15 जून, 2020

कंचन जायसवाल की कविताएँ



कंचन जायसवाल



स्त्रियां और सपने

औरतें,
एक घेरे को उलांघते दूसरे घेरे में सहजता से कैद हो जाती हैं
बचपन में लंगड़ी का खेल खेलते, रेखाओं के घेरे को फांदते
जरा सी लापरवाही में जरता होते ही हार जाती हैं
खुली आंखों से दुनियावी सपने देखते युवतियां
नकारती सारी रेखाएं, घेरे, पैमाने
ज्यादा देर तक खुले आसमान में उड़ने की इच्छा लिए,
और ऊंची उड़ान के घेरे में बिंध जाती, हलाक हो जाती हैं
नकारती सारी पुरानी तजवीजें
खोलती नए तालों को नए तालों में कैद हो जाती हैं
आसान नहीं है आजादी को चबाना
अदृश्य नदी जैसी होती है परंपराओं की धार एक के या दस-बीस के या एक गांव,
अमूमन चार पांच शहरों के नकारने पर भी लुप्त नहीं होती
बहती रहती है अनवरत,
रेत में छिपी नदी की तरह,
धीरे-धीरे; डेसपसीतो
दुख लंबे समय तक बांधता है घेरे को,
सुख की चाह तोड़ देती है अनचाहे वृत्त
अनचीन्हे समय में घुसना साहस का काम है, जैसे आजादी को जीना
सपनों का रंग सफेद कागज की तरह है
तमाम रंगीन घेरे सपनों को बांधते हैं
घेरे उलांघना सपनों में रंग भरने जैसा है


शाम होते ही

शाम होते ही आसमान प्रेमी की तरह थोड़ा नीचे झुकाता है, मानो
शाम होते ही नन्ही मुस्लिम लड़कियां पीछे की गली से निकल घूमने चली आती है अहाते तक,
सिर पर स्कार्फ लपेटे गली में बतियाती हैं वह कुछ छोटे हिंदू लड़कों से
बड़ी लड़कियां उनके दुपट्टे को सही करती हैं
अहाते में
लड़के जोर-शोर से क्रिकेट खेलते हैं शाम होते ही पेड़ झूमने लगते हैं
माएं अपने बच्चों को टहलाने के लिए घरों से बाहर निकल आती हैं
युवा होती लड़कियां साइकिल पर हंसते -खिलखिलाते गुजरने लगती हैं
छतों पर झांकते हैं चेहरे
शाम होते ही मजदूर दिन भर काम करने के बाद अपना सामान समेट में लगते हैं
कुछ हाथ मुंह धोने के बाद अपनी मोबाइल चेक करके, साइकिलें सीधी कर अपने घरों की ओर निकल जाते हैं
शाम के बहाने से रात नींद का गीत गुनगुनाने लगती है
शाम होते ही मन की गुलाबी आभा ओर-छोर तक पसर जाती है


नि: शब्द 

मेरे पास कुछ भी नहीं है

बस कुछ नुचे हुए शब्द हैं
जिन से रिसता रहता है खून
और पपड़ी की तरह
जम जाता है रिश्तों पर
शब्द दर शब्द
खालीपन है
और मैं नि:शब्द


यह बीच की स्थिति है

यह बीच की स्थिति है, लगभग आधी से थोड़ी पहलेया थोड़ी ज्यादा भी हो सकती है;
एक ही ढर्रे से सूरज के उगने और डूबने और दिन का कैलेंडर में बदल जाने से, आदी हो जाने पर हम छूट जाने के प्रति उदासीन हो जाते हैं
छूट जाना फिर रीत जाना है
और यह रीतना ही लोग जीवन बताते हैं
फिर आगे का दोराहा सीधा-सपाट लगता है, लगभग चिन्हित सा
डरकभी नहीं जाता
बस आकार बदलता रहता है
ुबह की अलसाई शुरुआत में रात का प्रेमी जी अचानक से कंधे के पीछे से डरा सकता है
डरहर सांस के साथ पलता है
तुम कागज की कश्ती बना लेते तो अच्छा था
तुम घड़ियों के व्यापारी बन जाते, नंगे पैर रेत पर दौड़ते,
बालू के घर बनाते,
समुद्र की तरफ दोनों बांहें फैलाए दौड़कर लहरों को गले लगाते,
तुम किसी छोटे बच्चे को देर तक कहानियां सुनाते
तुम किसी हुनरके पुजारी होते
बचे हुए आधे के सूख जाने से पहले ही तुम करवट बदल लेते
सोने और जागने के बीच में कई सुबहें अपनी राह देखती हैं


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें