17 फ़रवरी, 2019

 शिव कुशवाहा की कविताएं




शिव कुशवाहा



सत्ता और कुकुरमुत्ते

राजनीति का क ख ग नहीं जानती प्रजा
प्रजा केवल बदल सकती है सत्ता
और सत्ता पर काबिज हो जाते हैं कुकुरमुत्ते
कुकुरमुत्ते उग आते हैं
नकाब पहनकर हर बार नए रंग रूप में

सत्ता बन जाती है खूंखार लकड़बघ्घा
जो राह चलते झपट लेते हैं
भूखों का निवाला
दिन पर दिन बढ़ जाती है घोटालों की फेहरिस्त
कुकुरमुत्तों की परिधि रात दिन बढ़ती है
और बढ़ जाती है उनकी उदरपिपासा
सोख लेते हैं समाज की ऑक्सीजन

सच को सच कहने वाले टांग दिए जाते हैं
ईसा की तरह सलीब पर
और झूठ को सच साबित करने वाले
सत्ता के करीब होकर हो जाते हैं पुरस्कृत
सत्ता का झूठा चरित्र बेनकाब करने वाले
घोषित हो जाते हैं दिवालिया

समय सत्ता के चारित्रिक हनन के साथ
बढ़ रहा आगे
सत्ता के असली नायक रह जाते हैं पीछे
आगे आगे चलते हैं कुकुरमुत्ते
हर जगह बिना खादपानी के उग आते हैं ..





बरगदी छाया से दूर

पुराने बरगद
नहीं पनपने देते नए पौधे
जहां तक छाया रहती है
वहां नहीं उगने देते नई किल्लियां
उसकी आत्महंता जड़े
सोख लेती है धरती की उर्वरा शक्ति
जहां कुछ उग आने की संभावना के इतर
उगने से पहले ही
सूख जाती हैं नवकोंपलें.

फैलती हुई जड़ों की परिधि
विस्तार लेती हुईं उसकी शाखाएं
कद ऊंचे से और अधिक ऊंचा होता हुआ
जहां वह नहीं देखता
अपने आस पास
छोटे छोटे नव विकसित कोपलें
जो हरियाना चाहती हैं
लेकिन बरगद
आखिरी दम तक
सोख ही लेते हैं उनकी प्राण वायु..

बरगदी छाया से दूर
उगते हुए नये पौधे
धीरे धीरे उठ रहे हैं ऊपर
अपने आस पास उग आये नए कोंपलों को
बांटते है उर्वरा शक्ति,
धरती में पनपती हुई अनेक तरु शिखाएं
घटित होते हुए समय की असलियत
पहचान ही लेती हैं
कि बरगदी छाया
आत्मुग्ध बरगद की एक स्थिति है..









कविता

कविता
पिघलते हुए
ग्लेशियर की तरह
मनुष्य की संवेदना में
धीरे-धीरे बह रही है

नदी की तरह होता है
कविता का बांध
शब्दों के दरकने से
टूट रहे बांध के पास
अब भी मौजूद है
वर्जनाओं का पूरा इतिहास

कविता की भाषा
बहती नदी है,
कविता मेरे लिए
महज़ आदमी होना है...






विचारधाराएं

अजस्र जल धारा की तरह
प्रवाहित रहती हैं
विचारधाराएं
फूटता रहता है उनका उत्स
बनता रहता है
वैचारिक उर्वर धरातल.

विचारधाराएं
खत्म करने के बरक्स
उभरने लगती हैं तेजी से
जिसतरह नैसर्गिक धारा को
जबरन बांधने पर
भरभराकर गिर जाते हैं बांध

दहशती बयार में
चिंगारी की मानिंद
होती हैं विचारधाराएं
धीरे धीरे हवा के रुख से
सुलगती रहती हैं अंदर ही अंदर...





धरती पर उतरता हुआ चांद

आकाश के बीचो-बीच
चांद का उतरता हुआ रंग
रक्तिम आभा से
परिणत हो जाता है
गहरे स्याह रंग में.

झिलमिलाते हुए तारे
मद्धिम रोशनी में
अंतिम किरण की तरह
नहीं छोड़ना चाहते
आकाश का स्थाई कोना
गहराती हुई रात
तब्दील हो जाती है एक युग में.

चांद और तारों के ठीक नीचे
जागते हुए कलमकार
बनाते हैं कल्पना की तूलिका से
बिम्बों का सहज छविचित्र.

जैसे रात अपनी कालिमा में डूबकर
उतर आती है धरती पर
वैसे ही कलमकार
गढ़ता है नए प्रतिमान
समय की बालुका पर चलकर
वह पहुंच जाता है
चांद की सतह के ऊपर,

धरती पर उतरता हुआ चांद
लेकर आता है
अपने साथ अनेक भाव
जिनमें डूबता - इतराता है
हमारा पूरा परिवेश...




             
यात्राएं

यात्राएं
होती हैं जीवन पर्यंत
आना जाना लगा
रहता है..
फिरभी लोग-
ठहरकर नहीं देखते
शायद कोई इंतजार कर रहा हो
अप्रत्याशित आशाओं के बीच
जो हमारा होना चाहता है
इन यात्राओं की तरह...






शहर की तलाश

बंजर होते हुए रास्ते
सिकुडती हुई तंग गलियों में
रेत की मानिंद
फिसलती जिंदगी के दरम्यान
फासला कदम-दर-कदम
नाप ही लेते हैं
लेकिन अभी भी
हमें तलाश हैं
एक मुकम्मल शहर की...






स्याह पन्ने

यात्रा में बैठे हुए
निहारता हूं जब
पेड़ की नाचती शिखाएं
घूमती हुई दिखाई है
पूरी धरती
एक क्षण के लिए
उतर जाता हूं
अंतस की गहराइयों में.

पीछे छूटते जाते हैं लोग
आगे चलती जाती है मंजिल
खो जाते हैं
जिंदगी के स्याह पन्ने
अदृश्य मन के किसी कोने में
बनते मिटते हैं
अनन्त बिम्ब.

फ्लैशबैक शैली की मानिंद
उभर आतीं विस्मृत स्मृतियां
और धीरे-धीरे
तैरने लगती है
अंतस्तल में
जीवन की धुंधली तस्वीर  ...





संवेदना के सूखते दरख़्त 

ग्लोबल होती हुई दुनियां के
महानगरीय बोध की चकाचौंध में
आंखों पर बंधी हुई पट्टी
जो नहीं देखती
टूटते हुए घरौंदें का दर्द

वह नहीं देखती
मानवीय संवेदना के सूखते हुए दरख़्त
और खो रहे विश्वास के बीच
टूट रहा है आज अपना परिवेश

उत्तरआधुनिकता की
लपेटे हुए चादर
आज का समय
धीरे-धीरे बढ़ रहा
पाश्चात्य सभ्यता के ओवरब्रिज से
जो निकल जाना चाहता है बहुत आगे.

समय की गति
अपनी धुरी से फिसलकर
बढ़ रही एक ऐसी दुनियां की तरफ
जहां दिन- ब दिन
दम तोड़ रही है
संवेदना की बहती हुई नदी...





काल्पनिक तूलिका

कल्पना के कोरे कैनवास पर
उकेरा है एक चित्र
जो है बेबस और निराश
पलकें सांझ की मानिंद
दिखाई देती हैं खामोश.

आंखों में उमड़ता वेदना का सागर
हिलोरें ले रहा हृदय की गहराई में
और पलकों के धीरे से मुंदने से
बयां  हो गए हैं अनकहे दर्द
जिन्हें महसूस किया
कि लहरें सागर की और कुछ नहीं
वे तो हैं उमड़ते आंसू,
कि सागर का खारापन ही
आंसू की असंख्य बूंद हैं.

कल्पना के एक बिम्ब में
बन रहा अलक्षित सा कोई अक्स
जो खोज रहा हो स्वयं में अपना ही अस्तित्व
अनजाने में जो निहार रहा हो
शाम के ढूंढ़लके में
खोया हुआ अपना प्रतिबिम्ब

काल्पनिक तूलिका
बादलों के पीछे खीचती है
शब्दों की एक प्रेम-श्रंखला
जो आकाश के नीले रंग में विस्तार पाकर
चित्रकार के मानसपटल पर हो जाती है अंकित..
०००

शिव कुशवाहा की कविताएं नीचे लिंक पर उन्हीं की जुबानी सुनिए

https://youtu.be/Z9OrLM2zKI0

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रचनाकार परिचय-
समकालीन युवा कवि शिव कुशवाहा की कविताएं समय के साथ संवाद करती हैं। अपने समय को कविता में बांधना ही कवि की पहचान है। कविता जब कवि की पहचान बन जाती है तो स्वतः कवि का चेहरा सामने आ जाता है। कवि की पहचान पीछे चलती है और कवि की कविता आगे। 


नाम- शिव कुशवाहा 
जन्मतिथि-  5 जुलाई , 1981
जन्मस्थान- कन्नौज ( उ प्र)
शिक्षा - एम ए (हिन्दी), एम. फिल.,नेट, पीएच.डी.
प्रकाशन-
छायावादी काव्य की आत्मपरकता ( शोध पुस्तक),
'तो सुनो' काव्य संग्रह प्रकाशनाधीन, ।
अन्य- 
उत्तर प्रदेश, मधुमती, प्राची, ककसाड़, सृजन सरोकार, कविकुम्भ, लहक, युद्धरत आम आदमी, पतहर, जनकृति, दलित अस्मिता, दलित वार्षिकी , सच की दस्तक,  तीसरा पक्ष, डिप्रेस्ड एक्सप्रेस, अम्बेडकर इन इंडिया, कलमकार, नवपल्लव , लोकतंत्र का दर्द , पर्तों की पड़ताल, शब्द सरिता, निभा, नवोदित स्वर , ग्रेस इंडिया टाइम्स , अमर उजाला काव्य, हस्तक्षेप, उदय सर्वोदय  आदि विभिन्न साहित्यक पत्रिकाओं में निरन्तर काव्य रचनाएं प्रकाशित ।
सम्प्रति- अध्यापन
पत्राचार पता - 
C/O श्री विष्णु अग्रवाल 
लोहिया नगर
गली नं - 2
जलेसर रोड़ , जनपद- फिरोजाबाद ( उ प्र)
पिन- 283203
सम्पर्क सूत्र- 07500219405
E mail- shivkushwaha.16@gmail.com

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