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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविता : नागार्जुन

मित्रो,  30 जून को हिन्दी और मैथिली कविता की अनन्य शैली के जनक बाबा नागार्जुन की जयन्ती पर  उन्हें स्मरण करते हुए उनकी तीन कविताएँ आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। उनकी कविताओं की रेंज विस्तृत है। एक ओर उनकी कविता में विद्रोह के स्वर हुँकारते हैं, तो दूसरी ओर एक पिता के वात्सल्य का झरना बहाते हुए मन को भिगोते हैं, और कहीं व्यंग्य की चाशनी में लिपटे हुए वार करते हैं....

कविता :

1. "गुलाबी चूड़ियाँ"

प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वरना किसे नहीं भाँएगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!

2.  चंदू, मैंने सपना देखा

चंदू, मैंने सपना देखा, उछल रहे तुम ज्यों हिरनौटा 
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से हूँ पटना लौटा 
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम्हें खोजते बद्री बाबू 
चंदू,मैंने सपना देखा, खेल-कूद में हो बेकाबू 

मैंने सपना देखा देखा, कल परसों ही छूट रहे हो
चंदू, मैंने सपना देखा, खूब पतंगें लूट रहे हो 
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलंडर 
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर मैं हूँ अंदर
चंदू, मैंने सपना देखा, अमुआ से पटना आए हो 
चंदू, मैंने सपना देखा, मेरे लिए शहद लाए हो 

चंदू मैंने सपना देखा, फैल गया है सुयश तुम्हारा 
चंदू मैंने सपना देखा, तुम्हें जानता भारत सारा 
चंदू मैंने सपना देखा, तुम तो बहुत बड़े डाक्टर हो 
चंदू मैंने सपना देखा, अपनी ड्यूटी में तत्पर हो 

चंदू, मैंने सपना देखा, इम्तिहान में बैठे हो तुम 
चंदू, मैंने सपना देखा, पुलिस-यान में बैठे हो तुम 
चंदू, मैंने सपना देखा, तुम हो बाहर, मैं हूँ अंदर
चंदू, मैंने सपना देखा, लाए हो तुम नया कैलेंडर 
(1976)

3. "आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी"

आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी,
यही हुई है राय जवाहरलाल की
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

आओ शाही बैण्ड बजायें,
आओ बन्दनवार सजायें,
खुशियों में डूबे उतरायें,
आओ तुमको सैर करायें--
उटकमंड की, शिमला-नैनीताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

तुम मुस्कान लुटाती आओ,
तुम वरदान लुटाती जाओ,
आओ जी चाँदी के पथ पर,
आओ जी कंचन के रथ पर,
नज़र बिछी है, एक-एक दिक्पाल की
छ्टा दिखाओ गति की लय की ताल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी !

सैनिक तुम्हें सलामी देंगे
लोग-बाग बलि-बलि जायेंगे
दॄग-दॄग में खुशियां छ्लकेंगी
ओसों में दूबें झलकेंगी
प्रणति मिलेगी नये राष्ट्र के भाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

बेबस-बेसुध, सूखे-रुखडे़,
हम ठहरे तिनकों के टुकडे़,
टहनी हो तुम भारी-भरकम डाल की
खोज खबर तो लो अपने भक्तों के खास महाल की!
लो कपूर की लपट
आरती लो सोने की थाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

भूखी भारत-माता के सूखे हाथों को चूम लो
प्रेसिडेन्ट की लंच-डिनर में स्वाद बदल लो, झूम लो
पद्म-भूषणों, भारत-रत्नों से उनके उद्गार लो
पार्लमेण्ट के प्रतिनिधियों से आदर लो, सत्कार लो
मिनिस्टरों से शेकहैण्ड लो, जनता से जयकार लो
दायें-बायें खडे हज़ारी आफ़िसरों से प्यार लो
धनकुबेर उत्सुक दिखेंगे, उनको ज़रा दुलार लो
होंठों को कम्पित कर लो, रह-रह के कनखी मार लो
बिजली की यह दीपमालिका फिर-फिर इसे निहार लो

यह तो नयी-नयी दिल्ली है, दिल में इसे उतार लो
एक बात कह दूँ मलका, थोडी-सी लाज उधार लो
बापू को मत छेडो, अपने पुरखों से उपहार लो
जय ब्रिटेन की जय हो इस कलिकाल की!
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!
रफ़ू करेंगे फटे-पुराने जाल की
यही हुई है राय जवाहरलाल की
आओ रानी, हम ढोयेंगे पालकी!

( प्रस्तुति-बिजूका)
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टिप्पणियाँ:-

मज़कूर आलम:-: अगर आओ रानी हम ढोएंगे पालकी जैसी कविताएँ वर्तमान में लिखी जाए, तो आज कैसी प्रतिक्रिया होगी और तब नेहरू की क्या प्रतिक्रिया रही थी ये जानना रोचक होता। अगर किसी संस्मरण या बातचीत में इसका ज़िक्र मिले तो वो भी लगाना चाहिए।

पवन शेखावत:-: कल ही मैं भी जब बस में किन्नौर जा रहा था तो बस के आगे के हिस्से को देखकर बरबस ही "गुलाबी चूडियाँ " की याद हो आई थी... ड्राइवर के ठीक ऊपर बीच में... किसी सुहागिन की खूब सारी चूडियाँ लटक रही थी... चूडियाें के अलावा वहां और भी बहुत सारी चीजें बस की छत के साथ बंधी लटक रही थी... इनमें एक छोटा शिव का डमरु, छल्ले वाली गुड़िया, सजावटी झालर और भी न जाने क्या क्या... इसका जिक्र कभी किसी कहानी या कविता में करना चाहूंगा... मैं भूल न जाऊं यह सब चीजें... इसलिए मैंने उस पूरे माहौल का फोटो भी ले लिया... स़वारियां इन सब चीजों का फोटो लेते देख हैरानी भरी निगाह से देख रही थीं...

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