28 जून, 2018


यात्रा संस्मरण: अथ औली यात्रा कथा 


      
ठण्ड की तलाश में

रचना त्यागी


रचना त्यागी


20 जून, 2018 की रात को पहाड़ी पर्यटन स्थल 'औली' (उत्तराखण्ड) के लिए निकलना तय हुआ था। इंटरनेट की जानकारी के अनुसार दिल्ली से औली का 18 घण्टे का सफ़र था। यूँ तो पहले कई बार पहाड़ी स्थलों का भ्रमण किया है, लेकिन साल-दर-साल पहाड़ों पर बढ़ती गर्मी, वहाँ की भीड़-भाड़ और गन्दगी, लम्बी सड़क-यात्रा में होने वाली दिक़्क़त (ट्रैवल सिक्नेस) के चलते पहाड़ी यात्राओं में एक लम्बा अंतराल आ चुका था। इस बार भी ठंडक, प्राकृतिक सौन्दर्य आदि जैसे बिंदुओं के मद्दे-नज़र बहुत सोच-विचार के बाद यह स्थान तय हुआ था। हम कुल 10 यात्री थे, जो एक ही परिवार के थे, अतः आने-जाने में एक साथ समय बिताने, बोलने-बतियाने और लम्बी, पहाड़ी चढ़ाई पर ख़ुद ड्राइव करने से बचने के लिए टैम्पो-ट्रैवलर का साधन चुना गया। 20 जून की रात ठीक एक बजे (21 जून) हमने प्रस्थान किया। बीच-बीच में चाय के बहाने गाड़ी को और ख़ुद को विराम देते हुए जब तक हरिद्वार, ऋषिकेश पहुँचे, अँधेरे की चादर को छीजते हुए भोर का उजाला फैलने लगा था। सूरज की आमद दिखाई दे रही थी, पर सूरज अभी नटखट बालक की मानिंद शरारत करने पर तुला हुआ लुका-छिपी खेल रहा था, सो बहुत देर बाद नज़र की ज़द में आया।




हरिद्वार में विश्व विख्यात 'पतजंलि'  के कई एकड़ में फैले आश्रम के दर्शन हुए। साथ ही बाबा रामदेव की व्यावसायिकता के विषय में सहयात्रियों के कटु उद्गार प्रकट हुए।







 कुछ आगे जाने पर हरिद्वार में पुराने ढंग के बने हुए मकानों को देखकर एक मीठा-सा अहसास हुआ। रंग-बिरंगे मकान दूर से खिलौने जैसे प्रतीत होते थे। उनमें एक ही दीवार में दरवाज़ा और खिड़की निकाली हुई थी और खिड़कियाँ लोहे की सलाखों और बिना छज्जे वाली थीं।  उन्हें देखकर ऐसा लगा कि कई साल पहले इस तरह का मकानों में लोग रहते होंगे।  साथ ही पुराने समय की कई कहानियाँ मस्तिष्क में साकार हो उठीं, मानो उनके पात्र उन्हीं मकानों में रह चुके हों। बहरहाल, वहाँ दिनचर्या शुरु होने के लक्षण दिखाई दे रहे थे - कोई पिता अपने पुत्र के साथ छत पर खड़ा दातुन कर रहा था, कोई चिड़ियों, कबूतरों के लिए दाना डाल रहा था, कहीं इलाक़े के नल से बाल्टी में पानी भरा जा रहा था। जब कोई वस्तु या व्यक्ति हमारी कल्पना के क़रीब होता है, तो पहली बार दिखने या मिलने पर भी जाना-पहचाना लगता है। इसी भावना के अन्तर्गत महानगरीय भोर से अलहदा यह भोर बहुत सुहावनी और चिर-परिचित लगी। सच कहूँ, तो तीव्र इच्छा हुई कि गाड़ी से अपना सामान लेकर उतर जाऊँ और मन भरने तक इसी जीवन का हिस्सा बनी रहूँ।  ज़िंदगी बहुत सीमित है ... और अभिलाषाएँ असीमित ! ऐसे में यदि सारी में से कुछ आकांक्षाएँ भी इस तरह के पड़ावों के ज़रिये पूरी होती रहें, तो जीवन में तृप्ति की सम्भावना बढ़ जाती है।

         
 हर यात्रा दोतरफ़ा होती है - 

एक अंतर्मन की और दूसरी बाह्य जगत की। इस लिहाज़ से यह यात्रा मन के भीतर चल रही थी... और बाहर का आलम यह था कि सुदूर पर्वत दिखाई देने से मंज़िल के नज़दीक़ आते जाने की उम्मीद बढ़ती जा रही थी और रोमांच भी। रास्ते में फ़ाइबर के बने हुए चल शौचालयों (सुलभ शौचालयों) से भी भेंट हुई, जो बाहर से दिखने में काफी साफ़ और सुंदर थे, पर अंदर से गंदे और पानी की कमी से बेहाल। पूछने पर पता चला कि उनका किराया 10 रूपये प्रति व्यक्ति है, लेकिन यह किराया वसूल करने के लिए वहाँ कोई उपलब्ध नहीं था। अगर होता, तो शायद यह बदहाली न होती।

   
रास्ते में गंगा की अठखेलियों और उदासीनता के अलग-अलग रूप देखते हुए हम घुमावदार पर्वतीय रास्तों पर बढ़ते रहे। जैसे -जैसे ऊँचाई पर चढ़ते जा रहे थे, बच्चे दूर से दिखने वाली पर्वत श्रृंखला की यत्र-तत्र सफ़ेद चमकदार चोटियों को देखकर उत्साहित होते जा रहे थे। जबकि हरिद्वार पार करने तक भी तापमान में कोई कमी महसूस न होने से निराशा भी हो रही थी। कई स्थानों पर देखा कि पहाड़ी रास्तों को चौड़ा करने के लिए काम चल रहा था। रास्ते में सिख धर्म स्थल 'हेमकुण्ठ' के लिए बाइक पर जाते केसरिया पगड़ी बाँधे सिख नौजवान और पैदल जाते वृद्ध प्रचुरता में देखने को मिले। जगह-जगह इनके स्वयंसेवकों ने मीठे पानी व भोजन की व्यवस्था कर रखी थी और आते-जाते यात्रियों को विनम्र आग्रह कर खाने-पीने के लिए सेवा का अवसर प्राप्त करने के अभिलाषी थे। यह दृश्य देखकर एक बार फिर मेरी यह धारणा पुष्ट हुई कि निःस्वार्थ सेवा-भाव में सिख धर्म सबसे अग्रणी है।

   
21 जून की शाम छः बजे के क़रीब हम 'औली नेचर रिज़ॉर्ट' पहुँचे, जहाँ यात्रा से ही पूर्व नैट के ज़रिये जानकारी लेकर और मैनेजर से फोन पर बात करके रुकने योग्य जगह समझकर हमारी तलाश समाप्त हुई थी। वहाँ पहुँचने पर पता चला कि वह स्थान 'जोशीमठ' है, जो औली से छः किमी नीचे है। हालाँकि वहाँ प्रवास के दौरान यह पाया कि उसका दाम, सर्विस के मुक़ाबले बहुत अधिक है, पर नई जगह होने के कारण इस तरह के अनुभव होना आम बात है। उस तथाकथित 'रिज़ॉर्ट' का रिसेप्शन हमेशा खाली रहता था, सो बात करके कुछ तय करने के लिए कोई उपलब्ध नहीं था। स्टाफ़ के नाम पर तीन-चार लड़के थे, जो ज़ोर से आवाज़ लगाने पर दृष्टिगोचर होते थे।  वे रात को ही नाश्ते के बारे में पूछकर सुबह-सुबह बनाकर रख देते और बाक़ी दिन बैडमिंटन खेलने या अन्य गतिविधियों में बिताते। पानी मिली दाल और कच्ची सब्ज़ी में कोई स्वाद न होते हुए भी खाना लाचारी थी। हालाँकि थोड़ा सख़्ती से टोकने के बाद खाने की गुणवत्ता में थोड़ा सुधार हुआ। लेकिन खाने की कमी पर वहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य हावी रहा। हालाँकि जिस ठण्ड की तलाश में हम इतनी दूर गए थे, उसका कहीं अता-पता न था। पर वहाँ प्रकृति की गोद में बने झोंपड़ीनुमा कमरों ने हमें बहुत लुभाया। कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरकर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कमरे बने हुए थे, जिनकी छत झोंपड़ी की तरह ढलवाँ थी। चारों ओर खाई और विशाल पर्वत थे। हर कमरे के बाहर छत से लटकती नीली रौशनी वाली लालटेन, जो दरअस्ल मच्छरों को आकर्षित करने के लिए एक ख़ूबसूरत प्रलोभन थी, उस सौंदर्य को और बढ़ा रही थी। बड़े-बड़े हेलीकॉप्टर की शक़्ल के मच्छर मौक़ा पाते ही कमरे में घुसने को बेताब रहते थे। पता चला कि ये  'हेलीकॉप्टर' नामक जीव केवल मई-जून के ही दो महीनों में यहाँ नज़र आते हैं। बाक़ी के दस महीने कहीं छिपकर विश्राम करते हैं।




हमारे कमरों के ठीक सामने हाथी के आकार का एक विशाल पर्वत था, जिसका नाम ही 'हाथी पर्वत' पड़ गया था। शायद किसी ज़माने में किसी ऋषि के श्राप ने उसे वहाँ इस रूप में स्थापित कर दिया होगा।

                                   हाथी पर्वत

अगली सुबह, जैसा कि एक गाईड से पूर्व -निर्धारित था, हम लोग अपने साथ लाई गाड़ी में औली के लिए निकल गए। छः किमी के चढ़ाई वाले रास्ता तय करके हम 'स्की रिज़ॉर्ट' के पार्किंग क्षेत्र में पहुँचे, जहाँ से लोहे की सीढियाँ पार कर हमें 'एयर चेयर' ( ट्रॉली ) के ज़रिये हवा में उड़ते हुए औली पहुँचना था। ट्रॉली में बैठकर नीचे खाईयों की गहराई को देखना दिल दहलाने वाला अनुभव था। एक-एक क्षण जान की सलामती की दुआ माँगते हुए वे सात मिनट कैसे बीते, यह समझा जा सकता है। यह ट्रॉली एक बार में चार व्यक्तियों को बैठा सकती है और आने-जाने का टिकट 300 रूपये / व्यक्ति है, जबकि एक ओर के सफ़र में डेढ़ गुना कम ख़र्च है। मसलन- अगले दिन वापसी में हमें केवल औली से वापिस स्की रिज़ॉर्ट की पार्किंग तक पहुँचकर अपनी गाड़ी में सवार होना था, तो नौ लोगों के टिकट की बजाय पाँच लोगों की टिकट लगी, क्योंकि यह यात्रा एकतरफ़ा थी।



ट्रॉली ने जैसे ही हमें  औली  की वादियों में उतारा, ऐसा लगा कि हम दूसरी दुनिया में पहुँच गए हैं।  नज़र की हद तक पर्वत ही पर्वत ! कुछ पर बर्फ़ की चमक झलक रही थी। गाईड हमें पैदल चलाते हुए उबड़ -खाबड़ पहाड़ी रास्तों पर ले चला। चारों ओर चट्टानों पर देवदार और चीड़ के पेड़ ढलान से बेख़बर सीधे तने हुए खड़े थे। लगभग 50 -60 फ़ीट की ऊँचाई पर सघन वन थे, जिनमें जंगली पशुओं का वास था। ट्रैकिंग के रास्ते में काली गायों और बछड़ों के झुण्ड निश्चिंचतता से हरियाली चरते हुए दीखे। उनके गले में बंधी घण्टियों की खनखनाहट उन वादियों में गूँजने वाली एकमात्र ध्वनि थी। पता चला कि ये गायें पहाड़ों में खेती करने वालों की हैं।  जिन महीनों में खेती नहीं होती, उन महीनों में ये खेतिहर इन्हें प्रकृति के हवाले छोड़ देते हैं और खेती का समय आने पर इन्हें वापिस ले जाते हैं। इसके अलावा जो गायें दूध देना बन्द कर देती हैं, उन्हें भी यूँ ही बेसहारा छोड़ दिया जाता है। इनमें से कई पशु ठण्ड अथवा जंगली जानवरों का शिकार हो जाते हैं। इस मानवीय प्रवृत्ति को देखकर उन मासूम बेज़ुबान पशुओं के प्रति मन भर आया ! 'इस्तेमाल करके छोड़ देना' वाली फ़ितरत इंसान को कितना नीचे गिरा देती है!

                                      ट्रैकिंग

बहरहाल, गाईड के पीछे-पीछे चलते हुए एक खुले मैदान में पहुँचकर हम थमे, जहाँ उसने हमें कुछ पर्वतों के नाम और पौराणिक सन्दर्भों से अवगत कराया। उसने हमें 'ब्रह्म कमल' नामक एक पर्वत शृंखला दिखाई, जिसके शिखर कमल की खिली पंखुड़ियों के आकार में थे। उनकी रंगत कमल की तरह गुलाबी न होकर बर्फ़-सी सफ़ेद थी।

                     
                                   ब्रह्म कमल


दूसरी ओर संकेत करके गाईड ने हमें 'नन्दा देवी पर्वत' दिखाते हुए बताया कि इस पर्वत पर आज तक कोई नहीं चढ़ पाया है, क्योंकि इसे नन्दा देवी का 'मस्तक' माना जाता है, अतः इस पर कोई पैर नहीं रख सकता। उसके साथ ही उसने वह पर्वत भी दिखाया, जहाँ से हनुमान जी लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लेकर आये थे और दूसरी ओर संकेत करके वह स्थान दिखाया, जहाँ उन्होंने संजीवनी एक हाथ में थामे हुए विश्राम के लिए एक पैर धरती पर टिकाया था। यद्यपि वह स्थान वहाँ से दूर था और हम हनुमान जी के पैर का चिह्न नहीं देख पाए, न ही जान पाए  कि ऐसा कोई चिह्न है भी, या नहीं। वहाँ  नीचे देखने पर सैनिकों के लिए बने 'इग्लू हाउस' भी दिखे, जो सफ़ेद रंग के इग्लू जैसे दीख रहे थे।


सैनिकों के 'इग्लू हाऊसिज़

           

उस विशाल मैदान में तेज़ धूप कारण टिकना मुश्किल था, क्योंकि ऊँचाई के साथ -साथ धूप तीख़ी हो जाती है। हमें मौसम विभाग की उस भविष्यवाणी के सच होने का इंतज़ार था कि उस दिन औली में बरसात होने वाली है। तभी जैसे सूरज ने हमारी सुन ली और तीख़ी धूप की पीली चादर को समेट कर गहरी सलेटी रंग की चादर उन वादियों के आकाश पर बिछा दी। एकदम से मौसम बदल गया और ठण्डी -ठण्डी  हवा बहने लगी। बच्चों को यह देखकर इतना आनंद आया कि उन्होंने तेज़ आवाज़ में संगीत लगा दिया और नाचने लगे। गाईड, जो कि हमें घुमाकर अपनी दिहाड़ी पूरी कर अगले यात्रियों तक पहुँचने की  जल्दी में था, बच्चों की ज़िद देख मन मारकर वहीं बैठ गया। कुछ ही देर में हल्की बूंदा-बांदी भी शुरु हो गई और हमें न चाहते हुए भी अपने साथ गए बुज़ुर्ग परिवारजनों का ख़्याल कर वहाँ से कूच करना पड़ा, क्योंकि बरसात में पहाड़ी रास्तों पर फ़िसलन का डर रहता है।



 वहाँ से ट्रैकिंग करते हुए हम फिर से ट्रॉली स्टेशन पहुँचे, तो रास्ते में नीचे बने हुए एक सुन्दर रिज़ॉर्ट पर नज़र पड़ी। वहाँ ऊँचाई के कारण मौसम तो ठण्डा था ही, चारों और भरपूर पहाड़ी इलाका, सामने बनी छोटी सी कृत्रिम झील, घने हरे जंगल, पशुओं के झुंड और उनके गले में बँधी घण्टियों की मधुर ध्वनि हमें भरपूर मोह रही थीं।  वैसे भी हम जोशीमठ वाले 'औली नेचर रिज़ॉर्ट' के ख़राब रख-रखाव और वहाँ की अपेक्षाकृत गर्मी के कारण पड़ाव बदलना चाहते ही थे। सो तय हुआ कि उन हसीन वादियों और ठण्ड से घिरे इस रिज़ॉर्ट के विषय में जानकारी ली जाये। हम दो लोग जाकर उस रिज़ॉर्ट में कमरे देखकर,अगले दिन के लिए उनकी उपलब्धता और किराये आदि जानने के बाद फ़ोन पर मैनेजर से बात तय करके उत्साहित होकर ट्रॉली स्टेशन के पास आ गए, जहाँ चाय की छोटी-छोटी काठ की ढाबेनुमा दूकानें बनी हुई थीं। पहाड़ी ढाबों की मैगी प्रसिद्ध है। हमने वहाँ चाय-मैगी का लुत्फ़ लिया और वापिस ट्रॉली में बैठकर दूसरे सिरे पर उतरे और गाड़ी से अपने पुराने ठिकाने पर आ गए। उस शाम वहाँ भी मौसम ठण्डा और ख़ुशनुमा हो चला था। हमने उस शाम आग जलाकर नृत्य -संगीत का आयोजन किया। देर रात तक उन पर्वतों और खाईयों के बीच संगीत की लहरियाँ गूँजती रहीं। 'हाथी पर्वत' ख़ामोशी से हमारा आनन्दोत्सव देख रहा था। वह तो न जाने ऐसे कितने ही उत्सवों और हादसों का साक्षी रह चुका होगा ! काश..... कि वह बोल या लिख पाता, तो उससे वे सारी गाथाएँ सुनती। क़ुदरत मानवीय कृत्यों का वह मूक संग्रहालय है, जो संग्रह तो करती है, पर हर संग्रह को दिखा नहीं पाती।

अगले दिन बहुत उत्साहित होकर हमने वह जगह खाली की और अपने नए पड़ाव 'नंदा देवी रिज़ॉर्ट्स' की ओर निकल पड़े। यहाँ एक बड़ी चूक हमसे हुई। पिछले दिन जब हम औली में इस रिज़ॉर्ट के बारे में बात करने गए  थे, उस समय वहाँ का मैनेजर जोशीमठ गया हुआ था। अतः उसकी अनुस्पस्थिति में वहाँ स्थानीय कर्मियों से ही बात हो पाई थी। हालाँकि वहाँ ठहरने के बाबत मैनजेर से ही फ़ोन पर बात हुई थी, पर वहाँ पहुँचने के रास्ते के बारे में दो-तीन अलग-अलग उपाय हमें बताये गए थे।  एक कर्मी, जिसका नाम प्रकाश है, उसने बताया कि वहाँ आने के रास्ते में ऊँची चढ़ाई है और बरसात में मिट्टी धँस जाने का ख़तरा है, इसलिए गाड़ी नीचे छोड़कर हमें वहाँ चलने वाली 'सूमो' से आना सुरक्षित रहेगा।  एक अन्य ने सुझाव दिया कि केवल एक दिन का सामान ( क्योंकि वहाँ हमें एक ही रात ठहरना था ) लेकर ट्रॉली से आना और जाना बेहतर है। लेकिन जब हमने पिछले रिज़ॉर्ट को छोड़ने से पहले भावी ठिकाने 'नंदा देवी रिज़ॉर्ट'  के मैनेजर से फ़ोन पर बात करके अपनी गाड़ी से आने के विषय में सलाह माँगी, तो उन्होंने बेहिचक हमें अपने टैम्पो ट्रैवलर से आने को हरी झण्डी दिखा दी। चूँकि वह क्षेत्र 'भारत-तिब्बत सीमा'  के निकट है, इसलिए हर वाहन को सेना से इज़ाज़त लेकर ही आगे जाने दिया जाता है।  इस बाबत मैनेजर ने फ़ोन पर सेना कर्मियों से बात करवाकर हमारी गाड़ी को आने की इज़ाज़त दिलवाने का दिलासा दिया। हम बेफ़िक़्र होकर अपनी गाड़ी में लदकर निकल पड़े। सेना छावनी पर हमें रोककर पहचान पत्र आदि देखा गया, पूछताछ हुई और 'नंदा देवी  रिज़ॉर्ट'  के मैनेजर से फ़ोन पर बात होने के बाद, सेना अफ़सर की संतुष्टि के बाद आगे जाने की अनुमति मिल गई। इस दौरान वहाँ अपने देश के रण बाँकुरों को हमारी रक्षा के लिए शूटिंग का अभ्यास करते देख उनके प्रति एक अकथनीय गर्व और आदर का अहसास हुआ।

यहाँ तक रास्ता बहुत कठिन नहीं था, लेकिन इसके आगे कच्चा, तंग और खड़ा रास्ता देखकर हमारे होश फ़ाख्ता हो गए। हर क्षण ऐसा लगा, कि गाड़ी अब गयी और तब गयी। उस समय जीवनदान की याचना हर चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी, और पछतावा भी ... अपनी गाड़ी का मोह छोड़, ट्रॉली से न जाने का। ड्राइवर अपनी जगह परेशान था, कि यदि बरसात हो गई , तो गाड़ी मिट्टी में धँस जाएगी। सामने से कोई कोई गाड़ी आ जाती, तो उसे या हमें पीछे हटने के लिए उस खड़ी चढ़ाई और बेहद तंग कच्चे रास्ते पर कोई जगह नहीं थी। गाड़ी के हर हिचकोले पर प्राण मुँह को आते थे। उस 10,000 फ़ीट की ऊँचाई पर मैं नीचे की गहराई भाँपते हुए किसी हादसे की सम्भावना में अपने शरीर का हश्र सोच रही थी।


किसी तरह दूर रिज़ॉर्ट दिखाई देना शुरु हुआ, तो उम्मीद बँधी। हालाँकि जितना नज़दीक़ वह दिखाई दे रहा था, उससे कहीं दूर, और चढ़ाई पर था। ख़ैर ! इस सफ़र के लिए तो ड्राईवर को जितना सराहा जाये, कम है ! एक तरह से उसने हमें दो बार जीवनदान दिया। रिज़ॉर्ट थोड़ी चढ़ाई पर था, सो हमें सामान समेत चढ़ाई को ख़ुद ही तय करना था। किया। वहाँ पहुँचकर जहाँ एक ओर सुंदर वादियों में एक दिन बिताने का उल्लास था, वहीं उस उल्लास के रंग को फ़ीका करते अन्य बिंदु , यथा कमरों में 'हेलिकॉप्टर्स' का डेरा, सफ़ाई न होना, पानी न होना, मनचाहे कमरे ( जिनकी पिछले दिन बात तय हुई थी ) न मिलना, और सबसे बड़ा - 'आग जलाने की अनुमति न मिलना'  थे। जिस कर्मी 'प्रकाश' से पिछले दिन हमारी मुलाक़ात और बात हुई थी, वह पानी का प्रबंध करने में इधर-उधर मारा-मारा फिर रहा था और मैनेजर आज भी नहीं दीख रहा था। पता चला कि यह सरकारी रिज़ॉर्ट है और यहाँ अधिकांश कर्मी  दैनिक वेतन पर हैं। मैनेजर 'किशोर डिमरी' बर्फ़ गिरने के सीज़न में 'स्की इंस्ट्रक्टर' का काम करता है और इन दिनों में रिज़ॉर्ट का प्रबंधन संभालता है। बच्चों की 'बॉनफ़ायर' की बहुत ज़िद करने पर बताया गया कि डिप्टी मैनेजर कोई बहुत सख़्त महिला हैं, जिन्होंने रिज़ॉर्ट में जगह-जगह सीसीटीवी कमरा लगा रखे हैं और अपने सख़्त मिज़ाज़ के चलते दो महीने से अधिक कहीं टिक नहीं पातीं।  यहाँ छः महीने टिकने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं। ऐसे में  'बॉनफ़ायर' की बात सोचना भी फ़िज़ूल है। इसके अलावा वन-विभाग के अधिकारी गश्त पर रहते हैं और लकड़ी जलाने पर 25,000 रुपये का चालान है। मन मसोसकर बच्चों ने वादियों में ही घूमना तय किया और रिज़ॉर्ट के आसपास ही ट्रैकिंग, घुड़सवारी, फ़ोटोग्राफ़ी आदि करते रहे।

                  नंदा देवी रिज़ॉर्ट’ और कृत्रिम झील

 नीचे कृत्रिम झील के पास एक छोटा सा मंदिर था 'नाग देवता' का, जिसमें एक नाग की मूर्ति बनी हुई है। कुछ-कुछ दूरी पर 2 -3  चाय की दूकानें थीं। शाम 5.30 बजे के क़रीब ठण्ड काफ़ी बढ़ गयी थी और स्वेटर और शॉल के बावजूद कंपकंपी छूट रही थी। प्रकृति का श्रृंगार अपने चरम पर था।  सामने विशाल पर्वतों पर सूरज ने किरणों का हल्का पीला बुरादा छिड़क दिया था, जो समय के साथ -साथ रंगत खोता जा रहा था। बादल और ऊँचाई आपस में साँठगाँठ कर पर्वत शिखरों पर सूरज की रंगोली के रंग मिटाकर अपना स्लेटी रंग भरने को आमादा थे। बहुत मनोहारी मंज़र था। ऐसे में अनेक तरह के भाव मन में आ रहे थे - वैराग, एकांकीपन, जीवन की निरर्थकता, संबंधों का सत्य और न जाने क्या-क्या !





                            नाग देवता' का मंदिर


अगली सुबह तय किया गया कि यहाँ आते समय जो ग़लती  हुई, उसे न दोहराते हुए सामान को गाड़ी में छोड़कर हमें ट्रॉली से जाना चाहिए। हालाँकि ऐसे में भी ड्राईवर के लिए ख़तरे की फ़िक़्र थी, लेकिन इस बार दो बातें ख़तरे को कम करती थीं - गाड़ी में वज़न कम होना और चढ़ाई की बजाय उतराई का रास्ता होना। एक अच्छी बात यह थी कि ड्राईवर पहाड़ का रहने वाला था और पहाड़ी इलाक़ों में गाड़ी चलाने का उसे अच्छा तज़ुर्बा था। लेकिन यह बात गाड़ी नहीं समझती। उसकी भाषा हमें ही समझनी पड़ती है, चालक कैसा भी हो, कोई भी हो। तो हुआ यह , कि ट्रॉली से उतरकर हम लोग नीचे आए और गाड़ी में बैठे। वह सफ़र की शुरुआत से ही कुछ कहना चाह रही थी, जिसे हम नहीं समझ पा रहे थे। शायद चालक समझता था, पर उसकी आवाज़ अनसुनी करता रहा। फलतः नाराज़ होकर गाड़ी रूठ गई।  और फिर वह हुआ, जिस मौक़े के लिए यह चौपाई लिखी गयी है -'होइ है वही, जो राम रची राखा ....'

दूसरे ही दिन से जब हमने देखा कि दिल्ली से औली का सफ़र बहुत लम्बा है और हमारे साथ-साथ चालक और गाड़ी के लिए इतना लम्बा सफ़र एकमुश्त तय करना ठीक नहीं है, तो रास्ते में पड़ाव का उपाय हमारे मन में तैरने लगा था।  इस पड़ाव के लिए रास्ते का मध्य होने के नाते और नदी में नहाने का आनंद उठाने के नाते हरिद्वार / ऋषिकेश से  बेहतर पड़ाव कोई हो ही नहीं सकता था। लेकिन पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को बदलकर बीच में रुकना जेब और समय, दोनों की योजना में घात लगाने वाली बात थी , सो बच्चों की बहुत मिन्नतों के बावजूद अस्वीकृत कर दी गई। अंदाज़ा लगाया गया कि देर रात या भोर  तक हम दिल्ली पहुँच जाएँगे। आते समय ड्राईवर महोदय की नींद पिछली तीन रातों से पूरी नहीं हुई थी और वे नींद के झोंकों को भगा-भगाकर गाड़ी चला रहे थे, यह राज़ भी बहुत बाद में खुला। सो, ज़िंदगी के बचे हुए अधूरे कामों और जीवन से मोह के मद्दे -नज़र वापसी में उन्हें दो घण्टे विश्राम देने का समय भी वक़्त के बजट में जोड़ लिया गया था। लेकिन .... जैसा कि पहले बताया, होनी को कुछ और ही मंज़ूर था। गाड़ी अपनी आवाज़ अनसुनी करने से नाराज़ होकर ऐंठ गई और बीच रास्ते शिवपुरी में ( जहाँ बच्चों ने रुकने की इच्छा ज़ाहिर की थी ), बैठ गई। रात के 10 बजे, दूर दूर तक कोई मैकेनिक नहीं ! इक्का -दुक्का खाने -पीने की दूकानें थीं, वे भी अपना शटर गिराने को तैयार, सो आने वाली स्थिति को भाँपकर हमने दौड़कर खाने-पीने का कुछ सूखा सामान लिया और एक ढाबे को खुला देखकर तुरन्त बच्चों के लिए खाना मँगवाया। यह निश्चित था कि गाड़ी अब बिना पूजा करवाए चलने वाली नहीं, तो हम रात बिताने के लिए इधर-उधर होटल के कमरे ढूँढने की क़वायद करने लगे। इस बीच कुछ स्थानीय लोगों ने मदद करने की मंशा से मैकेनिक को फ़ोन पर सम्पर्क करने की कोशिश की, लेकिन मैकेनिक गाड़ी तक आने की बजाय गाड़ी ही वहाँ बुलवा रहा था,जोकि कोप भवन में रूठी पड़ी थी। कुछ पर्यटक लड़कों ने धक्के लगवाकर गाड़ी को चालू करवाने का विफल प्रयास किया।


 आटा कंगाली में ही गीला होता है। ऐसे में आसपास के किसी होटल में कमरा खाली न मिला। इंटरनेट पर एक महँगा होटल उपलब्ध दिखाई दिया। मजबूरी का नाम ...... !  सो बाल-बच्चों और महिलाओं समेत हमारे समूह को उसी होटल की शरण लेनी पड़ी। यह तो ग़नीमत थी कि हरिद्वार में किसी पड़ाव पर रुकने की उम्मीद में हमने अपना पूरा सामान गाड़ी के ऊपर बाँधकर ज़रूरत भर का एक-एक बैग साथ में रख लिया था। रात के अँधेरे में टॉर्च और मोबाइल की रौशनी में चढ़ाई रास्ते पर अपना सामान घसीटते हुए, अँधेरे मोड़ों पर भारी और तेज़ गति के वाहनों से बचते-बचाते हम होटल तक पहुँचे।  साथ में हमारे रक्षक थे वे चार कुत्ते, जिन्हें हमने अपने साथ खाना खिलाया था। होटल पहुँचकर हमारी साँस में साँस आई ,क्योंकि फोन पर बात करने के बावजूद मन में यह फ़िक़्र थी कि कमरे मिलेंगे, या नहीं।  जीवन के ही अनुभवों ने सिखाया है कि मुसीबत अकेले नहीं आती। ख़ैर  ....... बच्चों की जिस इच्छा को अनुसना किया गया था- वहाँ रुकने की, वह इच्छा तो पूरी हुई, पर उस तरह नहीं, जैसे वे चाहते थे - नदी किनारे अठखेलियाँ करते हुए। बल्कि एक मजबूरी के रूप में। उस होटल में रातभर रुककर, सुबह नाश्ता करके कम्पनी द्वारा भेजी गई एक दूसरी गाड़ी में हम निकले, तब तक पता चला कि ड्राइवर ने पिछली गाड़ी ठीक करवा ली थी। यह बात बहुत अजीब लगी कि लम्बी यात्रा के लिए गाड़ी उपलब्ध करवाने वाली बड़ी कंपनियों के पास ऐसे आपातकाल के लिए कोई प्रबंध नहीं था ! जबकि आजकल व्यक्तिगत वाहन चलाने वाला हर व्यक्ति ऐसी परेशानियों से बचने के लिए 'रेस' और  ‘क्रॉसरोड' जैसी निजी सेवाओं की सदस्यता ज़रूरी तौर पर रखता है, जो उसे पंक्चर से लेकर बड़ी से बड़ी परेशानी में कहीं भी, कभी भी मदद कर सकती हैं। और कुछ नहीं, तो कम-अज-कम चालक को ही मैकेनिक का अनिवार्य रूप से प्रशिक्षण देना चाहिए ऐसे नाज़ुक समय के लिए।


 गाड़ी ठीक होने पर हमने राहत की साँस ली और अब बाक़ी बची यात्रा की कुशलता की कामना लिए घर की ओर अग्रसर हुए। निकलते ही कुछ दूरी पर सिख स्वयंसेवक ने बहुत विनम्रता से रोककर हमें लंगर में कुछ ग्रहण करने का अनुरोध किया। मना करने पर उन्होंने केवल प्रसाद का हलवा लेने का आग्रह किया, जो मना करते नहीं बना। उस प्रसाद को ग्रहण करने के उपरांत हमने गाड़ी रवाना की और बीच में भोजन व चाय के लिए दो बार व यातायात पुलिस की सेवा के लिए मुरादनगर में एक बार रुकने के उपरान्त रात के पौने दस बजे अपने घर पहुँचे।


                                       लंगर


 


रचना त्यागी की कविताएं नीचे लिंक पर पढ़िए

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8 टिप्‍पणियां:

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  2. जीवंत वर्णन ... चित्र भी बेहद सुंदर हैं |

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  4. बहुत जीवंत वर्णन किया है आपने रचना जी , चित्र भी बहुत खूबसूरत है जो यात्रा वृत्तांत को और भी रोचक बना रहे हैं .... वंदना बाजपेयी

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