05 जून, 2018

 संजय अलंग की कविताएँ 



मेरे लिए कविता लिखना क्यों का प्रश्न नहीं है। मैं कविता वैसे ही लिखता हूँ, जैसे कि, कोई भी अन्य अपना कोई भी काम करता है। अपना कोई काम नहीं करने पर जो कमी या कोफ़्त महसूस होनी चाहिए, वह मुझे कविता नहीं लिखने पर होती है। यह पूर्ण काम है और स्वभाविक भी। मेरे लिए यह स्थिति, दृश्य, कार्य, भावना, प्रतिरोध, समर्थन आदि सभी भावों में स्वभाविक क्रिया या प्रतिक्रिया है। इसके लिए कोई बहुत विशेषण, आडम्बर, मण्डन या कोई भी अन्य चीज नहीं है।



संजय अलंग




कविताएँ

बंटे रंग

उसने बताया ये रंग तामसी है और ये रंग राजसी और ये वाला सात्विक
आगे फिर बताया गया ये कोई मर्दों का रंग है ये तो औरतें पहनती हैं
और बताया ये तो उसका रंग है और ये हमारा
फिर उसने बताया वह केवल अपने रंग ही पहनता है बाकी रंग खराब हैं
तब से उसके पास से रंग ही गायब हो गए अब वह धूसर और श्वेत से ही ढ़का रहता है और बाकी रंगों से दुनिया
००


शाह अमर हो गया आगरे के लाल किले के साथ 

बड़ी और महंगी कला छोड़ जाती है बड़ा नाम भी बना देती है वह नाम को चिर यादग़ार
चाहिए इसके लिए शांति का काल और ढ़ेर सारा धन साथ ही समर्पित उच्च्कोटि कलाकारों की कल्पना और श्रम सीकर  इन्हीं में सम्मिलित है वास्तुकला भी
राजा को भी अपना नाम चिर स्थाई करने को चाहिए होता है कला का आश्रय जिससे वह दिख सके सुसंस्कृत भी
वे लाते धन जनता से ही इसके लिए करते तरह-तरह के उपाय करने को एकत्र धन तब बनवा पाते कला का नायाब नमूना जिसमें होता उनका नाम पीछे ही रह जाता कलाकार का नाम जनता तो कहीं होती ही नहीं
ऐसे शाँति के काल में जब फूल रहा होता व्यापार बटोर कर धन लगाया जाता कला में बनाए रखने को नाम दिखने को सुसंस्कृत
ऐसे में कला का अप्रतिम रूप आता सामने बिखेरता अपनी छटा  सामने आता आगरे का लाल किला सभी कलाओं को अपने में समेटे हुए
पत्थरों से भी चाँदनी बहने लगती   बहने लगती कविता लाल बलुआ और श्वेत मरमर के पत्थरों से
पत्थरों से लिखी इस कविता के साथ कभी सजता था मयूर सिंहासन जड़ा था जिसमें कोहिनूर
ऊँचे खड़े नयनाभिराम दरवाजों के ऊपर बैठ बजाते थे साज कलाकार बजती नौबत के साथ गुजरता शाह जरदोजी के स्वर्ण वस्त्र पहन छिड़का जाता जिस पर सुगन्धित जल
किले की बारीक़ कटी जाली से दिखता ताज़ यह था वह मक़बरा जो कला के कारण कहलाता महल यह झरोखा कला को कला से जोड़ता हीरे से मिलता हीरा
पच्चीकारी से सजे पत्थर आत्मा में घुल जाते आम और खास के दीवान लुभाते सुकून को साथ लाते
आंगन में बहती नहरों के मध्य गायन और वादन की महफिल के साथ होता नृत्य रचता जीवन कला के लिए
कला सभी रूपों में एक साथ उतर आती आगरा के किले के प्रांगण में
सभी हस्त कलाएँ हो जाती एक जगह एकत्र अपनी सुन्दरता के साथ देखे जाने को तब झूम जाती खुशी से हाथी पोल पर खड़ी प्रतिमाएँ भी
पूनम का चाँद भी किले की प्राचीर पर टंगा लगता   उसकी चमक भी लगती फीकी किले में बिखरी कलाओं के सामने  इतराती फिरती कलाएँ शाह के साथ किले में
चलतीं जब वे छम-छम पैजनियाँ बाँध दरीचों से आँखे पलक झपकना भूल जातीं
कलाकारों ने बना दिए कला के नए आयाम कला लगने लगी अप्रतिम रहा नहीं अब उनका कोई सानी
हो जाने पर यह सब शाह को लगता तब   उसने कला को बांध लिया है फेंटे में  अपने नाम के साथ अब दुनिया में स्थाई रहेगा नाम उसका
वह मुस्कुरा देता निहारते हुए किले को भरता संतोष की साँस कि अब हो गया है अमर नाम उसका
वह था सही बाद में भी किसी ने नहीं लिखा कलाकार और करदाता का नाम
शाह अमर हो गया आगरे के लाल किले के साथ 
००



धरती खाने वाली औरत

प्रशांत के उफनते समुद्र में ज्वालामुखी का अति उष्ण लावा भी बहता है जिनसे ही बने हैं द्वीप वहाँ बसता है जीवन जिनमें
हवाई द्वीपों में जीवन अनुभव से बना है मिथक एक ऐसा    जिसमें है ज्वालामुखी की आग उगलती सत्ता की स्वामिनी ‘पेले’  धधकती प्रचण्ड़ ज्वाला के साथ 'पेले' करती है विचरण वहाँ कहते हैं उसे-'धरती खाने वाली औरत’ जो है 'केनेहोलनि' और 'हौमिया' की बेटी
ज्वालामुखी की प्रचण्ड़ अग्नि और लावा हैं उसके पास  हवा, पानी, बारिश, लहरें, बादल भी हैं उसके भाई-बहन असीम शक्ति के साथ जुनून, ईर्ष्या, सनकीपन भी आ गए हैं साथ  जिससे प्रचण्ड़ अग्नि में जलन और तीव्रता बढ़ गई है वे सहभागी हो ध्वंश का नृत्य करते हैं तीखे अट्टाहस के साथ
रहती वह धधकते 'हलेमौमौ' ज्वालामुखी के बीच सदा वह भी धधकती इस अग्निकुण्ड़ के ही साथ उसी की ही तरह सभी को जला देने को ध्वस्त कर देने को 
सदा धधकती और जलती रहती है उसकी भूमि बनी रहती है मृगतृष्णा की तरह अस्थाई
समुद्र की स्वामिनी उसकी बड़ी बहन 'ना-माका-ओ-कहाइ'  ड़रती रहती है कि उसकी सर्वभक्षी महत्वकांक्षा सब कुछ ध्वस्त न कर दे
इसलिए वह ले जाती है उसे समुद्र में दूर डोंगी 'होनुअ-इ-केया' में बैठा उसकी छोटी बहन 'हइका' और भाईयों 'कमोहोली', 'कनेमिलोहई' और 'कनेपौअ' के साथ
इस यात्रा में छोड़ दिया जाते हैं भाई 'कनेमिलोहई' और 'कनेपौअ'    छोटी समुद्री चट्टान 'मोकुपापापा' और 'निहओ' पर  बनाने और विस्तारित करने को मानव निवास विकसित करने को उनका आवास 'पेले' के बिना जलन के ध्वंश से दूर
साथ छोड़ देने पर ‘पेले’ और उसके चरित्र का त्याग दी जाती हैं उसकी सर्वभक्षी इच्छा जब दूर हो जाता है ध्वंश का साम्राज्य और तब   शक्ति का जुनून हो जाता है दरकिनार इसके साथ ही मिट जाती है-  जुनूनभरी ईर्ष्या सब पाने का वहशीपन और नहीं पा पाने पर ध्वस्त कर देने का सनकीपन
तब ही बस पाती हैं इंसानी बस्ती द्वीप पर धधकती ज्वाला को बर्फ से ढ़क कर
मिलता हैं उन्हे तब यह मंत्र-  'ए समुद्र, ए समुद्र शार्क के ए समुद्र अब समुद्र उड़ेलना  धधकते 'कानालोआ' ज्वालामुखी पर ही  समुद्र पहाड़ी से अवतरित होना'
'जलन' से लिप्त धधकते ज्वालामुखी को बुझा कर समुद्र से ठंड़े हुए लावा पर  बनता है नया जीवन शांति और सुकून से ही बसती है बस्ती जब जा चुकी होती है ‘पेले’ दूर होती नहीं जब उसकी और उसके गुणों की छाया भी पास
'पेले' अभी यात्रा पर है और  बस्तियाँ बस रही हैं
००

क्रमांक वाला विश्व

किसका है यह पहले, दूसरे या तीसरे क्रमांक वाला विश्व जो बना है पैसे की उपलब्धता के आधार पर कसा गया है जिसे अर्थ तंत्र के पैमाने पर सबके लिए
‘दावोस’ में होता है जब इसके लिए गुणा-भाग तो क्या वह बन जाता है धर्म कट्टर धर्मान्ध की ही तरह पालन किए जाने की अनिवार्यता के साथ  सिंहासन के लिए जो भुनाने को इसे बनाते रहते हैं अलग-अलग समूह, गुट और मंच
किसी के लिए भी वह जहाँ होता है वहाँ से ही शुरू हो जाता है उसका विश्व पहली दुनिया बन उससे अन्यत्र की दुनिया ही आती है उसके लिए किसी भी अन्य क्रमांक  पर बेमानी हो जाता है उसके लिए  बड़े मंचों के लिए अनिवार्य बना अर्थ तंत्र का यह वर्गीकरण   उसके लिए अनजान हैं इसे नापने के औजार और विचार एकदम अलग  सिंहासन और अर्थतंत्र से
दोनों नाकाम हैं एक-दूसरे को समझने में जान ही नहीं पा रहे हैं एक-दूसरे को
ऐसे में यह विचार है ही नहीं कि कब आएँगें साथ एक ही धरातल पर जब क्रमांक नहीं होगा विश्व का नहीं होगा कोई पैमाना इसका  होगा विचार सभी के लिए समान दृष्टि से सभी सोचेंगें एक-दूसरे के लिए साथ-साथ
तब तक बना ही रहेगा क्रमांक वाला विश्व लगातर बढ़ती गिनती के साथ
००

मुखौटा अब नकाब में बदल गया है 

नृत्य करते हुए पहने गए थे मुखौटे दिखाने को विभिन्न रूप हमारे
यह तब था जब दिखाना होता था यह सब सहज और स्वभाविक
अब हमने मुखौटों को बदल दिया है नकाब में जो पहनते थे डाकू डाके के समय चेहरा छुपाने के लिए
अब नहीं दिखती आंखें, चेहरा और भाव जो बह रहा है फटे दूध की तरह हमारी रगों में खून बन कर वह भी शालीन मुस्कुराहट की नकाब के पीछे सभी को छील दिए जाने की कामना के साथ
यह कैसा विचलन है या स्वभाव का विकास जो किसी के समझ में नही आ रहा है पूछ रहा था एक संवाददाता क्या अब इस पर भी प्रबन्धन का कोर्स आएगा?
००

लाशों पर खड़ा इतिहास

पता नहीं क्यों इतिहास में लाशें ही पाले में आती हैं मेरे पाले में भी लाशें ही लाशें आईं
होश सम्हाला तब पिता और बुआ साथ थे विभाजन के किस्से सुनाते हुए यह किस्से रक्त रंजित लाशों से पटे पड़े थे धरती पर सीमा रेखा  लाशों से खींची जा रही थी सीमा रेखा के चारो ओर भी लाशें ही लाशें पड़ी थीं इस रेखा ने नफ़रत के साथ लाशें बढ़ाईं थीं जो बन गईं थीं विश्व में लाशों का सबसे बड़ा ढ़ेर इन लाशों को रौन्दते हुए इनके मध्य ही लोग भी भाग रहे थे एक ओर से दूसरी ओर नई जमीन की खोज में
होश सम्महाला तब लाशें बिखर रहीं थीं सड़कों पर मित्रों और पड़ोसियों की कभी किसी हत्या का बदला लेने के लिए कभी पताकाओं को फहाराने के लिए कभी ढ़ाचों को गिराने और कभी बनाने के लिए  कभी किसी अन्य को सबक सिखा देने कभी उसे अपना प्रभुत्व बताने के लिए बदला-यह ही हवा में गूँज रहा था  जिसमें लाशें गिराना ही माध्यम बन रहा था सड़कों पर रक्त बह कर स्थाई पपड़ी की तरह जम रहा था सफाई करने वाला कोई नहीं था
बड़ा हुआ तब अब लाशें फिर सामने थीं वन और उसकी पगड़ण्ड़ियों पर बन्दूकों और बारूदी सुरंगों से क्षत विक्षित हो कर बिखरी हुई  पूरे वन को उड़ी देह की बिखरी धज्जियों ने   जले और सड़ते रक्त और माँस की गन्ध से भर दिया था  वन  का हरा रंग सूखे हुए रक्त से काला हो गया था वन में कटी-फटी लाशें मुहँ बाए पड़ी थीं
लाशों के सहारे विजय का इतिहास बनाया जा रहा था इन्हें ही पुस्तकों में लिखा जाना था और  यह ही बताया जाना था कि  विजयी ही इतिहास बनाते हैं वे ही रास्ता बनाते और दिखाते हैं इसके साथ ही पुनः  यह स्थापित किया जाना था कि विजयी के लिए सभी मात्र साधन हैं लाशें उनके रास्ते में रूकावट की तरह नहीं आतीं वे उसका भी पुल ही बनाते हैं उस पर चढ़ कर आगे बढ़ते जाते हैं वे लाशों की नींव पर इतिहास बनाते हैं और उन्हीं पर इतिहास लिखे जाते हैं
००

सड़क के काँधों पर धान

सड़क पर जाते हुए दिख रहा है  सड़क के दोनों ओर उसके काँधों पर दूर तक बिखरा हुआ  धान और पुआल जो गिरा है दूर तक नज़र आ रही उन बैलगाड़ियों से जो भर कर जा रही हैं खेतों से खलिहान की ओर और जिनकी लंबी कतार आ रही है नज़र धीरे-धीरे बढ़ती हुई आगे
खलिहानों से इन्हें मीस कर ले जाएँगें मण्डी क्योंकि नहीं आता कोई इन्हें लेने ले जाना पडता है उन्हें ही स्वयं खेत से मण्डी तक धान जिस तरह बोने के लिए भी स्वयं ही आए थे सामग्री मण्डी से खेत तक
लहलहाती फसल कटकर बैलगाड़ियों में लदकर जा रही है मण्डी की ओर उसी से गिर रहा है धान सड़क के काँधों पर बिखर रहा है धान और पुआल गाँव की सड़कों पर
सड़क का इस तरह भरा रहना भरा रहना है किसान का जिससे ही भरती है मण्डी और जिससे भरता है शहर
सड़क पर जाते हुए दिखता है दूर तक किनारों पर बिखरा हुआ धान भरी हुई है सड़क भरे हुए हैं किसान
००

बैड़मिंटन

44 x 20 के मैदान में रैकेट लेकर उतरना और शटलकाक पर प्रहार करना मात्र इतना नहीं है बैड़मिंटन
यह किसी भी कठिनाई में अपने को सुनना है असफलता को धता बता उसे जीतना है रैकेट के माध्यम से रोड़े को धक्का देना है जीतने को सीखना है
कक्षाओं में आगे बढ़ने के कारण छूट जाता है जब खेलना तब भी वह होता है साथ पढ़ने और जीतने की प्रेरणा के साथ
एक बार रैकेट पकड़ लेने पर न खेलने पर भी छूटता नहीं है वह बस एक बार मैदान में उतर तो जाओ जूझना सिखाने को साथ आ जाएगा हाथ पकड़ वह भी
विजेता होने के एहसास को सहजता से दूर रखते हुए केवल यह बताते हुए कि खेलना है पूरे जीवट के साथ छोड़ देता है बुरे को अच्छे को रख अपने पास
ग़र रैकेट हो हाथ में होती खुशी भी साथ कोई रास्ता तब बिमार नहीं मिलता अवसाद छूट जाता है पीछे

देता ताक़त यह भी कि अब प्रारम्भ होने को कोई रोक नहीं सकता
मंजिल भी आ जाती पास  बना रहे बैड़मिंटन का साथ
००



गेंड़ी 

हर स्थिति में जी लेता हूँ मैं
खोज लेता हूँ खेल और आनन्द
कठिनाई में भी

नहीं बनाई जब सड़क
नहीं दिया जब पथ
बारीश में जब
रच गया इनमें कीचड़
इस काँदो में भी
खोज निकाला मैनें आनन्द
निकलने को इससे बाहर
बना ली गेंड़ी मैंने
खेलने लगा खेल भी उससे ही

तुम तो इसे लोक जीवन बता रहे थे
हरेली के दिन आकर
साथ मेरे फोटो खिंचा
गाड़ी में बैठ घर को वापस जा
नहा धोकर आराम फरमा रहे थे
तब भी मैं गाँव में था
कठिनाई को भी उत्सव में बदल रहा था
जीने को आसान कर रहा था

तब तुम गेंड़ी से छिल गए
पैर के अँगूठे में
दवाई लगवा रहे थे
कीचड़ का शोक मना रहे थे
फोटो को अख़बार में छपवा रहे थे

गेंड़ी अब भी मेरे पास थी और
तुम जा चुके थे
अब मैं तुम्हारे वज़न से
टूट गई गेंड़ी को भी
सुधार रहा था
००                                                         ----+----


ऊँचे दरख्तों के साए में प्यार

प्यार स्वयं कदम्ब के पेड़ों की गणना पर है
वह बच्चा ऊँचे पेड़ों की छाँह में ड़ूब गया है
प्यार तो शास्वत है और सर्वाधिक समसामायिक भी
जंगल में अब भी गुनगुनी धूप विस्तार पा रही है
हालाँकि पेड़ और ऊँचे होते जा रहे हैं
कश्मीर से बस्तर तक यही बयार है

सुबह की धूप के टुकड़े की कमीज बना पहनना चाह रहा है
पर धूप कहाँ है?

सभी पक्षी बन्द कर देते चहकना
गाती जब मैना
सुनने को मीठा गाना
अभी भी निरवता ही है
अब भूल ही गया है चहकना
उस बन्द करने और इस भूलने में अंतर
कोई महसूस ही नहीं कर पा रहा है
जबकि बताते हैं,
उनके पास महसूसने को अंग रहे हैं
बच्चा ऊँचे दरख्तों के मध्य उन्हें भी खोज रहा है

प्यार को प्यार और बढ़ाता रहा होगा
साथ रहने से और भी परवान चढ़ता था
क्या कैम्प और शिविर में साथ रहने से भी?
अब उत्तर क्या होगा
दरख्त उसे भी अपने में समेटे रहेंगें

मीठी सुबह की गुनगुनी धूप के वस्त्र
काँटों से उलझते, बदन छिलते
तो मुस्कुराहट ही आती
अब यही वस्त्र
पेशाब में भींग कर बदबू मार रहे हैं
बर्बादी घोटुल से शिकारों तक
शरीर ढ़कने को तरस रही है

अल्हड़ गोंड़-गोंड़िन के जंगल में भाग जाने पर
खोजने वाला ही नहीं रहा
माड़ को पूजने वाला
और अबूझ ही बना रहे

राजा रानी न तो जुताई करते हैं
न ही रथ पर बैठते है
चाह अवश्य
समन्दर से मत्सयगन्धा की है
राजा-रानी यह जरूर कह रहे हैं कि
प्यार क्या शापित हो चला है?
जो भेजा जा रहा है घोटुल में आनन्द मारने
शिकारों को ड़ुबोने

आधी रात का निधन
नागफनी से ही जन्म लेता है
चिनार, गुलाब, महुआ, सल्फी
रौंद दिए गए हैं
पिघलती संगीनें और बूट भी प्यार ही माँग रहे है
संगीनों और बूटों को दफनाया साथ ही जाना है
माँ ने मारने की आज्ञा दी है

बस प्यार दरख्तों के मध्य कोई खोज नहीं पा रहा है
बच्चा अभी भी प्रयासरत है
रानी संगीन के नोक पर खड़ी
नृत्य को साध रही है
राजा छीजन और चीथड़ों के मध्य भी रसीली बोटी पा गया है
प्यार माँ के साथ ही झूम रहा है
बच्चा उससे चिपका हुआ है
बाकी तो गोली खा रहे हैं
००



कोयला खनिक

सिर पर लगी कड़ी टोपी में जलते प्रकाश के साथ लम्बे जूते पहने हुए टटोलते खुदी सीम की दीवार को अन्दर तक धंसते जाते करने को काम कमाने को दाम

अभी वे सचेत करने को एक-दूसरे को बजाएँगे सीटी और रख एक ओर कुदाली सुस्ताने को लेंगें गहरी साँस  फेफड़ो में भर जाएगी काली धूल
वही धूल जब खुद कर जाएगी बाहर बन जाएगी सोना लादी जाएगी लोको और डम्फरों में दूर तक जाने के लिए

खनिक पीछे ही रहेगा बोझ साझा करने के लिए एक-दूसरे का जिससे ही बना है प्रगाढ़ रिश्ता उनका एक-दूसरे से जो निकला है हाड़-तोड़ मेहनत से पसीने में गुंथा हुआ
००



गोदना

बताते यह कि -
जम को मृत्यु के समय
व्यक्ति को ले जाने के लिए
जब नहीं चीन्हा गया लिंग
तब उसने
अपनी बहू के गुदवाया गोदना
भेजा उसे पृथ्वी पर
पुत्र के साथ
दिखाने को गोदना
जो दिखाया उसने
सारंगी की धुन के साथ
आकृष्ट हो गईं सब महिलाएँ
देख स्थाई आभूषण देह के
भा गया यह गहना उन्हें
रहता जो साथ सदा
जाता मृत्यु के बाद भी साथ
लगीं वे भी सजाने इससे देह

यह भी कहते कि -
महादेव के भोज में
गोंड़ देव भी गए सपत्नीक
वापसी के समय
लेने को साथ उन्हें
रख दिया हाथ कंधे पर
जो निकला पार्वती का
चीख पड़ी वह
महादेव समझ गए वस्तुस्थिति और
हंस पड़े
यह भूल
नहीं हो दुबारा इसलिए
पार्वती ने दी युक्ति
सभी गुदवाएँ गोदना पृथक-पृथक
इससे बना सभी का
अलग-अलग गोदना 

काजल की कालिख से
उभरने लगी कला
बन शरीर का स्थाई आभूषण

काजल को
बीजा लकड़ी से बने पात्र में
भिगो कर निकाला रंग
मिलाया इसमें
भिजरा या टमाटर का कोयला
सुखा कर इसे बदला चूर्ण में

चूर्ण को मिलाया तेल में
अण्ड़ी, भेलवा, जटंगी या सरसों के
बन गया रंग
सुई त्वचा में चुभो कर
शरीर में उतारने को
इसमें मिलाई हल्दी
संक्रमण से बचाने को

साथ में की सुई चिकनी
इस जखना कहलाया 'फोपसा'
डुबोया उसे काजल के तेल में

कानी ऊँगली की टेक लगा
साधा हाथ
बनाने को सटीक चित्रकारी
सुई से

बनाई जाने लगी चित्रकारी शरीर पर
उभरने लगे चित्र अंगों पर
होने लगा 'गुदनारी' का काम
सजने लगी देह
बनने लगे
तरह-तरह के चित्र शरीर पर
उभरने लगे कई प्रतीक भी

हर अंग की शक्ति के लिए देव
प्रजनन को मछली
कोमलता सुन्दरता को पेड़, पत्ती, फूल और मोर

चित्रांकन में दर्शन भी आया सामने
दर्शाने को मनुष्य के आयु की तीन अवस्था
बनने लगा गूढ़ चित्र-'तीन टिपका'

गोदना के चित्रांकन में चित्रित होने लगे
जिन्दगी के सभी सुख-दुःख
जीने लगा यह सब के साथ
जो मरने के बाद भी जाता साथ

कितनी तो बातें आईं गईं
कई कलाएँ उखड़ती रहीं
मरा नहीं गोदना कभी स्वयं
न ही मार पाया कोई उसे
जीता रहा वह पूरी शिद्दत और
जीजिविषा के साथ

होने को
सब कुछ तो होता रहा
उसके भी साथ

जिससे
होने लगा वह जंगल से भी बाहर
उसको बनाने वाला भी होने लगा लुप्त
फैशन और बाज़ार ने भी किया घात
जिसके घात से
नहीं बचता कोई भी और कुछ भी
नाम बदल किया टैटू
खोल ली इस कला की भी दुकान
बदल दिया उसका रूप भी
तब भी वह जीता रहा
पूरी जीजिविषा के साथ

उसके टिके होने ने
लहरा दिया परचम
आदिम कला का
बाज़ार और फैशन को भी
कर दिया चित्त और
कर दी घोषणा
आदिम सभ्यता के
जीवन में गुथे होने की
जिन्दग़ी का मूल होने की
लहू के साथ
जीन में बहने की
००


अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा
(सेज आदि जैसे विस्तारों पर)

पैसा आएगा तो उड़ेगा ही ऐसा कैसा पैसा जो आए और
अपने पर ही न ख़र्च हो
जब अच्छा आदमी ज़मीन लेगा तो
खूब पैसा देगा पैसा आएगा तो यहाँ-वहाँ जाएगा
ज़मीन तो अच्छा आदमी ही लेगा कानून बनाएगा नहीं, अच्छा कानून बनाएगा क़ायदे का ही काम होगा
पैसा देगा, काम भी
 जमीन जाएगी, जाए पेड़, पहाड़, नदी, ज़ानवर नाच-गाने, किताब, बोली आन-बान, इज्ज़त, आबरू शासन, संस्कृति साथ जाएँ तो, जाएँ
पैसा तो आएगा दाम भी, काम भी अच्छी कालोनी में छोटा घर न जंगल का डर
न गोरू का काम बस दाम ही दाम
अच्छा आदमी कानून तो बनाएगा यह ही स्वतंत्रता का रास्ता, यह समझाएगा
वो बड़े वाले देश में भी कानून ही कानून आए न्याय की गुहार में दाम भी पाए पूरी जगह अच्छे आदमी ही छाए
कभी आर्य, कभी ब्राह्मण, कभी अमेरिकी कहलाए कौन इण्डियन, कौन दस्यु, कौन दैत्य, कौन गोंड़, कौन भील, कौन फिलीस्तीनी, कौन ईराकी- मैं की जाँणां मैं कौंण?
पैसा आएगा तो जाएगा विकास भी लाएगा भर-भर मुट्ठी फूल उड़ाएगा छम-छम करती नचनिया पाएगा जमीन तो स्थिर है उसे ही ले जाएगा कर्मशील दस्यु ही चल संपत्ति है उसे ही हटाएगा

कितने अच्छे सुन्दर न्यायपूर्ण कानून लाएगा पुस्तक, आस्था, हाथ देकर श्रद्धा से आँखे बन्द कराएगा फिर गद्दी पर भी वह ही जाएगा
अच्छा आदमी अच्छा ही कहलाएगा
वह सदा ही हटता है नई जगह खोजता है यही विकास विस्तार है
एक जगह टिकाव तो रुकना है तुम्हे भी बढ़ना सिखाएगा अच्छा आदमी तुम्हे भी हटाएगा अपने में सम्मलित होने की बात चलाएगा बड़ा वाला एक गाँव बनाएगा
बाकी किस काम के एक गाँव, एक धर्म, एक संस्कृति को जमा जाएगा

अच्छा आदमी और कानून लाएगा समझौते से मध्य रास्ता निकलवाएगा
अच्छा आदमी धीरे-धीरे पूरा बसता जाएगा सब जानेंगें कैसे हुआ भेद भी खोलेंगें पर कोई कुछ नहीं कर पाएगा
अच्छा आदमी सब ओर बस जाएगा                         
००




गेज़ नदी

भरपूर बारिश में जब रास्ते रूक जाते सड़कें भी भर जातीं पायांचे मुड़ जाते
खेत लबालब होते धान रोपे जाने लगते रोपाई गीत सुनाई पड़ते
साँझ को सूप-पत्ते की छातानुमा टोपी खोमरा और छितौरा लिए और कीचड़-काँदों से लथ-पथ महिलाओं की कतार बगुलों के झुंड़ की तरह घर लौटती दिखती
तब गेज़ पूरे उफान पर आती
और सार्थक होता गेज नाम होना
झाग या फेन का ही तो पर्याय है गेजा
गेज़ का उफान देखने उमड़ता क़स्बा छाता उठाए पैदल, साईकल पर पड़ते निकल सब, गेज़ की ओर शताब्दी पुराना पुल भर जाता, लोगों से जितना उफान, उतनी भीड़ उतनी ही छुट्टी, उतना ही उत्साह
यह उत्साह खेतों के भरे रहने का पानी बने रहने का
खूब खेल होते बारिश में
अल्हाद में डूबते लोग उत्सव धूम-धाम से होते गणेश पूजा,दुर्गा पूजा,दशहरा,दीपावली,काली पूजा ईश्वर के धन्यवाद हेतु
गेज़ का पूर आना खुशहाली का पूरना होता पानी का बने रहना होता
सुनता हूँ मैं कि अब टूट ही जाती है, अक्सर गेज़ की धार

00

संक्षिप्त परिचय (लेखकीय):-


जन्म भिलाई में। शिक्षा मुख्यतः बैकुण्ठपुर, कोरिया में और तदुपरांत अम्बिकापुर और दिल्ली में।
 इतिहास में पीएच.डी.। मातृभाषा पंजाबी।  
दो कविता संग्रह – शव और पगडंडी छिप गई थी तथा  छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति पर दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित, जिसमें से ‘छत्तीसगढ़:इतिहास और संस्कृति’ को भारत सरकार मानव संसाधन विकास मंत्रालय का सर्वश्रेष्ठ शोध शिक्षा लेखन का एक लाख रूपयों का पुरस्कार। इस के अतिरिक्त कविता पर दिनकर और श्रीकांत वर्मा सम्मान सहित कई अन्य सम्मान। एक कहानी, कुछ यात्रा वृतांत, समीक्षाएँ आदि भी प्रकाशित। कविताएँ प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में भी प्रकाशित। कविताओं का ख्यात मंचों और माध्यमों से प्रसारण भी। 
शासकीय सेवा में निःशक्त जनों हेतु कार्य के लिए मा. राष्टपति जी से राष्ट्रीय पुरस्कार। 
कुछ विदेश यात्राएँ। 
सम्प्रति-भारतीय प्रशासनिक सेवा में छत्तीसगढ़ में कार्यरत।


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