image

सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
विमर्श लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विमर्श लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

20 जुलाई, 2015

बीजलेख : आंच से कहीं अधिक : निरंजन श्रोत्रिय

आंच से कहीं अधिक

इन दिनों पूरे देश में व्यापमं चर्चा में छाया हुआ है। चर्चा से अधिक वह हम मध्यप्रदेश वासियों की शर्म की वजह भी है। यूँ तो यह देश घोटालों का देश ही हो गया है और कोई भी घोटाला अब हमें उस तरह से व्यथित नहीं करता क्योंकि अब हम इन घोटालों के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं, कम-से-कम संवेदनों के स्तर पर तो।

बात भले ही घिसी हुई है लेकिन प्रासंगिक कि जब कोई गलत व्यक्ति डॉक्टर या इंजीनियर बन जाये तो कुछ चीजें प्रभावित होंगी लेकिन यदि कोई गलत / अयोग्य व्यक्ति शिक्षक बन जाये तो पीढियां बर्बाद हो जाएँगी। इसी तरह कोई भी घोटाला जिससे देश की अर्थव्यवस्था इत्यादि प्रभावित होती हो, व्यापमं घोटाले से compare नहीं किया जा सकता क्योंकि इस घोटाले से लाखों मासूम, युवाओं का मोहभंग हुआ है। बल्कि एक साफ़-सुथरी और विश्वसनीय मानी जाने वाली व्यवस्था से भरोसा उठ गया है। यह हमारे लोकतंत्र के लिए अत्यंत घातक है। हम जानते हैं कि तमाम घोटालों के बावज़ूद संघ लोक सेवा आयोग अभी तक एक विश्वसनीय संस्था रही है जिसके द्वारा पूरे देश की नौकरशाही बल्कि अन्य महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ होती हैं। अब यदि ऐसी संस्था भी किसी कारण से संदेह के घेरे में आ जाये (जो कि कोई मुश्किल बात नहीं) तो क्या देश की जनता का एक सिस्टम (वो कैसा भी हो ) से भरोसा नहीं उठ जायेगा?

व्यापमं घोटाले में लिप्त लोग पैसे भर कमा लेते तो भी क्षम्य था लेकिन इस घोटाले से जो दरका है, भीतर तक, उसकी भरपाई बहुत मुश्किल है।
हम में से कई लोग व्यापमं की परीक्षाओं से बहुत पहले (शायद 20-25 वर्षों ) से जुड़े हैं।  पहले पी एम टी के प्रश्नपत्र लीक होने की कहानी सामने आई थी जिसमे बॉक्स में बंद प्रश्नपत्रों को साइड के दो कब्जे खोल कर लीक कर दिया गया। बाद में व्यापम ने बॉक्स के चारों कब्जों को सील करना तय किया गया। अब तो हम आप समझ गए हैं  कि पूरे प्रकरण में वास्तविक दोषी कौन है ? शायद CBI को भी पता लग ही जाये।

इस सन्दर्भ में मेरा स्पष्ट मत है कि हमें अपनी असहमतियां शासन को दर्ज़ कराना चाहिए। इस प्रसंग में राजनीति के इंवॉल्वेमेंट के कारण कई गलत चीजें भी बहस के केंद्र में आ सकती हैं।

000 निरंजन श्रोत्रिय
----------------------------------
टिप्पणियाँ:-

प्रियदर्शन:-: कुछ दिन पहले अपने चैनल के लिए व्यापम पर यह टिप्पणी लिखी थी।

 जिस मामले में सैकड़ों लोग गिरफ़्तार हों, इतने ही फ़रार हों, हज़ारों लोग आरोपी बनाए गए हों, और इन सबमें राज्य के राज्यपाल से लेकर कॉलेजों के प्रोफेसर, डॉक्टर, और चपरासी-ड्राइवर तक इल्ज़ामों से घिरे हों, क्या वह बस एक सरकारी तंत्र की विफलता का मामला है?

इसमें संदेह नहीं कि व्यापमं घोटाला मध्य प्रदेश के जर्जर और भ्रष्ट हो चुके सरकारी तंत्र की कोख से निकला है और इसकी वजह से उन बहुत सारे नौजवानों का भविष्य अंधेरे में डूबा है, जो अपनी मेहनत और ईमानदारी पर भरोसा करके नाकाम इम्तिहान देते रहे होंगे। लेकिन व्यापमं इतना भर नहीं है।
वह भारत के खाते-पीते मिडिल क्लास के भीतर की सड़ांध का आईना भी है- ऊपर से ख़ूब चमकता-दमकता, मेहनत और प्रतिभा की बात करता यह मध्यवर्ग धीरे-धीरे पैसे को सबसे बड़ी चीज़ मानने लगा है और इसके लिए हर तरह के धत्तकरम करने को तैयार है।

वह अपने नालायक बच्चों को घूस देने की कला सिखाता है और उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर बनाकर उनकी सारी उम्र इस घूस की वापसी के लिए सुनिश्चित कराता है। इस मिडिल क्लास के लिए अच्छी पोस्टिंग का मतलब गांव-देहात की वह पोस्टिंग नहीं है, जहां उसकी ज़्यादा ज़रूरत है, बल्कि बड़े शहरों और आर्थिक केंद्रों की वह मलाईदार पोस्टिंग है, जहां सबसे ज़्यादा रिश्वतखोरी की गुंजाइश है।
पैसे खाने-खिलाने में उसे कोई नैतिक दुविधा नहीं होती, वह अन्याय करता भी है और सहता भी है। वह ख़ुद को देशभक्त बताता है, लेकिन अक्सर उसकी हरकतें देश को कमज़ोर करने वाली साबित होती हैं, वह ख़ुद को ईमानदार बताता है, लेकिन ईमानदारी के हर इम्तिहान में फेल होता है।

वरना व्यापमं में वे क़ाबिल और पढ़ने-लिखने वाले लड़के शामिल नहीं होते, जो अपने बूते इम्तिहान पास कर सकते थे, लेकिन रुपयों की ख़ातिर दूसरे नाक़ाबिल लोगों को पास कराने में लगे रहे। दरअसल, यह पाखंड इतना आम और सार्वजनिक है कि अब इससे जुड़े लोग शर्मिंदा तक नहीं होते।
उल्टे अगर उन्हें सजा हो जाए, बुढ़ापे में जेल हो जाए, उनका सार्वजनिक अपमान हो जाए, तो दूसरों को उनसे सहानुभूति होने लगती है। भारत में मीडिया में दिखाई पड़ने वाले घोटाले उस महाघोटाले के मुकाबले में कुछ नहीं हैं, जो भारतीय समाज में कई स्तरों पर चल रहा है।

व्यापमं ने बस नए सिरे से यह मौका सुलभ कराया है कि हम इस सड़ांध को पहचानें और इसके विरुद्ध वाकई अपने भीतर कोई प्रतिरोध पैदा करे।

कविता वर्मा: जिस तरह व्यापम घोटाला परत दर परत खुल रहा है और जिस तरह व्यापम घोटाले के आरोपी और गवाह मौत के मुँह में समा रहे हैं उससे आम जन हतप्रभ है।  पूरी कहानी जो अभी पूरी नहीं हुई है और पता नहीं कब और कैसे पूरी होगी पूरी होगी भी या नहीं लेकिन इसने नैतिक मूल्यों और साहस पर नकारात्मक प्रभाव डाला है।
एक टीचर के रूप में मैं सोचने लगी हूँ एजुकेशन सिस्टम में बेहतरी के लिए बदलाव करते करते हम वहाँ पहुँच गये जहाँ शिक्षा का मूल उद्देश्य ही गायब हो गया है ? शिक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को विषय विशेष में शिक्षित करके उन्हें एक अच्छा नागरिक बनाना है। अच्छा नागरिक से अभिप्राय है ऐसा नागरिक जिसमे नैतिक मूल्य नैतिक साहस हो। यही शिक्षा किसी राष्ट्र के विकास और खुशहाली के लिए आवश्यक है।  आज इस विषय को ही विलोपित कर दिया गया है।  शिक्षा का अर्थ किसी भी तरीके से स्वयं को आगे रखना है।  हर उस चीज़ को पाना है जिसकी  चाह है चाहे उसके लिए कोई भी राह अख्तियार करना पड़े।  मेहनत ईमानदारी जैसे शब्द कहीं पीछे छूट गए हैं। 

आज छोटे छोटे बच्चे भी हर क्षेत्र में जुगाड़ लगा कर पा लेने में विश्वास करते हैं।  आश्चर्य होता है इन आधुनिक धृतराष्ट्रों पर। अपनी मेहनत से पाई सफलता से अपने बच्चों के लिए आसान सफलता खरीदने वाले ये माता पिता क्या वाकई इनके शुभचिंतक हैं ? क्या वाकई ऐसा प्यार जता कर वे इन्हे जिंदगी की जंग में उतरने के लिए तैयार कर रहे हैं ?

इस घोटाले ने तो सारा सिस्टम ही उलट दिया है जिसमे पहले खरीददारों का नंबर आता है उसके बाद काबिलियत का।  इस सब ने मेहनत , लगन , धीरज जैसे गुणों की हिम्मत तोड़ दी है।

व्यापम घोटाला जिस तरह से पूरे देश की सुर्खी बनी है , जिस तादाद में बड़े रसूखदार नाम इसमे शामिल हैं व्यापम एक ऐसे कीचड़ भरे बदबूदार तालाब की तरह हो गया है जिससे होकर गुजरने वाला इससे अछूता माना ही नहीं जा सकता।  चूंकि इसकी शुरुआत आठ से दस साल पहले हो गई थी इसलिए पिछले चार पाँच सालों पहले अपनी मेहनत से पास हुए बच्चों की काबिलियत पर भी ऐसा सवालिया निशान लग गया है जिससे निजात पाना उनके लिए आसान ना होगा।  खुद को हमेशा संदेह से देखा जाना , कमतर आँका जाना बेहद दुखदायी है। 
अब इन घोटालों के खुलने और अपने बच्चों के साथ आरोपी बनाये जाने वाले और जेल जाने वाले ये पालक क्या जिंदगी में कभी एक दूसरे से आँख मिला पाएँगे ? इस तरह अपना करियर और जीवन तबाह करने के लिये क्या ये बच्चे अपने माता पिता को माफ़ कर पाएँगे ? इनके जेहन में क्या ये प्रश्न नहीं उमड़ेगा कि हम तो बच्चे थे आप तो माँ बाप हैं अनुभवी हैं अच्छा बुरा सही गलत समझते हैं फिर क्यों आपने इतनी गलत राह चुनी जो कभी किसी मंजिल पर ही नहीं पहुँचती।

प्रज्ञा :-
व्यापम् बनाम शैक्षणिक ब्रष्टाचार बनाम मौतों का सिलसिला। इस उपभोगतवाद की अंधी आंधी में धकेल दी गयी पीढ़ी को बिना श्रम सब उपलब्ध कराने के रास्ते, नैतिकता और आदर्शों की धज्जियां उड़ाना , शिक्षा को कारोबार में रूपांतरित करने का परिणाम है ये। पर राजनीति कोई परहेज का मुद्दा नही। यदि व्यापक समाज व्यापम् के विरोध में एकजुट हो रहा है तो ये भी एक राजनीति है। सकारात्मक।

चंद्र शेखर बिरथरे :-
व्यापम घोटाला एक सत्ताधारी दल की घृणित राजनैतिक एवम् शि क्षा की कालाबाजारी की निकृस्टतम महत्वआकांछा का निम्नस्तर का अक्षम्य अपराध है । पता नहीं कितने भख और बली और लेगा पता नहीं कितने नोनिहलो का भविष्य अँधेरा करेगा ईश्वर खैर करे । च शे बिरथरे

फ़रहत अली खान:-
कविता जी की लम्बी टिप्पणी आँखें खोल देने वाली है। प्रज्ञा जी की बात से भी सहमत हूँ।
इस मामले में सियासत ज़रूर हो रही है लेकिन सियासत होने से बहुत से सकारात्मक परिणाम नज़र आये हैं। अकेले व्हिसल-ब्लोअर्स कुछ नहीं कर पाते अगर विपक्ष के लोग इस मामले में नहीं कूदते।
अगर इतना बड़ा कोई घोटाला होता है तो ये हो ही नहीं सकता कि सरकार के नुमाइन्दे उसमें शामिल न हों। सालों से जान-बूझकर ढीली-ढाली और दिखावे के लिए जाँच करके शिवराज सरकार दाल में काला होने का सबूत ख़ुद ही पेश कर चुकी है। ये विपक्ष का दख़ल ही है जो अब इसकी जाँच सीबीआई को सौंपने को सरकार को मजबूर होना पड़ा। हालाँकि सरकारी तोते के नाम से मशहूर सीबीआई इस मामले को कहाँ तक ले जा पाती है, ये देखने योग्य बात होगी।

गरिमा श्रीवास्तव:-
आज ही एक डा 50हज़ार की रिश्वत लिए म प्र में मिला।व्यापम की व्याप्ति बड़ी है।अकल्पनीय।म प्र जाना हुआ था बड़े ही संवेदनशील परीक्षा कार्य के लिए।आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वहां सारा काम ठेके पर हो रहा था।कोई आवाज़ नही उठा रहा था।परीक्षा स्थल पर इतनी गन्दगीथी कि कई बीमारियों को बुलाने की ज़रूरत न थी।सरकार परीक्षकों के भोजन चाय इत्यादि का धन देती है ताकि कोई 10_5के बीच बाहर न जा सके।मोबाइल भी सीज़ थे।लेकिन दोपहर के भोजन के लिए सबसे रूपए लिए जाते तब बाहर से खाना मंगा के वहीँ दिया जाता।पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार और शिक्षा की ठेकेदारी का नमूना थी।पिछले दिनों pmt की परीक्षा दोबारा होना व्यापम जैसे घोटालों की व्यापकता को दिखाता है।न्यायिक हिरासत ,कारागार भी सुरक्षित नहीं।जो बोलेगा वह मार दिया जायेगा।

गरिमा श्रीवास्तव:-
यही सच है।जो लोग मीनाक्षी जैसी लड़की ,जिसे चाकू से गोद कर सरेशाम मार दिया गया ,के लिए आगे नहीं आये मूक दर्शक बने देखते रहे।वे लोग व्यापम चुपचाप देख रहे हैं तो क्या आश्चर्य।जहाँ अभी निर्भया को न्याय मिलना बाक़ी है वहां व्यापम की खोजबीन होते- होते आशाराम बापू के केस की तरह सब गवाह पलट जायेंगे।मुक्तिबोध ने कहा है न "सब चुप कविजन निर्वाक्"

मेघेश:-
Vyapam .....
Na to yeh koi scam hai or na hi Madhya Pradesh ke daman ka daag, isko mudde ko bahar laane k liye vipaksh Ki Bhumika sivay natak k kuch nhi , kuch logo/chintako ko lag sakta hai Ki yeh Manav adhikaro ka hanan hai ya aisa hi bahut kuch ..... 

Lekin vaastav Mein yeh hamari or hamare samaaj Ki sacchai hai , yeh hamaare andar ka chor hai , Zara sochiye Jin logo ne galat admission liye unke Mata pita ne hi unhe paise diye honge ab agar ek ausat bacche Ki umra 23 saal maani jaaye P.MT. k liye to uske Mata pita Ki umra takreeban 45-50 k aas pass honi chahiye .....matlab Ki aap gour kare to samaaj to pahle se hi sadan maar rha hai , bachi kuchi kasar capitalism ne poori kar di ....aap logo se ek samanya sa prashn .........aap sabhi facebook par honge hi ...... Kitni baar aap bina Kisi tasveer ko dekhe ya post ko dhang se padhe us par lyk laga dete hain.....dekhiye or mahsus kijiye Ki brastachaar khna tak or kitna hai .....vyapam jaise gotaale vartmaan samaaj ka aina Ho hi nhi sakte kyunki itihaas batata hai Ki is desh Mein pahla gotala to 1932 Mein hi Ho gya tha wo bhi Gandhi ji ke samay ...... Baat confusing lag sakti hai lekin sochiye agar class Mein 1st rank 2nd rank Ki rasm adaaygi 1st class se hi na shuru Ki jaaye to kitne bacche apne jeevan Mein asafal hone se Bach jaayenge ....ab baat aati hai Ki to vyapam ka kiya kya jaaye ????
Dekhiye sadiyo ka andhera ek baar k ujaale se gayab Ho sakta hai lekin mitna muakil hai ....aisa hone k liye Kewal humko or sirf humko apne aaj se imaandaar banana shuru karna hoga ....tab jaKar shayad kanhi aane wali pidhiya is bandhan se mukt Ho paaye ...jaisa Greece Mein ho rha hai .... Kya C.B.I or kya supreme court .... Hamaare soye sab ek samaan hai lekin hamaare jaage is desh/ samaaj ka kuch bhi bigaad paana asambhaav hai .....
Mujhe to afsoos hota hai is baat par Ki lagbhag 60 Ki umra ke samvidhaan Mein hum aaj tak RIGHT TO RECALL jaisa koi kanoon/act pass nhi karwa paaye ......

संध्या:-
यह सच है ,हम ठगा सा महसूस कर रहे हैं ।मेरे बेटे की तबियत दो दिन से ठीक नहीं है हम डॉक्टर के पास दिखा कर आये अभी तक आराम नहीं आया ।हम सब मज़ाक करते रहे ज़रूर कोईं वयापमबाज़ डॉक्टर होगा ।मगर क्या ते सच में केवल हँसी मज़ाक का विषय है ?हमें निश्चित ही अपनी बात रखनी होगी मगर किस सरकार के पास ? जो स्वयं ही कटघरे में हैं ? इतना पैसा व्यय कर चुनाव होते हैं और हम सब निश्चिन्त हो जाते हैं की व्यवस्था की बागडोर अब ठीक से चलेगी ।लेकिन घोटालों के जंगल में कहीं कुछ दिखाई नहीं देता ।और जहाँ शिक्षा का प्रश्न हो वहां चुप कैसे बैठा जा सकता है ?जहाँ स्वयं CBI भी विवाद के घेरे में हो ?हम आखिर जा कहाँ रहे हैं ?

निरंजन श्रोत्रिय:-
जब तक किसी संस्था में गुणवत्ता और विश्वसनीयता नहीं होगी, उसे प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी। ये सभी यूँ ही नहीं मिल जाते, इन्हें अर्जित करना पड़ता है। यह दुखद है कि आज़ादी के लगभग 70 वर्षों बाद भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में हम एक भी ऐसा संस्थान खड़ा नहीं कर पाये जो विश्व मानकों के अनुरूप हो। यहाँ तक कि देश के किसी भी आई आई टी की गिनती विश्व के श्रेष्ठ 100 संस्थानों में नहीं होती। कारण स्पष्ट हैं। भ्रष्टाचार की दीमक ने समूचे देश को खोखला कर दिया है। इस प्रकरण में लेखकों/कलाकारों की भूमिका एक सचेतक की हो सकती है लेकिन यक्ष प्रश्न वही कि आपको सुन कौन रहा है ?

अरुण आदित्य :-
व्यापम कोई अजूबा नहीं है। हमारे समाज में अनैतिकता जिस तरह एक जीवन मूल्य बन चुकी है और राजनीति, नौकरशाही और अपराधियों में जिस तरह का गठबंधन बना हुआ है, उसके दुष्परिणाम तमाम क्षेत्रों में देखने को मिल रहे हैं।कई राज्यों के लोकसेवा आयोग भी इसी तरह के सवालों के घेरे में हैं।यही नहीं निजी क्षेत्र तक में जोड-तोड से नौकरियां, इंक्रीमेंट, प्रमोशन मिल जाते हैं।कुएं में ही जुगाड़ की भांग पडी हुई है। शादी के वक्त दहेज के मोलभाव के दौरान लडके का बाप गर्व से बताता है कि लडके की ऊपरी कमाई कितनी है।

व्यापम के बहाने हमारे पास आत्म निरीक्षण और तंत्र की सफाई का एक मौका है। सीबीआई अगर पिंजरे से बाहर निकल कर सबसे बडी मछली पर हाथ डालती है तो निश्चित ही यह एक सबक होगा। लेकिन सबक के साथ ही समाज में नैतिकता का सामूहिक बोध भी विकसित करना होगा। अनैतिक तरीकों से किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने वालों को जब तक समाज हेय दृष्टि से देखने के बजाय सिर माथे पर बिठाता रहेगा, हर क्षेत्र में 'व्यापम' होते रहेंगे।

देवेन्द्र रिनावा:-
अरुण ने बहुत अच्छे ढंग से अपनी बात कही है।सी बी आई जांच पर से भी लोगों का भरोसा ख़त्म होता जा रहा है।
        समाज में नैतिकता के सामूहिक बोध का विकास ही सबसे बेहतर तरीका है और इसके लिए बुनियादी शिक्षा में व्यापक रूप नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाना चाहिये।नमक के दरोगा जैसे कई पाठों को पाठ्यक्रम से हटाया जा चुका है।इधर घर में नानी दादी द्वारा सुनाई जाने वाली कहानियां भी नदारद हो चुकी है।नैतिकता को पुनर्जीवित करने के लिए सम्पूर्ण नहीं तो कम से कम कुछ % ही सही पारंपरिक  परिवेश को फिर कायम करना होगा।

वागीश झा:-
अरुण ने बहुत महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा किया है कि "अनैतिक तरीकों से किसी भी क्षेत्र में सफलता हासिल करने वालों को जब तक समाज हेय दृष्टि से देखने के बजाय सिर माथे पर बिठाता रहेगा, हर क्षेत्र में 'व्यापम' होते रहेंगे।" तो यह CBI के बस की बात नहीं। यह एक व्यापक और गहरे आत्मालोचना का समय है। वरना 'मेरे क़त्ल में मेरा हाथ था, ये कभी किसी को पता न हो'। अरुण को सलाम।

प्रदीप मिश्र:-
व्यापम घोटाले पर जरूरी आलेख और प्रभावशाली भी। भाई वागीश और लेखक का आभार। अरुण तो हमेशा ही बहुत ही सार्थक हस्तक्षेप करता है। अरुण से पूरी तरह से सहमत। में इस घटना के जड़ों को कोचिंग सेंटरों की शुरुआत के साथ जान लेते हुए देखता हूँ। अगर आप कोचिंग सेंटरों कि पड़ताल गंभीरता से करेंगे तो पाएंगे कि हर तरह परीक्षा जिसमें कोचिंग सेंटर का योगदान है वहां पर घोटाले की सड़ांध भरी पडी है। स्थिति यह हो रही है कि 11वीं के बाद बच्चे कोचिंग सेंटर में एक सीओ ट्रैक्ट के साथ एडमिशन ले रहे हैं और वे कोचिंग सेंटर किसी स्कूल से टाई उप करके 12वीं की परीक्षा दिलवादेते हैं। बच्चे उस स्कूल का मुँह सिर्फ परीक्षाओं में देखते हैं। यह अपने आप में न केवल बड़ा घोटाला है।सरकारी शिक्षा व्यवस्था का अपमान है।यहीं पर बच्चों को घोटाले की पहली शिक्षा भी। मैंने तो देखा है जो बा च्चे बड़ी मुश्किल से सामान्य इंजीनियरिंग के स्तर के थे वे आई आई टी से बी ई करलिये। इसमें कोचिंग सेंटरों के अंडर टेबल की महिमा है।यह पूरी तरह से गलत बात है की कोचिंग सेंटर किसी बच्चे की योग्यता में कोई मूलभूत इजाफा कराते है। वे ट्रिक्स और तकनीक की बात कराते हैं। अब आप स्वयं सोचें की ये ट्रिक और टेकनिक क्या होते हैं। मेरा तो जाँच एजेंसिओं से आग्रह है कि वे कोचिंग सेंटरों तक अपनी जाँच का दायर बढ़ाएं। फिर देखें इन शिक्षा के दीमकों ने शिक्षा चयन और परीक्षा व्यवस्था को कितना चलनी कर रखा है। जब हमारे पास एक शिक्षा व्यवस्था है। स्कूल कॉलेज हैं। तो फिर इन कोचिंग सेंटरों की जरूरत ही क्यों। इनको बंद करने का निर्णय यथाशेघृ लेना चाहिए। अन्यथा योग्य ईंट ढोता रहेगा और अयोग्य अभियन्ता बना फिरेगा। खैर यह बहुत बड़ी सड़ांध है। देखें कितना साफ़ होता है। मैं अरुण से सहमत हूँ। सिर्फ मध्य नहीं हर प्रदेश में यह व्याप्त है

आशीष मेहता:-
बीज वक्तव्य के केन्द्रीय विचार के मूल "भ्रष्टाचार की दीमक" पर निरंजनजी का  विचार स्वाभाविक (एवं सटीक) है।

अरुणजी को साधुवाद जो इसे 'प्रदेश', 'शर्म, मेरे, तेरे,' "कहाँ है, कहाँ नहीं" से परे, सीधे 'मर्म' पर ले आए।
(१) आत्म निरक्षण ; (२) तंत्र की सफाई ।
दोनों पहलू एक दूसरे के पूरक हैं। एक औसत (!!) नैतिक व्यक्ति (प्रायः पाए जाते हैं) को नैतिक पूर्णता हासिल करने में जिन्दगी लग जाती है। "तंत्र" उसकी इस यात्रा को दुरुह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ता ।
नैतिक शिक्षा (स्कूल एवं कॅालेज स्तर पर भी) निर्विवाद रूप से होनी चाहिए । पारिवारिक स्तर पर (संस्थागत भी) नैतिकता, होते सोते भी, अक्सर 'दोहरी मानसिकता' से जद्दोजहद करती रहती है। आत्मबल का अभाव और जंग लगे तंत्र में जीने की मजबूरी, नैतिकता को परवान चढ़ने ही नहीं देती।
आत्मबल बढ़ा कर कुछ कोशिश करें, तो समाज और तंत्र, आपको बेवकूफ साबित करने पर आमादा हो उठता है । घरेलू गैस सिलेंडर से मारुति चलाइए, Best Price में थोक विक्रेता बन कर स्वउपभोग के लिए राशन खरीदें, टिकट कन्सेशन के लिए बच्चे की उम्र घटाइये, भवन अनुज्ञा को बेहतर बनाने के लिए दरोगा से दिवाली मुबारक कीजिए ।
यहाँ तक तो "आटे में नमक" आँखों देखी मिलने दिया । यहाँ तक तो आत्म आलोचना feasible लगती है।
व्यापमं और कोचिंग नेक्सस्, जैसे मामलों में व्यक्ति तंत्र के आगे विवश हो जाता है। लोकसेवा आयोग, पुलिस, न्याय व्यवस्था, स्वास्थ्य, परिवहन, रक्षा, वाणिज्य, क्या छूटा है भ्रष्टाचार से।
तंत्र की सफाई के क्या उपाय हैं ? खासतौर पर जब रक्षक ही भक्षक हों । कितने टी एन शेषन चाहिए होंगें, तंत्र की सफाई के लिए ? चाहे लेखक हो या कलाकार, एक जीवट नागरिक धर्म क्या हो, इस परिदृश्य में ??
आज का मुक्कदस दिन तो, अल्लाहताला से सभी के गुनाहों की माफी मांगने का है । पर मैं दुआ मांगता हूँ, रमजान के महिने में मिले प्रभार को CBI सच्चे अंजाम तक पहुँचाए और "देश को आशा" दिलाए (जैसा, CBI अधिकारी ने घोषित किया है।)
पर सिर्फ दुआओं से क्या होगा ? क्या आजाद देश में क्रांति होती है ?

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
अरुण जी और वागीश जी ने बहुत स्पष्ट रूप में और सटीक तरीके से बात रखी है,  जो कि स्तब्ध करती है। अन्य साथियों ने भी विचारपरक मुद्दे प्रस्तुत किए हैं। तेलगी प्रकरण से लेकर फिक्सिंग आदि कई अवसरों पर ऐसे कुहासे से गुजरना पड़ा है। फिर भी, मुझे लगता है कि  "सब कुछ" में से "सब" खतम हो जाने पर भी "कुछ" बचता है।

सुचिता राठी:-
एक बात मुझे बार बार व्यथतित करती रही है कि हम आम जनता को सब पता चल रहा है ,हम इस पर चर्चा भी करते है , रोष भी व्यक्त करते है परंतु नतीजा क्या होता है सब स्वार्थी नेता, राजनेता ,पक्ष विपक्ष तपाक से अपनी रोटी सेंकने लग जाते है।जनता सिर्फ बेबस बलि का बकरा बनती जा रही हैं।  ललित मोदी को देखे किस तरह से उसके बयानों ने सारा केंद्र उससे हटा कर दूसरे नेताओ की और कर दिया।क्या हुआ क्या हो सकता है??कुछ नहीं।सिस्टम ही बिगड़ा हुआ है।लोग चाहे सरकारी गैर सरकारी हो सब कही न कही किसी स्वार्थ के चलते curruption में लिप्त है।हम सब न जाने ये कौन से नशे के आदि हो रहे है की इससे बहार निकलने का रास्ता ही नहीं मिल रहा है।मन व्यथित है संदेह से घिरा है।जिसके पास सत्ता और पैसे की ताक़त है वो survive कर जाएगा बाकि.....व्यापमं घोटाले पर प्रतिक्रिया ....घोटाला इतना बड़ा है पर देखना सब बड़े नेता बच जाएंगे

राहुल सिंह:-
शुचिता भ्रष्ठाचार एक बाई-प्रोडक्ट है मूल जड़ अर्थव्यवस्था में नीति स्तर के मानक और उन्हें लागु करने की शक्ती और वे कारक जिन्होंने उसे शक्ती बनाया है। अपने देश ने 1947 के बाद मिश्र-अर्थ व्यवस्था अपनायी, अर्थात पूंजी और समाजवाद का mix पर धीरे धीरे सिस्टम पर धन कुबेरों ने कब्ज़ा जमा लिया और हश्र हमारे सामने है।

सुचिता राठी :-
बिजूका अमरावती न्यू: कोई भी सत्ता में आएगा इस रोग से ग्रसित ही जाएगा जिसका नाम भ्रष्टाचार है

13 अप्रैल, 2015

विमर्श:- दिनेश कर्नाटक

आज का विमर्श
**************


साहित्य विचार, संवेदना तथा कला से मिलकर बनता है। अनुभव इसे विश्वसनीय बनाता है। केवल अनुभव, विचार, संवेदना या कला से रचना नहीं बनती। कबीर की कविता मूलतः विचार की कविता है। लेकिन वहां सिर्फ विचार नहीं है। संवेदना, कला भी है। तभी कबीर आज भी हमें अच्छे लगते हैं। और शायद आने वाले कई युगों तक उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
साहित्य में कुछ लोग विचार तो कुछ अनुभव तो कुछ कला को रचना की एकमात्र कसौटी मान लेते हैं। इतना ही नहीं यह आग्रह दलित, स्त्री तथा आदिवासी लेखन के संदर्भ में यहां तक पहुंच जाता है कि अगर इन वर्गों के लोगों ने लिखा है तभी वह प्रमाणिक है। यहां पर अनुभव को रचना की सफलता की एकमात्र कुंजी मानने की गलती की जाती है।
साहित्य सूचना तथा तथ्य से नहीं बनता। अख़बार में कई घटनाएं आती हैं, जिनको पढ़कर हम हिल जाते हैं। मगर उनका प्रभाव  "कफ़न" "पूस की रात" और "वह तोड़ती पत्थर" के असर को हमारे भीतर से मिटा नहीं पाता। यह असर साहित्य का है।
रचना विचार, संवेदना, कला तथा अनुभव के समन्वय से ही संभव है। अगर समन्वय है तो वह अपना असर छोड़ेगी। नहीं है तो समय के प्रवाह में कहां खो गई इसका पता नहीं चलेगा ।
-------------------------------------------------------------------------------------
 
अमिताभ मिश्र:-
विमर्श के लिए ही सही कि एक कविता आंदोलन विचार कविता के नाम से ही चलाने का प्रयास किया गया था।  कविता में दरअसल विचार से ज्यादा संवेदना की जरूरत है।  ज्ञानात्मक संवेदना या संवेदनात्मक ज्ञान के बारे में मुक्तिबोध बात कर चुके हैं।

दिनेश कर्नाटक:-
अमिताभ जी, यह जानना सुखद है कि आपकी इन बातों को लेकर सहमति है। मगर कई लोग तो अनुभव की प्रमाणिकता तथा विचार के सवाल को लेकर साहित्य को ख़ारिज करते हुए दिखते हैं।

अमिताभ मिश्र:-
मेरे मत से बुद्धि बहुत है और बाकी बहुत ज्ञान उपलब्ध है सब जगह कमसकम कविता में संवेदना की जगह बची रहे।  वरना तो जीवन से भी लुप्तप्राय है यह चीज।

05 अप्रैल, 2015

काव्य की रचना प्रिक्रिया

आज विमर्श के लिए प्रस्तुत हैं काव्य की रचना प्रक्रिया पर अग्रज कवि मुक्तिबोध के एक अत्यंत महत्व पूर्ण लेख के अंश:

काव्य की रचना-प्रक्रिया


रचना प्रक्रिया, वस्तुतः एक खोज और ग्रहण का नाम है।अभिव्यक्ति के कार्य के दौरान में कवि नई खोज भी कर लेता है।इस तथ्य को मैं एक  उपमा-चित्र द्वारा स्पष्ट करना चाहूंगा।
वीरान मैदान, अंधेरी रात, खोया हुआ रास्ता, हाथ में एक पीली मद्धिम  लालटेन।
यह लालटेन समूचे पथ को पहले से उद्घाटित करने में असमर्थ है। केवल थोडी सी जगह पर ही उसका प्रकाश है।ज्यों-ज्यों वह पग बढाता जाएगा, थोडा-थोडा उद्घाटन होता जाएगा।चलने वाला पहले से नहीं जानता कि क्या उद्घाटित होगा।उसे अपनी पीली मद्धिम लालटेन का ही सहारा है।इस पथ पर चलने का अर्थ ही पथ का उद्घाटन होना है, और वह भी धीरे-धीरे, क्रमशः।वह यह भी नहीं बता सकता कि रास्ता किस ओर घूमेगा या उसे किन घटनाओं या वास्तविकताओं का सामना करना पडेगा।कवि के लिए, इस पथ पर आगे बढते जाने का काम महत्वपूर्ण है।वह उसका साहस है।वह उसकी खोज है।बहुतेरे लोग, जिनमें कवि भी शामिल हैं, इस तथ्य को भूल जाते हैं, क्योंकि वे उस पर चलना नहीं चाहते, अथवा बीच में से ही भाग जाना चाहते हैं।
इस रास्ते पर बढने के लिए, निस्संदेह, आत्मसंघर्ष करना पडता है।केवल एक लालटेन है, जिसके सहारे उसे चलना है।
इस उपमा को देखकर बहुतेरे लोग यह आरोप लगाएंगे कि यहां किसी अवचेतनवादी सिद्धांत का निरूपण हो रहा है। किंतु कोई भी रचनाकार यह जानता है कि रचना के बढते जाने के मार्ग का नक्शा, रचना के पूर्व नहीं बनाया जा सकता, और यदि बनाया गया तो वह यथातथ्य नहीं हो सकता।रचना-प्रक्रिया, वस्तुतः, एक स्वायत्त प्रक्रिया है। और वह किन्हीं मूल उद्वेगों और अनुरोधों के सहारे चली चलती है । ये उद्वेग और अनुरोध ही वह लालटेन है, जिसको हाथ में लेकर उसे आगे चलना होता है।
और यह पथ क्या है? वस्तुतः बाह्य संसार का आभ्यंतरीकृत रूप है।बाल्यकाल से ही मनुष्य, बाह्य संसार का अनवरत आभ्यंतरीकरण करता रहता है।और इस प्रकार वह उस आभ्यंतरीकृत बाह्य को उन विशेषताओं से समन्वित और संपादित करता रहा है, जो उसके 'स्व ' की विशेषताएं हैं।
###
चूंकि कवि का आभ्यंतर वास्तव बाह्य का आभ्यंतरीकृत रूप ही है, इसलिए कवि को अपने वास्तविक जीवन में, रचना-बाह्य काव्यानुभव जीना पडता है।
कवि केवल रचना-प्रक्रिया में पडकर ही कवि नहीं होता, वरन उसे वास्तविक जीवन में अपनी आत्म-समृद्धि को प्राप्त करना पडता है और मनुष्यता के प्रधान लक्ष्यों से एकाकार होने की क्षमता को विकसित करते रहना पडता है।यही कारण है कि काव्य केवल एक सीमित शिक्षा और संस्कार नहीं है, वरन एक व्यापक भावनात्मक और बौद्धिक परिष्करण (कल्चर ) है---वह कल्चर, वह परिष्कृति, जो वास्तविक जीवन में प्राप्त करनी पडती है।

 000 गजानन माधव मुक्तिबोध
प्रस्तुति:- अरुण आदित्य जी
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------
टिप्पणी:-

सुरेन्द्र रघुवंशी
:-
काव्य की रचना प्रक्रिया  में एक अनिश्चित रचना पथ होता है । यह दुर्गम,दुरूह और श्रमसाध्य होता है ।रचनाकार को अनुभवों के ताप में तपना पड़ता ।इसे हम   उसके हिस्से का रचनात्मक तप भी कह सकते हैं।समाज के दुःखों, विडंबनाओं और विद्रूपताओं की चिंता में रचनाकार केमाथे पर स्वेद बहता है और ह्रदय में गहन पीड़ा की नदी भी , जो रचना के जन्म का कारण बनती है। मुक्तिबोध ने भी यही कहा है। कवि रचना के लिए कोई पूर्व नियोजित पथ नहीं बना सकता । यदि बना भी ले तो उस पर रचना के सृजन के दौरान चल नहीं सकता। यदि सायास चलने का भी प्रयास करेगा तो यह बलात् होकर रचना के सौंदर्य के कौमार्य को नष्ट करेगा।
            संवेदनशील होना मनुष्य और कवि होने की पहली शर्त है ।साथ ही एक आवेग होता है रचना का जो परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में आपको रचना की गहराई में ले जाता है । कई बार मैं कहा करता हूँ कि रचन्स एक गर्भस्थ शिशु की तरह होती है जिसे हमें जन्म देना ही पड़ता है ।हम न चाहें तब भी । यहाँ आवेग प्रसव का समानार्थी हो जाता है। हम रचना को जन्म नहीं देते बल्कि रचना जन्म ले लेती है ।और इसका समय भी हम निर्धारित नहीं कर सकते।
                    यही वास्तविक और नैसर्गिक सृजन है जिसकी सुखद प्रसव पीड़ा से कवि  या कोई भी रचनाकार निश्चय गुजरता है। कहाँ से और कब गुजरना है यह भी हम तय नहीं कर सकते । रचनाकार का आंतरिक आवेग और परिस्थितियों की वयार उसे उड़ाकर रचना की भूमि पर खड़ा कर देती है जो निश्चित तौर पर मनुष्यता की मिट्टी से निर्मित होती है।भाव यहाँ स्वच्छ आकाश की तरह नीले , निर्मल और आकर्षक हैं जिनकी गहराई जिनकी गहराई में सानंद डूवकर ही रचनाकर्म सार्थक होता है।

अमिताभ मिश्र
मुक्तिबोध बार बार रचना प्रक्रिया की बात करते हैं।  निबंध में, कहानी में, कविता में।
कला का तीसरा क्षण उनकी महत्वपूर्ण थ्योरी है। एक साहित्यिक की डायरी को जितनी बार पढ़ो  नए अर्थ समझ में आते हैं।
मुक्तिबोध के अनुसार कला के तीन क्षण हैं। उनसे ही जानें वे तीन क्षण कौन से हैं—‘कला का पहला क्षण है जीवन का तीव्र उत्कट अनुभव। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना मानो वह फैंटेसी अपनी आंखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता। …फैंटेसी अनुभव की कन्या है और उस कन्या का अपना स्वतंत्र विकास-मान व्यक्तित्व है। वह अनुभव से प्रसूत है इसलिए वह उससे स्वतंत्र है।’ 

शैली किरण
कविता  स्वतः प्रकट होती है,
भावपूर्ण हृदय से, कवि कभी सामान्य नहीं होता, क्योंकि काव्य ही लेखन की सबसे पुरातन विधा है, अतैव सृष्टि रचियता ब्रहमा से कवि की तुलना उचित है , किन्तु कवि रचना अपलक नहीं करता,  छोटा छोटा कदम रखकर लम्बा सफर तय करता है, क्योंकि जीवन यात्रा में थोडी थोडी चेतना उसे प्राप्त होती है विभन्न अनुभवो से, यदि अंहकार वश कोई यह कह दे कि मैंने रचनाक्रम के पूरे रहस्य को जान लिया है, तो मुक्तिबोध के शब्द मार्गदर्शन करते हैं, "उसे वास्तविक जीवन में अपनी आत्म समृद्धि को प्राप्त करना पडता है"...
आत्म सृमद्धि की आवश्यकता और बढ़ जाती है, जब देश भारत हो, जहाँ रामायण, महाभारत, गीता काव्य असंख्य मानवों की जीवन दिशा निर्धारित करते हों...

आशा पाण्डेय
सही कहा आप लोगों ने,कविता स्वतः प्रकट होती है.और अपने प्रकट होने में लम्बा समय लेती है.मुकि्तबोध ही कहते हैं..."काव्य रचना एक परिणाम है किसी पूर्वगत प्रदीर्घ मनःप्रक्रिया का ,जो अलग-अलग समयों में बनती गई और अपने तत्व एकत्र करती गई है."

परमेश्वर फुंकवाल
अरुण जी,  सुरेंद्र जी बेहद अहम पोस्ट और टिप्पणी। साहित्य रचना अपने आप को रचने जैसा है। यहां फ्लड लाइट की तरह अचानक रोशनी नहीं वरन अपने मन की ज्योति को जागृत कर शनैः शनैः ब्रम्हांड का आलोकन होता है। अच्छा कवि वहीं है जो सच्चा है। शिल्प आदि के आवरण के भीतर भी। धन्यवाद सार्थक विषय के लिए। 

अरुण आदित्य
मुक्तिबोध ने बिलकुल सही कहा है कि 'रचनाकार यह जानता है कि रचना के बढते जाने के मार्ग का नक्शा, रचना के पूर्व नहीं बनाया जा सकता, और यदि बनाया गया तो वह यथातथ्य नहीं हो सकता।' इस बात का एक शानदार उदाहरण क्रांतिकारी कवि पाश की निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में देखा जा सकता है।
मैं कविता से मांगता हूं
तुम्हारे लिए नेलपॉलिस की शीशी
छोटी बहन के लिए रंगदार कढाई वाला धागा
पिता के मोतियाबिंद के लिए दवाई
कविता इह तरह की मांगों को शरारत समझती है
और महीने दर महीने अपने रखवालों को
बेंत के डंडे
और नरम बटों वाली बंदूकें देकर भेजती है।
अवतार सिंह पाश
..................
देखा, प्रेयसी के लिए नेल पॉलिस की रूमानी आकांक्षा का सहारा लेकर चली कविता, कवि को धता बताकर किस तरह बंदूक के साथ केलि करने लगी।
मेरा मानना है कि कविता लिखने के लिए कवि होना पडता है। कवि होना दर असल एक आत्म संघर्ष की प्रक्रिया में शामिल होना है। यह आत्म संघर्ष कुछ और नहीं, एक सच्चा मनुष्य बने रहने की जिद है। अपनी संवेदना को बचाए रखने और कमजोरियों से पार पाने की जद्दोजहद। गरल पीकर भी सरल-तरल बने रहने का आत्म संघर्ष।
बाकी जो मैं नहीं समझा पा रहा हूं , उसे वीरेन दा की इन काव्य-पंक्तियों से बहुत सहज तरीके से समझा जा सकता है
कवि
........
इच्छाएं आती हैं तरह तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर जरूरत दर्ज है
एक फेहरिश्त में मेरी हर कमजोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप होकर गर्दन लटका लूंगा
मगर मैं फिर भी जाता रहूंगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।
000 वीरेन डंगवाल