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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

फ़िल्म निर्देशक माजिद मजीदी का साक्षात्कार

यह साक्षात्कार फ़िल्म- SONG OF SPARROW के संबंध में एक अमेरीकी पत्रकार द्वारा लिया गया था, इसका उनुवाद बिजूका लोक मंच की साथी सुश्री रेहान हुसैन द्वारा किया गया है।

प्रश्न- सामान्य अमेरीकी यह फ़िल्म देखकर मानता है कि आधुनिकीकरण के कारण मनुष्य का औचित्य ढँक गया है। आप इस बारे में क्या कहेंगे ?

उत्तर- हाँ ! सामान्य व्यक्ति आधुनिकता के वेग में एक कठपुतली बनकर रह गया है। मैं अपने सारे पात्र सच्ची घटनाओं से प्रेरिअत होकर लेता हूँ। इसीलिए यह वास्तविक जान पड़ते हैं। एक पात्र करीम का परिवर्तित होना यही दर्शाता है।
प्रश्न- इसमें एक पात्र जब केबल की वायर लेकर छत पर चढ़ जाता है और फिर हँसी की स्थिति बनती है, ऎसा क्यों ?
उत्तर- वो परिस्थिति से उपजी हुई हँसी थी, इसमें कुछ भी जोड़ा नहीं गया है। करीम पहले सीधा-साधा व्यक्ति होता है जो शहरी हवा लगने के कारण सख़्त दिल और लालची बन जाता है।
प्रश्न- इस फ़िल्म में नीले दरवाज़े का क्या महत्त्व है ?
उत्तर- वैसे तो कुछ विशेष नहीं। हाँ, नीला रंग पवित्रता का प्रतीक है एावां करीम उससे इतना जुड़ा होता है कि पड़ोसी के माँगने पर वह दरवाज़ा देने से इंकार कर देता है।
प्रश्न- आपको यह विषय कहाँ से मिला ?
उत्तर- तेहरान से कुछ दूरी पर ही एक फार्म हाउस है, वहीं पर जाना हुआ और करीम जैसे पात्र से मिलने का संयोग हुआ और उसके बाद धीरे-धीरे कहानी की बनावट संभव हुई।
अनुवादः रेहाना हुसैन

टरटल्स केन फ्लाई

इस फ़िल्म के निर्माता, निर्देशक और पटकथा लेखक इरानी मूल के श्री बाहमन गोबारी है। 97 मिनट की इस फ़िल्म को ‘गोल्डन शैल अवार्ड’ सेनसेबेशियन में एवं ‘सिल्वर बियर अवार्ड शिकागो में मिल चुका है। श्री गोबारी अंतररास्ट्रीय ख्याति के फ़िल्म निर्देशक है। उनकी कुछ और अवार्डेड फ़िल्मों में ‘ A TIME FOR ORUNKEN HORSES AND MAROONED IN IRAG’ है।

फ़िल्म टरटल्स केन फ्लाई का विषय सन 2003 में ईराक के समाज को राजनैतिक परिस्थियों कारण जो कुछ भोगना पड़ा उसे बनाया गया है। इसी दौरान वहाँ के शासक श्री सद्दाम हुसेन को अपने पद से हट अमेरिका ज़बरन हटा देता है। फ़िल्मा का फिल्माँकन और कथानक दर्शक न सिर्फ़ बाँधे रखने में सफल होता है, बल्कि उसे झकझोरता भी है।

इस फ़िल्म में SORAN IBRAHIM- 13 वर्षिय लड़का जिसे लोग सेटेलाइट के नाम से पुकारते हैं। AGRIN- असली नाम AVAZ LATIF शोषित लड़की है। HENKAR- का असली नाम HIRSH FEYSSA यह लड़की का विकलांग भाई है। RIGA- का असली नाम ABDUE ROHMAN ICARIM है। यह एक छोटा बच्चा है और अंधत्व का शिकार है।

फ़िल्म युद्ध के विस्थापितों के लिए बनाए गये अस्थाई कैंप से शुरू होती है, जिसमें AGRIN नामक लड़की जो अपने माता-पिता को युद्ध में खो चुकी है, अपने नाज़ायज़ बच्चे (RIGA) को लेकर एक किशोर जिसे सब सेटेलाइट कहते हैं, से DISC लगाने के दरमियान मिलती है। सेटेलाइट उसे मन ही मन उस पर मुग्ध हो जाता है। किंतु AGRIN अपने साथ अमेरीकी सैनिको के द्वारा हुए अमानवीय व्यवहार भावनाशून्य हो चुकी है। AGRIN का भाई HENKAR अपने दोनों हाथ अमेरीकी बमबारी की वजह से खो चुका है। उससे किसी भी चीज़ की भविष्यवाणी करने की अद्भूत क्षमता है। AGRIN अपने उस बच्चे से कोई मोह नहीं रखती जो अमेरीकी सैनिक के द्वारा उसके साथ बलात्कार करने जन्मा है, वह उसे छोड़ना चाहती है, क्योंकि उसे सामाजिक निंदा का भय रहता है। लेकिन HENKAR उस अंधे बच्चे बहुत चाहता है। वह अपने दोनों कोहनी तक कटे हाथों के बावजूद इस बच्चे को गोद में लेकर भागता है और हर संभव सभी तरह से सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश करता है।

इधर सेटेलाइट कुछ अनाथ कुर्द बच्चों का नेता बनकर उनसे युद्ध क्षेत्र में बिना फटे बमों को ढ़ूँढने का काम करवाता है। दस-पन्द्रह बच्चे हमेशा उसके आगे पीछे घुमते रहते हैं। वह थोड़ी बहुत अंग्रेजी भी जानता है, इसलिए गाँववाले उसे बहुत इज़्ज़त देते हैं, ताकि वो गाँव में टी. वी. डिस्क लगा सके और उन्हें युद्ध के बारे में ख़बर मालूम हो सके । वे उसकी हर बात मानते हैं और उसे गाँव में रोके रखने की हर संभव कोशिश में रहते हैं। फ़िल्म की सिनेमेटोग्राफ़ी बहुत सुन्दर है । कुछ दृश्य जैसे प्रतिबंधित क्षेत्र में चले गये RIGA जो कि अंधा बच्चा है, को सेटेलाइट द्वारा बचाना, ऊँची पहाड़ी पर से AGRIN का कूदकर आत्महत्या कर लेना और HENKAR का पानी के अंदर RIGA को ढूँढ़ने का फ़िल्माया गया दृश्य कलात्मक दृश्टु से तो बेहद ख़ूबसूरत है। लेकिन ये दृश्य दर्शक को भीतर तक झकझोरते भी है। युद्ध से उपजी समस्याओं को हमारे सामने बहुत कलात्मक और संवेदनात्मक ढंग से प्रस्तुत करती है।

फ़िल्म अपने कथानक और फ़िल्माँकन के कसाव और ख़ूबसूरती के कारण पूरे समय दर्शक अपने अलग नहीं होने देती है। कम उम्र के बच्चों का परिस्थितिवश व्यस्कों जैसा आचरण करना मन को उद्वेलित कर देता है। गाँववालों का टी.वी़ में अंग्रेज़ी चैनल आने पर तौबा-तौबा करना, वहाँ साँस्कृतिक रूढीवादिता को उजागर करता है।

हम सिर्फ़ युद्ध के बारे में अख़बार में पढ़ते हैम और टी.वी. पर देखते हैं, हम वह देखते हैं, जो हमें ताक़तवर सत्ता द्वारा दिखाया जाता है। इससे हम युद्ध की असल भयावहता का ठीक से अंदाज़ा नहीं भी लगा पाते हैं, लेकिन यह फ़िल्म बहुत बारीक़ी से हमें युद्ध की भयावहता से अवगत कराती है। मैं चाहती हूँ कि इस फ़िल्म को हर वह इंसान देखे जिसका सामाजिक मूल्यों और संवेदना से ज़रा भी सरोकार है। अद्भुत है। फ़िल्म ‘टरटल्स केन फ्लाई’ का प्रदर्शन बिजूका फ़िल्म क्लब में 6 दिसम्बर 2009 को किया गया था।
रेहाना हुसैन

बिजूका लोक मंच, इन्दौर, सम्पर्क-
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