आवाज़ जो पर्दे से बाहर थी
" नाना "
नाना,
तुमने अभिनय नहीं किया—
तुमने आदमी के भीतर
छिपी हुई आग को
उसका चेहरा दिया।
तुम्हारी आवाज़
संवाद नहीं होती थी,
वह जैसे
किसी भूले हुए आदमी की
अचानक सुनाई पड़ गई
आत्मा होती थी।
तुम जब क्रोधित होते थे
तो पर्दा काँपता नहीं था,
हमारे भीतर का
डरा हुआ नागरिक काँपता था।
तुम्हारी आँखों में
नायक कम,
वह आदमी अधिक दिखाई देता था
जिसने जीवन को
बहुत पास से देखा हो—
हारते हुए,
टूटते हुए,
फिर भी
अपनी जगह से न हटते हुए।
तुमने
बंदूक उठाने वाले हाथ को भी
प्रश्न दिया,
और चुप रहने वाले आदमी को भी
एक आवाज़।
कभी तुम
क्रांति की तरह आए, से
कभी व्यंग्य की तरह,
कभी पिता की तरह,
कभी उस बूढ़े कलाकार की तरह
जिसके पास मंच बचा था
लेकिन समय नहीं।
और आज—
मंच खाली है।
कुर्सी पर
तुम्हारी अनुपस्थिति बैठी है,
और दर्शक
पहली बार समझ रहे हैं
कि कुछ कलाकार
फिल्म खत्म होने पर
घर नहीं जाते।
वे
हमारी स्मृति में
एक अधूरा संवाद छोड़ जाते हैं।
तुम चले गए, नाना,
पर तुम्हारी आवाज़
भी भी पूछ रही है—
जिस आदमी को तुमने पर्दे पर देखा था,
क्या वह
तुम्हारे भीतर भी
ज़िंदा है?
पानी की मौत पर आठ कविताऍं
पानी की मौत-1
पानी की मौत
किसी नदी के सूख जाने से नहीं हुई थी।
वह तो बहुत पहले हमारी आँखों से निकलकर
काग़ज़ों में चला गया था—
जहाँ उसकी मात्रा आँकड़ों में बची रही
और प्यास आदमी के गले में।
नदी बहती रही मानचित्र पर,
उसकी देह पर बाँधों के हस्ताक्षर थे
और किनारे मुआवज़े की रसीदें।
गाँव के बूढ़े ने कहा—
पानी कभी मरता नहीं,
बस अपना रास्ता बदलता है।
किसी ने उसकी बात नहीं सुनी।
उसके सामने एक टैंकर खड़ा था
जिस पर लिखा था—
पीने योग्य पानी।
लोग कतार में थे,
लेकिन पानी पहले ही बिक चुका था।
शहर ने बारिश को भी अपने हिसाब से बाँट लिया था—
कुछ बूँदें काँच की इमारतों के लिए,
कुछ विज्ञापनों के लिए,
और बची हुई बारिश उन छतों पर
जहाँ बाल्टियाँ आकाश की ओर खाली मुँह किए खड़ी थीं।
एक बच्चा सूखे नल को खोलकर बहुत देर तक देखता रहा।
उसे विश्वास था कि भीतर कहीं पानी नहीं,
उसका बचपन अटका होगा।
नल ने एक बूढ़ी खाँसी जैसी आवाज़ की
और चुप हो गया।
तभी शहर में एक नया उद्घाटन हुआ—
जल-संरक्षण परियोजना।
मंच पर पानी की तस्वीर थी,
पीछे पानी की तरह चमकता पर्दा,
और भाषण में पानी बार-बार आया।
सिर्फ़ पानी नहीं आया।
उसी रात एक और नदी
काग़ज़ पर जीवित घोषित कर दी गई।
सुबह उसकी तलहटी में मछलियों की जगह
प्लास्टिक मिला।
पानी की मौत दरअसल
मछलियों की मौत से भी पहले हुई थी,
जब हमने उसे जीवन नहीं, संसाधन कहना शुरू किया।
और मनुष्य की मौत शायद उसके बाद—
जब उसे अपनी प्यास के लिए भी
किसी अनुमति की ज़रूरत पड़ने लगी।
अब समुद्र बचा है।
इतना विशाल कि हम उसके सामने
अपनी तबाही को छोटा समझ सकें।
लेकिन समुद्र भी जानता है—
पानी की सबसे भयावह मौत उस दिन नहीं होती
जब आख़िरी बूँद सूखती है;
वह उस दिन होती है
जब प्यासा आदमी पानी को सामने देखकर भी
उसे छू नहीं सकता।
तब पानी पानी नहीं रहता—
वह किसी और की मिल्कियत हो जाता है।
पानी की मौत-2
पानी की मौत किसी दिन नहीं हुई।
वह धीरे-धीरे हमसे अपना चेहरा छिपाता रहा—
पहले कुएँ की आँख में,
फिर नदी की आवाज़ में,
फिर उस घड़े में जिसे दादी अँधेरे में भी
टटोलकर पहचान लेती थीं।
एक दिन घड़ा वहीं था,
दादी नहीं।
पानी भी नहीं।
हमने समझा—
गर्मी बढ़ी है।
लेकिन गर्मी सिर्फ़ मौसम में नहीं थी।
शहर के नक्शे पर नीली रेखाएँ थीं—
इतनी नीली कि उनमें डूबा जा सके।
हमने उनमें सड़कें निकालीं,
कॉलोनियाँ उगाईं,
बाँध खड़े किए
और नदी को उसका पुराना नाम देते रहे।
नदी ने कुछ नहीं कहा।
वह चुपचाप अपने भीतर से
मछलियों की भाषा निकालती रही।
मछलियाँ मरती रहीं।
उनकी आँखों में आख़िरी बार जो चमका था
वह शायद पानी नहीं था—
आकाश था, जो उनके साथ डूब नहीं सका।
पानी की मौत-3
अब पानी नलों में नहीं आता।
वह बिलों में आता है,
रसीदों में,
कंपनियों के लोगो में,
बोतलों के पारदर्शी शरीर में।
उस पर एक तारीख़ छपी है,
एक कीमत,
एक शुद्धता-प्रमाणपत्र और एक चेतावनी—
धूप से बचाकर रखें।
कितनी अजीब बात है—
जिस पानी ने हज़ारों वर्षों तक सूरज को
अपनी देह में ढोया,
उसे अब सूरज से बचाना पड़ता है।
पानी की मौत-4
गाँव में एक बूढ़ा कुआँ है।
उसकी जगत पर बैठा आदमी रस्सी नीचे डालता है।
बहुत देर तक कुछ सुनाई नहीं देता।
फिर एक हल्की-सी टकराहट।
जैसे अँधेरे में किसी ने अपना नाम पुकारा हो।
वह बाल्टी खींचता है।
बाल्टी खाली है।
फिर भी उसमें पानी की गंध है।
बूढ़ा कहता है—
“कुआँ सूखा नहीं है,
बस उसके नीचे हमारी पहुँच ख़त्म हो गई है।”
मैं सोचता हूँ—
क्या पानी सचमुच धरती के नीचे चला गया है,
या हमने धरती से नीचे गिरना शुरू कर दिया है?
पानी की मौत-5
इतिहास में
कई युद्ध पानी के लिए हुए होंगे।
इतिहास की किताब उन्हें नाम देती है।
नदियों के नाम बदलती है,
राजाओं के नाम बचाती है,
हारने वालों की प्यास फुटनोट में रख देती है।
लेकिन पानी इतिहास से अधिक पुराना है।
वह हर साम्राज्य के बाद मिट्टी में बचा रहा।
हर धर्म के पहले उसने मनुष्य को नहलाया।
हर भाषा के पहले उसने प्यास का एक ही अर्थ जाना।
फिर हमने उसका भी विभाजन कर दिया—
यह मेरा पानी,
यह तुम्हारा पानी,
यह पवित्र,
यह अपवित्र,
यह पीने योग्य,
यह उद्योग के लिए।
पानी शायद पहली चीज़ था जिसे मनुष्य ने बाँटा
और आख़िरी चीज़
जिसे वह अपना समझ नहीं पाया।
पानी की मौत-6
रात को शहर सोता है।
ऊँची इमारतों की छतों पर टंकियाँ सोती हैं।
टंकियों के भीतर पानी नहीं—
अगले दिन की सुविधा भरी रहती है।
नीचे फुटपाथ पर एक आदमी सोया है।
उसके पास आधी बोतल पानी है।
वह उसे तकिए की तरह सिर के नीचे रखता है।
सुबह उसकी आँख खुलती है।
बोतल खाली है।
वह कुछ देर बोतल को देखता है,
फिर बोतल को नहीं—
अपने भीतर बचे हुए आख़िरी पारदर्शी स्थान को।
पानी की मौत-7
कहते हैं
पानी की कोई स्मृति नहीं होती।
पर समुद्र हर नदी को पहचानता है।
बादल हर समुद्र से उठते हैं।
बारिश हर बार किसी पुरानी जगह पर गिरती है।
शायद पानी हमसे अधिक याद रखता है—
हमारे हाथों की गर्मी,
हमारे खेतों का स्वाद,
मृतकों की राख,
बच्चों की पहली हँसी,
और वह दिन जब हमने पहली बार
नदी के किनारे एक दीवार खींची थी।
इसलिए शायद नदियाँ सूखते समय कुछ नहीं कहतीं।
वे जानती हैं—
मनुष्य को चेतावनी से अधिक मौन समझ आता है।
पानी की मौत-8
अब आख़िरी बात—
पानी की मौत वह नहीं
जब आख़िरी नदी सूख जाएगी।
न पानी की मौत वह है
जब आख़िरी कुआँ भर जाएगा
और कोई बाल्टी उस तक पहुँच नहीं पाएगी।
पानी की मौत तब होगी
जब एक बच्चा प्यास को सिर्फ़ एक शब्द समझेगा—
जिसका अर्थ किसी पुराने शब्दकोश में लिखा होगा।
और शायद उस दिन भी बारिश होगी।
खिड़की के शीशे पर बूँदें उतरेंगी,
शहर चमकेगा,
पेड़ कुछ देर और हरे दिखाई देंगे—
और हम बारिश को देखकर कहेंगे—
पानी आ गया।
पर पानी नहीं आया होगा।
सिर्फ़ उसकी स्मृति आकाश से उतर रही होगी।
अनिल गंगल
बी-104 ,गाला सेलेस्टिया
वैष्णवदेवी सर्कल के पास
एस पी रिंग रोड
बालाजी विंड पार्क के सामने
अहमदाबाद-382481 [गुजरात ]
Mob.8233809053
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