्मत नहीं कि थानेदार से बात कर ले और आप थाने के अंदर आ गए। इनको अंदर करो और दोनों को नंगा कर उल्टा लटका दो। सारी रात पिटाई की गई। ढाई साल के लिए हत्या और अपहरण के जुर्म के झूठे केस में जेल में डाल दिया गया। सुबह वकील साहब से लिखवाया गया की सुरक्षा के लिए मैं रात थाने में रुक गया और सुबह सही सलामत वापस जा रहा हूं। मेरे पास आए तो उनका शरीर सूजा हुआ था। वह फोटो आज भी मेरे पास है। आज तक उनका ऑफआईआर दर्ज नहीं हुआ। मेरे सारे कार्यकर्ताओं के घर पुलिस पहुंच चुकी थी। आज तक उस थानेदार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। आदिवासियों के मुकदमे अदालतों में पड़े थे। मुझे लगा कि आज मरना कोई अच्छा विचार नहीं है। आगे निकलना चाहिए और लड़ाई जारी रखनी चाहिए। तो मैं आधी रात को अपनी पीछे की दीवार से कूदा और टैक्सी लेकर वहां से निकला। उसके बाद मुझे बताया गया कि मेरे खिलाफ करीब 100 से ज्यादा स्थाई वारंट है।
मेरी साथी सोनी सोरी जो मेरी छात्रा रही है। वह और उसका भतीजा लिंगा कोड़ोपी। जब इन लोगों ने वहां आवाज उठानी शुरू की। तो लिंगा कोड़ोपी को फर्जी मामले में पकड़कर SP के घर ले जाया गया। लिंगा कोड़ोपी को नंगा किया गया। मिर्च पाउडर तेल में डुबोकर डंडा उसके मलद्वार में घुसा दिया गया। उससे उसकी आँत फट गई। अभी तक उसको रक्त स्राव होता है। कई ऑपरेशन हो चुके हैं उसके। लेकिन ठीक नहीं हो रहा है। सोनी सोरी को थाने में ले जाकर कहा गया कि तुम लिख दो कि अरुंधति राय,प्रशांत भूषण, हिमांशु कुमार यह सब नक्सलियों की शहरी नेता हैं। तो हम तुम्हें छोड़ देंगे। सोनी सोरी ने लिखने से मना किया। तो SP ने सोनी सोरी को निवस्त्र करने का हुकुम सिपाहियों को दिया। सिपाहियों ने उसको निर्वस्त्र कर दिया। एसपी के आदेश पर उसको बिजली के झटके दिए और उसके गुप्तांगों में पत्थर भर दिए गए। वह बेहोशी की हालत में जीप में पड़ी रही और मजिस्ट्रेट ने उसको देखना भी मुनासिब नहीं समझा। ज्यूडिशियल रिमांड दे दिया, जेल भेज दिया। हम लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन किया। हमने कहा छत्तीसगढ़ से बाहर इसकी जांच कराई जाए। एनआरएस हॉस्पिटल कोलकाता में सोनी सोरी का मेडिकल परीक्षण हुआ। वहां उसके शरीर में से पत्थर के टुकड़े निकले और वह सुप्रीम कोर्ट की टेबल पर रख दिए गए। लेकिन 7 साल होने को है सुप्रीम कोर्ट की हिम्मत नहीं हो रही है कि एक SP के खिलाफ FIR भी करें। क्यों? क्योंकि भारत का जो विकास का मॉडल है बंदूक के दम पर ही चल सकता है। आजादी के बाद से आज तक एक भी विकास का कोई प्रोजेक्ट बिना पुलिस और बंदूक के लगाया ही नहीं गया। अगर पुलिस को जेल में डाल देंगे तो यह शहरी लोगों का विकास कैसे होगा। यह विकास का मॉडल गरीब के साथ बातचीत करके नहीं चलता है। थोपा जाता है और बंदूक के दम पर चलता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट की हिम्मत नहीं है वह पुलिस ऑफिसर को जेल में डाले।
 7 साल से मुकदमा लटका हुआ है सुप्रीम कोर्ट में। वह लड़ रही है और आज दूसरे लोगों के लिए भी लड़ रही है। सरकार के लिए एक चुनौती बन चुकी है। अभी हमारी उससे बात हुई उसने बताया कि सलवा जुडूम फिर आ रहा है। अभी कुछ महीने पहले नए गांव जलाए गए हैं। महिलाओं को पीटा गया है। सुरक्षा बल उनके महुआ और धान रखने वाले टोकरों को कुल्हाड़ी से फाड़ रहे हैं। सारा अनाज बिखेर देते हैं मिट्टी में। गोलियां चलाकर उनकी गाय और बकरियों को जंगल में भगा देते हैं। और उनसे कह रहे हैं गांव छोड़कर भाग जाओ वरना तुम्हारे बच्चों की गर्दन काट देंगे। आदिवासी को सुनने वाला कोई नहीं बचा है। विनायक सेन छत्तीसगढ़ में जाकर काम नहीं कर सकते। वकील ईशा खंडेलवाल जो वहां मुफ्त कानूनी सहायता देने गई थी। उनको वहां से भगा दिया गया और डीजीपी पूरी बेशर्मी के साथ उसको डर नहीं है, वह कहता है हमने वकीलों को इसलिए निकाल दिया बस्तर से क्योंकि यह माओवादियों को कानूनी मदद देते हैं। कौन माओवादी है? पुलिस जिसे कह दे वो माओवादी है? अगर मुझे माओवादी कहा गया। तो अदालत फैसला करेगी कि मैं माओवादी हूं या नहीं। और उसके लिए मुझे वकील की जरूरत पड़ेगी। आप हमारे वकील को भगा देंगे। आप मेरे वकील को मारेंगे। तो मैं मुकदमा कैसे लड़ूंगा? मैं न्याय कैसे प्राप्त करूंगा? आप न्यायिक प्रक्रिया में बाधा डाल रहे हैं। यह जुल्म है, इसका कोर्ट को संज्ञान लेना चाहिए। लेकिन कोर्ट संज्ञान नहीं ले रही है। डीजीपी मीडिया में कह रहा है कि हमने वकीलों को इसलिए भगा दिया है। पांच पत्रकारों को जेल में डाल दिया गया है। सोनी सोरी के ऊपर दोबारा तेजाब डाल दिया गया है। हैदराबाद हाईकोर्ट में वकील,पत्रकार की फैक्ट फाइंडिंग की पूरी की पूरी टीम को जेल में डाल दिया। नंगा करके उनको जेल में परेड कराई गई। ताकि डर जाएं सब लोग। कोई फैक्ट फाइंडिंग के लिए बाहर से ना आए।
 आदिवासियों की मदद के सारे रास्ते बंद किए जा रहे हैं। और कानून, मीडिया, व्यवस्था सब को बंद करके आदिवासियों का जनसंहार किया जा रहा है। ऐसा लगता है कि सौ साल पुरानी कोई दूर देश में सूडान या पाकिस्तान की बात है। यह हमारे सरकार, हमारे देश में आज हो रहा है। और हम लोग जो अपने को बहुत विकसित, लोकतांत्रिक, महान संस्कृति के वाहक  कहते हैं। अपने देश के करोड़ों लोगों की हत्या कर रहे हैं अपनी ही सेनाओं के माध्यम से। यह बेचैन कर देने वाली हालत है। न बर्दाश्त करने वाली हालत है। लेकिन जितनी बेचैनी देश में होनी चाहिए लाखों-करोड़ों लोगों की हत्याओं पर। मैं कोशिश करता हूं कि इस बेचैनी को फैलाऊं। जो आग बस्तर में लगी हुई है। आप कहते हैं हिमांशु जी का संघर्ष मेरा संघर्ष कुछ नहीं है। जो बस्तर के लोग संघर्ष कर रहे हैं। जो लोग जेल में है। जिन हालत में मर रहे हैं लोग।  उस बात को हमें ज्यादा से ज्यादा बात करनी चाहिए, लिखना चाहिए। जितनी ज्यादा आवाज उठाएंगे सरकार उतना डरेगी। जितना चुप रहेंगे सरकार की हिम्मत उतनी बढ़ेगी। सबसे महत्वपूर्ण, खतरनाक बात यह है अगर सरकार को छत्तीसगढ़ में यह करने की छूट दे दी गई। तो कल को सरकार आपके साथ भी यही करेगी।
शैलेश

( शैलेश गोरखपुर विवि से लॉ के छात्र हैं। उन्होनें बीएचयू से बीकॉम किया। यहां सक्रिय भगत सिंह छात्र मोर्चा के भूतपूर्व अध्यक्ष हैं। छात्र मशाल इसी संगठन का मुखपत्र है )


अभी यूपी में एंटी रोमियो स्क्वायड बनाया गया। वह सलवा जुडूम है। गुंडों को पावर दी गई थी कि वो किसी को पकड़ सके और पीट सके। इसी तरह हरियाणा में जो गौरक्षकों को पहचान पत्र दिया गया। यह भी सलवा जुडूम है। पुलिस प्रोटेक्शन दे रही है कि यह पीट सके मुसलमानों को और पशुओं का व्यापार करने वाले, दलितों को।  अगर आप  छत्तीसगढ़ में यह इजाजत देंगे सरकार को तो कल को आपके  साथ भी यही करेगी। इसलिए जहां भी सरकार संविधान, कानून व मानवअधिकारों को कुचले, तुरंत पकड़े वही रोक दीजिए। वही आवाज उठाइये। एक भी व्यक्ति के मानवाधिकार का हनन स्वीकार करना भारत के हर नागरिक के मानवाधिकार का हनन है।
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