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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

बीज लेख : संजय जोठे

आज आपके लिए प्रस्तुत है संजय जोठे जी का एक लेख,  जो भारत में आध्यात्मिक गुरुओं की विभ्रमकारी भूमिकाओं की निर्मम पड़ताल करता है।  इन गुरुओं ने देश, समाज का किस प्रकार से कुमार्गदर्शन किया,  यहाँ की अशिक्षित जनता की अवैज्ञानिक आस्थाओं का रस पी - पीकर इनका कद कैसे बढ़ता रहा, आधी से अधिक आबादी के ग़रीबी रेखा के नीचे दबने वाले देश में कैसे इन गुरुओं की स्वनिर्मित अतार्किक मान्यताओं की दूकानें फलती - फूलती रहीं हैं.... इन सब प्रश्नों के उत्तर पाने में यह लेख बहुत सहायक है। आपके विचारों / प्रतिक्रियाओं का स्वागत है।

"भारतीय अध्यात्म का व्यावसायिक माडल और भारत का पतन"
(संजय जोठे) :

आधुनिक समय के दो प्रसिद्ध भारतीय गुरुओं को ध्यान से देखिये, इन दोनों की शिक्षाओं और शैलियों के अध्ययन से आप समझ सकेंगे कि भारत की सनातन समस्याओं का स्त्रोत क्या है. इन गुरुओं ने जिस तरह का आभामंडल और भक्त समुदाय बनाया है उसके मनोविज्ञान को नजदीक से देखने पर और अधिक निराशा भी होती है लेकिन यह बात बहुत स्पष्ट हो जाती है कि इन गुरुओं ने जिस चीज को समाधान की तरह प्रचारित किया है वह समाधान ही सबसे बड़ी समस्या है. वैसे तो भारतीय समाज की हजारों समस्याएं हैं और हजारों प्रश्न हैं जो एक एक करके बहुत लंबी बहस की मांग करते हैं लेकिन दो ऐसे महत्वपूर्ण और प्रतिनिधि प्रश्न हैं जो सभी प्रश्नों को अपने गर्भ में समेटे हुए हैं. ये दो प्रश्न हैं – भारत इतनी सदियों तक गुलाम क्यों रहा और यह कि भारत इतने हजार सालों के ज्ञात इतिहास में विज्ञान क्यों पैदा नहीं कर सका ?

ये दो प्रश्न भी असल में एक ही प्रश्न के दो पहलू भर हैं. जो समाज अवैज्ञानिक होता है वह गुलाम होता है और जो गुलाम होता है वह विज्ञान से डरने लगता है. इस तरह इन दो में से किसी एक का भी उत्तर इन गुरुओं से पूछा जाना चाहिए. ये गुरु लोग इन प्रश्नों के आसपास जन्मे उप प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक झूठा वैचारिक आन्दोलन जरुर छेड़ते हैं लेकिन इन प्रश्नों की पीड़ा से जन्मे उत्तरों को व्यवहार में लागू करने का कोई वर्केबल रोड मेप नहीं देते हैं. यहाँ आकर इनकी समझ और नीयत पर प्रश्न खड़ा होता है. यह मानना गलत होगा कि इतने बुद्धिमान, घाघ और इतने बड़े साम्राज्यों को बनाने या चलाने वाले ये गुरु समस्या को नहीं पहचान पा रहे हैं. ये जरुर ही समस्या को समझ पा रहे हैं. लेकिन इनके काम करने की शैली इतनी गलत है कि वो समस्या को बढाती जाती है, कम तो बिलकुल ही नही करती.

हम अपने मूल प्रश्नों पर लौटते हैं. भारत की अवैज्ञानिकता और गुलामी का विमर्श ही वास्तविक भारत विमर्श है. यह रोगी को उसके रोग से समझने का प्रयास है. लेकिन ये दो आध्यात्मिक गुरु रोगी को उसके स्वस्थ होने की संभावना के आईने में झलकाकर परिभाषित करते हैं, और स्वास्थ्य भी ऐसा जो अभी तक किसी ने नही देखा या जाना. सरल शब्दों में कहें तो वे भारत और भारतीय समाज की समस्याओं को एक झूठी आशावादी दृष्टि से हल करते हैं और प्रचार करते जाते हैं कि भारत का समाज अध्यात्मिक नैतिक और उन्नत समाज है. वे अभी आंख के सामने ही पल रहे रोग की चर्चा नहीं करते बल्कि स्वस्थ हो जाने के बाद क्या संभव है उसकी चर्चा करते हैं. वे अभी की जरूरतों की बात नहीं करते बल्कि स्वर्णयुग की इबारत लिखते हैं और उसी के चारों तरफ अपनी खुद की महिमा और गुरुडम की बुनाई भी करते जाते हैं. वे स्पष्ट शब्दों में ये नहीं कहते कि इतने लंबे समय तक धर्म अध्यात्म तंत्र मन्त्र योग कुण्डलिनी इत्यादि करने के बावजूद या इसी के कारण ये देश सड़ रहा है, बल्कि वे अभी भी यही कहते हैं कि भारत के लोगों को और अध्यात्मिक और धार्मिक बनने की जरूरत है ताकि सारी समस्याएं मिटाई जा सकें. ये दोनों गुरु यह नहीं कहते कि भारतीय आध्यात्मिकता का माडल ही असली जहर है, बल्कि इसके विपरीत वे इसी माडल की कास्मेटिक सर्जरी करके इसी को सुन्दर और जहरीला बनाते जाते हैं.

भगवान रजनीश ने हालांकि अपने करियर की शुरुआत में गौतम बुद्ध और मार्क्स से प्रभावित होकर बहुत ही सही दिशा में प्रश्न उठाये थे. वे एक खालिस नास्तिक या अज्ञेयवादी की मुद्रा में बात करते थे और एकदम चुभते हुए सवाल उठाते थे. वे पूछते थे कि इतना धर्म कर्म सत्संग और संन्यास होने के बावजूद इस देश में सामान्य सी प्राकृतिक नैतिकता क्यों नहीं है. लोग यहाँ एकदूसरे के साथ मिलकर समाज बदलने का प्रयास क्यों नहीं करते. महिलाओं की हालत इतनी खराब क्यों है और भारतीय शिक्षा संस्थान और वैज्ञानिक दुनिया में सबसे पिछड़े क्यों हैं इत्यादि. उनकी पुरानी हिंदी की किताबों में बहुत स्पष्टता से ये देखा जा सकता है. उनकी दो महत्वपूर्ण किताबे हैं - भारत के जलते प्रश्न और गांधी पर पुनर्विचार. इन दोनों किताबों में वे बहुत वैज्ञानिक ढंग से प्रश्न उठाते हैं और उत्तर भी देते हैं. लेकिन जब वे खुद जब इन प्रश्नों के उत्तरों को अमल में लाने की दृष्टि से समर्थ हो जाते हैं तब आश्चर्यजनक ढंग से स्वयम ही भगवान् बनकर लोगों को तन्त्र मन्त्र कुण्डलिनी और रहस्यवाद इत्यादि सिखाने लगते हैं. साठ के दशक में वामपंथी और मार्क्सवादी शैली में बात करने वाले आचार्य रजनीश जब समाज में पैठ बना लेते हैं तो सत्तर के दशक की शुरुआत में ही संन्यास देने की घोषणा करते हैं और समाज क्रान्ति की सारी बातें भूलकर आध्यात्मिक क्रान्ति की बात करने लगते हैं. आध्यात्मिक क्रान्ति का सीधा सीधा अर्थ है कि मनुष्य साधना करके मोक्ष को कैसे हासिल करे इस जमीन पर गरीबी मिटाने की बजाय स्वर्ग का ऐश्वर्य कैसे हासिल करे.

यह नितांत वेदान्तिक ढंग का एकांगिक और आत्मकेंद्रित माडल है जिसमे सामूहिक शुभ और समाज के लाभ की कोई प्रेरणा नहीं होती है. आप अपना तन्त्र मन्त्र लेकर चुपचाप अपने कमरे में बैठे रहें और आपके पडौस में ही अन्याय होता है तो उसके बारे में आपको सोचना तक नहीं है. यह भारत का सनातन वेद सम्मत आध्यात्मिक अनुशासन है. इसी का प्रचार रजनीश खुद को भगवान् घोषित करके करते हैं. अब चुंकी उन्होंने शुरुआत में बुद्ध की नास्तिकता और मार्क्स की सामाजिक क्रान्ति दृष्टि का उपयोग करके लोगों को प्रभावित कर लिया है इसलिए लोग उनसे पूछते हैं कि महाराज वो पुरानी क्रांतिकारी बातों का क्या हुआ? तो भगवान रजनीश उत्तर देते हैं कि जीवन विरोधाभास है एक सांस अंदर आती है तो दुसरी बाहर जाती है, दिन के साथ रात है, पक्षी दो पंखों पर उड़ता है इत्यादि इत्यादि.
इस पूरे खेल में वे लाखों लाख लोगों को उलझा लेते हैं और वे सभी लोग जो उन्हें सामाजिक  बदलाव का पक्षधर मानते आए थे वे उनसे दूर चले जाते हैं. बचे रह जाते हैं खालिस भक्त और मोक्ष का संधान करने वाले भाग्यवादी, अन्धविश्वासी और स्वार्थी लोग जिन्हें समाज और दुनिया की कोई समझ नहीं है और चिंता भी नहीं है. बस ले देकर चक्र कुण्डलिनी समाधि इत्यादि की बात करते हैं और भद्दे और स्त्री विरोधी जोक्स सुनाते रहते हैं. आज भी उसी दौर के स्वार्थी अन्धविश्वासी और व्यक्तिपूजक शिष्य उनकी विरासत संभाले हुए हैं.
अभी अभी ओशो के नाम पर एक नया आश्रम शुरू हुआ है जो चौरासी दिनों में चौरासी लाख योनियों से मुक्ति दिलाने का दावा करता है और तीन दिनों में पूर्वजन्म की यात्रा करवा देता है, ज्योतिष और देवी देवताओं का आह्वान करना सिखाता है. ये रजनीश की कन्फ्यूज्ड और मूर्खतापूर्ण शिक्षाओं का स्वाभाविक परिणाम है. फलों से पता चलता है कि पेड़ कैसा था. उनके अन्य आश्रम और ध्यान केंद्र भी जो समाज में बड़े बोल्ड होकर खुद को पेश करते हैं वे भी समाज को बदलने की बिलकुल चिंता नहीं करते बल्कि अत्यंत स्वार्थी ढंग के ध्यान समाधि में ही अपनी ऊर्जा लगाए रखते हैं. उनके शिष्यों में अधिकाँश लोगों से बात करने पर साफ़ दिखाई देता है कि आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म सहित मोक्ष इत्यादि के अंधविश्वास कितनी गहराई से उनके मन में जमे हुए हैं. यहाँ तक कि आनंद उत्सव के नाम पर जिस तरह का हास्यबोध रजनीश उन्हें देकर गये हैं उसमे भी स्त्रीविरोधी और नस्लीय चुटकुलों की भरमार है. खासकर सरदारों, स्त्रीयों, सिंधियों और मारवाड़ियों को उन्होंने चुटकुलों में खूब इस्तेमाल किया है. उनके शिष्यों मे भी इसी तरह का भयानक जातिवाद, स्त्री विरोधी मानसिकता और पलायनवाद सहित ज्योतिष इत्यादि का सम्मोहन बना हुआ है. इस उदाहरण से समझ में आता है कि भगवान रजनीश किस तरह से भारत के लिए समाधान नहीं बल्कि समस्या देकर गये हैं.

इसी तरह श्री श्री रविशंकर जो कि महर्षि महेश योगी के शिष्य हैं उन्होंने भी अपनी शुरुआत से ही अध्यात्मिक उपलब्धियों और मानसिक शान्ति के लिए उपायों को अपनी चर्चा के केंद्र में रखा. प्राणायाम और आसनों की व्यवस्था सहित मन्त्रों इत्यादि के अनुशासन से लोगों को मानसिक शान्ति और स्वास्थ्य का आश्वासन दिया गया. एक शहरी और उपभोक्तावादी जीवनशैली में व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं का समाधान करने के उद्देश्य से उनकी प्रस्तावनाएँ रची गईं हैं. कामकाजी युवा मध्यम वर्ग की तनाव और प्रतियोगिता से जन्मी समस्याओं का उन्होंने हल पेश किया. उनकी अध्यात्मिक पहल में हालाँकि मोक्ष समाधि और चक्र कुण्डलिनी इत्यादि का वैसा ज्वार नहीं है जितना भगवान रजनीश की प्रस्तावनाओं में है लेकिन फिर भी उनका पूरा अनुशासन मोक्ष और समाधि की धारणा का ही विस्तार है. व्यक्तिगत शुभ और व्यक्तिगत मोक्ष की आत्मघाती धारणा से जन्मा एकान्तिक और स्वार्थी ढंग का आध्यात्म उनके अनुशासन का मुख्य स्वर है. सुदर्शन क्रिया या अन्य प्राणायाम और कीर्तन इत्यादि असल में तनाव दूर करने के और शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य को बढाने के उपाय हैं. इन सबको एक सामूहिक ढंग से करने का तरीका भी बतलाया गया है जो एक नये ढंग की सामूहिकता और टीम का आभास देता है. उपर उपर से लगता है कि रजनीश के सन्यासियों की तरह ही रविशंकर के शिष्य भी ध्यान कीर्तन इत्यादि के माध्यम से एकदूसरे के निकट आ रहे हैं और समाज में एक तरह का संश्लेषण और एकीकरण हो रहा है. लेकिन ज़रा कुरेदकर देखिये ये संश्लेषण और एकीकरण झूठा और बनावटी है. न केवल यह बनावटी है बल्कि असली एकीकरण और सामूहिकता बोध की संभावना का सबसे बड़ा दुश्मन भी है.

आइये इसकी गहराई में प्रवेश करते हैं. रजनीश और रविशंकर दोनों ही जिन मौलिक मान्यताओं पर खड़े हैं वे हैं आत्मा, परमात्मा, पुनर्जन्म और मोक्ष या बुद्धत्व. ये मान्यताएं दुनिया की सबसे घातक अन्धविश्वासी अवैज्ञानिक और क्रान्ति विरोधी मान्यताएं हैं. इनमे उलझने वाले किसी भी समाज ने आज तक न तो विज्ञान दिया है न तकनीक, न ही समतामूलक और लोकतांत्रिक समाज दिया है. लिंग, वर्ण, भाषा और जाति के भेद इन्ही मान्यताओं के गर्भ से आते हैं. अब ऐसे गुरु जब पश्चिमी क्रान्तिद्रिष्टि को भारतीय पुराण दृष्टि से मिलाकर खिचड़ी बनाते हैं तो वो ऐसी जहरीली रचना होती है जो न पश्चिम के काम आती है न पूर्व के. अब इन गुरुओं की प्रस्तावनाओं को दुबारा देखिये, ये दैनिक जीवन का जो अनुशासन देते हैं और जिस तरह के प्रवचन पिलाते हैं वो एक पक्ष है, फिर जिस तरह से मनुष्य और दुनिया के भविष्य को चित्रित करते हैं वो दुसरा पक्ष है. और मजा ये कि ये दोनों पक्ष एकदूसरे के विरोध में हैं. यही इनकी मूर्खता का स्त्रोत है. दोनों ही एक भयानक पाखंडी विरोधाभास पर खड़े होकर दुनिया को मूर्ख बनाते हैं.

एक तरफ आत्मा का सिद्धांत सिखाते हैं और दूसरी तरफ कहते हैं कि आत्मभाव – मैं मेरा से मुक्ति ही मोक्ष है. अब ये गजब की पाखंड लीला है. अगर आत्म भाव से मुक्ति ही लक्ष्य है तो आत्मा और पुनर्जन्म का सिद्धांत क्यों सिखाते हो? तब क्यों नहीं बुद्ध की अनत्ता सिखाते हो? या तो आत्मा सिखाओ या फिर निर्वाण सिखाओ दोनों एकसाथ क्यों सिखाते हैं? एक तरफ समझाते हैं कि आत्मा अजर अमर अविनाशी और एक से दुसरे गर्भ में जाने वाली चीज है उसे नष्ट नहीं किया जा सकता. फिर ये भी सिखायेंगे कि अपने होने का बोध यानी आत्मभाव या अहम् को त्यागना ही मोक्ष है. अरे भाई जब त्यागना ही है तो आत्मा की बकवास सिखाते ही क्यों हैं आप? यही इनके धंधे का असली राज है. जब आप पुनर्जन्म मानकर चलेंगे तो आप स्वार्थी होने लगेंगे, जब स्वार्थ की बातें करेंगे तो ये परमार्थ की सितार छेड़ देंगे. बस जलेबी पर जलेबी बनाते जायेंगे. ये गुरु लोग एक हाथ में जहर की पुडिया और दूसरे हाथ में दवाई लेकर चलते हैं बिमारी और इलाज दोनों से कमाई होती रहे. रात में दीवार पर कीचड़ डालते हैं और सुबह गली गली में चिल्लाते हैं दीवार साफ़ करवा लो. ये धर्म और आध्यात्म का विशुद्ध बाजारीकरण हैं और रजनीश सहित रविशंकर इसमें बहुत ही कुशल हैं.
ये दोनों गुरु सिखाते हैं कि व्यक्तिगत जीवन में आनंदित कैसे हों, दैनिक जीवन के तनाव और प्रतियोगिता सहित यौन कुंठाओं और शारीरिक व्याधियों से भी कैसे मुक्त हों. यह बात बहुत सुन्दर है. एक शुरुआत के रूप में बहुत अच्छी बात है. लोग संन्यास लेकर या दीक्षा लेकर या बेसिक कोर्स या एडवांस कोर्स करके आगे बढ़ते जाते हैं. प्राणायाम मंत्रजाप आसन त्राटक या कीर्तन आदि से कुछ तनाव कम करते हैं और अपने जीवन में सुख और शिथिलता का अनुभव करते हैं.  इस बात की प्रशंसा होनी चाहिए. लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब ये व्यक्तिगत समाधान सामूहिक समाधान बन पाने की यात्रा में एकदम से असफल हो जाते हैं. उदाहरण के लिए व्यक्तिगत जीवन में तनाव कम करके हजारों लोग जब आपस में मिलकर सामूहिक जीवन और समाज का नक्शा बनाने बैठते हैं तब वे समाज निर्माण की चिंता की बजाय अपने मोक्ष की चिंता में घुस जाते हैं. आत्मा और पुनर्जन्म की धारणा उन्हें अपने ही भावी जन्म सहित मोक्ष की चिंता में इतना उलझा लेती है कि इन गुरुओं के शिष्य समाज के लिए रत्ती भर भी योगदान नहीं करते.
इसका ये अर्थ हुआ कि एक उपभोक्तावादी और तनावपूर्ण जीवनशैली में जीते हुए जब मन और शरीर थकने लगता है तब इन गुरुओं की शरण में आकर इनसे मदद ली जाती है. जब तनाव व रोग कम होते हैं तो दुगुनी ताकत से उसी जीवन व्यवस्था और स्वार्थी मोक्ष की धारणा की सेवा करने लग जाते हैं. इसी बिंदु पर जिद्दु कृष्णमूर्ति इन गुरुओं की खूब खबर लेते हैं और इनके पाखण्ड को नंगा करते हैं. यह बहुत बारीक बात है लेकिन रजनीश और रविशंकर दोनों के शिष्य इसे समझने में असफल रहे हैं. यह आज ही की बात नहीं है. इनके गुरु और उनकी पुरानी परम्पराओं ने भी यही सब किया है. इसीलिये इतने लंबे इतिहास में इस देश में राजतन्त्र, सामंतवाद, तानाशाही, गुलामी और धर्मसत्तावाद इत्यादि सब मिलेगा लेकिन लोकतंत्र का नामो निशान तक नहीं मिलेगा. लोकतंत्र कभी इस जमीन पर ही जन्मा था लेकिन वह आजीवकों और बौद्धों का काल था. अशोक बौद्ध होने के पहले आजीवक थे, चन्द्रगुप्त भी आजीवक थे. उस समय भौतिकवाद का दर्शन था जो आत्मा परमात्मा को नहीं बल्कि शरीर और मनुष्य सहित प्रकृति के सम्मान पर खडा था. इसीलिये उन्होंने उस समय में चिकित्सा, भेषज, मूर्तिकला, कृषि सहित अन्य सभी कलाओं को विक्सित किया. लेकिन जैसे ही आत्मा परमात्मा स्टाइल धर्म हावी हुआ ये मुल्क अंधविश्वास और कर्मकांड में डूब गया.

हालाँकि भगवान रजनीश को अमेरिका से सबक मिलने के बाद बहुत बड़ी शिक्षा मिली थी. अपनी विश्वासपात्र शिष्या शीला से और अन्य शिष्यों से धोखा खाने के बाद उन्हें समझ में आया कि आत्मा परमात्मा और गुरुभक्ति किसी भी तरह से किसी की चेतना में कोई बदलाव नहीं लाती बल्कि ऐसे सभी लोग मौके के इन्तेजार में बैठे रहते हैं और गुरु के बीमार या कमजोर होते ही खुद सत्ता चलाने लगते हैं. इस बोध से रजनीश को असली बुद्धत्व मिला. इसीलिये अमेरिका से लौटकर उन्होंने जिस अंदाज में अपनी बातें रखीं हैं वो एकदम अलग ही बात है. वही ओशो का असली सौंदर्य है उतना भर हिस्सा बचाने योग्य है और उसी से भारतीय अध्यात्म की मूर्खता के इलाज की कोई उम्मीद है. लेकिन उनके अपने शिष्य उनकी अनत्ता और शून्य पर आधारित बातों को छुपा रहे हैं. जब वे स्वयं को गौतम बुद्ध में समर्पित करते हैं उसके बाद की उनकी किताबें गायब की जा रही हैं. कापीराईट के झगड़ों में उन्हें अदृश्य बनाया जा रहा है. भगवान रजनीश तो अपने विरोधाभासों में खुद ही कमजोर होकर ब्राह्मणवाद का चारा बन चुके हैं अब उनका अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अवतार ओशो उनके लालची और पाखंडी शिष्यों के हाथों नष्ट हो रहा है.

श्री रविशंकर अभी मौजूद हैं, लेकिन उनकी शिक्षाओं के अनुशीलन से ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि वे कभी भी स्व, आत्मा और पुनर्जन्म आधारित अध्यात्मिक माडल का विरोध करेंगे. वे और उनके गुरु महेश योगी विशुद्ध वेदांती हैं. वे पुनर्जन्म के बिना चल ही नहीं सकते. और जब तक पुनर्जन्म की या स्व के या आत्म की निरंतरता का सिद्धांत इस देश में चलता रहेगा ये देश स्वार्थी और अवसरवादी बना रहेगा. इसमें सामूहिक शुभ और लोकमंगल की धारणा नहीं आ सकेगी. उपर उपर सर्वे भवन्ति सुखिनः कहते रहेंगे लेकिन अपने ही घर में स्त्री को शास्त्र पढने या मंदिर जाने की अनुमति नहीं देंगे. अपनी बेटियों को आजादी से और मनमर्जी से विवाह करने की इजाजत नहीं देंगे. कण कण में ब्रह्म का दर्शन करेंगे लेकिन एक शूद्र को तीन फूट ऊपर से धार गिराकर पानी पिलायेंगे वह छू न जाए इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे. वसुधैव कुटुंबकम की ढपली भी  बजायेंगे और शादी ब्याह के इश्तिहारों में धर्म, जाति और उपजाति का बखान भी करते रहेंगे.

भगवान रजनीश और रविशंकर की शिक्षाओं और उनके शिष्यों के मनोविज्ञान को ध्यान से पढ़िए आपको आश्चर्य होगा कि ये लोग इस शताब्दी में विज्ञान और तकनीक के साथ जी रहे हैं. वे एक पाषाण युग के चलते फिरते जीवाश्म नजर आते हैं. उनकी स्वार्थ दृष्टि अंधविश्वास और पलायनवाद देखकर समझ में आता है कि इस देश पर इतनी छोटी छोटी कौमों ने कैसे इतनी आसानी से कब्जा किया होगा. ऐसे गुरुओं और इनके आध्यात्म से इस देश को बचाने की सख्त जरूरत है. भारत के समाज में जो थोड़ी सी प्रगतिशीलता वैज्ञानिकता और नैतिकता बची हुई है तो वो इन गुरुओं की वजह से नहीं बल्कि इनके बावजूद बची हुई है.


प्रस्तुति:- बिजूका
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टिप्पणियाँ:-

पूनम:- बहुत खूब
पूरा पढकर सुखद अनुभूति होती है
रजनीश जी की प्राकृतिक नैतिकता ।
फिर रविशंकर जी का सामूहिक कीर्तन आदि से हलकी फुलकी खुशी और संतोष पा लेना ।
मार्क्स और बुद्ध की विचारधारा के समिश्रण से ओशो की उतपति ।
आपने चंद्रगुप्त से चाणक्य तक सभी की विचारधारा से मिलवाया।
माननीय ।संदेह करने से आदमी विचारक बन जाता है ।
आस्था करने से मनीषी ।
आप तो इन दोनो गुरू की विचारधारा को सिरे से खंड खंड करने पर तुले हुए है ।
आदरणीय ।बुद्ध के समय मे धयान लगाना आज के मुकाबले बहुत ही आसान हुआ करता था ।आज बहुत से लोग मनमुख है ।आज मन की धुलाई सफाई उस हजार साल पहले तरीके से नही हो सकती है ।
मै किसी भी गुरूजी की पक्षधर नहीहू
लेकिन इन दोनो की वाणी मे कुछ तो ओज है ।दोनो का सूफियाना ढंग न जाने कितने भटके हुए लोगो को राह दिखा रहा है ।
अब बात है कंफ्यूज करने की ।
यह बात तो हमेशा से थी ।
बुद्ध को मासाहार करके संसार छोडना पडा था ।
महान सूफी मंसूर को सूली पर लटका दिया ।सुकरात को विष दिया गया ।
तब भी बहुतो की    सोच रही थी  कि ये तो कनफ्यूज कर रहे है ।
आज की जटिल जीवन शैली के लिए
शायद यही गुरु कुछ सरलता ले आये ?वरन्  गलत बात कहा और कब नही थी ।
इतना बड़ा विद्वान और लडाका  हुमाअंयू  अफीम की पिनक के कारण फिसल गया ।जबकि उसके पास भी कोई न कोई तो था ही था।अकबर इतने विद्वान लोगो की संगति मे भी कैसा कुंठित होकर संसार से गया ।
आदरणीय ।
हर चीज अपने समय के हिसाब से अपनी प्राथमिकता को तय कर लेती है ।अपवाद तो है ही ।पर बहुमत अगर इन गुरु के साथ है ।सचिन तेंडुलकर जैसे महान खिलाड़ी जब इनकी चौखट पर जाते है ।सचिन   पुट्टपर्थी के साई बाबा के भक्त है ।
हम सब विचार रख सकते है ।
आपके विचार बहुत ही सारगर्भित है

पल्लवी प्रसाद:-
Dharma...vishesh kar Bhakti brand, nikkamon k panaahgaah hy. Yadi  panaahgaah ka baard (fence) toot gaya toh na jane samaj me kaisi baadh (flood) aye. Haan, log sarthak karya karen, atmavishwasi banen, toh ghor kalyan hoga. Bina Guru k charan gahe ya gaay k poonch pakde vaikunth prapt ho jayega in d sense jivan vaikunth  rupi hoga.
Kamkaji logon ka aisi jagah jana sanskar ya lobh janit bhi hota hy lekin  sara khali vaqt in chizon me vyateet karna....panaahgah pane vali bat hy.... Religion n devotion is a great ACTIVITY d world over! Sabse badhiya baat - Dharm iklota Time-pass hy jise karne par aap prashansa k bhagi hote hyn aur swarg me seat reserv hoti hy.

संजय जोठे:-
मैं यह देख पाता हूँ कि आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म - ये तीन या दो या कोई एक भी किसी धर्म में मौजूद है तो वो धर्म और वो भीड़ बहुत गहरे ढंग से अन्धविश्वास में पड़ जाती है। भारतीय धर्मों का यही दुर्भाग्य है।
वैसे, मेरा यह लेख लहक पत्रिका के मई जून अंक में आया है।

जय:-
संजय ने बहुत बेहतरीन लेख लिखा है। बाबा ओ के खिलाफ तो ओह माय गॉड जैसी फिल्म और सरिता प्रकाशन की तमाम किताबे है ।लेकिन सब भर्त्सना मुलक है।विश्लेषण की कोशिश नही है। संजय ने विश्लेषण कर विषय को गम्भीर मोड़ दिया है ।
सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के माहिर होंगे लेकिन विचार में फिसड्डी और मैट्रिक फेल हैं। उन्हें बौद्धिकता का आदर्श नही बनाया जा सकता ।ये गांठ के पुरे आँख के अंधे लोग हैं। अमिताभ बच्चन का क्या कम अंधविश्वासी है

पल्लवी प्रसाद:-
Inke profession me 'chance' mahatv rakhta hy isliye bhagwan bhi. Yahi bat vyapariyon par bhi lagu hoti hy. Fir shayad jab hum paripurnta se bhi adhik k bhagi hone lagte hyn toh Ishwar-unmukhi ho jate hyn ek toh khone k dar se, dusre guilt mitane k liye bhi.
Bhakton k kami is karan k chalte bhi nahi k Bharitya samajik-parivarik bunawat is prakar k hy jahan grihaston (vishesh kar mahilaon) k liye grihasti se itar koi 'let out', activity ya man lagane ka sadhan nahi. Dharm muft me hasil hy aur yash bhi deta hy. Jab is nazariye se dekhen toh mehsoos hota hy v shud not grudge ppl dr religious let out.
Guruon par niyantran k liye general anti superstition laws hone chahiye - ye Maharashtra me lagu hy. Bhakti karwayen lekin exploitation na ho.

प्रणय कुमार:-
यह लेख और भी परिपूर्ण व संतुलित होता यदि इसमें सभी धर्मों में व्याप्त अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर प्रहार किया जाता|इस दोहरेपन के कारण ही भारत में वामपंथ अपनी प्रासंगिकता खोता चला जा रहा है|एक ओर वह जहाँ बाबाओं के कर्मकांड और मायाजाल के प्रति मुखर रहा है,वहीं दूसरी ओर वह उलेमाओं-मौलवियों की करतूतों से आँखें फेर लेता है,एक ओर वह जहाँ हिंदू स्त्रियों और वंचितों के अधिकारों की बात करता है,वहीं दूसरी ओर वह मुस्लिम बहनों पर होने वाले अमानवीय अत्याचार और तीन तलाक जैसी दकियानूसी रिवाजों पर मौन साध लेता है|और इसीलिए निष्पक्ष लोग वामपंथी नीयत पर संदेह करने लगे हैं|श्री रविशंकर या रजनीश कितने भी अवैज्ञानिक हों,पर उन उलेमाओं-मौलवियों से जागरूक हैं जो औरतों को अल्लाह की फ़सल बताते हैं,जो औरतों को बच्चे जनने की मशीन बताने में भी संकोच नहीं करते|पर मुझे भारत में एक भी वामपंथी न दिखा जो ऐसी बातों पर कभी भूलकर भी टिप्पणी करता हो।
आभारी हूँ,इस मंच मैं बड़े संकोच और डर के साथ अपने विचार रखता हूँ।

सत्यनारायण:-
प्रणेय जी आप संकोच और डर के साथ विचार न रखा करे....बेफिक्र और बिंदास होकर रखे.....लेकिन तर्क और शालीनता के साथ रखे.....आपके और इस तरह हर साथी के विचारों का सदा स्वागत है....

प्रणय कुमार:-
कोशिश तो शालीनता की रही है,कहीं पैनापन भी आया होगा तो वह शिल्पगत होगा,भावगत नहीं|

जय:-
उलेमाओं के गलती गिनाने से हिन्दू बाबा सही नही साबित होते ।रविशंकर तो मोदी के कट्टर समर्थक है ।ऐसे में उनकी राजनितिक आलोचना होगी ही ।दलितों को ब्राह्मणवाद ने सताया तो वे सहारा के पिग्मियो की आलोचना नही करेंगे ।यह आरएसएस मार्का तर्क की यहूदी नर संहार का विरोध करने के लिए आज तक हुए सारे नर संहारो को गिनाना होगा बेहद बेतुका है ।

आलोक बाजपेयी:-
आलेख अच्छा है। इन सब का, इनके प्रभाव अनुकरण के कारणों का विश्लेषण आवश्यक है। यह नहीं किया जा रहा। केवल नकार ही पर्याप्त नहीं।

आशीष मेहता:-
लेख जितना विचारोत्तेजक है उतना तार्किक नहीं। सिर्फ दो गुरुओं के लेखे-जोखे से पूरे भारतीय समाज को पढ़ना, भारत की 'सनातन समस्याओं' को चिन्हित करना एवं यह निष्कर्ष निकालना कि 'गुलामी' की वजह अवैज्ञानिकता है, तीन विभिन्न अतार्किक विचार हैं।
लेखक के प्रतिनिधि प्रश्नों में प्रथम है  : भारतीय गुलामी की वजह? गौरतलब है कि जैन धर्म {जो न जाति को मानता है, न ही पुनर्जन्म को, पर आत्मा (जीव) को मानता है।} शायद ब्राह्मणवाद के समक्ष, ईसा पूर्व छटी/सातवीं शताब्दी में, बेहतर दृष्टिकोण (मानवतावादी) लिए आया था (मार्क्स का पैदा होना बाकी था तब।)..... उसके बाद बौद्ध धर्म (जो कि आत्मा को नहीं मानता, पर पुनर्जन्म को मानता है) अस्तित्व में आया। (कृपया इस पर और इससे पहले से वैदिक/सनातन धर्म पर, इतिहासविद् साथी, बेहतर जानकारी साझा करें )
लब्बोलुआब यह कि, दिल्ली पर तुर्क शासन हुआ १३वी शताब्दी  (AD) में, तो जैन धर्म की उत्पत्ति से करीब 2000 वर्षों की आजादी गिनी जा सकती है। गुलामी के दिन गिने, तो १३वी से २०वी शताब्दी, यानी लगभग ८०० वर्ष। और कारण क्या? धर्म, आत्मा, परमात्मा या पुनर्जन्म  ?
भारत की 'सनातन समस्याएं' हैं, जातिभेद, लैंगिकभेद (gender discrimination)। विशाल भूभाग होते हुए भी अपार जनसंख्या का असंतुलित बोझ। आज भी अर्थव्यवस्था मानसून की ललक रखती है। पिछली सदी में हम भ्रष्टाचार (नैतिक पतन कह लीजिए) नामक भस्मासुर जन चुके हैं। समस्याएं हजार नहीं, दो हाथों की उंगलियाँ काफी हैं, गिनने के लिए।
बावजूद इसके, भारतीय परंपराएं, तीज-त्यौहार, व्यवस्थाएं विज्ञान सम्मत हैं। आयुर्वेद, चरक संहिता को कैसे अवैज्ञानिक कह पाते हैं ? हमारे घरेलू नुस्खों में भी उत्तम जानकारी, प्राकृतिक सम्पदा रली-मिली है (नजर तंत्र मंत्र टोने टोटके पर ही डालनी हो तो, क्या कहना।) हाँ, हमारी परंपरा का एक बड़ा दोष जानकारी को सीमित (अपने पुत्र/सम्बन्धी तक) रखना, मौखिक रखना (copyright protection) रहा है ।
संजय भाई का पुरजोर समर्थन 'बाबाओं के व्यापारिक मॅाडल' के खिलाफ, अंधविश्वास के खिलाफ। दो बाबा, जो आपने गिनाए हैं, वे तो 'प्रिमियम बाबा' हैं, इनके पीछे 20 और गिन दीजिए, बाजार काफी बढ़ा है, हालांकि 'सर्वहारा' को छू नही पाया है, मध्यवर्ग और उपर भले कितना ही बेवकूफ हो लें।
अपना 'हित साधना' ही अन्धविश्वास की तरफ धकेलता है और भ्रष्टाचार की तरफ भी । एक अन्जाने डर (अहित) से बचने की लालसा ही 'परमात्मा' की अवधारणा का मूल है। बावजूद इसके, कहना चाहता हूँ कि जिस वजह से "आत्मा/पुनर्जन्म" वैज्ञानिक नहीं हैं, ठीक उन्हीं वजहों से, अवैज्ञानिक भी नहीं हैं।
आत्मा/पुनर्जन्म/अवैज्ञानिकता का गुलामी से क्या संबंध ? प्रदीप भाई ने पिछले दिनों "वैज्ञानिकों" की गुलामी (बाज़ारवाद के परिप्रेक्ष्य में) का मुद्दा छुआ था। वह तार्किक जरूर है, आज की तारीख में।

प्रणय कुमार:-
कुछ अर्थों में वामपंथ जिहादी मानसिकता और विचारधारा से भी अधिक घातक है|रक्तरंजित क्रांति के नाम पर इसने जितना खून बहाया है,मानवता का जितना गला घोंटा है,उतना शायद ही किसी अन्य विचारधारा ने किया हो|जिन-जिन देशों में वामपंथी शासन है,वहाँ गरीबों-मज़लूमों,सत्यान्वेषियों-विरोधियों आदि की आवाज़ को किस क़दर दबाया-कुचला गया है,उसके स्मरण मात्र से ही सिहरन पैदा होती है|यह भी शोध का विषय है कि रूस और चीन पोषित इस विचारधारा ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत इसके प्रचार-प्रसार के लिए कितने घिनौने हथकंडे अपनाए?वामपंथी शासन वाले देशों में न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार भी जनसामान्य को नहीं दिए गए,परंतु दूसरे देशों में इनके पिछलग्गू लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देकर जनता को भ्रमित करने की कुचेष्टा करते रहते हैं|
            
भारत में तो वामपंथियों का इतिहास इसके उद्भव-काल से ही देश और संस्कृति विरोधी रहा है,क्योंकि भारत की सनातन समन्वयवादी जीवन-दृष्टि और दर्शन इनके फलने-फूलने के लिए अनुकूल नहीं है|भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन में परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय और संतुलन साधने की अद्भुत शक्ति रही है|इसलिए इन्हें लगा कि भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन के प्रभावी चलन के बीच इनकी दाल नहीं गलने वाली,इसलिए इन्होंने बड़ी योजनापूर्वक भारतीय संस्कृति और सनातन जीवन-मूल्यों पर हमले शुरू किए|जब तक राष्ट्रीय राजनीति में, नेतृत्व गाँधी-सुभाष जैसे राष्ट्रवादियों के हाथ रहा,इनकी एक न चली,न ही जनसामान्य ने इन्हें समर्थन दिया|गाँधी धर्म से प्रेरणा ग्रहण करते रहे और ये कहने को तो धर्म को अफीम की गोली मानते रहे,पर छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में कभी पीछे नहीं रहे,यहाँ तक कि राष्ट्र की इनकी अवधारणा और जिन्ना व मुस्लिम लीग की अवधारणा में कोई ख़ास फ़र्क नहीं रहा,ये भी द्विराष्ट्रवाद का समर्थन करते रहे और कालांतर में तो इन्होंने बहुराष्ट्रवाद का समर्थन करते हुए इस सोच को बल दिया कि भारत अनेक संस्कृति और राष्ट्रों का अस्वाभाविक गठजोड़ भर है|इनकी राष्ट्र-विरोधी सोच के कारण ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे प्रखर देशभक्त राष्ट्रनेताओं ने इन्हें कभी भाव नहीं दिया , इनकी कुत्सित मानसिकता का सबसे बड़ा उदाहरण तो उनका वह घृणित वक्तव्य है जिसमें इन्होंने नेताजी को 'तोजो का कुत्ता' कहकर संबोधित किया था |जब यह मुल्क आज़ाद हुआ,तब देश में इनका प्रभाव नाम-मात्र को भी नहीं था|जबरन इन्होंने शहीदे आज़म भगत सिंह को अपना आइकन बनाने का अभियान छेड़ रखा है|सच तो यह है कि इन्हें भारत में अपना पाँव जमाने का मौका नेहरू के शासन-काल में मिला|नेहरू का वामपंथी झुकाव किसी से छुपा नहीं है|वे दुर्घटनावश स्वयं को हिंदू यानी भारतीय मानते थे|नेहरू की जड़ें भारत से कम और विदेशों से अधिक जुड़ी रहीं,उनकी परवरिश और शिक्षा-दीक्षा भी पश्चिमी परिवेश में अधिक हुई|भारत की जड़ों और संस्कारों से कटा-छँटा व्यक्ति,जो कि दुर्भाग्य से ताकतवर भी था,इन्हें अपने विचारों के वाहक के रूप में सर्वाधिक उपयुक्त लगा!और उनकी इन्हीं कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर इन्होंने सभी अकादमिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक या अन्य प्रमुख संस्थाओं के शीर्ष पदों पर अपने लोगों को बिठाना शुरू कर दिया जो उनकी बेटी 'इंदिरा' के कार्यकाल तक बदस्तूर ज़ारी रहा|यह अकारण नहीं है कि ज़्यादातर वामपंथी नेहरू और इंदिरा की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते नज़र आते हैं|और तो और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तो इंदिरा द्वारा देश पर आपातकाल थोपे जाने का समर्थन तक किया था,वे तत्कालीन सरकार के साझीदार थे|यह भी शोध का विषय है कि दो प्रखर राष्ट्रवादी नेताओं सुभाषचन्द्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री की मौत इनकी विचारधारा को पोषण देने वाले शासन व राष्ट्र रूस में ही क्यों हुआ?
   
भारत के विकास की गाथा जब भी लिखी जाएगी उसमें सबसे बड़े अवरोधक के रूप में वामपंथी आंदोलनकारियों का नाम सुस्पष्ट अक्षरों में लिखा जाएगा|बंगाल को इन्होंने एक विकसित राज्य से बीमारू राज्य में तब्दील कर दिया,केरल को अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या का अखाड़ा बनाकर रख दिया,त्रिपुरा को धर्मांतरण की प्रयोगशाला बनाने में इन्होंने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी|आप सर्वेक्षण और शोध करके देख लीजिए इन्होंने कभी पर्यावरण तो कभी मानवाधिकार के नाम पर विकास के कार्यक्रम में केवल अड़ंगे  लगाए हैं और आम करदाताओं के पैसे से चलने वाली समयबद्ध योजनाओं को अधर में लटकाया है या उसकी प्रस्तावित लागत में वृद्धि करवाई है|इनके मजदूर संगठनों ने तमाम फैक्ट्रियों पर ताले जड़वा दिए, रातों-रात लोगों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया|भोले-भाले मासूम आदिवासियों, वनवासियों और वंचितों को बरगलाकर इन्होंने उनके हाथों में बंदूकें थमा उगाही और फ़िरौती की दुकानें खोल लीं|अपने प्रभाव-क्षेत्र के इलाकों को स्कूल,शिक्षा,चिकित्सा,सेवा के विभिन्न  योजनाओं और प्रकल्पों के लाभ से वंचित कर दिया!और ये अपना शिकार किसे बनाते हैं,साधारण पुलिसवाले को,सेना में नौकरी कर अपनी आजीविका चला रहे कर्तव्यपरायण जवानों को,शिक्षकों को|
      
शिक्षा और पाठ्यक्रम में इन्होंने ऐसे-ऐसे वैचारिक प्रयोग किए कि आज वह कचरे के ढेर में तब्दील हो गया है|आधुनिक शिक्षित व्यक्ति अपनी ही परंपराओं,जीवन-मूल्यों,आदर्शों और मान-बिंदुओं से बुरी तरह कटा है,उदासीन है,कुंठित है|वह अपने ही देश और मान्य मान्यताओं के प्रति विद्रोही हो चुका है|इन्होंने उन्हें ऐसे विदेशी रंग में रंग दिया है कि वे आक्रमणकारियों के प्रति गौरव-बोध और अपने प्रति हीनता-ग्रन्थि से भर उठे हैं|भारत माता की जय बोलने पर इन्हें आपत्ति है,वंदे मातरम् बोलने से इनकी धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में पड़ जाती है,गेरुआ तो इन्हें ढोंगी-बलात्कारी ही नज़र आता है,शिष्टाचार और विनम्रता इनके लिए ओढ़ा हुआ व्यवहार है,छत्रपति शिवाजी,महाराणा प्रताप,गुरु गोविंद सिंह,वीर सावरकर जैसे महापुरुष इनके लिए अस्पृश्य हैं,राम-कृष्ण मिथक हैं,पूजा-प्रार्थना बाह्याडंबर हैं,देशभक्ति उन्माद है,सांस्कृतिक अखण्डता कपोल-कल्पना है,वेद गड़ेरियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है,पुराण गल्प हैं,उपनिषद जटिल दर्शन भर हैं,परंपराएँ रूढ़ियाँ हैं,परिवार शोषण का अड्डा है,सभी धनी अपराधी हैं,भारतीय शौर्य गाथाएँ चारणों और भाटों की गायीं विरुदावलियाँ हैं,यहाँ सदियों से रचा-बसा बहुसंख्यक समाज असली आक्रांता है,देश भिन्न-भिन्न अस्मित
कुछ अर्थों में वामपंथ जिहादी मानसिकता और विचारधारा से भी अधिक घातक है|रक्तरंजित क्रांति के नाम पर इसने जितना खून बहाया है,मानवता का जितना गला घोंटा है,उतना शायद ही किसी अन्य विचारधारा ने किया हो|जिन-जिन देशों में वामपंथी शासन है,वहाँ गरीबों-मज़लूमों,सत्यान्वेषियों-विरोधियों आदि की आवाज़ को किस क़दर दबाया-कुचला गया है,उसके स्मरण मात्र से ही सिहरन पैदा होती है|यह भी शोध का विषय है कि रूस और चीन पोषित इस विचारधारा ने अपनी विस्तारवादी नीति के तहत इसके प्रचार-प्रसार के लिए कितने घिनौने हथकंडे अपनाए?वामपंथी शासन वाले देशों में न्यूनतम लोकतांत्रिक अधिकार भी जनसामान्य को नहीं दिए गए,परंतु दूसरे देशों में इनके पिछलग्गू लोकतांत्रिक मूल्यों की दुहाई देकर जनता को भ्रमित करने की कुचेष्टा करते रहते हैं|
            
भारत में तो वामपंथियों का इतिहास इसके उद्भव-काल से ही देश और संस्कृति विरोधी रहा है,क्योंकि भारत की सनातन समन्वयवादी जीवन-दृष्टि और दर्शन इनके फलने-फूलने के लिए अनुकूल नहीं है|भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन में परस्पर विरोधी विचारों में समन्वय और संतुलन साधने की अद्भुत शक्ति रही है|इसलिए इन्हें लगा कि भारतीय संस्कृति और जीवन-दर्शन के प्रभावी चलन के बीच इनकी दाल नहीं गलने वाली,इसलिए इन्होंने बड़ी योजनापूर्वक भारतीय संस्कृति और सनातन जीवन-मूल्यों पर हमले शुरू किए|जब तक राष्ट्रीय राजनीति में, नेतृत्व गाँधी-सुभाष जैसे राष्ट्रवादियों के हाथ रहा,इनकी एक न चली,न ही जनसामान्य ने इन्हें समर्थन दिया|गाँधी धर्म से प्रेरणा ग्रहण करते रहे और ये कहने को तो धर्म को अफीम की गोली मानते रहे,पर छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण में कभी पीछे नहीं रहे,यहाँ तक कि राष्ट्र की इनकी अवधारणा और जिन्ना व मुस्लिम लीग की अवधारणा में कोई ख़ास फ़र्क नहीं रहा,ये भी द्विराष्ट्रवाद का समर्थन करते रहे और कालांतर में तो इन्होंने बहुराष्ट्रवाद का समर्थन करते हुए इस सोच को बल दिया कि भारत अनेक संस्कृति और राष्ट्रों का अस्वाभाविक गठजोड़ भर है|इनकी राष्ट्र-विरोधी सोच के कारण ही नेताजी सुभाषचन्द्र बोस जैसे प्रखर देशभक्त राष्ट्रनेताओं ने इन्हें कभी भाव नहीं दिया , इनकी कुत्सित मानसिकता का सबसे बड़ा उदाहरण तो उनका वह घृणित वक्तव्य है जिसमें इन्होंने नेताजी को 'तोजो का कुत्ता' कहकर संबोधित किया था |जब यह मुल्क आज़ाद हुआ,तब देश में इनका प्रभाव नाम-मात्र को भी नहीं था|जबरन इन्होंने शहीदे आज़म भगत सिंह को अपना आइकन बनाने का अभियान छेड़ रखा है|सच तो यह है कि इन्हें भारत में अपना पाँव जमाने का मौका नेहरू के शासन-काल में मिला|नेहरू का वामपंथी झुकाव किसी से छुपा नहीं है|वे दुर्घटनावश स्वयं को हिंदू यानी भारतीय मानते थे|नेहरू की जड़ें भारत से कम और विदेशों से अधिक जुड़ी रहीं,उनकी परवरिश और शिक्षा-दीक्षा भी पश्चिमी परिवेश में अधिक हुई|भारत की जड़ों और संस्कारों से कटा-छँटा व्यक्ति,जो कि दुर्भाग्य से ताकतवर भी था,इन्हें अपने विचारों के वाहक के रूप में सर्वाधिक उपयुक्त लगा!और उनकी इन्हीं कमज़ोरी का फ़ायदा उठाकर इन्होंने सभी अकादमिक-साहित्यिक-सांस्कृतिक या अन्य प्रमुख संस्थाओं के शीर्ष पदों पर अपने लोगों को बिठाना शुरू कर दिया जो उनकी बेटी 'इंदिरा' के कार्यकाल तक बदस्तूर ज़ारी रहा|यह अकारण नहीं है कि ज़्यादातर वामपंथी नेहरू और इंदिरा की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते नज़र आते हैं|और तो और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने तो इंदिरा द्वारा देश पर आपातकाल थोपे जाने का समर्थन तक किया था,वे तत्कालीन सरकार के साझीदार थे|यह भी शोध का विषय है कि दो प्रखर राष्ट्रवादी नेताओं सुभाषचन्द्र बोस और लाल बहादुर शास्त्री की मौत इनकी विचारधारा को पोषण देने वाले शासन व राष्ट्र रूस में ही क्यों हुआ?
    
भारत के विकास की गाथा जब भी लिखी जाएगी उसमें सबसे बड़े अवरोधक के रूप में वामपंथी आंदोलनकारियों का नाम सुस्पष्ट अक्षरों में लिखा जाएगा|बंगाल को इन्होंने एक विकसित राज्य से बीमारू राज्य में तब्दील कर दिया,केरल को अपने राजनीतिक विरोधियों की हत्या का अखाड़ा बनाकर रख दिया,त्रिपुरा को धर्मांतरण की प्रयोगशाला बनाने में इन्होंने कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखी|आप सर्वेक्षण और शोध करके देख लीजिए इन्होंने कभी पर्यावरण तो कभी मानवाधिकार के नाम पर विकास के कार्यक्रम में केवल अड़ंगे  लगाए हैं और आम करदाताओं के पैसे से चलने वाली समयबद्ध योजनाओं को अधर में लटकाया है या उसकी प्रस्तावित लागत में वृद्धि करवाई है|इनके मजदूर संगठनों ने तमाम फैक्ट्रियों पर ताले जड़वा दिए, रातों-रात लोगों को पलायन करने पर मजबूर कर दिया|भोले-भाले मासूम आदिवासियों, वनवासियों और वंचितों को बरगलाकर इन्होंने उनके हाथों में बंदूकें थमा उगाही और फ़िरौती की दुकानें खोल लीं|अपने प्रभाव-क्षेत्र के इलाकों को स्कूल,शिक्षा,चिकित्सा,सेवा के विभिन्न  योजनाओं और प्रकल्पों के लाभ से वंचित कर दिया!और ये अपना शिकार किसे बनाते हैं,साधारण पुलिसवाले को,सेना में नौकरी कर अपनी आजीविका चला रहे कर्तव्यपरायण जवानों को,शिक्षकों को|
     
शिक्षा और पाठ्यक्रम में इन्होंने ऐसे-ऐसे वैचारिक प्रयोग किए कि आज वह कचरे के ढेर में तब्दील हो गया है|आधुनिक शिक्षित व्यक्ति अपनी ही परंपराओं,जीवन-मूल्यों,आदर्शों और मान-बिंदुओं से बुरी तरह कटा है,उदासीन है,कुंठित है|वह अपने ही देश और मान्य मान्यताओं के प्रति विद्रोही हो चुका है|इन्होंने उन्हें ऐसे विदेशी रंग में रंग दिया है कि वे आक्रमणकारियों के प्रति गौरव-बोध और अपने प्रति हीनता-ग्रन्थि से भर उठे हैं|भारत माता की जय बोलने पर इन्हें आपत्ति है,वंदे मातरम् बोलने से इनकी धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में पड़ जाती है,गेरुआ तो इन्हें ढोंगी-बलात्कारी ही नज़र आता है,शिष्टाचार और विनम्रता इनके लिए ओढ़ा हुआ व्यवहार है,छत्रपति शिवाजी,महाराणा प्रताप,गुरु गोविंद सिंह,वीर सावरकर जैसे महापुरुष इनके लिए अस्पृश्य हैं,राम-कृष्ण मिथक हैं,पूजा-प्रार्थना बाह्याडंबर हैं,देशभक्ति उन्माद है,सांस्कृतिक अखण्डता कपोल-कल्पना है,वेद गड़ेरियों द्वारा गाया जाने वाला गीत है,पुराण गल्प हैं,उपनिषद जटिल दर्शन भर हैं,परंपराएँ रूढ़ियाँ हैं,परिवार शोषण का अड्डा है,सभी धनी अपराधी हैं,भारतीय शौर्य गाथाएँ चारणों और भाटों की गायीं विरुदावलियाँ हैं,यहाँ सदियों से रचा-बसा बहुसंख्यक समाज असली आक्रांता है,देश भिन्न-भिन्न अस्मिताओं का गठजोड़ है,गरीबी भी इनके यहाँ जातियों के साँचे में ढली है,हिंदू दर्शन,कला,स्थापत्य इनके लिए कोई मायने नहीं रखते,उन्हें ये पिछड़ेपन का प्रतीक मानते हैं,पर इस्लाम को अमन और भाईचारे का पैगाम,हिंदू स्त्रियाँ इन्हें भयानक शोषण की शिकार नज़र आती हैं,पर मुस्लिम स्त्रियाँ जन्नत की परी, इनके लिए प्रगतिशीलता मतलब अपने शास्त्रों-पुरखों को गरियाना है....वगैरह-वग़ैरह!यानी जो-जो चिंतन और मान्यताएँ देश को बाँट और कमज़ोर कर सकती हैं,ये उसे ही प्रचारित-प्रसारित करेंगे|प्रोपेगेंडा और झूठ फ़ैलाने में इन्हें महारत हासिल है|
     
निजी जीवन में आकंठ भोग में डूबे इनके नीति-नियंता सार्वजनिक जीवन में शुचिता और त्याग की लफ़्फ़ाज़ी करते नज़र आते हैं|पंचसितारा सुविधाओं से लैस वातानुकूलित कक्षों में बर्फ और सोडे के साथ रंगीन पेय से गला तर करते हुए देश-विदेश का तख्ता-पलट करने का दंभ भरने वाले इन नकली क्रांतिकारियों की वास्तविकता सुई चुभे गुब्बारे जैसी है|ये सामान्य-सा वैचारिक प्रतिरोध नहीं झेल सकते,हिंसा इनका सुरक्षा-कवच है !मेहनतकश लोगों के पसीने से इन्हें बू आती है,उनके साथ खड़े होकर उनकी भाषा में बात करना इन्हें पिछड़ापन लगता है,येन-केन-प्रकारेण सत्ता से चिपककर सुविधाएँ लपक लेने की लोलुप मनोवृत्ति ने इनकी रही-सही धार भी कुंद कर दी है|वर्ग-विहीन समाज की स्थापना एक यूटोपिया है,जिसके आसान शिकार भोले-भाले युवा बनते हैं,जो जीवन की वास्तविकताओं से अनभिज्ञ होते हैं|
         
इतना ही नहीं,अर्थशास्त्र के तमाम विद्वान एक स्वर से साम्यवादी अर्थव्यवस्था की आत्मघाती विसंगतियों और कमजोरियों के बारे में लिख चुके हैं, यह व्यवस्था अप्राकृतिक और अस्थिर होती है। जड़ से ही खोखली इन आर्थिक नीतियों के कारण तमाम साम्यवादी देशों और राज्यों की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल रहता है और इसकी सबसे ज्यादा कीमत निम्न और मध्यम वर्ग के लोग चुकाते हैं। और फिर अगर इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ लोगों में असंतोष उभरता है तो उसकी अभिव्यक्ति तक होने से पहले ही उनका क्रूरता से दमन कर दिया जाता है। जिस माओ के नाम पर बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ और बिहार-झारखंड में यहां के प्रगतिवादी वामपंथी खूनी खेल खेल रहे हैं, चीन में उसी माओ के शासनकाल में दो करोड़ से भी ज्यादा लोग सरकारी नीतियों से उपजे अकाल में मारे गए और लगभग पच्चीस लाख लोगों को वहां की इकलौती पार्टी के गुर्गों ने मार डाला। सोवियत रूस में स्तालिन ने भी सर्वहारा हित के नाम पर लगभग 30 लाख लोगों को साइबेरिया के गुलाग आर्किपेलागो में बने लेबर कैंपों में भेजकर अमानवीय स्थितियों में कठोर श्रम करवाकर मार डाला, ऊपर से लगभग साढे सात लाख लोगों को, विशेषकर यहूदियों को, बिना कोई मुकदमा चलाए मार डाला गया। इनमें से अधिकांश के  परिजनों को 1990 तक पता भी नहीं चला कि वे कहाँ गायब हो गए। पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी आदि ईस्टर्न ब्लाॅक के यूरोपीय देश जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद रूस की रेड आर्मी के कब्जे में थे और जहाँ रूस ने अपने टट्टू शासन में बिठा रखे थे, वहां भी कमोबेश यही स्थिति थी। पूर्वी जर्मनी में तो स्टासी ने हर नागरिक की पूरी जिंदगी की ही जासूसी कर रखी थी। इन सब देशों में कुल मिलाकर इन 'समाजवादी' सरकारों ने भय और प्रोपागैंडा के बल पर नागरिकों के मुंह खोलने पर पूरी पाबंदी लगा रखी थी और पूरा iron curtain बना रखा था- बिना पोलितब्यूरो की हरी झंडी के लोग देश के बाहर जाना-आना भी नहीं कर सकते थे, कहीं सच्चाई बाहर न चली जाए। इन सब जगहों पर कहने को चुनाव होते थे पर उनमें एक ही पार्टी खड़ी होती थी- कम्युनिस्ट पार्टी। अखबार, पत्रिकाएँ, टीवी, सिनेमा, साहित्य, विज्ञान, कला और यहां तक कि संगीत में भी जो भी कुछ होता था वो पोलितब्यूरो तय करती थी। Eisenstein और Tarkovsky जैसे अद्भुत फिल्मकारों से लेकर  Solzhenitsyn और Pasternak जैसे लेखक हों या Mosolov, Shostakovich और Rostropovich जैसे महान संगीत कलाकार, सबको अधपढ़े और असभ्य कम्युनिस्टों ने यातनाएं दीं- कुछ मारे गए, कुछ मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गए, कुछ ने डर से पोलितब्यूरो का एजेंडा अपना लिया और कुछ, जो नसीब वाले थे, अमेरिका और पश्चिमी यूरोप भाग गए। वैज्ञानिक और खिलाड़ी भी इस दमनकारी व्यवस्था से बचे नहीं, कितने ही लोग अंतरिक्ष में और चांद पर जाने की सोवियत मुहिम में मारे गए जिनके अस्तित्व के सारे सुबूत केजीबी ने मिटा दिए, हारनेवाले ऐथलीट भी कठोर सजा के हकदार बनते थे।इनके आदर्श 'सर्वहारा सेवकों' की सत्तालोलुपता और ऐय्याशी का वर्णन करते शब्द कम पड़ जाएंगे। जैसे ही कोई नेता कमजोर पड़ा कि गुटबंदी करके एक उसको मरवाकर खुद शासक बन जाता था। फिर उसके कल तक बाकियों से कैसे भी संबंध हो, निरंकुश शासन करने में जिस किसी के भी बाधक बन सकने का जरा सा शक भी होता था, उसपर 'सर्वहारा का दुश्मन' होने का आरोप लगाकर उसकी दिखावटी सुनवाई करके (अक्सर वो भी नहीं) उसे फायरिंग स्क्वाड के हवाले कर दिया जाता था। खुद स्तालिन ने 139 केंद्रीय समिति सदस्यों में 93 और 103 जेनरलों में 81 को मरवा दिया था, कई को सिर्फ शक के आधार पर। बाद में पुरानी तस्वीरों और फिल्मों में से भी उन्हें मिटा दिया जाता था। ऊपर से स्तालिन हो या अपने ज्योति बसु या आज के सीताराम येचुरी जैसे वामी नमूने- इनके अपने व्यक्तिगत जीवन में भव्य महल जैसे निवास, महंगी विदेशी गाड़ियाँ, क्यूबन सिगार, महंगी शराब और औरतों की बहुतायत मिलेगी, भले ही दावा ये मजदूरों की लड़ाई लड़ने का करते हों। जब ऐसी घृणास्पद विरासत के उत्तराधिकारी ये कम्युनिस्ट मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और जनहित जैसे शब्द अपनी जबान पर बेशर्मी से लाते हैं, तो इनकी असलियत जाननेवालों को तो कोफ्त होगी ही।
परिवर्तन प्रकृति का नियम है|वामपंथ अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा है|समय इसे छोड़कर आगे बढ़ चला है|अब तय आपको करना है कि आप बदलते दौर में विकास की राह पर आगे बढ़ना चाहते हैं या पतन की अंधी सुरंग की ओर!

संजय जोठे:-
सब सुधि जनों का शुक्रिया जो इस लेख पर इतनी चर्चा की गयी... सबका आभार
रजनीश को मैं इसलिए भी चुन रहा हूँ क्योंकि वे भारतीय अध्यात्म की सभी प्रवृत्तियों की निस्सारता को देखने के लिये सबसे महत्वपूर्ण की होल हैं।
तथाकथित अध्यात्म और रहस्यवाद के सभी आयामों को वे उनके शिखर पर ले जाते हैं ... इस ऊंचाई पर भी जब कॉमन सेंसिकल बातों के उत्तर नहिं मिलते तब अध्यात्म अंतिम रूप से असफल होता है ... तब उसे ढकोसला सिद्ध करना आसान है। यही रजनीश को चुनने का कारण है। यह काम आसाराम के साथ संभव नहीं।
रजनीश या ओशो की निरर्थकता बहुत लंबे ऐतिहासिक उद्विकास को अचानक तर्क की तलवार के आगे रख देती है।

कैलाश बनवासी:-
संजय भाई का लेख दो ही गुरुओं पर केन्द्रित होने से इसमें वह अपेक्षित व्यापकता नहीं आ पाई है.इसके मूल में धर्म है जो इन बाबाओं को भरपूर खादपानी मुहैया कराता रहा है.आध्यात्मिक बाबाओं की नजर मध्यवर्ग पर है इसी के सहारे वे फले-फूले हैं.भारत की गुलाम मानसिकता को लेकर बड़ी- बड़ी किताबें लिखी गई हैं .धर्म,जाति या कर्मकांडों को ब्राम्हणवाद ने जैसा विकृत किया उसी का खामियाजा बहुसंख्यक जनता को भुगतना पड़ रहा है.समाज में कुछ खास वर्ग का वर्चस्व हो जाये तो बाकी नीतियाँ उन्हीं के हितों के अनुरूप बनने लग जाती हैं अपने यहाँ यही हुआ है.आज भी यही जारी है. मुख्य सवाल इस काबिज जड़ता को तोड़ने का है.यह टूटना भी होगा, लेकिन समय लेगा.हम जैसे इसी संक्रमणकाल से गुजर रहे हैं.

आशीष मेहता:-
सहमति के लिए धन्यवाद प्रणयजी, पर आपकी भारी भरकम पोस्ट से उबरने में लगा हूँ अभी। इंटरवेल से पहले क्लारमेक्स जँचता है भला ?

पल्लवी प्रसाद:-
Unhe bahar se nahi swayam khud se khatra hy. They need to reinvent themselves. Congress supportrs tak apna vajood liya.

मज़कूर आलम:-
लेख यकीनन अच्छा है। सिर्फ दो-तीन उद

कविता : सर्वेश सिंह

नमस्कार मित्रो,
   आज आपके समक्ष समकालीन कवि की दो कविताएँ प्रस्तुत हैं। इन पर अपने विचार अवश्य रखियेगा।

कविता:

1.   लौट जाओ बेटी   

 

गुरुत्त्व था तुम्हारा बचपन

इस घर के लिए  

हाथों से पकड़ जिसे

घूम लिया पृथ्वी और आकाश

पर लपेट हर बार तुमने खींच लिया  

अपने मोंह के परेते में

 लेकिन घर जीवन की हद नहीं है मेरी बेटी

 और इसीलिए अब जबकि तुम बड़ी हो गयी हो

तो मैं चाहता हूँ की तुम्हें दूं

एक लम्बी हरी धरती

और एक असीम खुला आसमान

बढ़ने के लिए

उड़ने के लिए

 पर दुविधा में हूँ

कि तुम्हे भेजूं कहाँ मेरी बच्ची ?

 देखता हूँ इस शहर में हैं कड़कड़ाती हड्डियों सी सड़कें

और आवारा सांड से चौराहे

मोक्ष की इस नगरी में

स्वर्ग को जाता हर रास्ता

बजबजाते कीच और फूलमालाओं के लोथड़ों से होकर गुजरता है

मुक्ति की चाहना को किसी की आँख में देखते ही

यहाँ ईश्वर के दूतों की देह में उग आते हैं खूनी पंजे

और वे शरीर ही नहीं

आत्मा को भी नंगी कर

अपनी धार्मिक वासना की प्यास खोज लेते हैं

 पत्थरों की बिसात पर खुरची गई हर सुकुमार देह को देख

मैं सिहर उठता हूँ मेरी बच्ची   

 हालाँकि हो सकता है की इन रास्तों से बच बचाकर

तुम अपनी मरजाद लेकर निकल भी आओ

पर इसी शहर की उन उन्मादी रातों को कैसे भूल जाऊं

जिनमें आदमी, भेड़ियों में तब्दील हो जाता है

और मासूम बच्चियों तक को दबोच कर

गंगा की तलहटी में विलीन हो जाता है

कहते हैं की वे भेडिए उन तलहटियों में

उन बच्चियों की हड्डियों से भी मिटा लेते हैं

अपनी जीभ और उँगलियों की तृष्णा

और फिर उन्हें उसी गंगा में बहा देते हैं.

फिर सुबह उन्ही पानियों में नहाकर

लोग स्वर्ग के रास्तों पर बढ़ जाते हैं

 मंदिरों का यह शहर मुझे मुफीद नहीं लगता तुम्हारे लिए बेटी

 तो क्या तुम्हे राजधानी दिल्ली भेज दूं ?

जहाँ डीयू और जेएनयू हैं !!

 यह ख़याल अक्सर मुझे उत्साहित करता है बेटी  

पर इधर दिल्ली की बसों, चलती कारों, मेट्रो, और कैम्पसों

और यहाँ तक की संसद से भी डर लगने लगा है मेरी बेटी

सुनते हैं की दिल्ली के भेड़िये अब दिन के उजालों में भी शहर में घुस आते हैं

चलती कारों, बसों या किसी भी जगह को ये बिस्तरों में तब्दील कर देते हैं

वे लोहा लेकर शिकार को उतरते हैं

और सिखाते हैं मादाओं को मुक्ति और स्वतंत्रता को सहने का पाठ

और जिस्मों पर वे उन हथियारों से करते हैं वार

जिनका जिक्र पेनल कोड और संविधानों में कहीं नहीं है

और विडंबना देखो की पेट से खून की शिराएँ तक निकाल लेने वाले वे भेड़िये

अंत में बेदाग़ बरी हो जाते हैं

और चौसठ योगिनियों के मंदिर की भोंडी अनुकृति

वह संसद

करती रहती है, करती रहती है

जाति और मजहब पर बहसें

 यह सब देख मुझे लगता है

कि तुम्हे दिल्ली भेजना

किसी इंद्रजाल में तुम्हे फंसाने जैसा है मेरी बच्ची

 और इसीलिए इधर कुछ दिनों मैंने यह भी सोचा  

कि तुम्हे देश से बाहर कहीं भेज दूं

उधर, उत्तरी गोलार्ध की पश्चिमी हवाओं में

जैसे की मध्य पूर्व

जहाँ कुरआन की आयतें और इस्लाम की शांति है

खुदा की निगाहबानी में

गुनाहगारों का साया भी

शायद तुम्हारे नजदीक न आ पाए

 पर उन खजूरी रेगिस्तानों में आजकल

यह न जाने क्या पागलपन चल रहा हैं मेरी बच्ची ?

नौनिहालों के हाथों से बरस रही हैं एके-४७ की गोलियां

आत्मघाती बमों से सिसक रही है रेत

जंजीरों में बाँध बाजारों में बिक रही हैं सुंदर देह

और फिर उन्हें चींथा जा रहा है

अमेरिका और रूस से बदले के नाम पर।

 मैं सहम रहा हूँ मेरी बेटी

तुम्हे जिहाद के रैम्प पर क्या कैटवाकर बनाना है मुझे ?  

या धरती की बहत्तर हूरों में से एक बनता तुम्हे देखता रहूँ मैं ?

 नहीं मेरी बेटी

तुम्हे वहां भी भेजना दरअसल तुम्हे जिन्दा मार देना है

क्योंकि खुदा वहां किसी आत्मघाती हमले में जमींदोज हो चुका है

और पवित्र कुरआन की आयतें

धमाकों के बीच

मृतपाय मनुष्यता के शोक गीत गा रही हैं

 खोजते-खोजते अब थक गया हूँ मेरी बच्ची

लगता है कोई शहर,कोई देश

अब नहीं बचा

कि जहाँ मैं तुम्हे भेज सकूँ

उड़ने को

बढ़ने को   

चाहे दिल्ली हो या मद्रास

चाहे अमेरिका हो या फ़्रांस

 तुम्हे एक हरी धरती

और एक साफ़ आसमान देने में

तुम्हारा यह पिता शायद अक्षम है 

 पर हाँ,

एक सम्भावना अब भी बची है मेरी बच्ची

भले ही थोड़ी सी ही  

पर अभी भी शायद एक जगह

हमेशा की ही तरह  

आदमी से बची रह गयी है

और वह है- गर्भ

तुम्हारी माँ का  

सजल और स्निग्ध

 अच्छा होगा कि लौट जाओ मेरी बच्ची

उसी अँधेरी कोख में

लौट जाओ मेरी तितली

उसी हिरण्यगर्भ में

लौट जाओ मेरी आत्मजा  

सृष्टि के उसी अधिष्ठान में

जहाँ की पवित्र शांति में

तुम्हारी प्राण-नाल जुडी है

तुम्हारी माँ के पेट से

ह्रदय से

मन से

 लौट जाओ बेटी

स्वतंत्रता और गरिमा के उसी निर्जन में

जहाँ आदमी

उसका समाज

उसका धर्म

उसकी आसमानी किताबें

और उसके खुदा भी पहुँच नहीं सकते

कभी भी नहीं पहुँच सकते  

 लौट जाओ मेरी बेटी

कि यहाँ धर्म,धर्म नहीं,अनाचार है

न्याय,न्याय नहीं, बलात्कार है

खुदा, खुदा नहीं

धरती पर होता हुआ सनातन व्यभिचार है

 लौट जाओ मेरी बेटी 

कि पिता, अब पिता नहीं

एक निरीह कविता है

और कविता, कविता नहीं

बस, एक बेबस तर्पण है- 

 ॐ, न तातो न माता न बन्धु: न दाता |

न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता ||

न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव |

गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ||
_____________________________

2. प्रेम के आइनों-सी तुलसी की पत्तियाँ

 
आजकल रोज रात सोने से पहले

सिरहाने पानी से भरा

शीशे का एक गिलास रख लेता हूँ

और सुबह आँख खुलने पर

उसे तुलसी पर चढ़ा देता हूँ

 पता नहीं बासीपन से

या शीशे में रखने से

या अँधेरे में रात भर रखे रहने से  

या सिरहाने पड़े रहने से

या मुझ से कुछ पानी में मिल जाने से

पर ध्रुव है की पानी से ही

होता यह है कि 

दिन ढले तुलसी की पत्तियाँ

आइनों-सी दिखने लगती हैं  

उनमें झलकते हैं चाँद सितारे

आकाश और आकाशगंगाएँ

देवियों और देवताओं के चेहरे

अमृत और विष के कलश

आसमानी किताबों के फड़फड़ाते पन्ने

 और सूरज को मुट्ठियों में दबाये पृथ्वी के चक्कर लगाता मैं  

 यह सब धार्मिक-सा लग सकता है

पर मैं साफ़ दिल से कहता हूँ

कि यह अजूबा देखकर

मेरा यकीन इस बात पर बढ़ने लगा है

कि मैं किसी से प्रेम करने लगा हूँ 

3.  डूबना सिर्फ मरना नहीं होता

  मुझे चाहते हो !
बिलकुल ! कोई शक ?
क्या कर सकते हो मेरे लिए ?
किस में ? चाहत में ?
हां, चाहत में !
कुछ भी, जो तुम कहो 
गंगा में कूद सकते हो ?

 "हाँ !"

और वह गंगा में कूद गया

गंगा उसे अपने में समाता देख 
पहले बेचैन हुई
फिर मुस्कुराते हुए वहीं ठहर गई

वह उदासीन उत्सुकता से गंगा में देखती रही
और जब वह चिल्लाने को ही थी कि तभी 
वह पानी को चीरते उतराया
मध्यमा और तर्जनी से अंग्रेजी का ‘वी’ बनाते बाहर आया
और उसकी बगल में आकर बैठ गया

उसे देख वह जोर से हंसी 
फिर अजीब व्याकुल नजरों से उसे घूरा 
और फिर तमतमायी उठी और चप्पल पटकते लौटने लगी

वह भाग कर पीछे से उसके आगे आया 
बोला- अब क्या हुआ !

वह लगभग चिल्लाई- ‘लेकिन तुम डूबे नहीं ?’

धीरे से वह बोला- 
‘तुमने सिर्फ कूदने के लिए कहा था, 
और मैं तैरना जानता था, 
और अगर डूबता तो मर नहीं जाता !
क्या तुम मझे मारना चाहती हो’ ?

‘यही तो तुम्हारी मुश्किल है’, 
वह बोली-
‘मैं चाहती हूँ कि तुम मरो नहीं 
बल्कि डूब जाओ
मुझ में
खुद में 
इस गंगा में 
और हर उस जगह जहाँ हम हों 
लेकिन हर जगह, हर बार 
तुम तैर कर बाहर निकल आते हो 
आखिर तुम्हारी दिक्कत क्या है ?’

‘तैर कर बाहर निकल आने की इतनी हड़बड़ी क्यों रहती है तुम्हें’

‘देखो, तुम्हे जानना चाहिए कि 
डूबना सिर्फ मरना नहीं होता’

यह सुन 
उन्हें देख ठहरी गंगा 
भीतर तक काँप उठी 
और अनमने, सागर की राह चलीं 

4. प्रेमेतर

 
इतर प्रेम कोई पाप नहीं है

चाह भरे दिल में

उसका पलना

केवल दैहिक ताप नहीं है

 गलत नहीं उस खिड़की को गह लेना

जो घरनी की सूनी आँख बनी हो

नहीं बेतुका वहां बैठना

जहाँ ठिठक कर बैठि दिखे

प्रियतमा कोई उदास

 वह सब पुनीत है

जितना इनमें बचा हुआ है प्रेय

होने को दाह..

 नहीं बुरा है वह चौर्य-भाव

जब खोजे कोई

उनके तन-मन में   

यदि बची हुई हो

कहीं भी कोई राह

 भले ही उस पर छाप पड़ी हो किसी राग की 

या फिर जो ना चली गई हो   

 उतर कर उन राहों पर चलना

किसी किनारे हौले से

उस रस को भर लेना

भर देना  

नहीं नारकीय अघ जैसा

ना शाप देव का

ना क्रोध ऋषि का  

ना शब्द विरोधी मंत्र विरोधी

ना ही ऐसा कुछ है उसमें

जो हो शास्त्र-असम्मत लोक-असम्मत  

 मत पूछो आसमानों से  

प्रेम कोई अजपा जाप नहीं है.

5.   विरह में दो मन्त्र

 
वहाँ जूते उतार कर जाते हैं

जैसे बिस्तरों पर

द्वार पर नंदी है-

उत्तुंग और उत्तेज

 अंगूठे और तर्जनी की योग-मुद्रा से उसे आभार दें

 यहाँ से अब वापसी मुश्किल है 

ध्यानावस्थित मन 

लसलसे रास्तों पर

खुद-ब-खुद आगे बढ़ता जाएगा  

खून में मुक्ति की चाहना के काबुली घुड़सवार 

दौडेगें सरपट 

 एक-सा ही जादू है

यहाँ भी..

और वहाँ भी.. 

कि मन की अज्ञानता में 

गर्भ-गृह के द्वंद्व की सुखद यातना में

एक गति, एक ताल और एकतानता में  

सारी ये कायनात

मंथनमय है 

 और वहां जहाँ गिरता दूध जमा हो रहा है

और गल रहे हैं फूल,बेलपत्र 

वह आकृति, रूप के भवन में दीप की शिखा-सी है 

त्रिभंगी और लसलसी

वह बिस्तरों की सत्यापित प्रतिलिपि-सी है

  देवताओं में सुडौल वे

सनातन काल से वहीं जमें हैं

पत्थर के चाम हो गए हैं

 पर पत्थरों के इस विन्यास में

कितना तो साफ़ है

धर्म का उद्योग

कितना तो उज्जवल है उनका चिर-संयोग    

 कितना तो समान है

कि बिस्तरों में उस कामना के बाद

जागना नहीं

और जागरण इस प्रार्थना के बाद भी नहीं ...

 कर्म के बस दो अलग-अलग तंत्र हैं

आस्था और वासना

श्रेयस और प्रेयस   ...

 बस विरह में दो मन्त्र हैं-

ओह मेरे प्यारे शिवा !

ओम नमः शिवाय !!    

कवि परिचय :

परिचय :
नाम-सर्वेश सिंह
जन्म - उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के वेदपुर (मांडा) गाँव में जन्म  |
शिक्षा - उच्च शिक्षा भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू, नई दिल्ली से | 
कुछ दिनों केंद्रीय बौद्ध अध्ययन संस्थान,लेह,लद्दाख में अध्यापन कार्य | 2006 से, बीएचयू,वाराणसी के डीएवी कॉलेज के हिंदी विभाग में अध्यापक एवं अध्यक्ष | 
छात्र आंदोलनों में सक्रियता | 
हिंदी की शीर्षस्थ पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित | रामचरितमानस की औपनिवेशिक, कथावाचकीय और तथाकथित प्रगतिशील व्याख्याओं से मुठभेड़ एवं उसके सटीक अर्थायन का निरंतर प्रयास | कहानी ‘ज्ञानक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे’ एवं ‘मसान भैरवी’ को विशेष लोकप्रियता मिली तथा नाट्य रूप में मंचित भी हुईं | कथा साहित्त्य, विशेषकर कथा भाषा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय शोध कार्य |

प्रकाशन: आलोचना- ‘निर्मल वर्मा की कथा भाषा’ (2012), ‘साहित्य की आत्म-सत्ता’(2015), 
        कविता-संग्रह- ‘पत्थरों के दिल में’(2016) 
पुरष्कार/सम्मान: आलोचना का पहला ‘सीताराम शास्त्री सम्मान-2016’

सम्प्रति: अध्यक्ष,हिंदी विभाग, डीएवी पीजी कॉलेज (बीएचयू), औसानगंज, वाराणसी-1

Email: sarveshsingh75@gmail.com
Mob: 9415435154     

प्रस्तुति:- बिजूका
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टिप्पणियाँ:-

आनंद पचौरी:-
सारे जहान की पीडा और बेबसी पिता के हृदय में सिमट गई है।यधार्ध का बहुत मार्मिक चित्रण। दूसरी भी बहुत सुंदर।  शुभकामनाएँ आज के सुप्रभात के लिए

मनचन्दा पानी:-
पहली कविता में पिता की लाचारी का चित्र बहुत बारीकी से उकेरा है, काफी अध्ययन करने के बाद बनी कविता है, जड़ो को कुरेदती, पोलों को खोलती, बख़ियाँ उधेड़ती कविता। अच्छी कविता के लिए बधाई। दूसरी कविता को समझने की समझ अभी शायद मेरे पास नहीं है उसके लिए माफ़ी चाहूँगा।

मैं कवि से निवेदन करूँगा एक कविता और लिखें। उसमे इन सबको शामिल करें। बदलाव यह करें कि बेटी की जगह बेटा हो, कर्म की जगह कर्ता हो। जिसके साथ हो रहा है उसके पक्ष में नहीं जो कर रहा है उसके विरोध में हो।
और उन्हें भी रास्ता दिखाया जाए ऐसी जगह का जहाँ से उनके पंजे, उनके हथियार, न पहुँच सकें हमारी बेटियों तक।
बेटियों को क्यों कोख का रास्ता दिखाया जाये, भेड़ियों को ही ना ठिकाने लगाया जाए।

आशीष मेहता:-
बहुत खूब मनचंदा भाई। हालांकि बेटियाँ तो अपने यहां कोख में भी सुरक्षित नहीं हैं...... कविता में पड़ताल अधिक मिली... कम शब्दों में अधिक कहा जाए, ऐसा कुछ कम रहा। दूसरी कविता पर कुछ भी कहने में असमर्थ

कुमार मंगलम:-
काशी के नव्य नाथयोगी की कवितायेँ... सर्वेश सिंह अपनी बहुआयामी रचना संसार में बहुवस्तुस्पर्शिनी प्रतिभा के धनी हैं । लौट जाओ बेटी कविता समकालीन कविता की विविधताओं में एक नया प्रस्थान बिंदु है । निर्मल और निर्मम व्यक्तित्व के मालिक सर्वेश ऐसे कवि हैं जो पत्थरों के दिल से संवाद तो करतें ही हैं तृष्णा की घाटियों में चाहना का पुल रचते हुए मृषा(असत्य)नहीं सत्य का अन्वेषी हैं । प्रस्तुति बेजोड़ है । कवि अपने सत्य के साथ ऐसे ही बनारसियत मिज़ाज़ में रचते रहें ऐसी मंगलकामनाएं । बिजूका टीम को साधुवाद ऐसी कवितायेँ पढ़वाने के लिये ।

नीलिमा शर्मा निविया:-
जब किसी मंच पर  किसी की भी रचना रखी जाती हैं  तो सम्बंधित लेखक या कवि को इंतज़ार रहता कि उनकी रचना पर सब साथियो के विचार क्या हैं ।आलोचना समालोचना स्वीकार करने को मन  /मस्तिष्क से तैयार  होता हैं  ।लेकिन जब सब आये मंच पर झांके पढ़े और बिनकहे चले जाए तो एक सृजक मन आहत हो जाता हैं ।   अब एडमिन सबके इनबॉक्स जा जा कर तो नही invite कर सकता हर बार कि आये रचनाये पढ़े ।व्यस्तता का बहाना जायज नही जब सब लोग फ़ेसबुक और अन्य ग्रुप में पूरी तरह से एक्टिव हो ।   हो सकताहै मेरी बात पर आपत्ति हो कई मित्रो को ।  लेकिन यहाँ  सब रचनाकार है ।   रचनाकारो को प्रोत्साहन ओरमार्गदर्शन देना तो बनता हैं । कई बार मुझसे भी यह गलती होती मैं पढ़कर चुप  रह जाती। क्योंकि सब इतना कुछ लिख जातेमेरे पास शब्द नही होते । अगर  ऑनलाइन ेहैं और रचनाये पढ़ली गयी हैंतो  दो शब्दों का प्रोत्साहन बनता हैं ।