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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

दिनेश कुशवाह की कविता- उजाले में आजानुबाहु 

भारतीय मानवीय समय का एक छोर ब्राह्मणवाद पास है तो दूसरा दलितवाद के पास .ब्राह्मणवाद के पास तरह-तरह के अंधविश्वासों को और जातीय संकीर्णताओं को सच कि तरह प्रसारित करने में महारत हासिल है तो दलितों के पास भी बिना किसी ईश्वर और मिथक के जीवन जीने का सदियों पुराना अनुभव है .नयी सभ्यता के निर्माण में दलित-जीवन और अनुभवों  की दार्शनिक संभावनाओं का हिंदी में अभी उच्च स्तरीय सृजनात्मक दोहन नहीं हुआ है .जो कुछ भी है वह संसमरणात्मक ही है ,उसमें भविष्योन्मुख प्रगतिशीलता का अभाव है .हिंदी मे ईमानदार जाति-विमर्श अब भी शुरू नहीं हुआ है .शुरू में दलित विमर्श को भी मार्क्सवादी सरोकारों से बाहर ही माना  गया था ,जाति-विमर्श को प्रगतिशीलता के दायरे में न लेने के कारण वह अभी प्रारंभिक दौर में ही है .इस संकोच से भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और रूपांतरण में देर हो रही है .

 कवि दिनेश कुशवाह की कई कविताओं में जातीय चरित्र और मानसिकता को साहित्यिक विमर्श के केंद्र में बेझिझक लाने की रचनात्मक कोशिश मिलती है | इससे अपने ही भारत के कई अनदेखे चहरे सामने आते हैं .उनकी कविताएँ सामाजिक विमर्श के लिए आईना दिखने वाली कविताएँ हैं .उसमें हम अपने समाज की कुरूपताओं को पढ़ सकते हैं |पढ़े जाने के लिए उनकी कविताएँ एक बौद्धिक साहस की  मांग और अपील करती हैं यहाँ प्रस्तुत है  समकालीन राजनीतिक यथार्थ का सामाजिक पाठ प्रस्तुत करने वाली दिनेश कुशवाह की ऐसी ही एक कविता-

  
  उजाले में आजानुबाहु 
                           
बड़प्पन का ओछापन सँभालते बड़बोले
अपने मुँह से निकली हर बात के लिए
अपने आप को शाबाशी देते हैं
जैसे दुनिया की सारी महानताएँ
उनकी टाँग के नीचे से निकली हों
कुनबे के काया-कल्प में लगे बड़बोले
विश्व कल्याण से छोटी बात नहीं बोलते।

वे करते हैं
अपनी शर्तों पर
अपनी पसंद के नायक की घोषणा
अपनी विज्ञापित कसौटी के तिलिस्म से
रचते हैं अपनी स्मृतियाँ और
वर्तमान की निन्दा करते हुए पुराण।

लोग सुनते हैं उन्हें 
अचरज और अचम्भे से मुँहबाए
हमेशा अपनी ही पीठ बार-बार ठोकने से
वे आजानुबाहु हो गये।

उन्होंने ही कहा था तुलसीदास से 
ये क्या ऊल-जलूल लिखते रहते हो
रामायण जैसा कुछ लिखो
जिससे लोगों का भला हो।

गांव की पंचायत में 
देश की पंचायत के किस्से सुनाते 
देश काल से परे बड़बोले
बहुत दूर की कौड़ी ले आते हैं।

सरदार पटेल होते तो इस बात पर
हमसे ज़्ारूर राय लेते
जैसा कि वे हमेशा किया करते थे
अरे छोड़ो यार!
नेहरु को कुछ आता-जाता था
सिवा कोट में गुलाब खोंसने के
तुम तो थे न
जब इंदिरा गांधी ने हमें
पहचानने से इंकार कर दिया 
हम बोले-हमारे सामने
तुम फ्राक पहनकर घूमती थीं इंदू!
लेकिन मानना पड़ेगा भार्इ
इसके बाद जब भी मिली इंदिरा
पाँव छूकर ही प्रणाम किया।
'मैं' उनकेे लिए नहीं बना
वे 'हम' हैं
हम होते तो इस बात के लिए
कुर्सी को लात मार देते
जैसे हमने ठाकुर प्रबल प्रताप सिंह को
दो लात लगाकर सिखाया था
रायफल चलाना।

झाँसी की रानी पहले बहुत डरपोक थीं
हमारी नानी की दादी ने सिखाया था
लक्ष्मीबार्इ को दोनों हाथों तलवार चलाना।

एकबार जब बंगाल में
भयानक सूखा पड़ा था
हमारे बाबा गये थे बादल खोदने
अपना सबसे बड़ा बाँस लेकर।

हर काल-जाति और पेशे में
होते थे बड़बोले पर 
लोगों ने कभी नहीं सुना था
इस प्रकार बड़बोलों का कलरव।

वे कभी लोगों की लाशों पर
राजधर्म की बहस करते हैं-
'शुक्र मनाइए कि हम हैं
नहीं तो अबतक
देश के सारे हिन्दू हो गये होते
उग्रवादी
तो कुछ बड़बोले
नौजवानों को अल्लाह की राह में लगा रहे हैं

कुछ बड़बोलों के लिए
आदमी हरित शिकार है
कमाण्डो और सशस्त्र पुलिस बल से
घिरे बड़बोले कहते हैं
हम अपनी जान हथेली पर लेकर आये हैं।

कभी वे अभिनेत्री के
गाल की तरह सड़क बनाते हैं
कभी कहते हैं सड़क के गढढे में
इंजीनियर को गाड़ देंगे।

जहाँ देश के करोड़ों बच्चे
भूखे पेट सोते हैं
कहते हैं बड़बोले
कोर्इ भी खा सकता है फाइव-स्टार में
मात्र पाँच हजार की छोटी सी रक़म में।

अपनी सबसे ऊँची आवाज़ में
चिल्लाकर कहते हैं वे
स्वयं बहुत बड़ा भ्रष्ट आदमी है यह
श्री किशन भार्इ बाबूराव अन्ना हजारे
इरोम चानू शर्मिला से अनभिज्ञ
देश की सबसे बड़ी पंचायत में
कहते हैं बड़बोले
एक बुढढा आदमी कैसे रह सकता है
इतने दिन बिना कुछ खाये-पिये
और वे भले मानुष
ब्रह्राचर्य को अनशन की ताकत बताते हैं।

यहाँ किसिम-किसिम के बड़बोले हैं
कोर्इ कहता है
इनके एजेण्डे में कहाँ हैं आदिवासी
दलित-पिछड़े और गरीब लोग
ये बीसी-बीसी (भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार) करें
हम इस बहाने ओबीसी को ठिकाने लगा देंगे।

कोर्इ कहता है 
किसी को चिन्ता है टेण्ट में पड़े रामलला की
इस संवेदनशील मुददे पर
धूल नहीं डालने देंगे हम
अभी तो केवल झाँकी है
मथुरा काशी बाकी है।

देवता तो देवता हैं
देवियाँ भी कम नहीं हैं
कहती हैं बस! बहुत हो चुका!!
भ्रष्टाचार विरोधी सारे आंदोलन
देश की प्रगति में बाधा हैं
पीएम की खीझ जायज है
या तो पर्यावरण बचा लो
या निवेश करा लो
छबीली मुस्कान, दबी जबान में
कहती हैं वे
सचमुच बहुत भौंकते हैं
ये पर्यावरण के पिल्लै।

नहीं जानतीं वे कि उन जैसी हजारों
स्वप्न-सुन्दरियों की कंचन-काया
मिटटी हो जायेगी तब भी
बची रहेंगी मेधा पाटकर अरुणा राय और
अरुंधती, चिर युवा-चिरंतन सुंदर।

सचमुच एक ही जाति और जमात के लोग
अलग-अलग समूहों में इस तरह रेंकते
इससे पहले
कभी नहीं सुने गये।

बड़बोले कभी नहीं बोलते
भूख खतरनाक है
खतरनाक है लोगों में बढ़ रहा गुस्सा
गरीब आदमी तकलीफ़ में है
बड़बोले कभी नहीं बोलते।
वे कहते हैं
फिक्रनाट 
बत्तीस रुपये रोज़ में
जिन्दगी का मजा ले सकते हो।

बड़बोले यह नहीं बोलते कि
विदर्भ के किसान कह रहे हैं
ले जाओ हमारे बेटे-बेटियों को
और इनका चाहें जैसा करो इस्तेमाल
हमारे पास न जीने के साधन हैं
न जीने की इच्छा।

बड़बोले देश बचाने में लगे हैं।

बड़बोले यह नहीं बोलते कि
अगर इस देश को बचाना है
तो उन बातों को भी बताना होगा
जिनपर कभी बात नहीं की गर्इ
जैसे मुठठी भर आक्रमणकारियों से
कैसे हारता रहा है ये
तैंतीस करोड़ देवी-देवताओं का देश? 
तब कहाँ थी गीता?
हर दुर्भाग्य को 'राम रचि राखा' किसने प्रचारित किया!
लोगों में क्यों डाली गयी भाग्य-भरोसे जीने की आदत?

पहले की तरह सीधे-सरल-भोले
नहीं रहे बड़बोले
अब वे आशीर्वादीलाल की मुद्रा में
एक ही साथ
वालमार्ट और अन्डरवल्र्ड की 
आरती गाते हैं
तुम्हीं गजानन! तुम्ही षड़ानन!
हे चतुरानन! हे पंचानन!
अनन्तआनन! सहस्रबाहो!!

अब उनके सपने सुनकर
हत्यारों की रुह काँप जाती है
उनकी टेढ़ी नजर से
मिमिआने लगता है
बड़ा से बड़ा माफिया
थिंकटैंक बने सारे कलमघसीट 
उनके रहमों-करम पर जिन्दा हैं।

पृथ्वी उनके लिए बहुत छोटा ग्रह है
आप सम्पूर्ण ब्रह्रााण्ड उनके मुँह में
देख सकते हैं
ऐसे लोगों को देखकर ही बना होगा
समुद्र पी जाने या सूर्य को
लील लनेे का मिथक।

बड़बोले पृथ्वी पर
मनुष्य की अन्यतम उपलबिधयों के
अन्त की घोषणा कर चुके हैं
और अन्त में बची है पृथ्वी
उनकी जठरागिन से जल-जंगल-जमीन
खतरे में हैं
खतरे में हैं पशु-पक्षी-पहाड़
नदियाँ-समुद्र-हवा खतरे में हैं
पृथ्वी को गाय की तरह दुहते-दुहते
अब वे धरती का एक-एक रो आं
नोचने पर तुले हैं
हमारे समय के कारपोरेटी कंस 
कोर्इ संभावना छोड़ना नहीं चाहते
भविष्य की पीढि़यों के लिए
अतिश्योकित के कमाल भरे
बड़बोले इनके साथ हैं।

बड़बोलों ने रच दिया है
भयादोहन का भयावह संसार
और बैठा दिये हैं हर तरफ
अपने रक्तबीज क्षत्रप।

तमाम प्रजातियों के बड़बोले
एक होकर लोगों को डरा रहे हैं
इस्तेमाल की चीजों के नाम पर
वैज्ञानिकों की गवाही करा रहे हैं
ब्लेड, निरोध, सिरींज तो छोडि़ये
वे लोगों को नमक का
नाम लेकर डरा रहे हैं।

अब हँसने की चीज नहीं रहा 
चमड़े का सिक्का
उन्होंने प्लाटिक को बना दिया 
'मनी' और पारसमणि 
छुवा भर दीजिए सोना हाजिर।

बड़बोले ग्लोबल धनकुबेरों का आहवान
देवाधिदेव की तरह कर रहे हैं
'कस्मै देवाय हविषा विधेम'
पधारने की कृपा करें देवता!
अतिथि देवो भव!!
मुख्य अतिथि महादेवो भव!!!

बड़बोले आचार्य बनकर बोल रहे हैं
जगती वणिक वृतित है
पैसा हाथ का मैल
हम संसार को हथेली पर रखे
आँवले की तरह देखते हैं
'वसुधैव कुटुम्बकम' तो
हमारे यहाँ पहले से ही था।

भूख गरीबी और भ्रष्टाचार के 
भूमण्डलीकरण के पुरोहित 
बने बड़बोले सोचते हैं
बर मरे या कन्या
हमें तो दक्षिणा से काम।

बड़बोले भगवा, कासक, जुब्बा
पहनकर बोल रहे हैं
पहनकर बोल रहे हैं
चोंगा-एप्रिन और काला कोट
बड़बोले खददर पहनकर
दहाड़ रहे हैं।

पर आश्चर्य!!
कश्मीर से लेकर कन्या कुमारी तक
कोर्इ असरदार चीख नहीं
सब चुप्प।
जिन्होंने कोशिश की उन्हें 
वन, कन्दरा पहाड़ की गुफाओं में 
खदेड़ दिया गया।

बड़बोले ग्रेट मोटीवेटर बनकर
संकारात्मक सोच का व्यापार कर रहे हैं
और कराहने तक को 
बता रहे हैं नकारात्मक सोच का परिणाम।

बड़बोले प्रेम-दिवस का विरोध
और घृणा-दिवस का प्रचार कर रहे हैं
वे भार्इ बनकर बोल रहे हैं
वे बापू बनकर बोल रहे हैं
वे बाबा बनकर बोल रहे हैं।

बड़बोले अब पहले की तरह फेंकते नहीं
बाक़ायदा बोलने की तनख्वाह या
एनजीओ का अनुदान लेते हुए
अखबारों में बोलते हैं
बोलते हैं चैनलों पर
एंकरों की आवाज़ में बोलते हैं।

बाजार के दत्तक पुत्र बने बड़बोले
बड़े व्यवसायियों में लिखा रहे हैं अपना नाम 
और येन-केन-प्रकारेण
बड़े व्यवसायियों को कर रहे हैं
अपनी बिरादरी में शामिल।

शताब्दी के महानायक बने बड़बोले
बिग लगाकर तेल बेच रहे हैं
बेच रहे हैं भारत की धरती का पानी
बड़बोले हवा बेचने की तैयारी में हैं।

कहाँ जायें? क्या करें?
जल सत्याग्रह! या नमक सत्याग्रह!
गांधीवाद या माओवाद!
एक बूँद गंगा जल पीकर
बोलो जनता की औलाद!!

बड़बोले अब मदारी की भाषा नहीं
मजमेबाजों की दुराशा पर जिन्दा हैं
कि आज भी असर करता है
लोगों पर उनका जादू
बड़बोले खुश हैं
हम खुश हुआ कि तर्ज पर
कि उन्होंने लोगों को
ताली बजाने वालों की
टोली में बदल दिया।

बड़बोले अर्थशास्त्र इतिहास
शिक्षा-संस्कृति और सभ्यता पर
बोल रहे हैं, बोल रहे हैं
साहित्य-कला और संगीत पर
सेठों और सरकारी अफसरों के रसोइये
बड़बोले कवियों की कामनाओं और
कामिनियों के कवित्व का
आखेट कर रहे हैं।

बड़बोले समझते हैं
जिसकी पोथी पर बोलेंगे
वही बड़ा हो जायेगा
सारे लखटकिया और लेढ़ू
पुरस्कारों के निर्णायक वही हैं।

परन्तु वे किसी के सगे नहीं हैं
वे जिस पौधे को लगाते हैं
कुछ दिनों बाद एकबार
उसे उखाड़कर देख लेते हैं
कहीं जड़ तो नहीं पकड़ रहा।

अगर आप उनके दोस्त बन गये
तो वे आपको जूता बना लेंगे
पहनकर जायेंगे हर जगह
मंदिर-मसिजद-शौचालय
और दुश्मन बन गये 
तो आप
उनकी नीचता की कल्पना नहीं कर सकते।

वे चुप रहकर कुछ भी नहीं करते
सिवाय अपनी दुरभिसंधियों के
खाने-पचाने की कला में निपुण बड़बोले
अब अपने बेटे-दामाद-भार्इ-भतीजों को
बना रहे हैं भोग कुशल-बे-हया।

शीर्षक से उपरोक्त बने बड़बोलों को
अब किसी बात का मलाल नहीं होता
उन्हें इसकदर निडर और लज्जाहीन
अहलकारों ने बनाया या उस्तादों ने
उन्हें आदत ने मारा या अहंकार ने
कहा नहीं जा सकता
पर उन्होंने वाणी को भ्रष्ट कर दिया 
भ्रष्ट कर दिया आचारण को
ग्रस लिया तंत्र को
डँस लिया देश को
सिर्फ बोलते और बोलते हुए
वाणी के बहादुरों ने
लोकतंत्र पर कब्जा कर लिया
और बाँट दिया उसे
जनबल और धनबल के बहादुरों में 
और अब तीनों मिलकर 
देश पर मरने वालो को
पदक बाँट रहे हैं।

प्रस्तुति-बिजूका समूह
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टिप्पणियाँ:-

संजीव:-
इस तरह की कवितायें अच्छी दिखती हैं पर इनसे कोई सार्थक विमर्श नहीं पैदा होता हैं।

पूनम:-
मान्यवर, उजाले मे अजानुबाहु यह कविता अपना असर छोड़ने वाली कविता है तथा सम सामयिक वक्तव्य तथा विवादास्पद मुद्दे लेकर बहुत सच्चाई के साथ लिखी गई है देखिएगा कि कवि ने जैसे जैसे अपनी अभिव्यक्ति दी वैसे वैसे ही हमे इसका हरेक शब्द समझ लेना चाहिए । उस लिहाज से तो यह कवि बधाई के पात्र हुए ही ना

दीपक मिश्रा:-:
अद्भुत कविता। गुस्से और क्षोभ को सम्प्रेषित करती और समाज के पाखण्ड को उजागर करती। रिबेल की कविता ऐसी ही होगी अपितु, ऐसी ही होनी चाहिए। रेटोरिक और स्फीति को छोड़ दे तो बड़े पाए की कविता।

पाखी:-
सचमुच एक ही जाति और जमात के लाेग/अलग-अलग समूहाें में इस तरह रेंकते/इससे पहले/कभी नहीं सुने गये.... वाकई बड़बाेलेपन की सारी सीमाएं लांघने वाले लाेगाें की बाढ़ आ गई है... समय के सच को बड़ी गहराई से बयां करती बड़े फलक की बेहतरीन कविता. कवि काे हार्दिक बधाई!

संजीव:-
रिबेल की कविता बहुत डिफरन्ट होती  है। रिबेल किसके खिलाफ यही स्पष्ट नहीं हो तो रिबेल कैसे नया सृजन करेगा। रिबेल में विद्वेष नहीं विद्रोह होता है, जिसके समक्ष सृजन का साफ नक्शा होता है।

आइये आज पढ़ते हैं नंदना पंकज जी की कुछ रचनाएँ।

आइये आज पढ़ते हैं नंदना पंकज जी की कुछ रचनाएँ।
पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाओं से अवगत जरुर कराये ।

"बंदिनी का संशय"

अब जबकि तुम
लगातार लिख रहे हो
मेरे लिये
प्रेम और मुक्ति की
कविताएँ, 
मेरी सुप्त जिजीविषा को
जगाते हुए,
दिखा रहे हो
सपने
उन्मुक्त आकाश के,
भर रहे हो नस-नस में
विद्रोह की चिंगारियाँ,
और तुम्हारे  
भावपूर्ण शब्दों के स्रोत से
अद्भुत ऊर्जा जुटाकर
मैं यथाशक्ति
फड़फड़ा रही हूँ
अपने लहूलुहान
कतरे-छँटे पंखों को,
संभव है शीघ्र ही
पिंजरा तोड़ मुक्त हो जाऊँ,
किंतु क्या तुम 
आश्वस्त कर सकते हो मुझे
कि बाहर और शिकारी
घात लगाये नहीं
बैठे होंगे 
मुझे नोच खाने के लिये,
सुरक्षित रहेगी
मेरी उड़ान
दुनिया के तेज़
नाखूनी पंजो से...
        

            
"रोटी का मुल्य"

एक बार फिर 
सिद्ध कर दिया तुमने
कि रोटी का मूल्य
किसी भी दौलत से
कहीं अधिक है ,
तभी तो उस भुखे की
दसगर्दा धूनाई की,
जम कर उतारा उसपे
मन की सारी भड़ास,
अधमरा करके छोड़ा उसे
रोटी चुराने के अक्षम्य अपराध में,
देश चुराके खाने वाला
दूर देश में बैठे
अट्टहास कर रहा है
हमारी न्याय व्यवस्था पे, 
'सबसे बड़ा चोर कौन'
इसपे बहस के लिये
संसद में तैयारी हो रही है
जूतम-पैज़ार की।

          
"तम के विपक्ष में"

निःसंदेह अंतरिक्ष में
अंधेरा ही प्रतीत होता है
हर समय,
किंतु सत्य तो यह है कि
अनादि काल से 
अनवरत चल रहा है
प्रकाश का अनंत आवागमन 
एक अंतहीन अज्ञात 
गंतव्य की ओर,
बस वहाँ फैला अक्षुण्ण निर्वात
परावर्तित नहीं होने देती
अगणित असंख्य किरणों की 
एक भी तार
हमारी दृष्टि तक,
और हम स्वीकार लेते हैं
अंधकार की सत्ता को,
ठीक हमारे शासकों के
हृदय की भाव-शुन्यता
पर्याप्त रोशनी के बावज़ुद
गहन कर रही है तिमिर को
हमारे समक्ष,
इस निर्वात में उपस्थित नहीं
जब तक
करुणा, संवेदना, मनस्ताप,
भावोद्गार जैसे कुछ पदार्थ,
तो क्यूँ न साथी 
तम के विपक्ष में
कोई उपग्रह स्थापित करें हम
इस शुन्य में,
जो भले ही स्वयं दैदिप्यमान न हो
फिर भी चन्द्रमा की तरह
कुछ उजालों को मोड़ सके 
हमारी दृष्टि तक,
कण-कण में वितरित कर सके चाँदनी
कब तक सुर्योदय की
अपुरणीय प्रतिक्षा में भ्रमित 
हाथ पर हाथ धरे 
बैठे रहेंगे हम...

          
"परिश्रम का फल"

'परिश्रम का फल मीठा होता है।" 
बहुत ही बड़ा झूठ है ये,
परिश्रम का फल मीठा नहीं
नमकीन होता है,
क्युँकि सींचा जाता है इसे
श्रमिकों की कभी न
सुखने वाली
पसीने की धार से,
प्रायः घुला होता इसमें
आँसू और लहू का
अतिरिक्त लवण,
और युँ नमक
इतना तेज़ हो जाता है कि
फल खा ही नहीं पाता
श्रमिक 
सो जाता है
भूखे पेट...

प्रस्तुति-बिजूका समूह               

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टिप्पणी:-

संजीव:-
बंदिनी का संशय स्त्री मुक्ति के संदर्भ में पढी जाये तो बहुत कमजोर रचना है। बंदिनी जिस वजह से बंदिनी है उससे ही मुक्ति की आस और भविष्य में सुरक्षा की आश्वति चाहती है। एक बहुत.कमतर समझ.को प्रस्तुत करती है।

महान चिन्तक राहुल सांकृत्यायन के कुछ विचारणीय उद्धरण

महान चिन्तक राहुल सांकृत्यायन के कुछ विचारणीय उद्धरण

▫हमें अपनी मानसिक दासता की बेड़ी की एक-एक कड़ी को बेदर्दी के साथ तोड़कर फ़ेंकने के लिए तैयार रहना चाहिये। बाहरी क्रान्ति से कहीं ज्यादा ज़रूरत मानसिक क्रान्ति की है। हमें आगे-पीछे-दाहिने-बांये दोनों हाथों से नंगी तलवारें नचाते हुए अपनी सभी रुढ़ियों को काटकर आगे बढ़ना होगा।

▫असल बात तो यह है कि मज़हब तो सिखाता है आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना। हिन्दुस्तानियों की एकता मज़हब के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मज़हबों की चिता पर। कौव्वे को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मज़हबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसकी मौत को छोड़कर इलाज नहीं।

▫यदि जनबल पर विश्‍वास है तो हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जनता की दुर्दम शक्ति ने, फ़ासिज्म की काली घटाओं में, आशा के विद्युत का संचार किया है। वही अमोघ शक्ति हमारे भविष्य की भी गारण्टी है।

▫रूढ़ियों को लोग इसलिए मानते हैं, क्योंकि उनके सामने रूढ़ियों को तोड़ने वालों के उदाहरण पर्याप्त मात्रा में नहीं है।

▫ हमारे सामने जो मार्ग है उसका कितना ही भाग बीत चुका है, कुछ हमारे सामने है और बहुत अधिक आगे आने वाला है। बीते हुए से हम सहायता लेते हैं, आत्मविश्वास प्राप्त करते हैं, लेकिन बीते की ओर लौटना कोई प्रगति नहीं, प्रतिगति-पीछे लौटना होगा। हम लौट तो सकते नहीं क्योंकि अतीत को वर्तमान बनाना प्रकृति ने हमारे हाथ में नहीं दे रखा है।

▫धर्म आज भी वैसा ही हज़ारों मूढ़ विश्वासों का पोषक और मनुष्य की मानसिक दासता का समर्थक है जैसा पाँच हज़ार वर्ष पूर्व था।… सभी धर्म दया का दावा करते हैं, लेकिन हिन्दुस्तान के इन धार्मिक झगड़ों को देखिये तो मनुष्यता पनाह माँग रही है।
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प्रस्तुति-बिजूका समूह

एदुआर्दो गालेआनो की एक अनुवादित कविता दुनिया भर में डर

आज प्रस्तुत है एदुआर्दो गालेआनो की एक अनुवादित कविता

दुनिया भर में डर

जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं
कि उनकी नौकरी छूट जायेगी
जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं
कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा
जिन्हें चिंता नहीं है भूख की
वे भयभीत हैं खाने को लेकर
लोकतंत्र भयभीत है याद दिलाये जाने से और
भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर
आम नागरिक डरते हैं सेना से,
सेना डरती है हथियारों की कमी से
हथियार डरते हैं कि युद्धों की कमी है
यह भय का समय है
स्त्रियाँ डरती हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष
डरते हैं निर्भय स्त्रियों से
चोरों का डर, पुलिस का डर
डर बिना ताले के दरवाज़ों का,
घड़ियों के बिना समय का
बिना टेलीविज़न बच्चों का, डर
नींद की गोली के बिना रात का और दिन
जगने वाली गोली के बिना
भीड़ का भय, एकांत का भय
भय कि क्या था पहले और क्या हो सकता है
मरने का भय, जीने का भय.
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प्रस्तुति-बिजूका समूह

प्रवासी स्त्री मज़दूर: घरों की चारदीवारी में क़ैद आधुनिक ग़ुलाम:- लता

सुभोर साथियो,

आज आप सबके लिए प्रस्तुत है एक लेख इसे पढ़ें व खूब चर्चा करें ।

प्रवासी स्त्री मज़दूर: घरों की चारदीवारी में क़ैद आधुनिक ग़ुलाम:- लता

अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार विश्व स्तर पर होने वाले मज़दूरों के प्रवास में स्त्री मज़दूरों का हिस्सा आधे के बराबर है। लेकिन श्रम के चरित्र के निर्धारण में प्रवासी स्त्री मज़दूरों के पास विकल्प न के बराबर है और ये जिस देश में जाती हैं वहाँ भी श्रम विभाजन में लिंग भेद का प्रत्यक्ष सामना करती हैं। उनके हिस्से वही काम आता है जिसे परम्परागत रूप से औरतों के काम का दायरा समझा जाता है-साफ़-सफ़ाई, खाना बनाना, कपड़े धोना, बच्चों-बुज़ुर्गों की देखभाल आदि घरेलू कामकाज। घरेलू श्रम, श्रम का सबसे अनुत्पादक, उबाऊ और थकाने वाला स्वरूप होता है। घरों में मानो यह प्राकृतिक तौर पर स्थापित है कि ये काम घर की औरतें ही करेंगी। लेकिन आज पूँजीवाद के भूमण्डलीकरण के इस दौर में धनी देशों का एक बड़ा तबक़ा और विकासशील देशों का भी एक तबक़ा निजीकरण और नवउदारवादी नीतियों का फ़ायदा उठाकर जीवन के सारे ऐशो-आराम और ऐश्वर्य के मज़े लूट रहा है। वह तबक़ा अपने वर्ग की औरतों के लिए ‘सापेक्षिक’ आज़ादी ख़रीदने की क्षमता रखता है और उन्हें इन घरेलू कामकाज से मुक्त करने के लिए दूसरों का श्रम ख़रीदता है। जैसाकि पहले ही कहा गया है कि घरेलू श्रम, श्रम का सबसे अनुत्पादक, बर्बर, उबाऊ और थकाने वाला स्वरूप है, लेकिन बाहर से ख़रीदे जाने पर अक्सर यह बर्बरता का भीषणतम रूप अख्‍त़ियार कर लेता है। श्रम का यह स्वरूप अपने घरेलू दायरे की वजह से सर्वाधिक असुरक्षित और असंगठित क्षेत्र बनकर रह जाता है। घरेलू श्रम की सुरक्षा के लिए क़ानून न के बराबर हैं और जो हैं भी उनका लागू होना कठिन है।

घरेलू श्रम के रूप में प्रवासी मज़दूरों की स्थिति और भी असुरक्षित हो जाती है। सभी विकसित देशों में आप्रवासन क़ानूनों के ज़्यादा कठोर होने की वजह से ये घरेलू मज़दूर अपने मालिकों से पूरी तरह बँधे होते हैं और बचकर भाग निकलने की स्थिति में उन्हें देशनिकाला का सामना करना पड़ता है। दूसरे देश जाकर काम करने के लिए वीज़ा, पासपोर्ट और यात्रा में होने वाले ख़र्चे के लिए ये अक्सर स्थानीय सूदख़ोरों से भारी क़र्ज़ लेते हैं जिसकी भरपाई नहीं होने पर इनके लिए अपने देश वापस जाना बेहद कठिन होता है। उन्हें पता होता है कि उनकी नौकरी घर के छोटे भाई-बहनों या बेटे-बेटियों के भोजन का, बूढ़े या बीमार माँ-बाप के पोषण-इलाज का एकमात्र ज़रिया है। इसलिए मालिकों द्वारा दी जाने वाली शारीरिक-मानसिक प्रताड़नाओं को सहने के अलावा इनके पास कोई और चारा नहीं रहता। वैसे तो खाड़ी देशों से लेकर विकसित देशों तक सभी जगह प्रवासी मज़दूरों की स्थिति गुलामों की तरह ही है। लेनिन ने 1913 में एक लेख लिखा था ‘सभ्य यूरोपीय और बर्बर एशियाई’, जिसमें तथाकथित सभ्य यूरोपीय समाज के ऊपर कटाक्ष किया था। इसमें उन्होंने बताया कि रंगून में एक ब्रिटिश कर्नल ने घर में काम करने वाली एक 11 साल की लड़की का बलात्कार किया था। इसके बाद जज ने कर्नल को ज़मानत दे दी और कर्नल ने अपने ख़रीदे गवाहों से यह सिद्ध किया कि वह 11 साल की लड़की वेश्या है और फिर जज ने कर्नल को केस से पूरी तरह बरी कर दिया।

घर में काम करने वाले मज़दूरों की स्थिति हमेशा से ही ख़राब रही है, लेकिन आज जब पूँजीवाद अपने सबसे अनुत्पादक और परजीवी चरण में पहुँच गया है और इसने मानवीय मूल्यों के क्षरण और पतन की सारी सीमाएँ तोड़ दी हैं तो इन परिस्थितियों में समाज का सर्वाधिक कमज़ोर और अरक्षित हिस्सा जैसे बच्चे, औरतें और घरों में काम करने वाले आदि इस क्षरण और पतन का शिकार सबसे ज़्यादा होता है। घरों में काम करने वाले स्त्री-पुरुषों के साथ मार-पीट, गालियाँ, यौन उत्पीड़न बेहद सामान्य है लेकिन पिछले एक दशक से स्त्री मज़दूरों में जो ज़्यादातर घरेलू नौकरानी का काम करती हैं, उनमें काम की जगह से भागने के दौरान मौत या आत्महत्या की घटनाएँ बहुत अधिक बढ़ी हैं। इस उत्पीड़न से बच निकली स्त्रियों के लिए लेबनान तथा यूरोप के कई देशों में कुछ आश्रय गृह बने हैं। ब्रिटेन के आश्रयगृह में रहने वाली एक औरत का कहना है कि वह भाग्यशाली है कि वह बच निकली लेकिन उसके जैसी हज़ारों-हज़ार ऐसी औरतें हैं जो चुपचाप यह अत्याचार और उत्पीड़न झेल रही हैं और उनके पास बच निकलने का कोई रास्ता भी नहीं है।

आइएलओ के अनुसार स्त्री मज़दूरों के प्रवास और घरेलू श्रम के बीच स्पष्ट सम्बन्ध है। प्रवासी मज़दूर औरतें मुख्यतः घरों में काम करने के लिए विदेश जाती हैं। भारत, चीन, फ़िलिपींस, श्रीलंका, कम्बोडिया, बर्मा, सब-सहारा अफ़ीका के देशों से मज़दूर स्त्रियाँ खाड़ी देशों, चीन, मलेशिया, सिंगापूर, थाइलैण्ड आदि देशों में घरेलू नौकरानी का काम करने के लिए जाती हैं तथा अमेरिका में इन देशों के अलावा भारी तादाद में लातिन अमेरिका के देशों से औरतें घरेलू काम के लिए जाती हैं। इसके अलावा कई औरतों को घरेलू काम दिलाने का वायदा करके ले जाया जाता है और उन्हें जबरन वेश्यावृत्ति में धकेल दिया जाता है। मानव तस्करी की शिकार औरतें भी वेश्यावृत्ति के जाल में फँस जाती हैं।

domestic worker 2खाड़ी देशों में कम से कम 146,000 प्रवासी घरेलू कामगार हैं जिनमें से ज़्यादातर एशिया और अफ़ीका के देशों से हैं। अन्य प्रवासी मज़दूरों की तरह ये घरेलू मज़दूर औरतें भी अपने मालिकों से ‘कफ़ाला व्यवस्था’ से बँधी होती हैं। इस व्यवस्था के अनुसार अपना कॉन्ट्रैक्ट पूरा होने तक मज़दूर अपने मालिक या एजेण्ट से बँधा होता है। वह किसी भी हालत में काम नहीं छोड़ सकता, न ही कॉन्ट्रैक्ट तोड़ सकता है। यहाँ तक कि अपने देश वापस आने की भी इजाज़त मालिक की रज़ामन्दी पर ही मिलती है। इस व्यवस्था की वजह से ज़्यादातर मज़दूर औरतें हिंसा, उत्पीड़न और अत्याचार भरे माहौल में जकड़कर रह जाती हैं। ‘कफ़ाला व्यवस्था’ संयुक्त अरब अमीरात में आने वाले सभी स्त्री-पुरुष मज़दूरों पर लागू होती है, लेकिन घर की चारदीवारी में बन्द किसी मज़दूर औरत को यह व्यवस्था बिल्कुल अलगाव में डाल कर, निराश, हताश और असुरक्षित कर देती है। ह्यूमन राइट वाच (एचआरडब्यू) ने संयुक्त अरब अमीरात में घरेलू काम करने वाली 99 औरतों का साक्षात्कार लिया गया था, इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व के सबसे अमीर देश में इन घरेलू मज़दूर औरतों को बिना आराम लगभग 21 घण्टों तक काम करना पड़ता है, बेहद कम या लगभग न के बराबर भुगतान किया जाता है, ज़्यादातर को खाने को पर्याप्त नहीं मिलता, पिटाई आम बात है, कहीं भी आने-जाने पर पाबन्दी होती है, कइयों का यौन उत्पीड़न होता है और लगभग सभी का पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया जाता है। मज़दूर अधिकारों के हनन और अपनी ‘कफ़ाला व्यवस्था’ के लिए कुख्यात संयुक्त अरब अमीरात अब अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के प्रबन्ध मण्डल (गवर्निंग बोर्ड) का प्रभावी सदस्य होने जा रहा है।

गार्डियन अख़बार के डैन मैकडगॉल ने मध्य एशिया से लेकर ब्रिटेन तक में घरेलू स्त्री मज़दूरों के शोषण और उत्पीड़न पर एक रिपोर्ट बनायी है, जिसमें उन्होंने दिखाया है कि घरेलू स्त्री मज़दूरों की मृत्यु की बढ़ती घटनाएँ जिसे मध्य एशिया की सरकारें आत्महत्या कहकर केस बन्द कर देती है, वास्तव में वह या तो मालिकों द्वारा की गयी हत्या होती है या बेहद असह्य, बर्बर और अमानवीय काम की परिस्थितियों से बचकर भागने की कोशिश में हुई मौत होती है। यदि ये किसी तरह भाग भी निकलती हैं तो पुलिस इन्हें पकड़कर वापस मालिकों तक पहुँचा देती हैं। इसके अलावा यहाँ नौकरों के लिए कोई श्रम क़ानून नहीं है। 2012 में एक इथियोपियाई नौकरानी को लेबनान में सड़क पर बुरी तरह पीटा गया, एजेण्ट उसे ज़बरन वापस भेजना चाहते थे। राहगीर बस देख रहे थे, लेकिन कोई भी इस महिला को बचाने के लिए आगे नहीं आया। पुलिस द्वारा अस्पताल पहुँचाने के दो दिनों बाद इस महिला ने अस्पताल में आत्महत्या कर ली। वह महिला वापस अपने देश नहीं जा सकती थी और कफ़ाला व्यवस्था की वजह से वह कहीं और काम नहीं कर सकती थी। समझा जा सकता है कि ‘कफ़ाला व्यवस्था’ मज़दूरों को किस कदर हताश-निराश छोड़ देती है। मगर  यह व्यवस्था यदि हट भी जाये तो भी घरेलू मज़दूरों की स्थिति में ख़ास परिवर्तन की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, क्योंकि मध्य एशिया में घरेलू मज़दूरों के लिए कोई क़ानूनी अधिकार नहीं हैं।

यूरोप में मज़दूरों के लिए दर्ज क़ानूनी अधिकार के सम्बन्ध में भी प्रवासी मज़दूरों की स्थिति को लेकर गहरी उदासीनता है और प्रवासी घरेलू मज़दूरों की चर्चा न के बराबर है। यूरोप में भी घरेलू मज़दूरों की स्थिति भी विश्व के अन्य हिस्सों जैसी ही हैं, बर्बर, अमानवीय गुलामों सी। वर्तमान समय में ब्रिटेन में घरेलू मज़दूरों की माँग विश्व के किसी भी हिस्से से सबसे ज़्यादा है। डैन मैकडगॉल की ही रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में 86 प्रतिशत घरेलू मज़दूरी करने वाली प्रवासी स्त्रियों को 16 घण्टे से ज़्यादा काम करना पड़ता है, 71 प्रतिशत को भोजन न के बराबर मिलता है, 32 प्रतिशत के पासपोर्ट जब्त कर लिये गये हैं और 32 प्रतिशत के साथ शारीरिक और यौन उत्पीड़न होता है।

मई-जून 2014 में लातिन अमेरिका के ग़रीब और पिछड़े देश जैसे एल सल्वादोर, होंडुरास आदि देशों में माफ़िया और एजेण्टों ने यह अफ़वाह उड़ा दी कि अमेरिकी सरकार छोटे बच्चों वाली और गर्भवती महिलाओं के प्रति सहानुभूति दर्शाते हुए उन्हें अमेरिकी नागरिकता दे रही है। ग़रीबी और बेरोज़गारी की मार झेल रही कई लातिनी महिलाएँ  बेहतर ज़िन्दगी की उम्मीद में उनके पास जो कुछ भी था, उसे एजेण्ट के कमीशन और यात्रा के ख़र्चे पर फूँककर अमेरिका-मेक्सिको बॉर्डर पार करने चली आयीं। यहाँ आकर उन्हें सच्चाई का पता चला और अब वे अधर में हैं। यदि वे वापस चली भी गयीं तो उनके पास कुछ भी बचा नहीं है। अब पकड़े जाने पर उनके पास अमेरिका में रहने का कोई उपाय नहीं। वहीं अचानक से आयी औरतों और बच्चों की इस बाढ़ को देखकर ओबामा ने सीमा क्षेत्र पर सुरक्षा और सख़्त करने का ऐलान किया है।

लातिन अमेरिका से आयी गै़र-क़ानूनी प्रवासी औरतों की जीवन परिस्थितियाँ भी पुरुषों के समान ही कठिन होती हैं, लेकिन इस आबादी के बड़े हिस्से को विकल्पहीनता की स्थिति में या ज़बरदस्ती वेश्यावृत्ति या नशीले पदार्थों की बिक्री के व्यापार में धकेल दिया जाता है। ग़ैर क़ानूनी आप्रवासी मज़दूर जिसमें औरतें भी शामिल हैं सर्वाधिक श्रमसाध्य काम करते हैं और उन्हें बेहद कम या न के बराबर मेहनताना मिलता है।

अमेरिका में भी घरेलू मज़दूरों की स्थिति विश्व के बाक़ी हिस्सों जैसी ही है। यहाँ भी घरेलू काम ज़्यादातर फ़िलिपींस, इण्डोनेशिया, अप्ऱफ़ीका और लातिन अमेरिका से आयी औरतें ही करती हैं। कई ऐसी घटनाएँ सामने आयी हैं जिनमें घरेलू मज़दूरों को बिना पगार क़ैद करके सालों काम करवाया गया। ऐनी जॉर्ज नाम की एक महिला ने एक गै़र-क़ानूनी प्रवासी महिला को 5 सालों तक अपने बँगले में क़ैद कर गुलामों की तरह खटाया था। यह कोई अकेली घटना नहीं है, इसके अलावा प्रवासी औरतें जो क़ानूनी तौर पर घरों में काम करती हैं, उनकी स्थिति कोई ख़ास बेहतर नहीं है। ये भी बिना छुट्टी पूरे-पूरे सप्ताह 16 से 18 घण्टे काम करती हैं, खाने को कम और सोने की उचित जगह भी नहीं मिलती है।

28 फ़रवरी 2014 को हाँगकाँग शहर में सैकड़ों प्रवासी घरेलू स्त्री मज़दूरों ने अपने अधिकारों के लिए एक प्रदर्शन किया। आईएलओ की रिपोर्ट के अनुसार पूरे विश्व में घरेलू मज़दूरों के मात्र 10 प्रतिशित हिस्से को न्यूनतम मज़दूरी मिलती है।  जापान और कोरिया जैसे देशों में जहाँ न्यूनतम मज़दूरी लागू की जाती है, वहाँ भी घरेलू मज़दूर न्यूनतम मज़दूरी के दायरे से बाहर रह जाते हैं। वैसे घरेलू मज़दूर जो किसी एक मालिक के लिए काम नहीं करते और जो मालिक के साथ नहीं रहते, उनके लिए अपने क्षेत्र के बाक़ी मज़दूरों के साथ मिलकर न्यूनतम मज़दूरी और काम की परिस्थितियों में सुधार के लिए संघर्ष कर पाना थोड़ा आसान होगा। लेकिन किसी दूसरे देश से आकर 24 घण्टे मालिक के साथ रहने वाली प्रवासी स्त्री मज़दूरों की स्थिति बेहद कठिन होती है, क्योंकि वे समाज के बाक़ी हिस्सों से कटी हुई होती है। यदि कोई सम्पर्क भी हो तो भाषाई और संस्कृति भेद की वजह से दूरी बनी रहती है।

यह व्यवस्था जो ग़रीबों को अपनी जगह-ज़मीन से उजड़कर अनजान शहर और देश की ओर प्रवास करने के लिए मजबूर करती है, मज़दूर के शरीर के एक-एक कतरे को निचोड़ने के लिए रोज़ नये-नये दाँत तेज़ करती है, वह एक-दो क़ानून बना भी दे तो वह हाथी के दिखाने के दाँत होंगे। इसके अलावा घर की चारदीवारी के अन्दर किसी भी क़ानून का प्रभावी ढंग से लागू हो पाना असम्भवप्राय है। कहा जा सकता है कि इन क़ानूनों की स्थिति भी भारत में दहेज़ या घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानूनों की तरह ही होगी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हक़ों के लिए लड़ा नहीं जाये। पहले तो इन क़ानूनों को बनाने के लिए संघर्ष करना ही होगा, इस असुरक्षित, घरों में क़ैद मज़दूर आबादी को क़ानूनी हक़ के दायरे में लाया जाना बेहद ज़रूरी है।

जब तक ऐसा कोई समाज अस्तित्व में नहीं आता जो घरेलू काम से औरतों को मुक्त नहीं करता और इन कामों को घर की चारदीवारी से निकालकर समाज की ज़िम्मेदारी नहीं बना देता, घरेलू दायरे में होने वाले उत्पीड़न या हिंसा से समाज को और औरतों को मुक्त नहीं किया जा सकता। हमें लेनिन के उस कथन को नहीं भूलना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि औरतों की मुक्ति तब तक सम्भव नहीं जब तक उन्हें चूल्हे-चौके और बच्चों के परवरिश से मुक्त नहीं किया जाता। इन सारे कामों के पूरा करने की ज़िम्मेदारी समाज को लेनी होगी, तब ही सही मायने में औरतों की मुक्ति की ज़मीन तैयार होगी। 1917 की रूस की सर्वहारा क्रान्ति ने यह कर दिखाया था, औरतों को चूल्हे-चौके की गुलामी से मुक्त किया और कई ऐसे स्त्री विरोधी क़ानूनों को ख़त्म कर नये क़ानून बनाये गये और उन्हें लागू किया गया जिससे सही मायनों में औरतों को समाज में समान हक़ और अधिकार मिले। औरतें सही मायने में आज़ाद हुईं।
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प्रस्तुति-बिजूका समूह