13 दिसंबर, 2018

निर्बंध तेरह

"भरोसे" के आरपार
यादवेन्द्र 

पुष्कर मेला की खबर पढ़ी तो एकबार फिर याद आया दस बारह सालों से वहाँ जाने का मन बना रहा हूँ पर समय आने पर ध्यान नहीं रहता।गूगल पर जा कर मेले की तस्वीरें देखने लगा तो इस तस्वीर पर नज़र ठहर गयी - बचपन में दो तीन बार सामने से भी देखने का आनंद मिला है पर अब तो सिर्फ़ छवियाँ स्मृति में बस गयी हैं।बात बात में कुछ दिन पहले पढ़ी एक कविता अनायास याद आ गयी।                                   


























यदवेन्द्र

नई पीढ़ी के कवियों में अनुराधा सिंह मेरे कुछ प्रिय कवियों में शामिल हैं - साल के शुरू में उनका पहला संकलन आया "ईश्वर नहीं नींद चाहिए"। संयोग से दिल्ली के पुस्तक मेले में हम दोनों की पहली किताब भारतीय ज्ञानपीठ से एक साथ रिलीज़ हुईं थी।संकलन की अनेक अच्छी कविताओं के बीच यदि मुझे कोई खास कविता चुननी हो तो मैं सबसे पहले यह कविता चुनूँगा,कारण आप स्वतः समझ जायेंगे :


नट रस्सी पर नहीं भरोसे पर चलता है

तुम जानते थे न मेरे पास भाषा बहुत है
लेकिन उससे खेलना नहीं जानती थी
तुमसे बरतते समय अपनी पूरी भाषा
भूल जाना चाहती थी
कि भाषा के एकाधिक अर्थ
प्रेम की हत्या कर देते हैं
फिर भी शब्दों को ढाल बनाया तुमने
मौन को हथियार
तुम जानते थे न टूटी हुई चीजें
बस बांधी जा सकती हैं या चिपकाई
फिर भी तुम तोड़ते गए
फिर भी मैं बांधती गयी
सो नाते में गाँठ डाल देने का अभियोग है मुझ पर
तुम जानते थे न बांधना और चिपकाना
संशय का सूत्र है
क्या किसी नट को गाँठ लगी रस्सी पर चलते देखा है?
नट रस्सी पर नहीं भरोसे पर चलता है
मुझे तो तुम्हारी सड़कों पर चलने का अभ्यास भी नहीं
फिर भी चली न दोधारी पर
किसी दिन गिनना तुमने कितनी बार तोड़ा 
मैं खोलूँगी जितनी बार बाँधा था मैंने
इस आखिरी खोलने से पहले।

अनुराधा सिंह



अनुराधा इस छोटे कलेवर की कविता में कितनी बड़ी और नायाब बात कह जाती हैं - "क्या किसी नट को गाँठ लगी रस्सी पर चलते देखा है?".....देखा हम सबने है नट को लंबे बाँसों के बीच तनी हुई रस्सी पर चलते हुए पर गाँठ लगी रस्सी पर यह तसल्ली के साथ चल नहीं सकता इसका इल्म अनुराधा को ही हुआ - जहाँ न जाये रवि वहाँ जाये कवि कहावत को वे चरितार्थ करती हैं।उनकी इस सूक्ष्म दृष्टि को सलाम।इस कथन का नट के भार या रस्सी की मजबूती से कुछ लेना देना नहीं - रस्सी की गाँठ यहाँ एक 'रूपक' है,भरोसा भी वैसा ही 'रूपक' है जिसपर इंसान का समूचा जीवन चलता है....इंसान भी जीवन भर एक तनी हुई रस्सी पर चलता है और रिश्तों की गाँठ बाँधता खोलता रहता है।गाँठ में ईमानदारी और निष्ठा जैसे ही कम हुई यह पल भर में ढ़ीली होकर खुल बिखर जाती है।"टूटी हुई चीजें बस बाँधी जा सकती हैं या चिपकाई....फिर भी तुम तोड़ते गए,फिर भी मैं बाँधती गयी।" दरअसल जमीनी तौर पर जीवन टूटने और बंधने की जुगलबंदी होता है....पर असल ताकत रस्सी में नहीं होती,भरोसे में होती है।स्त्रीवादी विमर्श की यह श्रेष्ठ कविता रिश्तों की गैरबराबरी की ओर बड़े आवेग के साथ इशारा करती है - इस गैरबराबर जीवनदृष्टि से नट रस्सी पर चलता दिखाई भले दे जाए पर उसके मन में उस पार सुरक्षित उतरने की आश्वस्ति का निश्चित अभाव होगा।





अनुराधा सिंह




कुछ साल पहले की बात है जब मेरी बेटी जयपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही थी और मैं महीने में एक बार उस से मिलने चला ही जाया करता था। ऐसे ही एक सुबह ( अगस्त 2013 ) जयपुर के अखबारों में  एक ह्रदय विदारक पर चौंकाने वाली घटना का जिक्र छाया रहा --- कुश्ती मुकाबलों में देश का प्रतिनिधित्व कर चुकी एक युवा महिला खिलाडी का अधजला शव जयपुर में रेल की पटरी के किनारे मिला। हाँलाकि ये सुर्खियाँ अब अखबारों में बहुत आम हैं पर इस हत्या से सम्बंधित जो खबरें मीडिया में आयीं उनमें चटखारे लेकर पढ़ी सुनी जाने वाली बातें भी थीं ,पर पुलिस के हवाले से बतायी गयी कुछ ऐसी बारीकियाँ  थीं जिसने मन को अन्दर तक उद्वेलित कर दिया। पिछले साल मलेशिया जाकर भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली ये तेईस वर्षीय युवा पहलवान राजस्थान के भरतपुर जिले के एक गाँव की रहने वाली थी और पिछले कुछ महीनों से  दिल्ली ( जहाँ उसका परिवार रहता है) से जयपुर आकर अपनी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाएँ दे रही थी -- अपने खेल के पदकों और तजुर्बे की वजह से  उसको राजस्थान पुलिस में  नौकरी की ज्यादा उम्मीद थी।  यहाँ रहते हुए उसकी दोस्ती अपने से एक साल बड़े एक युवक के साथ हो गयी और धीरे धीरे उनमें अंतरंगता इतनी बढ़ी कि लड़की ने शादी के लिए कहना शुरू कर दिया। लड़के की टाल मटोल के बीच लड़की ने अपना कमरा बदलने  की बात सोची तो धोखेबाज लड़के को इसमें षड्यंत्र रचने का एक सुनहरा अवसर दिखाई दिया -- उसने रेलवे लाइन के आसपास कोई एक कमरा देखा और लड़की को किराये का कमरा दिखाने के बहाने पूरी तैयारी के साथ अपनी मोटरबाइक से लेकर वहाँ पहुँचा। रेल लाइन के पास पहुँच कर किसी षड्यंत्र से बेखबर वह पहलवान बलशाली लड़की अपने साथी के साथ साथ बगल की पगडंडी पर चलने लगी कि एक झटके में उसने लड़की की चुन्नी खींची और  लपक कर  उसके गले में कस कर लपेट दी। किसी हमले या षड्यंत्र से बेखबर अप्रत्याशित ढंग से काबू में कर ली गयी सरल पर बलशाली लड़की दम घुटने से कुछ मिनटों में दम घुटने से लाइन किनारे ही धराशायी हो गयी --- हत्या के बाद युवक सहज रूप में चलकर अपनी बाइक तक गया और वहाँ  योजनाबद्ध रूप से पहले से छुपा कर रखी हुई केरोसिन की केन लेकर आया , फिर तसल्ली के साथ उसने लड़की के मृत शरीर पर तेल  डाल कर तीली दिखा दी  कि जलने के बाद किसी हाल में उसकी शिनाख्त न हो पाये। लगभग एक हफ्ते की तलाश के बाद हत्यारे युवक को पकड़ा जा सका। 

आये दिन ऐसी अनेक घटनाएँ देश भर में होती रहती हैं पर इस घटना ने बार बार मेरे मन में यह प्रश्न पैदा किया कि देश विदेश में अपने शारीरिक बल का प्रदर्शन कर चुकी एक बलशाली युवती प्रेम पर सहज मानवीय भरोसे के कारण कुछ मिनटों में ही मार दी गयी और उसका शारीरिक और आत्मिक बल उसके किसी काम न आया। बचपन से सुनी अश्वत्थामा और हिरण्यकशिपु जैसे पौराणिक किरदारों की छलपूर्ण हत्या के साथ हमारा मन इतना एकात्म हो चुका है कि प्रेम के उद्दाम आवेग की राह में आने वाली भरोसे की दुर्बल छतरियाँ उनके सामने क्या टिकेंगी। यह तो कुछ ऐसा ही हुआ जैसे कुछ दशक पहले छपी यह खबर कि समुद्र में जा रहे एक विशालकाय जहाज पर इतनी तितलियाँ बैठ गयीं कि वह विशाल जहाज उन तितलियों के भार से डूब गया --- अकेली लड़की के शरीरी साथ की चंचल कामनाओं (तितलियों) ने पल भर में पार उतारने के भरोसे की विशालकाय किश्ती (जहाज) पल भर में डुबो दी। 


(तस्वीर gypsyescapade.com से साभार )


हमने पुराने समय में सुदर्शन की कहानी "हार की जीत" स्कूल की किताब में पढ़ी थी जिसका असर इतना गहरा था कि अब तक बाबा भारती,उनका घोड़ा सुलतान और डाकू खड्ग सिंह याद हैं और उनके बीच का देववाणी सरीखा यह संवाद भी कि "किसी को इस घटना के बारे में मत बताना नहीं तो लोग दीन दुखियों का भरोसा न कर सकेंगे।" (शब्दों में हेरफेर हो सकता है)।मालूम नहीं अब उनकी यह कहानी बच्चों के पाठ्यक्रम में है या नहीं या आज के शिक्षाशास्त्री ऐसे पाठों की अनिवार्यता समझते हैं या नहीं।पर भरोसा किसी इंसान के जीवन में कितना ऊँचा और महत्वपूर्ण स्थान रखता है यह इस लाजवाब कहानी से सीखा जा सकता है - हर कदम पर हर साँस में हम अज्ञात इलाके में भरोसे के बल पर ही आगे बढ़ने का साहस जुटा पाते हैं।ध्यान रहे लड़खड़ाना या गिरना भरोसे का प्रतिलोम नहीं है,सीखने की सीढ़ियाँ हैं...किसी ने क्या खूब कहा है : पहाड़ के शिखर पर चढ़ जाना उपलब्धि नहीं है,उसके लिए खुद पर भरोसा कर चढ़ाई का हौसला करना असल उपलब्धि है।



निर्बंध बारह नीचे लिंक पर पढ़िए


अभिव्यक्ति की आज़ादी पर पाबंदी बर्दाश्त नहीं
https://bizooka2009.blogspot.com/2018/11/31.html?m=1


अनुराधा सिंह की कविताएं और नीचे लिंक पर पढिए

https://bizooka2009.blogspot.com/2017/11/blog-post_13.html?m=1










Y Pandey
Former Director (Actg )& Chief Scientist , CSIR-CBRI
Roorkee
   

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