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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

बॉब डिलन की अनूदित कविताएं

मित्रो बॉब डिलन को पढ़ते हैं....
तुम्हें अपने प्यार का अहसास कराऊँगा 
बॉब डिलन 

अनुवाद - प्रतिभा उपाध्याय

जब तुम्हारे चेहरे पर बौछार पड़ रही है
और सारी दुनिया तुम्हारी सूरत देख रही है,
मैं दे सका गर्म आलिंगन तुम्हें
अपने प्यार का तुम्हें अहसास दिलाने के लिए।

जब सायंकाल दिखाई देते हैं छाया और सितारे,
और कोई नहीं है वहाँ तुम्हारे आँसू पोंछने के लिए,
मैं तुम्हें दस लाख वर्ष के लिए सँभाले रख सका
अपने प्यार का तुम्हें अहसास दिलाने के लिए।

मुझे पता है तुमने अभी तक नहीं बनाया है अपना मन
लेकिन मैं तुम्हारे प्रति कोई गलत काम कभी नहीं करूँगा
मुझे पता है यह उसी क्षण से जब हम मिले थे
मेरे मन में कोई संशय नहीं कि तुम किसकी हो।

मैं भूखा चला जाऊँगा, मुझे चोट पहुँचेगी
मैं रेंगता हुआ पथ से नीचे चला जाऊँगा
नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं जो मैं न करूँ
अपने प्यार का तुम्हें अहसास दिलाने के लिए।

तूफान का प्रकोप है लहरदार समुद्र पर
और पश्चाताप के राजमार्ग पर
बदलाव की बयार प्रचंड औ' निर्बाध चल रही है
तुमने भी अभी तक कुछ नहीं देखा है मेरी तरह।

मैं तुम्हें खुश कर सका, तुम्हारे सपनों को साकार कर सका
ऐसा कुछ नहीं जो मैं नहीं करूँगा
तुम्हारे लिए मैं धरती के पार जाऊँगा
तुम्हें अपने प्यार का अहसास दिलाने के लिए
अपने प्यार का तुम्हें अहसास दिलाने के लिए

खोने के लिए बाध्य, जीतने के लिए विवश 
बॉब डिलन 

अनुवाद - प्रतिभा उपाध्याय

अरे वाह! मैं खोने के लिए बाध्य हूँ, जीतने के लिए विवश हूँ मैं
सड़क पर पुनः चलने के लिए विवश हूँ मैं
खोने के लिए बाध्य हूँ, मैं जीतने के लिए विवश हूँ
सड़क पर पुनः चलने के लिए विवश हूँ मैं।

अरे वाह! मैं सिर्फ उन घुमक्कड़ों में से एक हूँ
जो घूम रहे हैं पता नहीं कब से
यहाँ मैं आ गया और फिर से चला गया

तुमने समझा मुझे कोई छोर नहीं मिला।
मैं खोने के लिए बाध्य हूँ, जीतने के लिए विवश हूँ मैं
सड़क पर पुनः चलने के लिए विवश हूँ मैं
मैं खोने के लिए बाध्य हूँ, जीतने के लिए विवश हूँ मैं
सड़क पर पुनः चलने के लिए विवश हूँ मैं।

जवाब हवा में उड़ रहा है 
बॉब डिलन 

अनुवाद - अरुण माहेश्वरी

कितने रास्ते तय करे आदमी
कि तुम उसे इनसान कह सको ?
कितने समंदर पार करे एक सफेद कबूतर
कि वह रेत पर सो सके ?
हाँ, कितने गोले दागे तोप
कि उस पर हमेशा के लिए पाबंदी लग जाए ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है।

हाँ, कितने साल कायम रहे एक पहाड़
कि उसके पहले समंदर उसे डुबा न दे ?
हाँ, कितने साल जिंदा रह सकते हैं कुछ लोग
कि उसके पहले उन्हें आजाद किया जा सके ?
हाँ, कितनी बार अपना सिर घुमा सकता है एक आदमी
यह दिखाने कि उसने कुछ देखा ही नहीं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है।

हाँ, कितनी बार एक आदमी ऊपर की ओर देखे
कि वह आसमान को देख सके ?
हाँ, कितने कान हों एक आदमी के
कि वह लोगों की रुलाई को सुन सके ?
हाँ, कितनी मौतें होनी होंगी कि वह जान सके
कि काफी ज्यादा लोग मर चुके हैं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है।

' Blowin' In The Wind ' का हिंदी अनुवाद
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टिप्पणियाँ:-

नंदना:-
अदनान की यह कविता मेरे दिल के बेहद करीब है, मानवता का संदेश लिए हुए उम्मीदों से भरी प्यारी और मासूम कविता, जब पहली बार सुना तो लगा काश ऐसी कविता मैंने लिखी होती...

रविन्द्र व्यास:-
बॉब डिलन कि या अदनान की, सीमा जी।

सीमा आज़ाद:-
अदनान दरवेश की जो मेरे बहुत पसंदीदा कवि हैं।

रविन्द्र व्यास:-
सीमाजी कमाल की कविताएं हैं उनकी हैं। कहने का कैसा सादा अंदाज़ और संवेदनशीलता की कैसी अनाप गहराई।

पवन पराग की कविता

आज हम सीमा आज़ाद द्वारा उपलब्ध कराई कविता पोस्ट कर रहे हैं....प्लीज पढ़े

पंजे भर जमीन / पवन पराग

इस धरती पर बम फोड़ने की जगह है
बलात्कार करने की जगह है
दंगों के लिए जगह है
ईश्वर और अल्लाह के
पसरने की भी जगह है
पर तुमसे मुलाकात के लिए
पंजे भर जमीन भी नहीं है
इस धरती के पास।

जब भी मैं तुमसे मिलने आता हूँ
भैया की दहेजुवा बाइक लेकर
सभ्यतायें उखाड़ ले जाती है उसका स्पार्क प्लग
संस्कृतियाँ पंक्चर कर जाती हैं उसके टायर
धर्म फोड़ जाता है उसका हेडलाइट
वेद की ऋचायें मुखबिरी कर देती हैं
तुम्हारे गांव में
और लाल मिर्जई बांधें रामायण
तलब करता है मुझे इतिहास की अदालत में ।

मैं चीखना चाहता हूँ
कि देवताओं को लाया जाय मेरे मुकाबिल
और पूछा जाय कि
कहाँ गयी वह जमीन
जिस पर दो जोड़ी पैर टिका सकते थे
अपना कस्बाई प्यार ।

मैं चीखना चाहता हूँ कि
धर्मग्रन्थों को मेरे मुकाबिल लाया जाय
और पूछा जाय कि
कहाँ गए वे पन्ने
जिसपर दर्ज किया जा सकता था
प्रेम का ककहरा ।

मैं चीखना चाहता हूँ कि
लथेरते हुए खींचकर लाया जाय
पीर  पुरोहित को और
पूछा जाय कि क्या हुआ उन सूक्तियों का
जो दो दिलों के महकते भाँप से उपजी थीं ।

मेरे बरक्स तलब किया जाना चाहिए
इन सबों को
और तजवीज़ के पहले
बहसें देवताओं पर होनी चाहिए
पीर और पुरोहित पर होनी चाहिए
आप देखेंगें कि देवता
बहस पसंद नहीं करते ।

मुझे फोन पर कहना था और
कह दिया है अपनी प्रेमिका से
कि तुम चाँद पर सूत कातती
बुढ़िया बन जाओ
मैं अपनी लोक कथाओं का कोई बूढा
सदियों पार जब बम और बलात्कार से
बच जाएगी पीढ़ा भर मुकद्दस जमीन
तब तुम उतर जाना चाँद से
मैं निकल आऊंगा कथाओं से
तब झूमकर भेंटना मुझे इस तरह
कि सिरज उट्ठे कोई कालिदास का वंशज ।

अभी तो इस धरती पर बम फोड़ने की जगह है
दंगों के लिए जगह है
ईश्वर के पसरने की भी जगह है
पर तुमसे मुलाकात के लिए
पंजे भर जमीन भी नहीं है इस धरती के पास।
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टिप्पणियाँ:-

संध्या:-
इस कविता के साथ और भी कुछ जुड़ गया है अब तो ।
मुझे ये कविता बहुत अच्छी लगी

राजेन्द्र श्रीवास्तव:-
मन को छूने वाली प्रेम कविता
संवेदनाओं को झकझोरने वाली विचारोत्तेजक कविता

प्रदीप कान्त:-
प्रेम का ककहरा दराज़ करने वाले पन्नों को खोजती कविता मन को प्रेम से छूकर गुज़रती है

मार्टिन कार्टर की कविताएँ 

मार्टिन कार्टर की कविताएँ                           
मेरी प्रियतमा का दमकता सौंदर्य 
मार्टिन कार्टर 

अनुवाद - सरिता शर्मा

अगर मैं चाहता
रात के चित्र बना सकता था मैं
विपुल जलराशि के ऊपर सितारों और
सितारों के नीचे फैली हुई जलराशि का नक्शा
मेरी प्रियतमा की सुंदरता
अँधेरे में सुबह की किरण लाने वाले पुष्प सा।
हाँ, अगर मैं चाहता
मैं अभी बंद कर लेता अपनी आँखें
और ले आता इन चीजों को दिमाग में जिंदगी की तरह।
मगर समय बदल गया है.
और जिस ओर भी मुड़ कर देखता हूँ मैं
प्रचंड विद्रोह चला जाता है मेरे साथ
एक चुंबन की तरह -
मलाया
और वियतनाम का विद्रोह -
भारत का विद्रोह
और अफ्रीका का -
संरक्षक की तरह।
मेरी सरपरस्त बन गई है
आजादी की लड़ाई -
और गुलाम बनाने वालों से मुक्ति के लिए
नृत्य करती हुई पूरी दुनिया की तरह
मेरी प्रियतमा का सौंदर्य दमकता है
उसकी हँसती हुई आँखों में।

यह अंधियारा समय है प्रिय 
मार्टिन कार्टर 

अनुवाद - सरिता शर्मा

यह अंधियारा समय है प्रिय
हर जगह धरती पर रेंगते हैं भूरे झींगुर
चमकता सूरज छुप गया है आकाश में कहीं
सूर्ख फूल दुख के बोझ से झुक गए हैं
यह अंधियारा समय है प्रिय
यह उत्पीड़न, डार्क मेटल के संगीत और आँसुओं का मौसम है।
बंदूकों का त्योहार है, मुसीबतों का उत्सव है
लोगों के चेहरे हैरान और परेशान हैं चहुँ ओर
कौन टहलता आता है रात के घुप्प अँधेरे में?
किसके स्टील के बूट रौंद देते हैं नर्म घास को
यह मौत का आदमी है प्रिय, अपरिचित घुसपैठिया
देख रहा है तुम्हें सोते हुए और निशाना साध रहा है तुम्हारे सपने पर।

 

सुश्री गीतिका द्विवेदी जी का एक संस्मरण

मित्रो समूह की साथी सुश्री गीतिका द्विवेदी जी का एक संस्मरण पोस्ट कर रहा हूँ...पढ़िए

विदाई( गीतिका द्विवेदी)


• आज शाम कुछ काम से मेन रोड गई थी।वहाँ एक मंगल कार्यालय है जहाँ अकसर शादियाँ होती रहती हैं।कभी बारात आते हुए सड़क की यातायात व्यवस्था अवरुद्ध हो जाती है तो कभी विदाई के समय भीड़ के कारण आने -जाने में लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ता है।इस प्रकार का माहौल लगभग हमारे दिनचर्या का अंग बन गया है।परंतु आज जो दृश्य मैं मंगल कार्यालय के बाहर देखी उसके बाद मेरा मन बहुत अशांत हो गया।मन बार-बार विचलित हो उठता है।वही खुली लाल कार पर बेला फूल की लड़ियों से चारखाना सजावट।कार में रोते हुई विदा लेती दुल्हन और उसके हाथ को न छोड़ती बिलखती हुई एक औरत जो शायद उसकी बहन थी या भाभी।घर आने के बाद भी बार-बार वही दृश्य मेरे आँखों के सामने घूमता रहा और एक बहुत पुरानी घटना जो मेरे परिवार में घटित हुई थी वो सब किसी चलचित्र की भाँति मेरे समक्ष प्रकट होने लगी।
•             तब मैं आठ साल की थी मेरी मौसी की शादी होने वाली थी मेरी बड़ी मामी मेरी मौसी को बहुत प्यार करती थीं।दोनों में इतना प्यार था कि जब भी ननद और भाभी के सम्बन्ध की चर्चा होती थी तो उन दोनों का मिसाल दिया जाता था।बहुत कांटने- छांटने के बाद गौरी मामी तनु मौसी की शादी के लिए मानीं थीं क्योंकि उन्हें कोई लड़का पसंद ही नहीं आता था।उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती थी तब भी शादी की सारी तैयारी मामी के देखरेख में हो रही थी।गौरी मामी विशाल हृदय वाली थीं।तनु मौसी भी उन्हें बहुत प्यार करती
• थीं।उन दोनों के प्यार को मेरा बाल मन महसूस तो करता था किंतु आज भी उन दोनों के बीच के रिश्ते को शब्दों के माध्यम से समझा पाने में मैं असमर्थ हूँ। विशेषकर ननद-भाभी के रिश्ते में तो अकसर कटुता के भाव ही देखने सुनने को मिलते हैं।ऐसे में आज भी उन दोनों के बीच के प्यार को मैं महसूस तो कर सकती हूँ किन्तु व्यक्त नही कर पा रही हूँ शायद मेरी पूरी रचना पढ़ने के बाद आप सभी समझ पाएं।
•           गौरी मामी का बड़े दिल का होना शायद ईश्वर को भी रास आ गया था इसलिए उस छोटी सी उम्र में उन्हें दिल की बीमारी हो गई थी।डाक्टर ने पहले से ही हिदायतें दे रक्खी थी कि मामी का बहुत ध्यान रखना होगा।उनके सेहत के लिए बहुत अधिक खुशी और गम  ठीक नहीं है।शादी वाले घर में उनके सेहत के  साथ लापरवाही हो सकती है इसलिए उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाने के मत से परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने सहमति जताई किंतु गौरी मामी इस प्रस्ताव को सुनते ही भड़क उठीं।'तनु की शादी मेरे बगैर आप लोग करने को सोच भी कैसे सकते हैं।जब से शादी करके इस घर में आई हूँ तब से तनु मेरे आँखों के सामने रही है।आप लोग जानते हैं कि मैं अपने मायके भी तनु के बिना नहीं रह पाती हूँ।एक तो मेरे मन के विरुद्ध दूसरे शहर में तनु का रिश्ता तय कर दिया गया। यह सोच कर मुझे रोना आता है कि मैं तनु से दूर कैसे रह पाऊंगी?आपलोग उसकी विदाई से पहले ही मुझे उससे दूर कर देना चाहते हैं '।गौरी मामी ने मामा से कहा-"कान खोल कर सुन लीजिए आप , तनु की शादी में एक-एक चीज़ मेरी मर्जी की होगी ऐसी शादी होगी  मेरी तनु की कि पूरा  शहर इस शादी को कभी भूल  नहीं पाएगा।उनकी तबीयत बिगड़ न जाए इस कारण मामा उनकी छोटी हो या बड़ी बात सभी को पूरा करने के लिए जी जान लगा देते थे।एक तरफ मात्र छह महीने का छोटा बच्चा दूसरी तरफ मामी की उठती-गिरती तबीयत के बीच हर दिन गौरी मामी की नित नई माँग।उन माँगों में सबसे अटल माँग ये कि तनु मौसी की बारात लाल रंग के खुली गाड़ी में आएगी और विदाई भी मौसी की उसी गाड़ी में होगी।पूरे कार की सजावट बेला फूल की लड़ियों से चारखाने डिज़ाइन में होगी।उस वक्त पूरे शहर में सिर्फ दो ऐसी गाड़ियाँ थीं। उसे भाड़े पर लेना साधारण लोगों के वश में नहीं था।मामा अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य लगा दिये उस गाड़ी को मंगवाने के लिए।मामा चाहते थे कि बस एक बार शादी अच्छे से सम्पन्न हो जाए फिर मामी को अस्पताल में भर्ती करवा कर अच्छे से इलाज करवाया जाएगा।गौरी मामी के अनुसार सारा इंतज़ाम होता रहा और शादी का वह मंगल मुहूर्त भी आ गया।हमारे यहाँ के घर इतने बड़े होते थे कि शादी के लिए मंगल कार्यालय लेने की आवश्यकता नहीं होती थी।पूरा घर मेहमानों से भरा था।एक के बाद एक शादी का कार्यक्रम होने लगा।मामी हर कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेती रहीं।उत्तर भारत में बारात शाम में आती है।पूरी रात शादी होती है।दूसरे दिन बारात को दोपहर का खाना खिलाने के बाद शाम में तनु मौसी की विदाई होनी   थी क्योंकि ट्रेन रात की थी।
•         शाम को शानदार बारात लगी।खुले लाल कार पर  बेला के फूल  के चारखाने डिज़ाइन से सजे  कार को देख कर जितना अधिक गौरी मामी खुश हुई उतना ही वह सजीले दूल्हे को देख कर खुश होती हुई मामा को आँखों ही आँखों में संतुष्टि का अहसास करवाती हुई विध-व्यवहार करने के लिए आगे बढ़ गईं ।हँस-हँस कर मौसा जी की आरती उतारीं।मौसी को लेकर मंडप में गईं।एक -एक विधि मामी ने मंडप में बैठ कर करवाया।कन्यादान के समय अपने आप को संभालने के बाबजूद भी सिसकी निकल ही गई।मौसी परेशान न हो जाए इसके लिए गौरी मामी ने अपने आप को काबू में किया और गीत गातीं औरतें के साथ सुर मिलाने की असफल कोशिश करने लगीं।इस बीच कई बार मामा आ कर उन्हें आराम करने की हिदायत देते रहे किंतु हर बार मामी उनके आग्रह को ठुकरा कर थोड़ी मुहलत माँग लेती थीं और तन्मयता से विवाह के विधि में तल्लीन हो जाती थीं।
• विवाह सम्पन्न हो ही चुका था सिंदूरदान के बाद पाँच सुहागन वधु को सिंदूर लगातीं हैं।गौरी मामी सबसे पहले तनु मौसी को सिंदूर लगाईं,चुमावन किया और मौसा जी और तनु मौसी को भरपूर निहारते हुए मौसा जी को कहीं -'आज से मेरी तनु आपकी हुई।पहले मुझे लगता था कि तनु और मैं एक दूसरे के बिना नहीं रह पाएगें पर आपको देखने के बाद मैं निश्चिंत  हो गई हूँ ।अब मुझे नींद आ रही है तनु मैं सोने जा रही हूँ' ।  गौरी मामी सोने चली गईं।
•         गौरी मामी के कमरे में ही कोहबर बनाया गया था। मंडप में शादी हो जाने के बाद यहाँ तनु मौसी और मौसा जी को आना था और यहाँ भी कुछ विवाह की विधि होने वाली थी।गौरी मामी अपने छह माह के बेटे को कलेजे से चिपटा कर पलंग पर सो गईं ।वह इस तरह लेटीं थीं कि उनका पैर पलंग से बाहर था।थोड़ी ही देर में तनु मौसी और मौसा जी उस कमरे में आ गए।जमीन पर कोहबर के सामने दोनों को बिठाकर  रस्म होने लगा।कौड़ी खेलना,एक दूसरे को दहीं खिलाना।हँसी-ठहाकों के बीच रस्म चल रहा था   मैंने देखा गौरी मामी का पैर बार -बार तनु मौसी को छू जाता था।उसी बीच मामा उस कमरे में मामी को दवा देने के लिये आए।उन्हें धीरे से थपकी देते हुए उठाना चाहे किंतु कोई हरकत नहीं हुई।नाक के पास हाथ ले जाकर देखा फिर नब्ज़ टटोला,कुछ पता नहीं चल रहा था।उधर नए नबेले वर-वधु के साथ औरतों के हँसी-मजाक का माहौल गरमाता जा रहा था इधर गौरी मामी लगभग ठंडी पड़ती जा रहीं थीं।छोटे मामा को गाड़ी निकालने को कह कर मामा ने घरवालों को कहा कि अब शादी तो समाप्त हो गई है इसलिए गौरी को अस्पताल में दाखिल करवाने जा रहा हूँ।नानी ने थोड़ा विरोध किया -'जैसे इतनी देर रही है तो कुछ घंटे और बहु को रहने दे।तनु की विदाई के बाद अस्पताल में रख आना गौरी को '।तनु मौसी की कातर आँखें भी शायद यही कह रही थी कि थोड़ी देर और भाभी को मेरे पास रहने दो।मामा के ऊपर किसी के बातों का कोई असर नहीं हो रहा था।गौरी मामी को अस्पताल  ले जाया गया।डाक्टर ने देखते ही कहा कि गौरी मामी आधा घंटा पहले ही गुज़र गईं।                                                    
•        उधर एकलौती बहन की शादी की खुशी का माहौल इधर अपनी जीवन संगीनी के जीवन के अंत का अनंत,असहृय दुख।बहन को विदा होने में बारह घंटे की अवधि थी क्योंकि ट्रेन रात की थी किंतु पत्नी को अलविदा करने के लिए वक्त ही नहीं बचा था।जनमासे में बारात ठहरी हुई थी,घर में रिश्तेदारों का जमघट।तनु मौसी को गौरी मामी के निधन का समाचार मामा देना नहीं चाहते थे।वृद्ध माता -पिता को  यह खबर कैसे दें!  छह महीने के बेटे से गौरी मामी को कितनी मुश्किल से अलग कर लाए थे उनका दिल ही जानता है।मामा समस्याओं के जाल में ऐसे फंसे थे कि उन्हें अपने हमसफ़र के निधन पर शोक मनाने का भी वक्त नहीं था।मामा ने सबसे पहले यह सोचा कि सबसे पहले  घर से तनु मौसी की विदाई कर दें उसके बाद गौरी मामी के विषय में घर वालों को बताया जाए।परंतु यह काम इतना आसान नहीं था।बारह घंटे पहले मौसी की विदाई सम्भव नहीं थी।आखिरकार मामा जनमासे में जाकर बारातियों से मामी के निधन का समाचार सुना कर आग्रह किये कि शीघ्र से शीघ्र वो लोग मौसी को विदा हो कर के स्टेशन चलें जाएं ताकि गौरी मामी का  शव घर में लाया जा सके।आनन-फानन में सबेरे -सबेरे तनु मौसी की विदाई कर दी गयी।बेला फूल से सजे उस खुले लाल कार पर मौसी को विदा करने का किसी को होश नहीं था।तनु मौसी बार-बार गौरी मामी से मिलने की ज़िद करती रहीं परंतु गौरी मामी की अस्पताल में दाखिल होने की बात और खराब तबीयत का बहाना बना कर उन्हें विदा कर स्टेशन भेज दिया गया।
•        जिस आँगन में रात को सजे-धजे हरे बाँस के मंडप में शादी का माहौल था उसी आँगन ने सुबह ऐसा रूप धारण कर लिया जिसे लिखते हुए आज भी मेरी रुह कांप जाती है।गौरी मामी के शव को लाने के पहले शादी के मंडप को उखाड़ा जाने लगा।जिस गौरी मामीको रात शादी के मंडप में सुहागन के रुप में शुभ माना
• गया था आज प्राण पखेरू क्या उड़े उन्हें अशुभ मुर्दा माना जाने लगा।तभी तो उस मंडप के हरे बांस को सवा महीने के पहले ही कुछ घंटे में ही वहाँ से दूर हटा दिया गया।कुछ ही देर में कुछ और हरे बाँस आए किंतु ये खड़े रहने के लिए नहीं बल्कि अर्थी बनने के लिए , जिस पर सुहागन गौरी मामी लाल बनारसी साड़ी और सोलह श्रृंगार जिस आँगन में रात को सजे-धजे हरे बाँस के मंडप में शादी का माहौल था उसी हरे आँगन ने सुबह ऐसा रुप धारण कर लिया जिसे लिखते हुए आज भी मेरी रुह काँप जाती है।गौरी मामी के शव को लाने के पहले शादी के मंडप को उखाड़ा जाने लगा।जिस गौरी मामी को रात शादी के मंडप में सुहागन के रुप में शुभ माना गया था आज प्राण पखेरू क्या उड़े उन्हें अशुभ मुर्दा माना जाने लगा।तभी तो उस मंडप के हरे बांस को सवा महीने के पहले ही कुछ घंटे में ही वहाँ से दूर हटा दिया गया।कुछ ही देर में कुछ और हरे बाँस आए किंतु ये खड़े रह कर शुभ का प्रतीक बनने के लिए नहीं बल्कि खुद को गिरा कर अर्थी बनने के लिए थे।सुहागन गौरी मामी को लाल बनारसी साड़ी और सोलह श्रृंगार किया गया।मामा जब अंतिम बार उनकी माँग भरने लगे तो वहाँ उपस्थित सभी लोग फूट-फूट कर रो पड़े परंतु मैं रो नहीं पाई।मैं एकटक गौरी मामी को देखे जा रही थी।मुझे ऐसा लग रहा था कि अब मामी उठ जाएगीं ।पर मेरा विश्वास टूट गया।सजधज कर मामी अपनी अंतिम यात्रा के लिए निकल गईं।यह घटना याद कर आज भी मैं सोचती हूँ कि यह कैसी विदाई थी!तनु मौसी अपने मायके से विदा हुईं और गौरी मामी इस संसार से ...!!
संस्मरण
गीतिका द्विवेदी
पुणे

अनुज लुगुन की कविताएँ

मित्रो कविता के क्षेत्र में जाना-पहचाना और लोकचतना से संपन्न...प्रतिबद्ध नाम- अनुज लुगुन..आज उन्हीं कविताएँ पढ़ते हैं ....

1. महुवाई गंध : अनुज लुगुन 

(कामगरों एवं मजदूरों की ओर से उनकी पत्नियों के नाम भेजा गया प्रेम-संदेश)

ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारे बालों से झरते हैं महुए।

तुम्हारे बालों की महुवाई गंध
मुझे ले आती है
अपने गाँव में, और
शहर के धूल-गर्दों के बीच
मेरे बदन से पसीनों का टपटपाना
तुम्हें ले जाता है
महुए की छाँव में
ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारी सखियाँ तुमसे झगड़ती हैं कि
महुवाई गंध महुए में है।

मुझे तुम्हारे बालों में
आती है महुवाई गंध
और तुम्हें
मेरे पसीने में

ओ मेरी महुवाई पत्नी !
सखियों का बुरा न मानना
वे सब जानती हैं कि
महुवाई गंध हमारे प्रेम में है।

2. अघोषित उलगुलान 

अल सुबह दांडू का काफिला
रुख करता है शहर की ओर
और साँझ ढले वापस आता है
परिंदों के झुंड-सा,

अजनबीयत लिए शुरू होता है दिन
और कटती है रात
अधूरे सनसनीखेज किस्सों के साथ
कंक्रीट से दबी पगडंडी की तरह
दबी रह जाती है
जीवन की पदचाप
बिल्कुल मौन !

वे जो शिकार खेला करते थे निश्चिंत
जहर-बुझे तीर से
या खेलते थे
रक्त-रंजित होली
अपने स्वत्व की आँच से
खेलते हैं शहर के
कंक्रीटीय जंगल में
जीवन बचाने का खेल

शिकारी शिकार बने फिर रहे हैं
शहर में
अघोषित उलगुलान में
लड़ रहे हैं जंगल

लड़ रहे हैं ये
नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ
जनगणना में घटती संख्या के खिलाफ
गुफाओं की तरह टूटती
अपनी ही जिजीविषा के खिलाफ

इनमें भी वही आक्रोशित हैं
जो या तो अभावग्रस्त हैं
या तनावग्रस्त हैं
बाकी तटस्थ हैं
या लूट में शामिल हैं
मंत्री जी की तरह
जो आदिवासीयत का राग भूल गए
रेमंड का सूट पहनने के बाद।

कोई नहीं बोलता इनके हालात पर
कोई नहीं बोलता जंगलों के कटने पर
पहाड़ों के टूटने पर
नदियों के सूखने पर
ट्रेन की पटरी पर पड़ी
तुरिया की लावारिस लाश पर
कोई कुछ नहीं बोलता

बोलते हैं बोलने वाले
केवल सियासत की गलियों में
आरक्षण के नाम पर
बोलते हैं लोग केवल
उनके धर्मांतरण पर
चिंता है उन्हें
उनके 'हिंदू' या 'ईसाई' हो जाने की

यह चिंता नहीं कि
रोज कंक्रीट के ओखल में
पिसते हैं उनके तलवे
और लोहे की ढेंकी में
कुटती है उनकी आत्मा

बोलते हैं लोग केवल बोलने के लिए।

लड़ रहे हैं आदिवासी
अघोषित उलगुलान में
कट रहे हैं वृक्ष
माफियाओं की कुल्हाड़ी से और
बढ़ रहे हैं कंक्रीटों के जंगल,

दांडू जाए तो कहाँ जाए
कटते जंगल में
या बढ़ते जंगल में।

3. उलगुलान की औरतें 

वे उतनी ही लड़ाकू थीं
जितना की उनका सेनापति
वे अपनी खूबसूरती से कहीं ज्यादा खतरनाक थीं
अपने जूड़े में उन्होंने
सरहुल और ईचाः बा की जगह
साहस का फूल खोंसा था
उम्मीद को उन्होंने
कानों में बालियों की तरह पिरोया था
हक की लड़ाई में
उन्होंने बोया था आत्मसम्मान का बीज,

उनकी जड़ें गहरी हो रही हैं
फैल रही हैं लतरें
गाँव-दर-गाँव
शहर-दर-शहर
छहुरों से
पगडंडियों से
गलियों से बाहर,
आँगन में गोबर पाथती माँ
सदियों बाद
स्कूल की चौखट पर पहुँची बहन
लोकल ट्रेन से कूदती हुई
दफ्तर पहुँची पत्नी
और भोर अँधेरे
दौड़-दौड़ कर खेतों की ओर
चौराहें की ओर
आवाज उठाती
सैकड़ों अपरिभाषित रिश्तों वाली औरतें
खतरनाक साबित हो रही हैं
दुःस्वप्नों के लिए
उन्होंने अपने जूड़े में
खोंस रखा है साहस का फूल
कानों में उम्मीद को
बालियों की तरह पिरोया है
धरती को सर पर घड़े की तरह ढोए
लचकती हुई चली जा रही हैं
उलगुलान की औरतें
धरती से प्यार करने वालों के लिए
उतनी ही खूबसूरत
और उतनी ही खतरनाक
धरती के दुश्मनों के लिए।