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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

14 फ़रवरी, 2019


दिमाग़ का चैनल और प्रेम पर बहस

शरद कोकास

‘प्रेम में दरअसल होता क्या है ?’ अक्सर इस मौसम में खुली खिड़की से आनेवाली बसंती हवाओं की भांति यह प्रश्न मेरे दिमाग में प्रवेश कर जाता है । इस प्रश्न के उपस्थित होते ही मेरे भीतर रहने वाले कई लोग मुझे स्प्लिट पेर्सोनिलिटी के ख़तरे की ओर धकेलते हुए भी अचानक सक्रिय हो जाते हैं और टीवी चैनल पर होने वाली बहस की तरह इस बहस में शामिल हो जाते हैं ।







सबसे पहले मेरे भीतर का कवि कहता है ..प्रेम क्या है ? प्रेम तो दरअसल  प्रेम में जीना है , प्रेम करते हो तो उसे भरपूर जियो और प्रेम कविताएँ लिखो । प्रेम और करुणा की कविताएँ लिखना भी प्रेम करने की तरह होता है । जाने कितने कवि हैं जिन्होंने जीवन भर प्रेम नहीं किया लेकिन प्रेम कविताएँ लिखते रहे । उन्होंने पत्नी के लिए प्रेम कविताएँ लिखीं किसी अनजान प्रेमिका के लिए कविताएँ लिखीं और इस तरह जीवन भर प्रेम में रहे ।

मेरे भीतर एक विद्रोही भी छुपा बैठा है जो कहता है ...वस्तुतः प्रेम विद्रोह का ही दूसरा नाम है । सामाजिक क्रांति भी एक तरह का प्रेम है सो क्रांति करो और क्रांति के गीत लिखो, वह किसी भी तरह के मानवीय प्रेम से ज़्यादा ज़रूरी है  । विद्रोही जी की बात सुनकर मैं जीवन यदु का गीत गुनगुनाने लगता हूँ " पहले गीत लिखूंगा रोटी पर फिर लिखूंगा तेरी चोटी पर"  विद्रोही भी मेरे साथ गुनगुनाता है  " जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा भारी पत्थर , कोई मत ख़्वाब सजाना तुम , मेरी गली में ख़ुशी खोजने अगर कभी जो आना तुम "

और यहीं कहीं प्रेम और विद्रोह के शायर फैज़ साहब भी सर पर सवार हो जाते हैं .." मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा " फिर मुझे पाब्लो नेरुदा भी याद आते हैं ।

अब कहीं मेरे भीतर का पुरातत्ववेत्ता भी चुप बैठ सकता है । वह संवाद की कुदाल उठाकर उत्खनन की मुद्रा में उठता है और कहता है प्रेम को तलाशना है तो मन की परतों में लैला मजनू , शीरी फरहाद , रोमियो जूलियट , सस्सी पुन्नू , अमि गुजर,  की प्रेम कथाएँ तलाश करो । इसलिए कि प्रेम तो वही है जो इन्होने किया था, भले ही वह किस्सों में हो या किंवदंतियों में । उसकी बात सुनकर मुझे मीरा याद आती है , राधा-कृष्ण याद आते हैं , काली भी याद आती हैं और प्रेम को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करने वाले शिव भी याद आते हैं । फिर मिथकीय साहित्य में  पुरुरवा -उर्वशी याद आते हैं और उदयन वासवदत्ता भी , फिर दुष्यंत और शकुंतला भी याद आते हैं सोचता हूँ कि जो इन्होने किया था क्या वही प्रेम था ।

इन सबकी बातें सुनकर मेरे भीतर बैठा वैज्ञानिक कहता है ..यह सब प्रेम है ज़रूर लेकिन वास्तव में प्रेम क्या है कुछ नहीं ...बस डोपामाइन , नोरेपाइन और सेरोटोनिन रसायनों का उतार चढ़ाव है । प्रेम में दिखाई देने वाले सारे लक्षण इन्हीं के कारण दिखाई देते हैं जैसे प्यार में भूख न लगना , नींद न आना , रात दिन सोचते रहना आदि । इन्हीं के कारण प्रेमी कभी कभी मूर्खता की सीमा तक  दुस्साहस  कर जाने का काम  कर बैठता है ।

लेकिन मेरे भीतर एक स्त्री भी है जो अपने साथी से नज़दीकियाँ और  प्रेम की दीवानगी का सबब समझती है । वह प्रेम की सार्थकता का अर्थ पूरी होने वाली अपेक्षा समझती है और रूहानी प्रेम और शारीरिक कामना में फ़र्क महसूस करती है । वह प्रेम और देह को अलग अलग मानती है । यहीं उससे पुरुष बहस करता है और कहता है कि ..माना कि प्रेम केवल एक कल्पना है जो दृश्यों  को देखकर भी उपज सकता है । मगर प्रेम में देह कैसे अनुपस्थित रह सकती है ,उसका होना सबसे ज़रूरी है ।

एक चित्रकार भी है मेरे भीतर जो अक्सर खामोश रहता है । इन सबकी बातें सुनकर वह कहता है ..प्रेम दरअसल सिर्फ रंग और रेखाओं का खेल है , भावनाओं और संवेदनाओं का एक ऐसा क्राफ्ट है जिसे हम मन ही मन बुनते हैं और उसमें खुशियों और अपेक्षाओं के रंग भरते हैं । यह एक ऐसा चित्र है जो अमूर्त होता है ,इसे हम कभी भी मूर्त रूप में नहीं देख सकते ।

अचानक वहीं कहीं मेरे भीतर का मार्क्सवादी चीखता है " प्रेम तो एक भौतिक अवधारणा है वत्स , यह देह सिर्फ पदार्थ है और चेतना ही प्रेम है । प्रेम में आलम्बन होना आवश्यक है और केवल वायवीय प्रेम कोई मायने नहीं रखता । जब तक मनुष्य की भौतिक आवश्यकताएँ पूर्ण नहीं होंगी प्रेम उपज ही नहीं सकता ।"

फिर कवि उससे पूछता है ..अगर ऐसा है तो फिर रूहानी प्रेम क्या है ? उसकी बात का जवाब वैज्ञानिक देता है .. रूह पर नाइट्रिक ऑक्साइड कोई काम नहीं करता भाई । वैसे भी रूह नाम की कोई चीज़ नहीं होती । रसायनों का असर सिर्फ दिमाग़ पर होता है, यही रसायन आपको प्रेम के लिए उकसाता है । एंड फॉर योर काइंड इन्फार्मेशन, यही आपके ‘वायग्रा’ में भी होता है । और हाँ,  प्रेम भी हर समय एक जैसा नहीं होता । इसमें भी तीन स्टेज होती हैं । पहली स्टेज में  जैसे जब हम किसी को देखते हैं तो सर्वप्रथम सामाजिक, दैहिक और मानसिक रूप से उसे उस कल्पना के अनुरूप पाते हैं जो हमारे चेतन अथवा अवचेतन मस्तिष्क में हमारे साथी को लेकर होती है ।

इतने में मेरे भीतर का गायक कहता है ..रुको रुको..तुम्हारी बात सुनकर मुझे वह गीत याद आ रहा है ... “ चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था ..हाँ तुम बिलकुल वैसी हो जैसा मैंने सोचा था .. “  और वह जगजीत सिंह की गई हुई ग़ज़ल गुनगुनाने लगता है  ..मेरे जैसे बन जाओगे जब इश्क़ तुम्हे हो जाएगा ।

वैज्ञानिक को उस गायक की अगम्भीरता अच्छी नहीं लगती । वह उस गायक को चुप करा देता है ... देखो ,जब भी हम प्रेम करने के बारे में सोचते हैं , या किसी को देखकर प्रेम करने की इच्छा होती है तो हमारे मस्तिष्क में  टेस्टोस्टरोंन और आस्ट्रोजन नामक हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं । दूसरी स्टेज वह होती है जब हम उस स्त्री या पुरुष के  प्रति विशेष आकर्षण महसूस करने लगते हैं । इस दौर में मस्तिष्क के तीन न्यूरोट्रांसमीटरों की सक्रिय भूमिका है एड्रेनालिन, डोपामाइन तथा सेरोटोनिन । जब हम अपने साथी के निकट होते हैं तब हमारे भीतर महत्वपूर्ण मानसिक बदलाव होते हैं जैसे चेहरे की लालिमा का बढ़ जाना और नसों में रक्त संचार का बढ़ जाना । और मज़े की बात यह कि प्रेमी अगर सामने न भी हो और उसकी उपस्थिति का भान या आभास  हो या स्मृति हो तब भी यह हार्मोन सक्रिय हो जाते हैं ।

एक फेसबुक और व्हाट्स एप प्रेमी भी है मेरे भीतर जो तुरंत पूछता है.... मतलब यह कि  सोशल मीडिया पर चैट से उपजने वाले आभासी प्रेम में यही होता है । न देखा, न सुना फिर भी प्रेम हो जाता है , लेकिन क्या प्रेमी से फोन पर बातें करते समय भी यह न्यूरो ट्रांसमीटर सक्रिय रहते हैं ? कई बार देखा है कि नेटवर्क चले जाने पर भी प्रेमी प्रेमिका आपस में बात करते रहते हैं । जय हो ।

वैज्ञानिक कहता है ..बिलकुल ...प्रेम की इस स्थिति में प्रेमी या प्रेमिका का नाम सुनकर ही आनंद महसूस होने लगता है । आप कवि लोग कहते हैं कि ‘दिल बल्लियों उछलने लगा है’ , या ‘दिल में लड्डू फूटने लगे हैं ।‘ प्रेम में  यह अवश्य होता है कि हमारे दिल की धड़कन बढ़ जाती है जिसका सम्बन्ध आपके रक्त प्रवाह से होता है । यह विचार आपकी सोचने समझने की शक्ति पर कब्जा जमा लेता है । फिर आप को कोई कुछ भी कहे ,कोई भी रोके आप पर उसका कोई असर नहीं पड़ता ।

गायक महोदय यह सुनकर खुश हो जाते हैं .. और फिर प्रेमी प्रेमिका गाने लगते हैं ..अब चाहे माँ रूठे या बाबा यारा मैंने तो हाँ कर ली , अब चाहे लग जाए हथकड़ियाँ मैंने तेरी बाँह पकड़ ली ..

अब इतिहासकार की बारी है वह कहता है ..अब समझ में आया ,इसीलिए  सोहनी महिवाल से मिलने के लिए  कच्चा घड़ा लेकर उफनती नदी में कूद जाती है , मजनू लैला की खातिर पत्थरों से कुचले जाने के लिए  भी तैयार हो जाता है । अनारकली सलीम के प्रेम में दीवानी होकर दीवार में जिंदा चुना जाना कबूल करती है , मीरा इस रूहानी प्रेम की ख़ातिर राणा का भेजा हुआ विष का प्याला भी  पी लेती है और उर्वशी एक अप्सरा से साधारण मानवी बनकर पृथ्वी पर रहना स्वीकार कर लेती है  । यही तो इश्क़ है जिसमे प्रेमी जन एक दूसरे की खातिर जान देने के लिए  तैयार हो जाते हैं । ग़ालिब साहब ने कहा भी है .. “ यह इश्क नहीं आसां इतना तो समझ लीजे , इक आग का दरिया है और डूब के जाना है ।

वैज्ञानिक बुरा सा मुँह बनाकर कहता है .. दरिया वरिया कुछ नहीं ..बताया तो यह सब हार्मोन की उथल पुथल की वज़ह से होता है ।

कवि झुंझला कर वैज्ञानिक महोदय से पूछता है ....भाई और कुछ भी साइंस बचा रहता है क्या इसके बाद प्रेम में ? वैज्ञानिक कहता है ..बिलकुल, प्रेम जब तीसरी स्टेज तक आता है तब धीरे धीरे प्रेम में लोगों के सोचने का तरीका बदलता है । प्रेम की तीसरी स्टेज में सामीप्य और गहरा अटेचमेंट उन्हें परिपक्वता और स्थायित्व की ओर ले जाता है । यहाँ तीव्र उतेजना के दौरान रिलीज होने वाले हारमोन ऑक्सीटॉक्सिन की भूमिका होती है । याद रहे यही हारमोन माता और बच्चे के बीच प्रेम बढ़ने के लिए  भी उत्तरदायी  है । यहाँ एक हारमोन की विशेष भूमिका होती है  जिसे वासोप्रेसिन  कहते हैं । यह सामान्यतः यौन संसर्ग के बाद रिलीज़ होता है । इसे एंटी-यूरिन हारमोन भी कहते हैं । महिलाओं में इस हारमोन की उपस्थिति  उन्हें अपने साथी के साथ यौन संबंधों की ओर आकर्षित करती है ।

कवि लपक कर कहता है ..बस भाई हो गया .. समझ गए कि प्रेम क्या है । प्रेम में भले ही रसायनों के कारण दीवानगी बढ़ जाये, प्रेम का प्रभाव या परिणाम जो भी हो  लेकिन यह बात सच है कि प्रेम उसे निरंतर अच्छा इन्सान बनाता है ।

इस बीच मेरे भीतर बैठा एक सिनेमा प्रेमी खुश हो जाता है .. बिलकुल सही बात कही आपने । प्रेम के परिणामों के बारे में सोचते हुए मुझे अक्सर फिल्म “ प्यार तो होना ही था “ का वह अंतिम दृश्य याद आता है जिसमे ओम पुरी  साहब प्रेमियों को रिहा करते हुए कहते हैं .... “ इन्सान को ज़िन्दगी में एक बार प्यार  ज़रूर करना चाहिए .. प्यार इन्सान को बहुत अच्छा बना देता है  । गायक उसका साथ देता है और कहता है ..हाँ ... उसके बाद रेमो फर्नांडीज़ और जसपिंदर नरूला की आवाज़ में .. यह गीत बजता है ...तू रु तू तू रु तू .... प्यार तो होना ही था ...।

मैं चुपचाप तमाम लोगों की बात सुनता हूँ और उदास हो जाता हूँ ।अब सब मिलकर मुझे समझाने लगते हैं ..तो भाई शरद कोकास , इस तरह प्रेम सिर्फ दिल दा मामला नहीं है बल्कि दिमाग से इसका अच्छा ख़ासा सम्बन्ध है । अगर आप किसी को दिल दें तो सिर्फ यह न कहें कि मैंने तुझे दिल दे दिया बल्कि यह भी कहें कि मैंने तुझे अपना दिमाग भी दे दिया है ,फिर भले ही वह आपको पागल समझे । हालाँकि यह वैज्ञानिक महोदय कहते हैं कि  प्रेम करते हुए न आप किसी को अपना दिल देते हैं न दिमाग , वह तो आपके ही पास रहता है , आपकी अंतिम साँस तक । लेकिन यह सब बातें छोडिये..इतना सोचेंगे तो प्रेम नहीं कर पाएंगे, सो  बिना दिल या दिमाग़ का ख्याल किये प्रेम करते रहिये ..और गाते रहिये ..किशोर कुमार का गाया वह मस्त गीत ... प्यार बांटते चलो ..प्यार बांटते चलो ..क्या हिन्दू क्या मुसलमाँ ..हम सब हैं भाई भाई ..।

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