अंकिता रासुरी की कविता का संसार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह निजी अनुभव को सामाजिक अनुभव से अलग नहीं करती। एक व्यक्ति का दुख धीरे-धीरे समाज का दुख बन जाता है और एक स्त्री की निजी पीड़ा व्यापक स्त्री अनुभव की आवाज में बदल जाती है। यही वह बिंदु है जहाँ उनकी कविताएँ केवल प्रेम कविताएँ नहीं रह जातीं, बल्कि अपने समय, समाज और मनुष्य की संवेदनशील पड़ताल करने लगती हैं।
इन कविताओं को पढ़ते हुए महसूस होता है कि प्रेम वास्तव में एक बहुत जटिल मानवीय अनुभव है। इसमें मिलना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही बिछड़ना भी, साथ होना जितना जरूरी है, उतना ही अपने भीतर लौटना भी! अंकिता की कविताएँ इसी जटिलता को बिना किसी बनावटी निष्कर्ष के हमारे सामने रखती हैं। ‘फ़ोल्डर में तुम’ में प्रेम मोबाइल और लैपटॉप के एक फ़ोल्डर में बची तस्वीरों तक सिमट जाता है। तीन साल बीत जाते हैं, तस्वीरें वहीं रहती हैं, लेकिन आदमी बदल जाता है। आज के डिजिटल समय में इससे अधिक सटीक अकेलेपन की तस्वीर शायद मुश्किल है। हमारे पास लोगों की हजारों तस्वीरें हैं, लेकिन उनके साथ बिताने के लिए समय नहीं। अंकिता के लेखन की यही खासियत है जो वह देखती है वही लिखती हैं। कोई रूमानी बिम्ब नहीं गढ़ती जैसे उनकी कविता ‘सच’ की पंक्तियाँ प्रेम को देह और आत्मा से आगे ले जाकर साथ होने की आकांक्षा बनाती हैं। वहीं ‘कुछ प्रेम’ का यह स्वीकार कि कुछ प्रेम कविता हो जाते हैं और कुछ पूरा जीवन, प्रेम की अधूरी कहानियों को एक व्यापक मानवीय अर्थ देता है। हर प्रेम विवाह या साथ रहने तक नहीं पहुँचता, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वह प्रेम कम सच्चा था। इस संग्रह की संवेदना केवल प्रेम-विरह तक सीमित नहीं है। ‘आसिफ़ा’ कविता अचानक पाठक को उस निर्मम वास्तविकता के सामने खड़ा कर देती है जहाँ एक बच्ची की मौत भी कुछ समय बाद ‘न्यूज़ वैल्यू’ बनकर रह जाती है। कविता का सबसे कचोटने वाला सवाल यही है कि हम कितनी जल्दी दुख को खबर और खबर को अगली खबर में बदल देते हैं। आसिफ़ा की मृत्यु पर लिखी कविता इसलिए केवल शोकगीत नहीं रह जाती, वह हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर आरोप-पत्र बन जाती है।
इसी तरह ‘माँ की हार’ शायद इन कविताओं की सबसे मार्मिक रचनाओं में से एक है। माँ घटते बढ़ते चांद को देख देखकर गोल-गोल रोटियाँ बनाना भूल जाती है। इस कविता में ऐसी स्वप्नदर्शी मां का चित्रण है जो समाज द्वारा तय किए गए ‘माँ’ के तय पैमानों में फिट नहीं बैठती और इसलिए उसे ताउम्र तकलीफों से जूझना पड़ता है। अंततः कवि कहता है यह केवल एक माँ की हार नहीं, पूरी इंसानी सभ्यता की हार है। यही पंक्ति कविता को निजी अनुभव से निकालकर सामाजिक प्रश्न बना देती है। आज जब हम स्त्री-सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, तब घर की रसोई में चुपचाप अपने सपनों को जलाती हुई कितनी स्त्रियाँ अब भी हमारे आसपास हैं यह कविता हमें उसी असुविधाजनक सच के सामने खड़ा करती है।
‘मेरा माँ होना’ कविता एक स्त्री के अपने शरीर और निर्णय पर अधिकार की बात करता है। यहाँ मातृत्व को किसी अनिवार्य सामाजिक भूमिका के रूप में स्वीकार नहीं किया गया, बल्कि स्त्री की इच्छा और स्वायत्तता के प्रश्न के रूप में देखा गया है। यह कविता आज के समय में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है, जब स्त्री के शरीर और उसकी पसंद पर समाज अब भी अपना अधिकार समझता है। ‘रीतापन’ और ‘बस मैं हूँ, घूमती हुई पृथ्वी पर बिल्कुल अकेली’ जैसी कविताएँ आधुनिक मनुष्य के उस खालीपन को पकड़ती हैं, जिसे भीड़ भी भर नहीं पाती। ऑफिस, शहर, मकान, रिश्ते और रोजमर्रा की व्यस्तता के बीच आदमी धीरे-धीरे अपने भीतर से खाली बल्कि यह कहा जाए की वह बिल्कुल खाली होता जाता है। यह अकेलापन सिर्फ प्रेमी के न होने का अकेलापन नहीं, बल्कि अपने ही जीवन से दूर हो जाने का अकेलापन है।
और ‘एक रूम पार्टनर की तलाश’ में स्त्री-पुरुष के रिश्तों का एक नया रूप दिखाई देता है, जहाँ स्त्री ऐसे रूम-पार्टनर की तलाश करती है जो भले ही लड़का हो, लेकिन उसका प्रेमी होना जरूरी नहीं है। शहरों में किराये के कमरों और अनाम रिश्तों के बीच यह कविता हमारे समय की बदलती सामाजिक संरचना को बहुत सहजता से पकड़ती है। इन कविताओं में एक और चीज लगातार दिखाई देती है अतीत और वर्तमान का संघर्ष। खेत, चाँद, पेड़, गाँव, माँ के हाथ की रोटी और बचपन की स्मृतियाँ एक तरफ हैं; दूसरी तरफ ऑफिस, न्यूज़, मोबाइल, फोल्डर और महानगरीय अकेलापन। जैसे कवि अपने भीतर दो दुनियाओं को साथ लेकर चलता है और दोनों के बीच लगातार कुछ टूटता रहता है। यही इस संग्रह का भावनात्मक संसार है। टूटना, याद करना, सवाल करना और फिर भी प्रेम को बचाए रखना। इन कविताओं को पढ़कर लगता है कि अधूरा प्रेम वास्तव में अधूरा नहीं होता। वह हमारे भीतर किसी स्मृति, किसी तस्वीर, किसी माँ की रोटी, किसी बच्ची की चीख, किसी खाली कमरे या किसी अनकहे वाक्य की तरह जीवित रहता है। ‘अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया’ इसलिए सिर्फ प्रेम कविताओं का संग्रह नहीं लगता; यह उस समय की डायरी है जिसमें हम प्रेम करते हुए भी अकेले हैं, साथ रहते हुए भी दूर हैं, खबरों के बीच रहते हुए भी संवेदनहीन हो रहे हैं और आधुनिक होने के बावजूद अपनी सबसे पुरानी मानवीय जरूरत, किसी के साथ सचमुच होने की तलाश में हैं। शायद सभी कविताओं की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इन्हें पढ़ते हुए हम कवि को नहीं, कहीं न कहीं खुद को पढ़ने लगते हैं।
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(सहायक प्रोफेसर, समाज कार्य विभाग, श्री रावतपुरा सरकार विश्वविद्यालय रायपुर)
पुस्तक: अधूरे प्रेम की पूरी दुनिया
विधा: कविता-संग्रह
लेखक: अंकिता रासुरी
प्रकाशक: साहित्य अकादेमी
मूल्य: ₹150
डॉ. नरेश गौतम


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