26 जुलाई, 2018

मैं क्यों लिखता हूं?

संजीव जैन

मैं लिखता कहां हूं? बस कुछ क्षण अपने तईं  जीने की कोशिश करता हूं। इस मरते हुए रचनात्मक समय में लेखक को हर क्षण मरना पड़ता है। लेखक के बतौर जीने का अर्थ है किश्तों में खुदकुशी करना। कम से कम मैं तो हर कविता या लेख के बाद एक नई जिंदगी को महसूस करता हूं। यह नई जिंदगी महसूस करने का अर्थ ही है कि उसके पहले का मैं मर चुका है।

संजीव जैन

भूख के लिए लिखना भूख से मरने वालों का अपमान है। बतौर लेखक मैं भूखा नहीं हूं। रोज रोटी मुझे मिल जाती है आराम से दोनों समय। तो मैं भूख के लिए नहीं लिख सकता जैसा तेजिंदर ने काला पादरी भूख से मौत का सामना करते हुए लिखा। मैंने इस तरह भूख को कभी महसूस नहीं किया इसलिए मैं काला पादरी नहीं लिख सकता। भूख एक भौतिक सच्चाई है। इस भौतिक ठोस कमीनी सच्चाई पर जिन लोगों ने कब्जा कर रखा है उनके इस अप्राकृतिक अधिकार को मैं रोज अपने मस्तिष्क पर महसूस करता हूं और यही कारण है कि मैं भूख पर नहीं भूख के शत्रुओं पर लिखता हूं। तो मेरे लिखने का कारण एक भौतिक, ज्यादा ठोस कारण है।
मैंने बतौर एक स्त्री के बलात्कार को नहीं झेला इसलिए मैं उस दरिंदगी की पीड़ा को नहीं लिख सकता और नहीं लिखता हूं कभी‌। मैं उस कारण की वास्तविकता जानता हूं जिसके चलते मेरे जैसा एक पुरुष बलात्कारी हो जाता है। मैं हमेशा स्वयं को एक बलात्कारी की वजह के बतौर महसूस करता हूं और इसलिए मैं उस वजह की जड़ में मट्ठा डालने के लिए लिखता हूं।
प्रेम को एक अलौकिक अमूर्त आध्यात्मिक प्रत्यय के बतौर मैंने कभी महसूस नहीं किया। मैं एक भौतिक तत्त्व की तरह प्रेम को सम्पूर्ण जीवन में व्याप्त देखना चाहता हूं और महसूस करता हूं इसलिए मैं प्रेम को दैहिक चेतना की आंतरिक अन्विति की तरह लिखता हूं और उसे इसी रूप में जीना चाहता हूं। प्रेम के वायवी आयामों ने स्त्री पुरुष को पृथक कोटियों में कैद कर दिया। यह कटघरे बलात्कार का एक महत्वपूर्ण कारण हैं। इसलिए मैं प्रेम को हरियाली की तरह सम्पूर्ण जीवन जगत में महसूस करने के लिए लिखता हूं।
मैं क्यों लिखता हूं ? इसे मैं इस तरह कह सकता हूं कि मैं एक स्थाई मौत नहीं मरना चाहता। मैं अपनी मौत को ठोस सच्चाई के बरक्स एक तरल अनुभूति की तरह फैला देने के लिए लिखता हूं। और यही कारण है कि मैं लेखक के बतौर रोज मरता हूं।

लेखक की मौत

मैं एक लेखक के बतौर रोज मरता हूं। मैं जब लिखने के लिए उठाता हूं कलम, मेरी अब तक  सीखी गई भाषा साथ नहीं देती। मुझे लगता है जैसे मैं शब्द और भाषा के श्मशान में हूं। कोई भी शब्द जिंदा नहीं महसूस होता है। वाक्य मरी हुई संज्ञा, सर्वनाम और क्रियाओं का निरर्थक समूह लगता है।
मैं एक लेखक के बतौर रोज मरता हूं। जब मैं लिखना चाहता हूं सत्ता के खिलाफ क्रांति और नहीं लिख पाता लोगों की दास मनोवृत्ति में जीते रहने की स्वीकृति के कारण।
मैं एक लेखक के बतौर रोज मरता हूं। उस वक्त जब लेखन पुरस्कार और वाहवाही के लिए लोमड़ी भाषा का इस्तेमाल करने लगता है।
मैं रोज मरता हूं एक लेखक के बतौर जब लेखन पूंजी की ललमुनिया के पीछे लपकता है और लेखक आलोचक सब प्रकाशक के इशारों पर बंदर की तरह नाचने लगते हैं।
मैं एक लेखक के बतौर उस वक्त मृत्यु का शिकार हो जाता हूं जब लेखन जीवन और जगत की गहरी समझ और अनुभूति के बिना संभव होता है।
इस तरह का लेखन अंततः पाठक की मौत का कारण भी बन जाता है। पाठक गहरी विवेचना नहीं करता परंतु उसकी चेतना ग़लत दिशा में सक्रिय होती जाती है इस तरह एक मृत पाठक समूह साहित्य के रंगमंच पर छाया रहता है। फिर लेखक से अपेक्षा की जाती है कि इस पाठक की समझ के अनुकूल लिखे। यह भी मेरे जैसे लेखक की मौत बन जाती है। पाठक को भाषा की समझ के प्रति लगातार असावधान रखा जाता है और फिर लेखक से अपेक्षा होती है कि वह उस भाषा में लिखे जो यह पाठक समझता हो।
जीवन और जगत के बीच संबंध आसान और सरल हैं ?
जटिलता, उलझाऊपन, गुंथे हुए जीवन को आसान भाषा में कैसे अभिव्यक्त किया जा सकता है? यह अपेक्षा लेखक की बतौर लेखक मृत्यु का कारण बन जाती है।

अर्थ को केंद्र से विस्थापित करने के लिए लिखता हूं

लेखन का संबंध है ज्ञान और चेतना से न कि सुविधाओं और सुख से। मैं स्वयं को अर्थ केंद्रित जीवन से घिरा हुआ महसूस करता हूं। इस घेरे में दम घुटता हुआ महसूस होता है। अपना स्वत्व बेचा खरीदा जाता हुआ महसूस करता हूं हमेशा। रोज सुबह उठते ही स्वयं को बाजार में चौराहे पर बेचे जाने के लिए प्रस्तुत करने के लिए तैयार करता हूं। इस दासत्व का केंद्र है पैसा। मैं सिर्फ उतनी देर स्वयं को मुक्त महसूस कर पाता हूं जितनी देर में लिख रहा होता हूं। तो जीवन के अर्थ केंद्रित चक्रव्यूह में स्वयं को कुछ समय के लिए उससे मुक्त महसूस करने के लिए लिखता हूं।

मैं स्वतंत्र समय को जीने के लिए लिखता हूं

आधुनिक तकनीक द्वारा नियंत्रित समय में ‘खाली समय’ को जिस तरह केपचर किया जा रहा है, वह जीवन के निजी समय को छीनकर पराधीन समय में ले जाने का दौर है। मेरे पास अपना स्वतंत्र कोई समय नहीं है जिसे मैं अपने अनुसार जी सकूं। लेखन का वक्त ही ऐसा वक्त होता है जो मेरा अपना होता है। इस समय में मैं स्वयं को तकनीक के नियंत्रण से मुक्त महसूस करता हूं इसलिए मैं लिखता हूं । निजी समय और निजी जगह के बिना जीवन को जिया जाना कटघरों में कैदी की तरह जीना है और मैं अपने लिखने के समय और लिखने की जगह को मुक्त मानव की तरह महसूस करने के लिए लिखता हूं।
००


संजीव जैन का स्तम्भ - मीडिया और समाज, नीचे लिंक पर पढ़िए

मीडिया और समाजः आठ
http://bizooka2009.blogspot.com/2018/07/blog-post_16.html

1 टिप्पणी: