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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
सतीश कुमार सिंह की कविताएँ
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कविताएँ


मरूंगा मैं
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नहीं मरूंगा मैं
कि जब तक मेरे भीतर
संचित हैं सुविचार
अच्छे संस्कार
और माँ की प्रार्थनाओं में
शामिल है
मेरे भविष्य की चिंता
नहीं मरूंगा मैं

नहीं मरूंगा मैं
कि जब तक
कार्तिक पूर्णिमा व्रत के साथ
नदी में प्रवाहित दीप
झिलमिलाते रहेंगे
पढ़ी जाती रहेंगी
तुलसी के चौरे के पास
रामायण की चौपाइयां
नहीं मरूंगा मैं

नहीं मरूंगा मैं
कि जब तक
सोये हुए शिशु की मुस्कान
याद आती रहेंगी मुझे
सफर के दौरान
और सूने पलों की संवेदना में
बसी होगी
उसके मुँह से आने वाली
माँ के कच्चे दूध की महक
नहीं मरूंगा मैं

नहीं मरूंगा मैं
मरने की तमाम संभावनाओं के बावजूद भी
नहीं मरूंगा मैं
कि जब तक
तुम्हारी स्मृतियों में रहूंगा सहेजा हुआ
जीती जागती शक्ल में
देखना मरकर भी
नहीं मरूंगा मैं





मेरे पास 
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उनके पास
न जाने कितने हाथ हैं
देने को आशीष
मंत्रपूत जल भी हैं
जिसे छिड़कते
किसी अलग लोक का
वे वितान रचते

मुझ अदने से कवि के पास है
मेरी दो बाँहें
तुम्हें अँकवार में भर भेंटने को
मेरे प्रिय

आँखों में है
तुम्हारी प्रतीक्षा में
भरते झरते अश्रु कण

इस जीवंत अस्तित्व को
तुमसे ही साझा कर
होना है मुझे मुक्त

तुम भी आओ
बांहें फैलाओ
एक दूजे के बंधन में
मुक्ति को वरें
कुछ इस तरह जिएं
कुछ इस तरह मरें









गमकती सांझ
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झींगुरों की आवाज
हल्की धुंध के साये
और गमकती सांझ के बीच
खड़ा हूँ खेत की मेड़ पर

चारों ओर लहकते
धान के हरियर पौधे
दूध उतरती बालियों की महक
बचे खुचे पानी में
पढ़िना मछली की खलबली
घिरा हूँ इनसे
अपनी साँसों में
घूँट घूँट उतरते महसूसते
इस गमकती सांझ में

दूर से आती ट्रेन की सीटी
तोड़ देती है तंद्रा
लौटता हूँ मैं
भीतर से भरा भरा
तेज कदमों से ताजादम
एक खुमारी लिए
अपनों के बीच
इस गमकती सांझ में ।





डर
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उसने मुझे गाली दी
मैं चुप रहा
एक पड़ोसी ने
मेरे एक आगंतुक मित्र को
पूछने पर
मेरे घर का पता नहीं बताया
मैं फिर भी चुप रहा

मैं जानता हूँ
वे मेरी चुप्पी से डरते हैं
इसलिए ऐसा करते हैं







कौन कितनी बार मरा है
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ख्वाहिशों के जंगल में
परिवर्तन की आस लिए
कौन कितनी बार मरा है
मौत यह बात
अच्छी तरह जानती है

सबसे पहले मरा वह
जिसने आग , पानी , हवा
और धरती ,अंबर के रहस्य को
जानना चाहा तो
उसके विचारों पर
बहुत से लोगों ने जड़ा ताला

मरा वह भी कई कई बार
जिसने सत्य और प्रेम को
ईश्वर कहा
दफनाए या जलाए जाने से पहले
कितनी बार मरा वह भी
जो सहमत नहीं था
इस बात से
कि कुछ भी नहीं
बदल सकता वह
न ले सकता है
ऐसा कोई फैसला
कि धरती ही बन जाए स्वर्ग

अब भी मरता है आदमी
जब इंसानी हक और
नैसर्गिक इच्छाओं की
पूर्ति के लिए
पुरजोर मांग रखते हुए
सवाल खड़े करता है
तो तिलमिलाता है हुक्मरान

लेकिन यह भी सच है
कि धर्म, समाज, सत्ता
की नजरों में
आज वे ही जिंदा हैं
भोगा है जिन्होंने
बार बार मरने का दुख




चूल्हा 
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माँ की स्मृतियों के साथ ही
अब भी बनी हुई है
गोबर से लिपे हुए मिट्टी के
तिकोने चूल्हे की याद

याद आती है माँ अक्सर
चूल्हा-चौका,चिमटा,बरतन से
घिरी हुई
जलती-बुझती लकड़ी को
चूल्हे से भीतर बाहर करती
अंगारों पर रखी
बटलोई की दाल पर
बीच बीच में डुआ चलाती

घर भर की भूख पर
सुबह-शाम दोपहर
अपनी धीमी आंच और
हल्के धुंएँ से
सोंधी गंध उगाने वाला चूल्हा
गुजरे वक्त की अंतर्कथा है

गांव गांव घर की रसोई में
अब राज है गैस चूल्हे का
अब आंगन के किसी कोने में
रसोई से बेदखल यह
मिट्टी का चूल्हा
घर आए मेहमानों को
ताकता है टुकुर टुकुर

ठंड के दिनों में
चना चबेना भुनने के वास्ते
हो जाता है उपयोग उसका
इस बीच बूढ़ी दादी भी
गरम कर लेती है
अपना सरसों तेल
गठिया वात से
निजात पाने को

कोई नहीं जानता
दादी के सिवा
चूल्हे के दिन रात खँटने
कुनबों में बँटने
और लगातार सिमटने का दर्द



चश्मा 
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बचपन में दादी के चश्में को
चुपके से लगाकर देखते थे
बड़ी ऊबड़ खाबड़
नजर आती थी तब जमीन

पहनकर चलना तो
भारी मुश्किल था
कई बार गिरा इस चक्कर में
मगर उम्र के साथ समझ आया
सही था दादी का चश्मा
इसने सम्हलना सिखा दिया

सबके पास होता है
चश्मों का ढेर
जाति का चश्मा
मजहब का चश्मा
भाषा और वर्ग का चश्मा
विचारधारा में लिपटे
कई तरह के पूर्वाग्रहों के
रंगीन शीशे वाला चश्मा
जिससे हम देखते समझते हैं
दुनिया और दुनियादारी को

मैं इन चश्मों को
तोड़ना चाहता हूँ
ताकि अंधे समय को
ठीक ठीक सुझाई दे
और धरती की
हरियाली में दिखे
सृजन के ताप से
दिपदिपाता सूरज का
भरा पूरा चेहरा









मनिहारिन

इधर बहुत दिनों से
नहीं दिखी वह
वह यानि
बेलकरहिन मनिहारिन

उसकी चूड़ियों ने
कई सुहागिनों की
मन्नतें पूरी कीं
पर खुद चैन से
कहाँ रह पाई

घाघरा कुर्ता
मुँह पर तरह तरह के मेकअप
पान चबाने की
उसकी अनोखी अदा
खींच लेती
राह चलने वालों को

उसकी हाँक को
मेरे कस्बेनुमा शहर की
हर गली पहचानती है
सुहागिन स्त्रियां ,
कुंवारी लड़कियां ,
कुछ मनचले भी

चूड़ियां पहनाते
सबसे लाड़ लगाती वह
जाने क्या है उसके अपनापे में
कि स्त्रियां उसे
अपना गोपन दुखड़ा सुनातीं
और वह सबको
वशीकरण का नुस्खा बताती
इसलिए तो भाव-ताव
नहीं करतीं उससे
मेरे मुहल्ले की स्त्रियां

इधर कुछ दिनों से
नहीं दिखी वह
मेरा मुहल्ला उदास है




भात
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भूख के मनोविज्ञान का
एक जरूरी पाठ है
भात

बाऊग ब्यासी,निराई गुड़ाई
से लेकर
क्वांर की पकी धूप में
बालियों के भीतर
दूध के पोठाने
खलिहान आते , मिंजाते
कई शक्लें बदलते धान की अन्न बनने की प्रक्रिया
कम नहीं
किसी संघर्ष गाथा से

छानी से उठते धुएं में
दर्ज है उसकी दास्तान
खदबदाते अदहन
और सुलगती
अँतड़ियों के बीच
उसकी महक से खुल जाती है
घर भर की भूख

सबके चूल्हों पर चढ़कर
समिधा के साथ
भोजन यज्ञ में
स्वाहा का उद्घोष
बन जाता है भात
जिसकी उर्जा और ताप से
होता है नवजीवन का संचार



ताला
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जिसने भी बनाया इसे
सपने भी नहीं सोचा होगा
कि इतना
विश्वसनीय हो जाएगा ताला
कि चाभी घुमाकर
ले सकते हैं इत्मीनान से
भरपूर नींद

अलीगढ़ को मैं जानता हूँ
गीत ऋषि नीरज के नाम से
पर मेरे शहर का
सुखराम कसेर
अलीगढ़ को जानता है
ताला के नाम से
कहता है
अलीगढ़ का ताला है बाबू
एक बार इस्तेमाल करके देखो

जेल का ताला
दुकान का ताला
मकान का ताला
भंडारगृह का ताला
सबकी अलग अलग चाबी
पर भरोसा एक सा

शोषण के खिलाफ
जब फूटता है गुस्सा
तब इंकलाब लाने
साथ हो लेता है ताला
मेहनतकश मजदूरों के

जड़ा जाता है जब
कारखानों , दफ्तरों में
फूले गालों वाले चेहरे तब
सहमकर लटक जाते
ताले की तरह

अवाम की जुबान पर
ताला लगाना
चीख चीखकर इसे
जायज बताना
बहुत महंगा पड़ता है
हुक्मरान को
जनता खोलती है इस ताले को
क्रांति की बंधी मुट्ठियों वाली
चाबी से
००

सतीश कुमार सिंह को वर्ष २०१७ का 'सूत्र सम्मान' प्रदान किए जाने की घोषणा हुई है। कवि को सूत्र सम्मान के लिए बिजूका समूह की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं। बधाई। सूत्र सम्मान की विस्तृत जानकारी आमंत्रण पत्र में पढ़ी जा सकती है।

परिचय 

 सतीश कुमार सिंह 

जन्म - 5 जून सन 1971 को जांजगीर चांपा जिले के ग्राम ठठारी में ।

शिक्षा - एम .ए ( हिंदी साहित्य )

लेखन - गीत , गजल , समकालीन कविता , साॅनेट , सामयिक विचार लेख ।

पुरस्कार एवं सम्मान - भोरमदेव साहित्य सम्मान,  (1992 ) बैरिस्टर ठाकुर छेदीलाल साहित्य सम्मान  (2005 ) प्रतिष्ठित साहित्य संस्था वर्तिका जबलपुर द्वारा मंच मणि अलंकरण  (2012 ) से विभूषित । जिला प्रशासन द्वारा गणतंत्र दिवस के अवसर पर साहित्यरत्न पुरस्कार ।
कई विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित ।

प्रकाशन - वागर्थ,  गीत गागर , अतएव , वर्तमान साहित्य, अक्षरा , सूत्र , साम्य , वसुधा , शब्द कारखाना आदि प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में । 
सुन रहा हूँ इस वक्त •• काव्य संग्रह शीघ्र प्रकाश्य । आकाशवाणी  रायपुर ,बिलासपुर , भोपाल,  बालाघाट केंद्रों से कविताओं का प्रसारण ।

संप्रति - शासकीय बहुउद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय जांजगीर क्रमांक 2 में अध्यापन ।

संपर्क - पुराना कालेज के पीछे 
( बाजारपारा ) जांजगीर 

जिला - जांजगीर चाम्पा ( छत्तीसगढ़ ) 495668