एक
रोती हुई बांसुरी
कोई बांसुरी रात में रोई थी
मेरा नाम लेकर हवा में खोई थी
कुएँ की मेंड़ पर बैठी मैं
हथेलियों पर चाँद उतार रही थी
पायल में बंधी पगडंडियाँ
मुझे अपने गाँव बुलाती थीं
जहाँ पीपल तले माँ बैठी होगी
चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही होगी
सूरज की किरणें अब भी मेरी देहरी चूमती हैं
पर अब घर में वो मिट्टी की गंध नहीं
मैं शहर में हूँ, शीशे के घरों में
जहाँ कोई बांसुरी रोती नहीं
०००
दो
शहर में एक पेड़ हूँ मैं
शहर में एक पेड़ हूँ मैं
जिसकी जड़ें ज़मीन खोज रही हैं
हर गली में पाँव पसारे
पर कोई मिट्टी मेरी नहीं
हवा आती है, पत्ते हिलते हैं
पर मेरी शाखों पर कोई घोंसला नहीं
किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर
मैं अपने ही साए से डरती हूँ
पर एक दिन
बारिश आएगी
और मेरी जड़ें अपनी मिट्टी पहचान लेंगी
०००
तीन
नदी और नाव
मैं नदी थी, वो नाव
वो बहता रहा, मैं ठहर गई
कभी-कभी मैं भी उफान में आई
पर नाव किनारों से बंधी थी
मैं उसे रोके रखना चाहती थी
पर मैं तो खुद भी बह रही थी
एक दिन नाव चली गई
और मैं वहीं की वहीं
अब मेरी लहरें भी थक गई हैं
शांत पड़ी हैं
अपने ही किनारे खोजती हुई
०००
चार
कमरे की परछाइयाँ
रात के आखिरी पहर
जब सब गहरी नींद में डूबे होते हैं
मैं अपनी परछाईं को पकड़ने की कोशिश करती हूँ
वो जो दीवारों पर चलती है
तकिए के किनारे बैठकर मुझसे सवाल पूछती है
आज वो पूछ रही थी—
क्या मैं उस खिड़की से बाहर कभी गई हूँ
जिसके शीशे पर रोज धूल की परत चढ़ती जाती है?
मैंने हँसकर कहा—
"नहीं, लेकिन बाहर की दुनिया अंदर आ गई है।"
कभी अख़बार में छपी स्याही बनकर
कभी अनजाने चेहरों की आवाज़ बनकर
०००
पाॅंच
घर के कोने
जिस घर में मैं रहती हूँ
उसके हर कोने में कुछ छिपा है
अलमारी में बंद पुराने ख़त
रसोई की दराज़ में टूटी चम्मच
दीवार के पीछे छुपे रंगों की परतें
और आँगन की मिट्टी में दबे अनगिनत क़दम
जब मैं अकेली होती हूँ
तो इन कोनों से बातें करती हूँ
वो सब कुछ बताते हैं
जो कभी किसी ने नहीं सुना
०००
छः
धूप में बैठी औरतें
गली के मोड़ पर
कई औरतें बैठती हैं
धूप सेंकने के बहाने
अपनी ज़िंदगी की कहानियाँ सुनाती हैं
एक कहती
"बेटा नौकरी पर चला गया
अब अकेलापन खा जाता है!"
दूसरी हँसकर कहती
"अरे, अकेलापन भी आदत बन जाता है!"
शायद उम्र के साथ
गर्म धूप ही सबसे बड़ी साथी होती है
०००
सात
अधूरी अलमारी
मेरी अलमारी आधी खुली रहती है
उसमें कुछ सलवारें हैं
एक पुरानी रेशमी साड़ी
और माँ का दिया हुआ दुपट्टा
अलमारी के एक कोने में
कुछ काग़ज़ पड़े हैं—
एक लिखी-अधूरी चिट्ठी
एक नौकरी का फॉर्म
एक बिना नाम की किताब
मैं रोज़ अलमारी खोलती हूँ
और सोचती हूँ,
कब ये काग़ज़ों का ढेर
जीवन का हिस्सा बनेगा
०००
सभी चित्र:- मुकेश बिजोले
परिचय
मध्य प्रदेश के जबलपुर से ताल्लुक रखने वाली कनकने राखी सुरेंद्र एक प्रतिष्ठित मीडिया प्रोफेशनल और सम्मानित लेखिका हैं। उनकी शैक्षणिक यात्रा जितनी अद्वितीय है, उतनी ही प्रेरणादायक भी—इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद जनसंचार के
क्षेत्र में कदम रखते हुए उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।राखी की लेखन शैली की सबसे बड़ी ताकत उसकी सहजता और भावनात्मक गहराई है, जिसने उन्हें कविता प्रेमियों के बीच खास स्थान दिलाया है। उनका पहला हिंदी कविता संग्रह 'तुम्हारी मेरी बातें', जो जनवरी 2018 में प्रकाशित हुआ और नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में लॉन्च किया गया, ने साहित्य जगत में उनकी प्रभावशाली शुरुआत को चिह्नित किया।
हिंदी कविता में अपनी सफलता के साथ ही, राखी ने अंग्रेजी साहित्य में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। उनकी तीन अंग्रेजी किताबों में दो लघु कथा संग्रह और एक कविता संग्रह शामिल हैं। जनवरी 2021 में प्रकाशित 'द लेमनेड' लघु कथा संग्रह को पाठकों से व्यापक सराहना मिली, जिसके बाद जनवरी 2022 में इसका दूसरा भाग '2nd सर्विंग ऑफ द लेमनेड' जारी हुआ। जुलाई 2022 में प्रकाशित उनका कविता संग्रह 'द सिटी स्पैरो एंड इट्स टेल्स' ने शहर के जीवन को गौरैया की आँखों से दर्शाते हुए उनकी लेखकीय विविधता को और मजबूत किया।
कनकने राखी सुरेंद्र की रचनाएँ नियमित रूप से कई प्रिंट और ऑनलाइन माध्यमों में प्रकाशित होती रहती हैं, और वह विभिन्न साहित्यिक मंचों की सक्रिय सदस्य हैं। उनके साहित्यिक योगदान को उज्जैन की मालवा रंग मंच समिति द्वारा ‘हिंदी सेवा सम्मान 2016’ से सम्मानित किया गया है।
अपने संवेदनशील लेखन और गहरे विचारों के साथ, कनकने राखी सुरेंद्र आज भी साहित्य प्रेमियों को प्रेरित और प्रभावित करती रहती हैं। उनका लेखन न केवल भावनाओं को छूता है बल्कि जीवन के प्रति एक नई दृष्टि भी प्रदान करता है।
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