27 दिसंबर, 2018

साक्षात्कार: डॉ हूबनाथ पाण्डेय



कई महीनों की कोशिश के बाद आज मुंबई विश्वविद्यालय के असोसिएट प्रोफेसर डॉ हूबनाथ पाण्डेय जो एक कवि, लेखक और आलोचक भी हैं, से साक्षात्कार के लिए मुलाक़ात करना संभव हुआ। उनकी व्यस्तता, उनके आसपास विद्यार्थियों की जमघट, लेक्चर के लिए आते ही उन्हें अपने रूम से निकलते देखना। अक्सर उनकी व्यस्तता मुझे साक्षात्कार के लिए मिलने का वादा लेने से भी पीछे खींचती रही। इतनी व्यस्तता के बावजूद विद्यार्थी उनके पास अपनी समस्या लेकर आते और हूबनाथ सर उनका समाधान पूरे मनोयोग से कराते भी रहें। इस साक्षात्कार के लिए उनकी सहमति जानने पर, पहले .... इसकी कोई जरूरत नहीं है, .... फिर क्या होगा साक्षात्कार से, .... तुम खुद ही प्रश्न का उत्तर दे दो, ..... फिर ठीक है किसी दिन मिलते हैं ..... के बाद आखिरकार दिन तय होने की तारीख .... रद्द होना ..... और आज वह दिन कि मैं उनका साक्षात्कार ले पाई .... वाकई एक अत्यंत सुखद अनुभूति है। 

     खुद के लिए नहीं, पर किसी की व्यथा सुन कर मदद के लिए दौड़ जाने वाले, फोन पर भी बीमारी का इलाज बताने वाले, सहायता की ख़ातिर हर संभव कोशिश करने वाले हूबनाथ सर जिनसे विद्यार्थी पारिवारिक परेशानी का हल पूछने से भी नहीं कतराते। अक्सर सुबह-सुबह विश्वविद्यालय में पौधों में पानी डालते, कौओं या अन्य पक्षियों की तस्वीर लेते उन्हें देखा जा सकता हैं। किसी कार्यक्रम में उपस्थिती न देते हुए किसी जरूरतमंद की मदद करते उन्हें देखना मामूली बात है। डॉ हूबनाथ पाण्डेय जिन्हें मैं सर कहती हूँ मेरे गुरु भाई भी हैं। आइए उनके उदगार, शब्दों और पंक्तियों पर गौर करें, अलग कुछ सुने, कुछ गुने .. !!  
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रीता दास राम


साहित्यकार को यह गलत फ़हमी है कि वह कोई बहुत बड़ा काम कर रहा है: डॉ हूबनाथ पाण्डेय

रीता दास राम


दूसरी कड़ी

रीता : आपकी कविता संग्रह ‘मिट्टी’ में 11 वीं कविता है “आओ ढूँढे उस मिट्टी को जिसे कभी हम सिकंदर कहते है, ढूँढे उस मिट्टी को जिसे कभी हम नेपोलियन, अशोक, या अकबर कहते थे, राम-कृष्ण, गौतम, यीशु, पैगंबर कहते है” इन सभी को मिट्टी से जोड़ कर, धरती से जोड़ कर, आप क्या कहने की कोशिश कर रहे हैं?



डॉ हूबनाथ पाण्डेय


डॉ हूबनाथ : इस कविता में मैं कहना चाहता हूँ कि दुनिया में कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो उसको अंत में मिट्टी में ही मिलना है। यह बात सभी जानते तो हैं पर मानने को तैयार नहीं हैं। जबकि देह तक ही हम सीमित है। देह के बाद कुछ भी हमारा रह जाने वाला नहीं है। देह से परे खुशबू एक ऐसी चीज़ है जो हमेशा रह जाएगी। एक कविता है कि फूल तो मुरझा जाता है पर फूल की खुशबू मिट्टी में रह जाती है। जब उसमें पानी पड़ता है। सौंधी खुशबू आती है। वह उन लोगों की अच्छाईयों की होती है जो मिट्टी में मिल चुके हैं। हमें अपने कर्म को महत्व देना चाहिए, देह को नहीं। देह से पाने वाले सुखों को नहीं। सुविधाओं को नहीं। भौतिकता को नहीं। तभी तस्वीर बदल सकती है। ये जितने नाम नेपोलियन, अशोक, अकबर, राम, कृष्ण, गौतम, यीशु, पैगंबर है, वह सारे के सारे मिट्टी हो चुके हैं। फिर भी उनका नाम लिया जा रहा है। वह उनके देह का नहीं बल्कि उनके कर्मों का। अगर हम अपने कर्मों को महत्व दें, अपने सिद्धांतों को, उसूलों को, अपने विचारों को तो तस्वीर बदल सकती है।

रीता : इसका मतलब सिकंदर, नेपोलियन, अशोक इन सभी से आप प्रभावित रहे जैसे राम, कृष्ण, गौतम, यीशू ..... !!

डॉ हूबनाथ : मैंने कुछ उदाहरण लिए जिन्हें लोग जानते हैं। ईसा मसीह से मैं बहुत ज्यादा प्रभावित रहा। अभी भी वह मुझे अच्छे लगते हैं। एक सीधी सी बात है कि जीजस को लगा कि वह ईश्वर की संतान है। वही नहीं, सारे के सारे लोग ईश्वर की संतान है। यह उस जमाने (समय) में जीजस ने कहा। जबकि राजा ही ईश्वर की संतान है ऐसी अफवाह फैली थी। जब जीजस से कहा गया कि ‘आप जो कह रहे हो वह गलत है। अगर आप यह स्वीकार कर लो तो आपको माफ भी किया जा सकता है।’ यदि उस वक्त जीजस इतना कह देते कि ‘ठीक है मेरी जान बख़्श दो। मैंने जो कहा वो गलत है।’ तो वह बच सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। जब इंसान एक बार जिस चीज़ को महसूस कर लेता है और उसके लिए जब वह जान भी देने को तैयार हो जाता है। तो वह बात पूरी कायनात में पसर जाती है। अगर जीजस ने अपनी जान बचानी चाही होती तो आज उनका कोई नाम भी नहीं लेता। उन्होंने अपना उसूल बचाना चाहा। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं। जैसे सुकरात, 79 की उम्र में उसको ज़हर पीना पड़ा। वह माफी माँग लेता तो दस साल और जीता। तब शायद उसको कोई जानता नहीं। जब तक आप अपनी देह को सत्य मानोगे तो आप सही ढंग से जी नहीं सकते। सत्य देह से परे जाना है। सत्य के लिए देह का त्याग करने की हिम्मत होनी चाहिए। तभी आप महान हो सकते हो। दूसरी बात जो जीजस की सबसे अच्छी थी वह यह कि गरीबों के लिए करुणा का भाव। अमीरों के प्रति तो हम दुनिया भर के भाव व्यक्त करते हैं। डर के मारे या लालच के मारे। पर गरीब आदमी जो विपन्न है उसके लिए आपके मन में करुणा नहीं रही तो समाज कभी बदल नहीं पाएगा। जीजस एक अलग ढंग के समाजशास्त्री थे या कहा जा सकता है समाजवादी थे।

रीता दास राम और डॉ हूबनाथ पाण्डेय


रीता : आज के दौर में मुस्लिम समाज को लेकर काफी कुछ कहा जा रहा है जो माहौल है और आपकी कविता में पैगंबर का नाम भी है। आप का क्या कुछ कहना है ...... !!

डॉ हूबनाथ : पैगंबर भी मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। अच्छे इस मायने में लगते हैं कि उस आदमी ने जैसा चाहा वैसी जिंदगी जी। मोहम्म्द साहब के घर में कुल जितने सामान थे उसकी एक छोटी पोटली बन सकती है। बहुत गिनती के बर्तन, गिनती के कपड़े, एक खजूर की चटाई उनकी बहुत थोड़ी जरूरतें थी। उनका कहना था कि सारी समस्या इन साधन को लेकर है। मोहम्म्द साहब जिस जमाने में थे उस जमाने में कुछ लोगों के पास संपत्ति ढेर सारी थी। कुछ लोग उसके लिए मर रहे थे। अगर लोग अपनी जरूरत सीमित कर ले तो बहुत लोगों तक बहुत सी चीज़ पहुँच सकती है। अगर हम अपनी भूख को थोड़ा सा कम कर ले तो भूख के कारण कोई मरेगा नहीं। अगर हम अपनी प्यास को थोड़ा कम कर ले तो कोई प्यासा मरेगा नहीं। उन्होंने कहा आप भूख को पहचानों। आप प्यास को पहचानों। यही कारण है जो उन्होंने रोजे की बात रखी। रोजे में आप भूखे रहोगे तो दूसरे की भूख का एहसास आपको होगा। आप प्यासे रहोगे तो दूसरों की प्यास का एहसास आपको होगा। तब आप दूसरे का हक नहीं मारोगे।

रीता : आज इन महत्वपूर्ण विभूतियों के वचनों की प्रासंगिकता क्या कोई समझता है?

डॉ हूबनाथ : असल में सारे महापुरुषों के साथ एक जैसा ही हुआ। मोहम्म्द साहब को भी लोगों ने सही ढंग से नहीं समझा। असल में एक होता है ‘व्यक्ति’ और एक होता है उसका ‘संदेश’।  व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता, संदेश महत्वपूर्ण होता है। हमने संदेश पर ध्यान नहीं देकर व्यक्ति को महत्वपूर्ण माना। जैसे रामायण में राम महत्वपूर्ण नहीं है। उनके द्वारा दिया जाने वाला संदेश महत्वपूर्ण है। हमने राम के संदेश को अलग रख दिया और राम की जन्मभूमि बनाने के चक्कर में देश के टुकड़े टुकड़े करने चाहे। मोहम्मद के जीवन संदेश को आत्मसात ना करते हुए मोहम्मद को पकड़ लिया गया। जीजस के संदेश को छोड़ कर जीजस को पकड़ लिया। हमने व्यक्ति पूजा करनी शुरू की सिद्धांतों पर ध्यान नहीं दिया। न ध्यान दिया न उसका आचरण किया। यह सिद्धान्त सिर्फ किताब में छापने के लिए नहीं थे। बल्कि जीवन में उतारने के लिए थे। ये कोड ऑफ कंडक्ट थे। पर हमने उन्हें आचार संहिता की तरह नहीं लिया। मंत्रों की तरह लिया। उनका पाठ करते रहे। रमजान आएगा तो उनको पढ़ेंगे। जीवन में नहीं उतारेंगे। महापुरुषों के साथ पूरी दुनिया में ऐसा ही होता रहा। आज भी यही है कि संदेश हमें नहीं चाहिए। हमें उस व्यक्ति की पूजा करनी है। और फिर हमें राजनैतिक दल तैयार करना है।


डॉ हूबनाथ पाण्डेय और रीता दास राम


रीता : तो आज आपको क्या लगता है कि किसी यीशु या पैगंबर की वापस जरूरत है ?

डॉ हूबनाथ : वे आएंगे भी तो ये लोग उनका फिर वही हश्र करेंगे। इंसान को जागने की जरूरत है। हर आदमी के भीतर यीशु और पैगंबर है। महावीर है। ये अच्छाई के प्रतीक है। अच्छाई तो हर आदमी में है। लेकिन आदमी उस अच्छाई को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल कर रहा है दूसरों के लिए नहीं।   
रीता : समाज, व्यवस्था और राजनीति से देश में जो हालात उत्पन्न हुए या होते हैं उस पर अपने समकालीन कवियों के लेखन से क्या आप संतुष्ट है?

डॉ हूबनाथ : समकालीन कवि या लेखकों के लेखन से मेरा बहुत ज्यादा परिचय नहीं। मैं बहुत ज्यादा पढ़ता नहीं हूँ। मतलब साहित्य नहीं पढ़ता हूँ। मेरे पढ़ने का क्षेत्र सोशोलोजी है। फिलोसफ़ी है। सायकोलोजी है। यह सब मैंने पढ़ा है। पढ़ता रहता हूँ।

रीता : किसमें रुचि सबसे ज्यादा है?

डॉ हूबनाथ : फिलोसफ़ी में सबसे ज्यादा रुचि रही है। फ़िलोसोफी का करंट सिनारियों है और मेरे प्रिय फिलोसफरस को ही मैं पढ़ता रहता हूँ।

रीता : आपकी कविता आपका व्यक्तित्व है। कविता में समाज और संस्कृति के प्रति आप जागरूक हैं ... !

डॉ हूबनाथ : संस्कृति की साधारण परिभाषा हम देखें तो इंसान अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए जो मटेरियलिस्टिक रचना करता है वह संस्कृति है। यानि आपका घर, आपके कपड़े, आपका खान-पान, आपकी वेश-भूषा, आपके फ्लाय ओवर, आपकी सड़के यह सब संस्कृति का हिस्सा होती है। फिर बाद में चल कर संस्कृति दो भागो में बट जाती है। एक मानसिक संस्कृति दूसरी भौतिक संस्कृति। मानसिक संस्कृति में फिर अध्यात्म और धर्म ये सारी चीज़ें आती है। पर धर्म मानने वाले यह नहीं मानते। वे कहते है संस्कृति हमारा हिस्सा है। मैंने रामायण बाद में पढ़ी, बायबल पहले पढ़ी। कुरान पहले पढ़ी, रामायण बाद में पढ़ी। मेरे मित्र मुस्लिम और ईसाई ज्यादा थे। हिन्दू मित्र कम थे इस वजह से इनका प्रभाव मुझ पर पड़ता रहा।

रीता : आपने समकालीन को तो नहीं पढ़ा लेकिन क्या आप अपने लेखन से संतुष्ट है?

डॉ हूबनाथ : असंतोष से ही तो लेखन पैदा होता है। संतुष्ट हो गए तो लेखन ख़त्म हो गया ना !

रीता : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सभी का हक है इसमें आपकी अपनी रणनीति के बारे में पाठक जानना चाहेंगे ?

डॉ हूबनाथ : रणनीति नहीं है। संविधान में पूरे देश के लोगों को यह अधिकार दे ही दिया है कि जो हमारे फंडामेंटल राइट्स है उसमें फ़्रीडम ऑफ एक्स्प्रेशन भी है। हिंदुस्तान का जो सबसे बड़ा धर्म ग्रंथ है इस समय वो संविधान है। जब हमारा संविधान यह हक दे रहा है तो किसी को यह हक नहीं जाता है कि इसको छिनने की कोशिश करें। कोई ऐसा करता है तो हमें उसका प्रतिकार करना चाहिए। विरोध करना चाहिए। कविताएं जो है इसी बात का प्रतीक है कि फ़्रीडम ऑफ एक्स्प्रेशन है। मैं अपने मन की बात कह सकूँ। उसमें एक क्लॉज़ (clause) यह भी है कि आप किसी दूसरे का मन दुखा कर अपनी बात नहीं कह सकते। किसी को आहत कर के कुछ कहा जाय तो वह फ़्रीडम ऑफ एक्स्प्रेशन में नहीं आता है। हर आजादी की कुछ बन्दिशें तो होती ही है। आदमी एक पैर पर खड़ा हो सकता है इतनी आजादी है दोनों पैर उठाएगा तो गिर पड़ेगा।

रीता : याने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की अपनी एक लिमिटेशन है .... !

डॉ हूबनाथ : लिमिटेशन होती ही है। सबकी होनी चाहिए। सबसे बड़ा लिमिटेशन हमारा विवेक है। होना भी चाहिए। हम जो कह रहे हैं वो समाज और समय के लिए कितना जरूरी है। यह हर एक व्यक्ति को सोचना जरूरी है।

रीता : आपकी कविताएं मुखर, बुलंद समाज में हो रहे घटित का विरोध जताते हुए कटाक्ष प्रकट करती है कभी आक्रामक सी भी होती है। क्या यह आपका आक्रोश है .... अगर है तो भावुक कवि मन कहाँ है?

डॉ हूबनाथ : भावुक तो मैं बिलकुल नहीं हूँ। यह आक्रोश ही होता है जो व्यक्त हो जाता है। वह असंतोष ही होता है वो बाहर आ जाता है। मेरी कविताओं में बहुत खूबसूरत कविताएं, पेड़-पौधे, पंछी, बहार-वहार यह सब नहीं मिलेंगे।

रीता : पंछी, पशु तो बहुत मिलते हैं आपकी कविताओं में साँड, बैल, मछली, बकरी, कौए सभी मिलते हैं।

डॉ हूबनाथ : हाँ वह सभी है पर रोमेंटिक मूड में नहीं मिलेंगे। उनका एक सामंजस्य है। वे मुझे संदेश दे रहे होते हैं या मैं उनसे संदेश ले रहा होता हूँ। तब उनकी बात करता हूँ। कौए मुझे बचपन से ही अच्छे लगते रहे हैं। जब मैं फोटोग्राफी करता था तो सैकड़ों-हजारों तस्वीरें मैंने कौए की ली है। मैंने जितनी भी फोटो ली हैं उस में दस प्रतिशत भी इंसान का चेहरा नहीं होगा। मुझे कौए का शेप अच्छा लगता है। उसकी चाल अच्छी लगती है। उसकी आँखें अच्छी लगती है। वह पूरा ओवर आल, उसका एक्स्प्रेशन अच्छा लगता है। कौए को हम बुरा मानते हैं जबकि वह हमारी गन्दगी साफ करता है। कबूतर जो सिर्फ़ गंदगी करता है उसे हम शांति का प्रतीक मानते हैं। गौरैया तो बहुत दुष्ट पंछी हैं वो आपको एक पल चैन से बैठने नहीं देती लेकिन वह आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। कौआ आया नहीं कि आप उसे भगाना शुरू करते हो। हाँ, पितृपक्ष में थोड़ी इज्जत कौए की हो जाती है।

रीता : आज शिक्षा के क्षेत्र में भी राजनीति का हस्तक्षेप है। विश्वविद्यालयों का बुरा हाल है। जेएनयू के बारे में कई बातें सुनने में आती है कि अब वह राजनीति का अखाड़ा हो गया है। विद्यार्थियों में भी इस राजनीति का बुरा असर देखने मिलता है। विद्यार्थियों की स्थिति, यह सब जो हो रहा है, बतौर एक प्रोफेसर आप क्या कहना चाहेंगे?

डॉ हूबनाथ : जिसकी बात की जा रही है वह राजनीति नहीं है। राजनीति में एक नीति होती है। राजनीति एक थ्योरी होती है। जिसको सोशल थ्योरी कहते है। वह समाज के लिए होती है। सही मायने में यदि राजनीति की बात की जाए तो वैसा यूनिवर्सिटी में नहीं हो रहा। किसी विचार धारा को लेकर हम अभी रिएक्शन में जी रहे हैं। हम किसी के विरोध में अपनी राजनीति लाने की कोशिश कर रहे हैं। जिसे राजनीति कहा जा रहा है असल में वह स्वार्थ नीति है। हम स्वार्थ में इस कदर अंधे हो चुके हैं कि स्वार्थ को हमने नीति का रूप दे दिया है। जिसे हम कूटनीति या कुटिलता कहते हैं। वह सारी चीज इसमें हैं जिसे हम राजनीति कह रहे हैं। जैसे राजनीतिक थ्योरी एक मार्क्सवाद है या नव मार्क्सवाद है। ऐसे कोई थ्योरी लेकर आप राजनीति नहीं कर रहे हो। अगर विचार धारा लेकर राजनीति कर रहे हैं तो कोई बुरी बात नहीं है। विद्यार्थी को राजनीति की जानकारी होनी चाहिए। राजनीति एक पावर है। पावर को आप समझेंगे नहीं तो वो आपको तकलीफ देगा। जैसे बिजली एक शक्ति है। उसे नहीं पहचानोगे तो वह आपको शॉक देगा। ऐसे ही राजनीति को समझना, अपनाना और समझना जरूरी है। होता यह है कि हम राजनीति की जगह स्वार्थ नीति कर रहे होते हैं। या कूटनीति कर रहे होते हैं। उसे कूटनीति भी नहीं कहेंगे तो उसे डिप्लोमेसी कहा जाता है।

रीता : जेएनयू में क्या हो रहा है।

डॉ हूबनाथ : असल में वह एक रिएक्शन है। हमारे देश में युवा बहुत ज्यादा है। बहुत तेजी के साथ युवा बढ़ रहे हैं। हर राजनैतिक सत्ता यह चाहती है कि युवाओं पर उसका कब्जा हो। युवा आपको कॉलेज और यूनिवर्सिटी में मिलते हैं। हमारे यहाँ छात्र का राजनीति चुनाव लड़ने पर बैन था। अभी नया कानून आ गया है। तो सभी पोलिटिकल पार्टियां अपना अपना ग्रुप बना रही है। बहुत दिनों से जेएनयू में मार्क्सवाद था। वामपंथी पार्टी, एसएफ़आई, स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया थी। फिर बीजेपी आई तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद आया। फिर काँग्रेस की पार्टी आई। फिर शिव सेना की। फिर मनसे की। ये सारी पार्टियाँ विद्यार्थियों को अपने दायरे में कैद करना चाहती हैं और उनका इस्तेमाल करना चाहती है। विद्यार्थी इस्तेमाल हो रहे हैं। विद्यार्थियों को लगता है कि आगे चल कर उन्हें एमएलए या एमपी का टिकट मिल जाएगा।

रीता : तो विद्यार्थी लालच में है ....

डॉ हूबनाथ : विद्यार्थी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। अगर कोई पोलेटिकल पार्टी विद्यार्थियों के साथ राजनैतिक पार्टी संगठन बनाती है तो वह गलत है। विद्यार्थी अपना विद्यार्थी संगठन बनाए तो वह सही है।

रीता : तो जेएनयू में क्या है विद्यार्थी संगठन ... ?

डॉ हूबनाथ : नहीं। पोलेटिकल है। .... सारे पोलेटिकल है। वो या तो सीपीआई के हैं। अब तो सीपीआई, सीपीएम एक हो गई है। कम्युनिस्ट पार्टी के हैं। या एवीबीपी के हैं।

रीता : आप मुंबई यूनिवर्सिटी से जुड़े हैं। आप यहाँ असोसिएट प्रोफेसर है। आप यहाँ किस तरह की राजनीति देखते रहे हैं? शिक्षा अपने पाक रूप में इस दांव-पेंच से क्या बच पाई है?

डॉ हूबनाथ : ये ज़रा मुश्किल है ..... !! असल में बात सिर्फ़ मुंबई यूनिवर्सिटी की नहीं है। शिक्षा का जो हाल है उसे यूँ कह सकता हूँ कि आपके बाएँ हाथ की हालत क्या हो सकती है जब पूरा शरीर ही सड़ा हुआ है। बायाँ हाथ भी वैसा ही रहेगा। दायाँ हाथ भी वैसा ही रहेगा। पूरे देश में जो शिक्षा की व्यवस्था है वह अविश्वसनीय जैसी हो गयी है। उसमें दो-तीन चीज़ें है जिसकी वजह से यह हालत है। एक तो विद्यार्थी है उसे नौकरी चाहिए। वह अपनी रोजी-रोटी के लिए शिक्षा के सिस्टम में आता है। हमारे इस एजुकेशन सिस्टम में समझदार बनने या दुनिया को समझने के लिए विद्यार्थी एजुकेशन सिस्टम में नहीं आता है। इसलिए हमारे यहाँ शिक्षा की भी वही केटेगीरी है। सबसे ज्यादा तनख्वाह वाली शिक्षा, उससे कम तनख्वाह वाली शिक्षा, कम तनख्वाह वाली शिक्षा, बिना तनख्वाह वाली शिक्षा। हमारे यहाँ सबसे ज्यादा डिमांड मेनेजमेंट की डिग्रीस की है। फिर उसके बाद मेडिकल साइनसेस, एंजिनियरिंग है। फिर उसके बाद कॉमर्स है। आर्ट्स सबसे नीचे आता है। आर्ट्स में भी भाषा (language) बहुत नीचे आती है। गए-गुजरे विषय, तलछट में आते हैं। आप इस तरह से जब शिक्षा का विभाजन कर दोगे तो वह शिक्षा, शिक्षा नहीं रह जाएगी। आप कोई न कोई स्वार्थ लेकर इस शिक्षा का इस्तेमाल करके अपनी जिंदगी को सुधारना या संवारना चाहते हो। यही विद्यार्थी तो शिक्षक बन कर आ रहे हैं। जब पूरे सिस्टम में ही गड़बड़ है तो शिक्षक वर्ग हो या शिक्षित वर्ग दोनों एक सरीखे होंगे। हमारे यहाँ आजादी के बाद ढेर सारे एजुकेशन कमीशन्स आए। पर उन सारे एजुकेशन कमीशन्स के शिक्षा आयोगों की सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया गया। शिक्षा आपको निर्भय बनाती है। आपके अंदर आत्मविश्वास पैदा करती है। अगर शिक्षा आपको निर्भय न बना सके और आत्मविश्वास न पैदा कर पाए तो वह शिक्षा किसी काम की नहीं है।

रीता : ये जो यूनिवर्सिटी में राजनीति के नाम पर चल रहा है यह सब क्या है?

डॉ हूबनाथ : यह ‘राजनीति’ नहीं ‘स्वार्थ नीति’ है। ‘राजनीति’ तो बड़ा शब्द है। राजनीति में थ्योरी होती है। उसमें सिद्धांत होते है। उसके प्रति आपका समर्पण होता है। आप कोई कीमत चुकाने को तैयार होते हो। यहाँ मेरा स्वार्थ ही मेरी नीति है। अपने स्वार्थ के लिए हम विद्यार्थियों का भी इस्तेमाल करते हैं। अपने इंस्टीट्यूट का भी इस्तेमाल करते हैं। चूंकि प्रोफेसर भी उसी समाज से आ रहे हैं। प्रोफेसर कोई आसमान से टपक नहीं रहे। तो जो हालत समाज की होगी वही शिक्षा की होगी वही राजनीति की होगी। ये सब एक ही क्षेत्र में काम करते हैं।

डॉ हूबनाथ पाण्डेय और रीता दास राम
 
रीता : यदि ऐसा ही है तो क्या कुछ किया जा सकता है? जो स्थिति में सुधार हो ? ऐसे में आप विद्यार्थियों के भविष्य को कहाँ देखते हैं ? आप प्रोफेसरों और विद्यार्थियों को क्या कुछ कहना चाहेंगे ?

डॉ हूबनाथ : विद्यार्थी खुद अपने भविष्य के बारे में कुछ नहीं सोचते हैं। विद्यार्थी जब आते हैं तो अपनी पढ़ाई के लिए उन्हें मेहनत करनी चाहिए रिफरेंस बुक्स पढ़नी चाहिए। सारे के सारे विद्यार्थी नोट्स के चक्कर में पड़े रहते हैं। झेरोक्स के चक्कर में पड़ते हैं। इवन मेडिकल साइंस के भी विद्यार्थी उस ज्ञान को प्राप्त करने के लिए नहीं आ रहे हैं बल्कि वे डिग्री लेने के लिए आ रहे हैं। किसी न किसी तरह से डिग्री मिल जाए एक अच्छा पर्सेंटेज मिल जाए। यह उनका उद्देश्य होता है। ज्ञान उनका उद्देश्य होता ही नहीं।

रीता : और प्रोफेसरों का ..... ??

डॉ हूबनाथ : प्रोफेसरों का भी। जब विद्यार्थी को ज्ञान लेना नहीं तो वह देगा कहाँ से। विद्यार्थियों को जो चाहिए वह चीज़ जब शिक्षक से मिल रही है तो वह विद्यार्थियों के लिए अच्छा शिक्षक है।

रीता : तो आज के जमाने में जो शिक्षक हैं उनमें गुरु के रूप में आदर्शवाद क्या देखने मिलता है ?

डॉ हूबनाथ : सभी नौकरी कर रहे हैं। सारे के सारे क्षेत्र में नौकरी की जा रही हैं। नौकरी में ऐसा है कि आपकी तनख्वाह तय होती है। जब आपके काम से आपके तनख्वाह पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है तो आप अपने काम पर कोई असर नहीं पड़ने देते।

रीता : ऐसे चुनौती और भ्रष्ट माहौल का आज के गुरु-शिष्य सम्बन्धों पर कैसा प्रभाव पड़ा है? इसमें आपकी क्या भूमिका है?

डॉ हूबनाथ : यह गुरु-शिष्य संबंध ही नहीं है। गुरु-शिष्य संबंध थोड़ा बहुत नृत्य में हैं। संगीत में हैं। जहाँ गुरु के बिना आपका काम नहीं चलेगा, वहाँ गुरु की इज्जत है। जहाँ गुरु के बगैर गाइड या नोट्स या कुंजियाँ मिल जाती है, वहाँ गुरु की कोई इज्जत नहीं। जिस-जिस क्षेत्र में सीधे आपको गुरु ज्ञान देते है जैसे नृत्य में, संगीत में, रागों की जानकारी गुरुओं के बगैर नहीं होती तो वहाँ आपको यह दृश्य दिखाई देगा कि विद्यार्थी गुरु के चरणों में गिरते हैं। या फिर छद्म रूप में आध्यात्म में गुरु अपनी जगह बनाएँ हुए हैं।

रीता : याने एक दिखावा चल रहा है .... !!

डॉ हूबनाथ : हाँ दिखावा। बाकी जगह पर गुरु-शिष्य संबंध नहीं है। विद्यार्थी और शिक्षक संबंध है। विद्यार्थी पैसा देता है शिक्षक पेमेंट पाता है। इन दोनों के बीच में जो आदर्श वाली बात थी, वह नहीं है।

रीता : आप भी प्रोफेसर है और आपके भी विद्यार्थी शोध कर रहे हैं आपके विद्यार्थियों के बीच आपकी भूमिका क्या है?

डॉ हूबनाथ : शोध में विद्यार्थी अपना विषय खुद चुनते हैं। उन्हें तकलीफ होती है तो मैं मदद करता हूँ। मैं सिर्फ़ मागदर्शन का काम करता हूँ बाकी सब विद्यार्थी करते हैं क्योंकि वो बड़े हो चुके हैं। इतने मैच्योर हो चुके हैं तो उनको सही और गलत की समझ होनी चाहिए। मैं ही सभी चीज़ें समझाता रहूँ तो वह सही रास्ते पर कभी चल नहीं पाएंगे। जहाँ वो डगमगाते हैं वहाँ मैं उनको सहारा देता हूँ। नहीं तो वो अपना रास्ता खुद तय कर लेते हैं।






रीता : मैंने सुना है। देखा है। आप विद्यार्थियों की मदद करते हैं, कर रहे हैं। ये आप कब से और क्यों कर रहे हैं?
डॉ हूबनाथ : इसकी वजह बस इतनी सी है कि मैं जब विद्यार्थी था तो मेरी मदद किसी ने नहीं की। मुझे ऐसा लगता रहा कोई होता जो सबकी मदद करता। मेरे साथ जो हुआ वो मेरे किसी विद्यार्थियों के साथ न हो इसलिए मैं विद्यार्थियों की मदद करता रहता हूँ।

रीता : क्या विद्यार्थियों में संभावनाएं है? बदलाव है तो कैसा ?

डॉ हूबनाथ : विद्यार्थियों में संभावनाएं है, पर वे अपनी संभावनाओं को पहचाने और विकसित करें। उसके लिए मेहनत करें। पर वह करने के लिए विद्यार्थी तैयार नहीं है।

रीता : और तब भी आप चाहते हैं कि विद्यार्थी खुद समझे और खुद करें ... !!

डॉ हूबनाथ : हाँ खुद समझे, क्योंकि विद्यार्थी इतने बड़े हो चुके हैं। हम अठारह साल में सरकार चुनने का अधिकार दे चुके हैं। ये अट्ठाईस साल में कम से कम अपनी जिंदगी तो खुद चुन सकें और तय कर सकें।

रीता : साहित्य को सिनेमा से जोड़ने की बात की जाती है।
आज कल सिनेमा से जुड़े अनेक विषय पर भी शोध हो रहे हैं। सिनेमा और साहित्य दो अलग प्रकार की विधाएँ है। दोनों के उत्कर्ष अलग है। एक बिन्दु पर दोनों मिलते भी हैं। सिनेमा में साहित्य की मौलिकता क्या बची रह पाती है। प्रेमचंद भी सिनेमा छोड़ कर वापस चले गए। बहुत दिनों तक शिक्षा जगत में सिनेमा को लेकर कोई बात नहीं हुई ... आज शोध हो रहे है इस पर आपके विचार .......।

डॉ हूबनाथ : प्रेमचंद यहाँ से गए उसके दो कारण थे। एक तो यहाँ का पानी उन्हें सूट नहीं हो रहा था। दूसरे वे पेट की बीमारी से ग्रसित ही यहाँ आए थे। यहाँ उनकी तबीयत लगभग खराब रहती थी। सिनेमा में उस समय एक तरह की अश्लीलता आ रही थी। प्रेमचंद ने बाकायदा उस पर टिप्पणी की है। जब पहली फिल्म उनकी फ्लॉप हुई। उसको फ्लॉप तो नहीं कह सकते। उसे चलने नहीं दिया गया। ‘मजदूर’ फिल्म जो ‘दामिल’ नाम से आई थी। उसमें मजदूरों और मालिकों के बीच में संघर्ष और मजदूरों की विजय दिखाई गई थी। यह वह समय था जब दूसरा विश्वयुद्ध शुरू होने वाला था। महँगाई बढ़ रही थी। मजदूरों में असंतोष बढ़ रहा था। अगर यह फिल्म रिलीज़ हो जाती तो मजदूरों को एक रास्ता मिल जाता। मजदूर उग्र हो जाते। उस समय मुंबई सेंसर बोर्ड के जो चेयर मेन थे वही मुंबई के सारे मिलों के भी चेयरमैन थे। उन्होंने मुंबई पर यह फिल्म रिलीज़ नहीं होने दी। हिंदुस्तान के जिस-जिस इलाके में मिलें थीं उस-उस स्थान पर यह फ़िल्म ‘दामिल’ रिलीज़ नहीं हुई। उन लोगों का भी नुकसान हुआ फिर भी उन्होंने प्रेमचंद को जाने नहीं दिया। उनकी दूसरी फ़िल्म भी उन्होंने शुरू की थी। प्रेमचंद ने बताया कि एक दिन शूटिंग देखने वे गए थे। वहाँ एक नायिका को भिगाकर उस पर एक गाना फिल्माया जा रहा था। और डाइरेक्टर उसके बदन को हाथ लगा-लगा कर उसे, किस तरह से अभिनय करना है यह बता रहा था। प्रेमचंद को यह बात पसंद नहीं आई। प्रेमचंद ने कहा यह तो गलत है। फिल्मों का जो भद्दापन था उसे देख कर प्रेमचंद यहाँ से चले गए। साहित्य और सिनेमा दो अलग चीज़े हैं। सिनेमा के लिए साहित्य की कोई जरूरत नहीं है। चार्ली चेपलियन की फिल्में अगर आप देखें तो उसमें कोई कंटेन्ट (कथावस्तु) ही नहीं होती है। सिर्फ ऐक्शन होता है। उसके आधार पर वे अपना संदेश देते है। साहित्य एक अलग चीज़ है और सिनेमा भी अलग चीज़ है। सिनेमा में साहित्य इसलिए आया कि .... जब 1931 में यहाँ बोलती फ़िल्म शुरू हुई तब पहली फ़िल्म ‘आलमआरा’ बनी। वह नाटक पर बनी थी। फिर वी शांताराम ने ‘राजा हरीशचंद्र’ को रिमेक कर ‘अयोध्याचा राजा’ बनाई। अतः कहानी कहाँ से लाएँ यह समस्या थी। सिनेमा क्या है यह हमें पता नहीं था। सिनेमा फ़ॉर्म को हमने समझने की कोशिश नहीं की। हमें ऐसा लगा कि किसी कहानी को हम पर्दे पर दिखा देंगे तो वह सिनेमा हो जाएगा। हमें कहानी की जरूरत पड़ने लगी। अजंता मूवी टोन ने पेपर में ‘एड’ दिया था। हमें ऐसे साहित्य कार की जरूरत है जिसके कहानी पर हम फ़िल्म बना सकें। वो ‘एड’ जैनेन्द्र ने प्रेमचंद को दिखाया और कहा यहाँ तुम्हें अपने कर्ज़ उतारने के लिए पैसे मिल सकते है। तुम कोशिश कर सकते हो। ‘एड’ देखकर लोग आए। आते थे। हमारे यहाँ जो सिनेमा में पैसा लगा रहे थे उनको एकदम अक्ल नहीं थी। आम तौर से जैसे जुए में पैसे लगाए जाते थे। मिल में लगाए जाते थे। उसी तरह वो सिनेमा में इन्वेस्ट करते थे। उनके पास सिनेमा की दृष्टि नहीं थी। कुछ डाइरेक्टर बाद में आए जिनके पास दृष्टि थी। शांताराम को बहुत दुख झेलना पड़ा। वे बहुत अमीर नहीं थे। दादा साहब फाल्के की हालत तो इतनी बुरी थी कि आखरी आखरी दिनों में शांता राम ने उनको खर्चे के लिए पाँच सौ रुपये भेजे थे। सच में जो सिनेमा वाले थे उनकी हालत बुरी थी। कुछ लोग सिनेमा का फायदा उठा रहे थे। इन लोगों को साहित्य (कहानी) चाहिए थी और इसी दौरान कुछ साहित्य कार भटक कर सिनेमा में आ गए ताकि चार पैसे मिल सके। मुक्तिबोध भी सिनेमा में लिखने के लिए आए थे पर कुछ बात जमी नहीं और उनको वापस जाना पड़ा।



रीता : कुछ और साहित्यकार जुड़े थे फिल्मों से ...... !! जैसे जगदंबा प्रसाद दीक्षित ..... !!

डॉ हूबनाथ : सभी पैसे के लिए। जगदंबा प्रसाद दीक्षित ज़ेवियर कॉलेज में पढ़ाते थे। शबाना आज़मी उनकी विद्यार्थी थीं। कई और भी विद्यार्थी थे। जब विद्यार्थियों में से कुछ ने फिल्म बनाना शुरू किया। तो अपने सर से कहा हम आपकी कहानी पर सिनेमा बनाएँगे। आप कहानी लिखिए। तब महेश भट्ट के लिए जगदंबा प्रसाद दीक्षित ने फिल्में लिखी। उन्होंने नौकरी छोड़ दी। फूल टाइम फिल्मों में आ गए। पर फिल्म उनकी अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी। उनके अभिव्यक्ति का माध्यम साहित्य ही था। ‘मुरदा-घर’, ‘कटा हुआ आसमान’, में ही वे खुद को अभिव्यक्त कर पाए। वह उनकी सफल अभिव्यक्ति थी।

रीता : तो सिनेमा में साहित्य की मौलिकता का प्रश्न खड़ा ही रहा ... बरकरार ही रहा ..... !!

डॉ हूबनाथ : सिनेमा एक सिस्टम है। सिनेमा एक आर्ट है। सिनेमा में साहित्य एक छोटी सी चीज़ जिसे थीम कहा जा सकता है। नाटक भी ऐसे ही है। यह जो लिखा हुआ नाटक होता है भरत इसको नाटक नहीं मानते थे। उसे वह ‘काव्य’ कहते थे। उस काव्य का जब अभिनय के रूप में प्रस्तुतिकरण होगा तो वह ‘नाटक’ होगा। तब उसमें बहुत सारे परिवर्तन होते ही है। नाटक का अपना अलग व्याकरण है। सिनेमा का अपना अलग व्याकरण है। सिनेमा साहित्य का इस्तेमाल करता है। वह साहित्य को फिल्माता नहीं है। वह साहित्य को एक थीम के रूप में लेकर सिनेमा बनाने की कोशिश करता है। इसे हम नाइंसाफी नहीं कहेंगे। सिस्टम के भीतर जो आएगा उसे वे सिनेमा में लेते हैं। आज यूनिवर्सिटी में सिनेमा पर भी शोध हो रहे हैं क्योंकि मास मीडिया पर यूनिवर्सिटी में एक नया पेपर आया है। यही कारण है कि सिनेमा पर शोध हो रहे हैं। विद्यार्थियों को सिनेमा के बारे में कोई जानकारी नहीं है। जो है वह सीमित है। अतः शोध भी बहुत ज्यादा सार्थक नहीं हो पा रहे हैं।

रीता : ‘आपकी मर्जी’ कविता मजबूरी से भरी तीखी तीस पैदा करती है। यहाँ आप किस तरह के संबंध से पाठकों को आगाह कर रहे हैं? आप इस कविता द्वारा क्या प्रेषित करना चाहते हैं?

डॉ हूबनाथ : मेरी जानकारी में एक शख़्स थे जो बहुत ही भ्रष्ट थे। चूंकि वे बड़े पोस्ट पर थे तो हम उनका कुछ कर नहीं पाते थे। ऐसा कई बार होता है कि सिस्टम के अंदर गलत आदमी के साथ आपको रहना पड़ता है। काम करना पड़ता है। जिसका हम कुछ नहीं कर सकते। मैंने सोचा कम से कम उस पर कविता लिखी जा सकती है। तब मैंने उन पर यह कविता लिखी। फिर बहुत से ऐसे लोग मेरी जिंदगी में आए।

रीता : आपने तो कविता लिख दी। सारे लोग तो ऐसा नहीं कर पाते। तो ऐसे लोगों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जा सकता है ..... !! कैसे डील किया जाना चाहिए ..... !!



डॉ हूबनाथ : जहाँ तक मेरा सवाल है मैं एक सरकारी नौकरी में था। मेरा एक इंसान ने बहुत नुकसान किया। मेरा प्रमोशन नहीं होने दिया और जितनी रुकावटे वे ला सकते थे या लाना चाहते थे वे लाए, लाते रहे। चूंकि वे मेरे बॉस थे तो हम उनका कुछ कर नहीं सकते थे। बात उन्हीं की सुनी जाती थी। एक स्थिति ऐसी आई कि या तो मैं काम छोड़ दूँ या वें छोड़ दे। उसी समय मुझे किसी अन्य जगह नौकरी का अच्छा मौका मिला। दुर्भाग्य कि ... जैसे मैं वहाँ से निकला उनका भी तबादला हो गया। तब तक मैं काम छोड़ चुका था। नहीं तो मैं वापस चला जाता। जब मुझे पता चला था कि उन्हें मधुमेह की तकलीफ है। मैं उनका इलाज कराने एक बड़े डॉक्टर के पास ले गया। वहाँ उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं तुम्हारे साथ इतना बुरा करता रहता हूँ। तुम मुझसे इतना नफ़रत करते हो फिर भी तुम मुझे डॉक्टर के पास क्यों लेकर आए। मैंने कहा दुश्मन अगर ताकतवर रहे तो लड़ने का मज़ा आता है इसलिए मैं आपको यहाँ लाया। आप स्वस्थ रहो तो हम लड़ते रहेंगे। मतलब लड़ाई भी हो तो खुलकर। सामने वाले को पता हो कि मैं नफ़रत करता हूँ। उसे यह गलतफ़हमी ना हो कि मैं प्यार कर रहा हूँ और इज्जत कर रहा हूँ। सारी चीज़े एकदम साफ साफ हो तो उसमें समस्या नहीं होती है। समस्या तो तब होती है जब मैं समझूँ कि वो इज्जत कर रहा हूँ और मैं नफ़रत कर रहा हूँ। तब वह रिलेशन दोनों को परेशान करते हैं।

रीता : आपके विचार जिस तरह के भी हैं आपकी कविताओं में व्यक्त होते हैं, विद्यार्थियों के सामने हैं, इसमें आपके परिवार का क्या कुछ योगदान है......?

डॉ हूबनाथ : कोई योगदान नहीं है परिवार बिलकुल अलग और मैं बिलकुल अलग हूँ। परिवार से भी मेरी कभी बनी नहीं। 
रीता : आपका बेटा ..... !!!!

डॉ हूबनाथ : वो अपनी तरह से जीएं। मैं अपनी तरह से जीऊँ। मैं अपनी सोच उस पर नहीं लादता। वो लादने की कोशिश करता है। बच्चा है। धीरे धीरे ठीक हो जाएगा। हर एक को अपना जीवन अपनी तरह से जीने का अधिकार होना चाहिए ऐसा मुझे लगता है। सिर्फ़ यह देखना होता है कि उसके पास विवेक नहीं है और वह गलत रास्ते पर जा रहा है तो मुझे उसे सावधान करना है।

रीता : लोग कहते हैं मुझे गुरुजी अच्छे मिले आप कहते हो मुझे विद्यार्थी ..... !!

डॉ हूबनाथ : हाँ। मुझे विद्यार्थी बहुत अच्छे मिले और ज़्यादातर विद्यार्थियों से ही मैंने सीखा। मैंने कोई बी.एड. नहीं की। कोई ट्रेनिंग नहीं ली। मुझे विद्यार्थी ही संवारते रहे, सुधारते रहे और मैं सुधरता रहा या बिगड़ता रहा जो भी कहें .... ।

रीता : बहुत बहुत धन्यवाद सर, आपके बारे में कई नई बातों की जानकारी मिली। मैं समझती हूँ आपके इस साक्षात्कार को पढ़कर भी कई शिक्षित होंगे और कईयों का मार्गदर्शन होगा। कई बातें सीखने-समझने मिलेगी।




आप कहते हैं जिंदगी में आप भागते रहे जबकि चीज़े आपको संतुष्ट नहीं कर पाई और आप विमुख हो अन्य रास्ते निकल पड़ते रहे। चोरों से भी आपकी संगत हुई और गुरुजनों से भी। आज जिंदगी ने जिस स्थान पर आपकी भूमिका होना स्वीकारा है आप सहर्ष जूझ रहे हैं। हालात का मुक़ाबला कर रहे हैं। समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं। दूसरों के लिए जीने की आपकी कोशिश हमें भी कुछ अलग करने का अवसर सुझाती है। आप एक बहुत सहृदय व्यक्तित्व के धनी, मानवता के विचारों से ओत-प्रोत, विद्वान, उसूलों के लिए लड़ते, समाज में हो रहे गलत का विरोध करते, जन-कल्याण की भावना समेटे, समाज शास्त्री कहना गलत नहीं होगा, जिसका क्षेत्र विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को शिक्षित करना ही नहीं बल्कि जागरूक करना भी रहा है। साथ ही साथ आपने समाज में गरीबों की सेवा, मज़लूमों की सहायता और सहयोग करना भी अपना उद्देश्य बना रखा है। मैं रीता आपके इस इंसानियत और मानवता के लिए कुछ कर गुजरने के जज़्बे को नमन करती हूँ।
०००
समाप्त

साक्षात्कार की पहली कड़ी नीचे लिंक पर पढ़िए


https://bizooka2009.blogspot.com/2018/12/blog-post_28.html?m=1






रीता दास राम की कविताएं नीचे लिंक पर पढ़िए

समाज में नारी


https://bizooka2009.blogspot.com/2018/12/16.html?m=0

1 टिप्पणी:

  1. सीधी सी बात है कि आप चाहे जो हों मगर सबसे पहले आपमें मनुष्यता होनी चाहिए।

    बहुत अच्छा साक्षात्कार।

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