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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कविताएँ : नितीश मिश्र

सुभोर  साथियो,

साथियो आज आप समूह के साथी नितीश मिश्र की कुछ रचनाओं का आनंद लें और  साथ ही अपनी बेबाक टिप्पणियाँ भी दें ।

साथी का नाम उनकी रचनाओं के साथ कल जानिए ।

1.  आज शहर बहुत उदास हैं

आज शहर बहुत उदास हैं 
शहर की गलियों में फैल चुकी हैं गंदगी 
मकानों पर बन रहा हैं गुंबद जालो का 
शहर खो रहा हैं 
धीरे धीरे अपना स्वाद ....
और मैला हो रहा हैं 
शहर का इतिहास ....
शहर की आत्मा धीरे धीरे फटने लगी हैं कई जगह से ...
शहर के होशियार लोग हो रहे हैं नपुंसक.... 
बच्चे बनते जा रहे हैं बहुरुपिया 
धीरे -धीरे शहर के उपर का चमकता हुआ सूरज डूब रहा हैं 
शहर के देवता मंदिरों से कर रहे हैं पलायन ....
लड़कियो ने बंद कर दिया हैं जाना स्कूल 
नदियो मे नहीं उतरती हैं अब नाँव 
आसमान मे कोई नहीं देख रहा हैं इंद्रधनुष 
शहर से जा रहे हैं एक एक करके सब फ़क़ीर ....
शहर से ख़त्म होती जा रही हैं प्रेम कहानियाँ ....
अब दूसरे शहर से नहीं आते हैं यहाँ पर जानवर 
अब शहर के देह पर नहीं उतरता हैं कोई अंधेरा ....
क्योकि शहर मे रो रही हैं लड़कियाँ ....
लड़कियाँ बंद हैं सदियो से हुकूमत के रंग में 
शहर उदास हैं ....
क्योकि शहर मे रहने वाली लड़कियाँ 
वर्षो से उदास हैं 
इसलिए शहर अब मर रहा हैं 
क्या किसी को मालूम हैं 
यह शहर अब बीमार हो चुका हैं ।

2.  बुनकरों ने घोषित किया हैं

बुनकरों को पहले ही मालूम हो गया था
आने वाली सदी में
नहीं दिखाई देंगे
कहीं फूल....
कहीं पत्तियां.... 
कहीं झरने
कहीं हिरन तो कही जंगल ....
बुनकरों को अंदाजा हो गया था
मनुष्य ही करेगा अपनी सभ्यता की हत्या !
इसलिए उन्होंने कपास के धागे में रफू किया था
कोई फूल , कोई झरना ,  कोई पेड़
बुनकरों ने बुना था धागे में हमारे लिए एक विशेषण
हत्यारे का ! हत्यारे का !
आज हमें एहसास   न हो लेकिन बुनकरों ने पहले ही घोषित का दिया था
हम इस सभ्यता के एक हत्यारे हैं !
आज मैं जब भी अपनी कमीज पर कोई रफू किया हुआ फूल देखता हूँ
मुझे फूल में बुनकरों की आँख दिखाई देती हैं
जो कहती हैं तुम कमीज नहीं
प्रकृति की हत्या करके उसकी आत्मा पहने हो ।

3.  माँ के बाद

माँ के बाद ....
मेरा कोई कुशल क्षेम चाहता हैं
या मेरे भविष्य के लिए चिंतन करता हैं
तो वह हैं ----
मेरे कमरे की दीवारे
खिड़कियां …… 
और मेरे जूते -चप्पल
मेरी तौलियां …।
मेरी माँ के बाद कोई मेरा रास्ता देखता हैं
तो वह हैं …… 
वह हैं मेरे कमरे में रखी कुर्सियां
दीवारो पर रखा  हुआ आईना 
और ताखे पर रखी हुई लालटेन ।
माँ के बाद कोई मुझसे बात करता हैं
तो वह हैं … 
झाड़ू
चूल्हा …
बर्तन
माँ के बाद कोई मेरा बोझ ढोता हैं
तो वह हैं कमरे में रखा हुआ मेज ॥

4.  चलो कुछ बन जाते हैं

चलो तुम कुदाल बन जाओ
और मैं मिट्टी …
तुम खोदो मुझे परत दर परत
और छिपा के रख दो अपना संघर्ष ....... 
एक समय के बाद
तुम्हारा संघर्ष
अविराम विरोध की आवाज बन जायेगा आकाश के नीचे !
चलो मैं फूल बन जाता हूँ
और तुम रंग .......
ऐसे में हम एक हो जायेंगे
और कभी साख से टूटे तो एक दूसरे का साथ न छूटे
चलो तुम नदी बन जाओ
और मैं नाँव
और चलता रहे सूर्यास्त के बाद भी हमारा कारोबार !
चलो तुम अँधेरा बन जाओं
और मैं उजाला
जिससे मैं उत्तर सकूँ तुम्हारी अस्थियों में .......
चलो तुम सृष्टि बन जाओं
और मैं पहरेदार .......
चलो तुम पर्स बन जाओं  जेब
और बना ले अन्धेरें में अपना -अपना आयतन
या तुम मैदान बन जाओं
 धावक  .......
और मैं अंत तक दौड़ता रहूँ तुम्हारी शिराओं में
या तुम धुप बन जाओं और मैं हवा
जिससे सदी के अंत तक बना रहे हमारा स्पर्श .......
चाहे अयोध्या काबा रहे या न रहे
चलो मैं पतीली बन जाता हूँ  आंच ......
_______________________

5.  चलो कुछ बन जाते हैं

चलो तुम कुदाल बन जाओ
और मैं मिट्टी …
तुम खोदो मुझे परत दर परत
और छिपा के रख दो अपना संघर्ष ....... 
एक समय के बाद
तुम्हारा संघर्ष
अविराम विरोध की आवाज बन जायेगा आकाश के नीचे !
चलो मैं फूल बन जाता हूँ
और तुम रंग .......
ऐसे में हम एक हो जायेंगे
और कभी साख से टूटे तो एक दूसरे का साथ न छूटे
चलो तुम नदी बन जाओ
और मैं नाँव
और चलता रहे सूर्यास्त के बाद भी हमारा कारोबार !
चलो तुम अँधेरा बन जाओं
और मैं उजाला
जिससे मैं उत्तर सकूँ तुम्हारी अस्थियों में .......
चलो तुम सृष्टि बन जाओं
और मैं पहरेदार .......
चलो तुम पर्स बन जाओं  जेब
और बना ले अन्धेरें में अपना -अपना आयतन
या तुम मैदान बन जाओं
 धावक  .......
और मैं अंत तक दौड़ता रहूँ तुम्हारी शिराओं में
या तुम धुप बन जाओं और मैं हवा
जिससे सदी के अंत तक बना रहे हमारा स्पर्श .......
चाहे अयोध्या काबा रहे या न रहे
चलो मैं पतीली बन जाता हूँ  आंच

6.  तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे जाने के बाद
कुछ भी फर्क़ नहीं पड़ा
नाखूनों का बढ़ना उसी तरह जारी रहा
और बालों का हवा में उड़ना भी
शाम का सूरज
जब चला जाता था
झाड़ियों में किसी से मिलने
अपने ही घर में
डर की बारिश में भींगता रहा देर तक
मेरी आत्मा में ही
सूर्यग्रहण होना शुरू हो गया ।

तुम्हारे जाने के बाद
पेट में पहले की तरह ही
एक गुदगुदी होती थी
तुम्हारे जाने के बाद
आँखों में नींद नहीं आती हैं रात भर
क्योकि आँखों ने
सजा के रखा हैं
तुम्हारे बहुत सारे सामान को । ।

7.  इस बारिश में 

बाजार की पहरेदारी के बावजूद भी 
वर्षो बाद 
इस साल की बारिश में 
भींगा हैं प्रेमपत्र !
और मैं भी ....
बारिश में 
एक प्रेमपत्र का भींगना 
अपने समय की सबसे बड़ी एक घटना हैं 
जिसे एक घटना की तरह हमे देखना चाहिए 
और जब -तक बारिश में 
प्रेमपत्र भींगता रहेगा 
तब -तक धरती खिली रहेगी ||

8.  सबसे बुरी खबर

संसार की
सबसे बुरी खबर
आज मेरे सामने खड़ी थी ङ्घङ्घ
एक प्रेमपत्र का खो जाना
जैसे ही यह खबर मेरे पास आई
और मैं अंदर ही अंदर हंसने लगा
यह सोचकर
कि वह व्यक्ति तो मर गया होगा
जब उसे मालूम हुआ होगा
की चोरी में किसी ने प्रेमपत्र को भी चुरा लिया। ।
प्रेमी रात भर शहर के सभी प्रमुख चौराहों पर घूमता रहा
और देखता रहा
सड़क पर पड़े हुए
तमाम कागजो के टुकड़े को
इस उम्मीद से कहीं मिल जाये उसे अपना प्रेमपत्र
लेकिन नहीं मिला !
थक हारकर वह रोने लगा
और कहने लगा
की जब इस दुनिया का इतिहास लिखा जायेगा तो
क्या कहीं दर्ज किया जायेगा इस घटना को ?
एका -एक वह अँधेरे की दीवार को उठाता हुआ मेरे पास आया
और कहने लगा
मैं बहुत बीमार हूँ
बहुत पूछने पर बताया
की खो गया हैं प्रेमपत्र
मुझे लगा आज के समय की यह सबसे बुरी खबर हैं ॥ 

9.  बनारस डूबने वाला हैं औरतों ने घोषित कर दिया हैं

बनारस की औरते
अब नहीं रोती हैं
पति रात को घर चाहे कितनी ही देर से क्यों न आये
या खाली हाथ शाम को आये
बनारस की औरते अब खुश नहीं रहती हैं
भाई को नौकरी मिल जाने पर
पिता को बीमारी से मुक्त हो जाने पर
छोटी बहन की शादी तय हो जाने पर
बच्चों के फर्स्ट डिवीजन पास हो जाने पर ।
बनारस की औरतों को अब दु:ख भी नहीं होता
यह जानते हुए की
पति किसी और से रोमांस करता हैं
बनारस की औरते अब नहीं जाती हैं मंदिर में
न ही मजार पर
न ही दुकान में
औरते अब नहीं झगड़ती
माकन मालिक से
सब्जी वालों से ,
बनारस की औरते अब नहीं देखती टीवी पर कोई भी धारावाहिक
अब नहीं बैठती आईने के पास देर तक
अब नहीं इच्छा रखती नए कपड़ों की
अब औरतों को नहीं मालूम रहता हैं
पड़ोसी के घर खाने में क्या बना हैं ?
बनारस की औरतो को पता चल गया हैं
आँखों के सामने की दुनियां
कल इतिहास में बदल जाएगी
औरते पहचान लेती हैं
सृष्टा के काल चक्र को
बनारस की औरते अब नहीं जनना चाहती
दूसरा बच्चा !
बनारस डूबने वाला हैं
औरतों ने घोषित कर दिया हैं । । 

10.   मेरे बारे में दीवारे बताएंगी

दीवारे !
हर अच्छे - बुरे वक्त मे
मेरे साथ रही
दीवारे भूलने की बीमारी से
मुझे सदा दूर रखती थी
माँ ! के न होने की
एक सीमा तक भरने का प्रयास करतीं
माँ ! के हाथो की महक
आज भी बचा के रखी हैं
दीवारे अपने पास ।
बाबूजी की बहुत सारी यादें बची हुई हैं दीवारों पर
दीवारे ढो रही हैं सदियों से
मेरे पूर्वजो की यादो को
अपने बदन पर !
मैंने ! भी दीवारो पर
लिख रखा हैं कई सारे सूत्र
कई सारे चित्र ङ्घ
दीवारे बताएगी तुम्हें
मैं कविता लिखने से पहले
कैसे रोता था ?
दीवारे बताएंगी
मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूँ
दीवारे बताएंगी
मैं लोगो के लिये
क्या क्या सोचता हूँ ?
दीवारे बताएंगी
मैं कितनी रात सोया नहीं ?
मैं कितने दिन भूखा रहा
दीवारे बताएंगी मै
मैं काशी को बचाने के लिये
क्या क्या किया ? !!

11.  मैं आखिरी रात प्रेमपत्र लिखता हूँ

जिंदगी की आखिरी रात में
मैं कुछ भी कर सकता हूँ
देवताओं से मिलकर
पूछ सकता हूँ उनका चरित्र
या मृत्यु के बाद जीवन का मूल्यांकन का सकता हूँ
या लम्बी -लम्बी कविताएँ लिख सकता हूँ
चाँद को हथेलियों से छूकर बता सकता हूँ
चाँद का स्वाद वर्फी जैसा होता हैं
या अपने को सबसे पवित्र घोषित कर सकता हूँ
या कई ऐसे लोगो से मिल सकता हूँ
जो मुझे एक विचार दे सकते हैं
या अपने सारे सपनों के साथ रात भर खेल सकता हूँ
बहुत सा धन कमा सकता हूँ
अपने विरोधियों को परास्त कर सकता हूँ ङ्घङ्घङ्घ
मैं देश को राजनीति का एक नया विकल्प दे सकता हूँ
या अपने शहर की बीमारी को खत्म कर सकता हूँ
लेकिन ! मैं ऐसा कुछ भी नहीं करता
अपने मन पसंद का खाना खाता हूँ
और देर तक अँधेरे में चक्कर लगाता हूँ
और अँधेरे के एक छोर को पकड़कर
प्रेयसी के मुस्कुराते हुए चेहरे को थामता हूँ
और उसे एक प्रेमपत्र लिखता हूँ
इस उम्मीद से की प्रेमपत्र में शामिल हो जाए उसके लिए वह तमाम खुशियां
जिनके बगैर वह खुद को
बार - बार कमजोर समझती हैं

प्रस्तुति-बिजूका

नाम - नीतीश मिश्र
जन्म -1.3.1982
शिक्षा - एम. ए हिंदी साहित्य
इलाहाबाद विश्वविद्यालय।
संप्रति - पत्रकार ।प्रदेश टुडे
संपर्क 39 जावरा कंपाउंड इंदौर ।एमपी।
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टिप्पणियाँ:-

मनीषा जैन :-
पहली कविता अंधेरे होते शहर की यथार्थ कविता। दूसरी कविता बुनकरों के साथ साथ साथ हर आदमी के द्वारा की गयी प्रकृति की अवहेलना का चित्रण है। अच्छी बन पड़ी है कविता। तीसरी कविता आज के अकेले होते जाते व्यक्ति की व्यथा। चौथी कविता कुछ अधूरी सी लगी। अच्छी कविताएं। आभार पढ़वाने के लिए।

प्रदीप मिश्रा:-
जालो का गुंबद कैसे बनेगा। समझ नहीं पा रहा हूँ। फ़ैल चुकी है गंदगी के बाद मिला हो रहा है लिखने की कितनी जरूरत है। नपुंसक शब्द भी खटकता है। दूसरी कविता बहुत सुन्दर शुरुआत के साथ बुरे अंत पर पहुंच रही है। माँ अच्छी कविता है। चलो कुछ बन जाते हैं बहुत अच्छी कविता है। हर कविता में संपादन की जरूरत है। कवि को भाषा,कहन और शब्द चयन पर बहुत रियाज़ करनी होगी। उसका जीवन विवेक और कथ्य अच्छी कविताओं के आमद का  भरोसा देते हैं।

सुषमा सिन्हा:-
सभी कविताएँ अच्छी लगीं पर 'माँ के बाद', 'चलो कुछ बन जाते हैं', और 'मेरे बारे में बताएँगी दीवारें अपेक्षाकृत ज्यादा अच्छी लगीं। सभी कविताओं को थोड़ा और समेटे जाने की जरुरत लगी। कवि को बधाई !!

नीलिमा शर्मा निविया:-
"उसको तो फ़र्क पड़ता है"
एक बार समुद्री तूफ़ान के बाद हजारों लाखों मछलियाँ किनारे पर रेत पर तड़प तड़प कर मर रहीँ थीं ! इस भयानक स्थिति को देखकर पास में रहने वाले एक 6 वर्ष के बच्चे से रहा नहीं गया, और वह एक एक मछली उठा कर समुद्र में वापस फेकनें लगा ! यह देख कर उसकी माँ बोली, बेटा लाखों की संख्या में है , तू कितनों की जान बचाएगा ,यह सुनकर बच्चे ने अपनी स्पीड और बढ़ा दी, माँ फिर बोली बेटा रहनें दे कोई फ़र्क नहीं पड़ता !
बच्चा जोर जोर से रोने लगा और एक मछली को समुद्र में फेकतें हुए जोर से बोला माँ "इसको तो फ़र्क पड़ता है" दूसरी मछली को उठाता और फिर बोलता माँ "इसको तो फ़र्क पड़ता हैं" ! माँ ने बच्चे को सीने से लगा लिया !
हो सके तो लोगों को हमेशा होंसला और उम्मीद देनें की कोशिश करो, न जानें कब आपकी वजह से किसी की जिन्दगी वदल जाए! क्योंकि आपको कोई फ़र्क नहीं पड़ता पर "उसको तो फ़र्क पड़ता है! ऐसे ही हैं हम सब रचनाकार ।आपकी  टिप्पणी से आपको तो फ़र्क़ नही पढता  लेकिन जिसने लिखा उसको तो पड़ता है न । अपनी रचनाधर्मिता निभाये ।

1 टिप्पणी:

  1. मिश्रा जी आपने पहली कविता में शहर का सजीव चित्रण बखूबी किया हैं, दूसरी में नये रूपकों के साथ सुंदर प्रयोग किया है, माँ भी संजोया हुआ शब्द विन्यास हैं, दीवारों का अनुप्रयोग बेहतर हैं, और प्रेमपत्र सटीक तंज़ हैं ...
    --- अर्पण जैन 'अविचल'

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