17 जनवरी, 2019

सोनल शर्मा की कविताएं

सोनल शर्मा 


अहिल्या

बनाती ही होगी भोजन सुबह-शाम
वह पत्थर की स्त्री
मुस्कुराती भी होगी
वक्त जरुरत
स्त्री थी और जीवित थी
तो वह सब करती ही रही होगी
जो जरुरी था
तभी तो वह बनी रह सकी
उस घर में बरसों बरस
पत्थर होकर भी !
लेकिन  क्यों
वह वहीँ बनी रही वही
तब जब पत्थर की नहीं रही ?





कैकई

युद्ध में घायल होकर
धार-धार बहते रक्त में
डूबी हुई स्त्री हूँ मैं
मेरी अंगुली फंसी है
तुम्हारे रथ के पहिये में
और तुम मुझे नहीं पहचानते !
मेरी देह धिक्कारती है मुझे
जिसमें रहती है मेरी आत्मा
यह नहीं कि मांगती हूँ राज्य
किसी भरत के लिए
या कि वन में भेजती हूँ
किसी राम को
निर्णय में भागीदार बनाने का हक़ मागती
स्त्री की ऐसी इच्छा हूँ मैं
जिससे वह खुद घृणा करती आई है
मैंने जो खो दिया है
वह नहीं लौटा सकोगे कभी
वर मांग कर करती हूँ तुम्हें ही भारमुक्त
उस प्रेम से
जो कभी मुझे कुछ दे पाता
अब पीछे तुम्हारे पास
मोह ही शेष बचेगा





सीता

क्या महसूस कर सकते थी वह
सिवाय इसके
उस क्षण में
जब दूसरी ओर खड़े
देखा होगा उसने
अपने राम को
इस समय में
यही उठा होगा मन में
कि फट जाए धरती
कितनी बार कहता है स्त्री का मन
कि समा जाए वह धरती में / इसी वक्त
एक स्त्री का मन / न जाने कितनी बार
गुजरता है उस भयानक ताप से
जिसे तुम अग्नि परिक्षा कहते हो
कितनी बार गर्भ में लिए प्रेम
वह चली जाती है
जन विहीन अरण्य में
और लौट कर कभी नहीं आती
ये एक स्त्री की कथा है
राम भी जिसके काम नहीं आते है









ब्लेक होल : एक 

डूब गया वह तारा कब से
जो तुम देख रहे हो
वह उस से छूटा प्रकाश है
तारे के मरने की खबर तुम्हारे पास आते
अभी और न जाने कितने बरस लगेगे





ब्लेक होल : दो 

वह एक तारा है
जो चमक रहा है
खुद के प्रकाश से
वह मरेगा अपनी मौत
अपनी मौत मरने में बुरा क्या है




ब्लेक होल  : तीन 

फिसलकर गिर जाने की प्रतीक्षा में
टहल रही हूँ
हर रात
जाती हूँ
लौटती भी हूँ
पर जानती नहीं
इस ब्लेक होल में
आने -जाने का रास्ता




ब्लेक होल : चार 

वह स्त्री रिस गयी है
देह के भीतर से
किसी ब्लेक होल में
तुम छूते हो जिसे
वह तो बस देह है





तुम्हारी याद 

हजारो जरुरी कामों के बीच
संधो से रिस रही है तुम्हारी याद
मेरी आँखे उकेर रहीं है
तुम्हारा होना दरवाजे पर
आश्वस्त है मन
जैसे होता ही है हर दिन
तुम आओगे
और समा जाओगे
जैसे एक रंग समाता है
चिलचिलाती धूप में 
और तपती दुपहरी को
सुनहरी शाम कर देता है






मन 

तुम्हारे आने की खबर है
खूब सफाई की है मैंने
घर आँगन की
पोछा है हर उस चीज को
जस पर जमी थी धूल
धुप से उजलाया
सुनहरा सा कमरा
धड़क रहा है
चाहती हूँ
तुम भी आओ धुले पूंछे
लो देखो
ज़रा खुला दरवाजा
और धूल ज़मने लगी





तुम होते तो 

तहाकर रखा  पूरा दिन
खोलती हूँ
और करती हूँ तुम्हें शामिल
उन उन जगहों पर
उन उन समयों में
जहां मैं चाहती थी कि तुम होते
फिर पूछती हूँ
बोलो ,तुम होते तो क्या करते ?
क्या कहते ?
तुम मुस्कुरा देते हो अक्सर
फिर कहती हूँ मैं ही
जो मैं चाहती हूँ
कि तुम होते तो कहते
पता नहीं तब भी तुम वहां होते हो
कि नहीं होते !
०००
संपर्क: सोनल शर्मा, इन्दौर । मोबाइल-9826008585

4 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १८ जनवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  2. सोनल शर्मा की कविताओं का पहली बार रस्वसादन किया. बहुत सुन्दर और बहुत विचारोत्तेजक कविताएँ ! इन कविताओं में युगों-युगों से स्त्री के प्रति होते आ रहे अन्याय की स्पष्ट गूँज है लेकिन उसके साथ नारी-ह्रदय में भरा हुआ अथाह प्रेम भी है.
    स्त्री की सबसे बड़ी चाह होती है कि कोई उसके मनो-भावों को अन्दर तक समझे, अहल्या की पीड़ा को समझे, कैकयी के अपमान को समझे. और ब्लैक होल से नारी के अंतर्मन की तुलना, उसके अंजाम की तुलना, तो लाजवाब है.

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