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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

गम्मत

यह कहानी 2010 में परिकथा के युवा कहानी विशेषांक में पहली बार प्रकाशित हुई थी, उसके बाद कुछ और जगहों पर भी प्रकाशित हुई। फिर 2011 में सत्यनारायण पटेल के दूसरे कहानी संग्रह- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ में भी संकलित की गयी है। bizooka2009.blogspot.com पर अभी तक हमने कहानी प्रकाशित नहीं की , लेकिन अभी सोचते हैं कि यहाँ कहानी प्रकाशित करने में भी कोई हर्ज नहीं है। जब ‘गम्मत’ परिकथा में छपी थी, तो पाठकों ने जी भर कर इसका स्वागत किया था। कई ने लम्बी-लम्बी प्रतिक्रिया परिकथा में लिखी। वरिष्ठ समीक्षक प्रो. विजय शर्मा (जमशेदपुर) ने तो पहनी पर पाँच पेज का पूरा लेख ही लिखा था, जिसे हमने ब्लॉग पर लगाया भी था। युवा आलोचक प्रो. अरुण होता (कलकत्ता) ने इस कहानी के प्रति जो प्रेम और दीवानगी दिखायी, उसे यहाँ बया करना कठिन है। कई पाठक मित्रों ने एस.एम.एस. पर प्रतिक्रिया भेजी। कई ने फ़ोन किये और जो रू-ब-रू प्रतिक्रिया दे सकते थे, उन्होंने तो रू-ब-रू भी दी। कहानी पर प्रतिक्रिया अभी भी आती है। कोई उसकी तारीफ़ करता है, तो कोई आलोचना। कुछ भाई तो फ़ोन पर या फिर रू-ब-रू गाली देने से भी नहीं चूकते। कुछ मित्र फ़ोन करके या फिर एस.एम.एस. करके ‘गम्मत’ की फोटोकॉपी मँगवाते हैं। सभी पाठक मित्रों की भावना, स्नेह, आदर और गालियों का सम्मान करते हुए ‘गम्मत’ पुनः प्रकाशित की जा रही है। अब यह इस ब्लॉग पर सदा उपल्बध रहेगी।


 कहानी
  
सत्यनारायण पटेल




होह……..होह…….होह.. ……………………... कुर्रर्रर्र….. कुर्रर्रर्र….. कुर्रर्रर्र.…
सी एम जी के काफिले के आगे सड़क पर वार्नर जीप बेखटके दौड़ रही है। जीप में हवा बेधड़क और ज़रूरत से ज़्यादा आ रही है। गयी रात, आधी रात के बाद हुई झमाझम बरसात का पानी पीकर हवा के नाखुन उग आयें हैं- ठंडे और पैने नाखुन। हवा की चाल में ग़ज़ब की तेज़ी है। जीप के हुड का कपड़ा फड़फड़ा रहा है। सोमु भील जीप चला रहा है, उसकी बग़ल में सहायक उपनिरीक्षक एम. के. डामोर और पीछे की सीट पर बंसी बैठा है। सभी ने गरम कपड़े पहने हैं। ठंड के मारे सोमु भील और डामोर के मुँह के जबड़े थ्रेसर के छलने की तरह हिल रहे हैं। ऊपर-नीचे के दाँत आपस में टकरा रहे हैं। डामोर को ठंड से बचाव का एक रास्ता सुझता है- आपस में बोलते रहना। इसलिए वह क़िस्से सुनाने लगता है। सोमु उसके क़िस्से सुनता है। हाँ.. हूँ.. कर हुँकारे भी भरता है। पर बंसी जाने किस लोक में खोया है, उसे न डामोर की आवाज़ सुनायी दे रही है, न ठंड लग रही है, बल्कि उसकी कनपटियों से पसीने की रेले ढुलक रही हैं- खारी और पारदर्शी रेले। बंसी को देखने से तो यही लगता है कि वह जीप में पिछली सीट पर बैठा है और उसे ठंड नहीं लग रही है। पर दरअसल ज़ेहनी तौर पर बंसी जीप में नहीं है। वह अपने मग़ज़ की स्क्रीन पर नाचती टोली में होह… होह… होह… कर नाच रहा है, कुर्राटी भर रहा है, और यही वजह है कि ठंडी हवा चलने के बावजूद, बंसी की कनपटियों से पसीने की रेले ढुलक रही हैं। उसके मग़ज़ की स्क्रीन पर नाचती टोलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। टोलियों में नाचने वाले केसरा भील, अलीया भील, छीतू भील, भुवान तड़वी, बिरसा मुन्डा और चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे कई लोग अपने-अपने परगनों की सीमाओं को पीछे छोड़ और इतिहास के पन्नों से बाहर आकर बंसी के मग़ज़ की स्क्रीन पर नाचते नज़र आ रहे हैं। चन्द्रशेखर आज़ाद बीच-बीच में टोली का जोश बढ़ा रहे है।


बंसी मग़ज़ की स्क्रीन पर देख रहा है- लम्बे समय से खूँटी और कन्धे की शोभा बढ़ाने वाले तीर-धनुषों ने कन्धे और खूँटी पर टँगे रहने से इंकार कर दिया है। जैसे वे ख़ुद ब ख़ुद खूँटी और कन्धे से उतरकर नाचती-गाती टोलियों के हाथों में आ गये हैं। बाँसुरियों ने हुलिए बदल लिए हैं और उनमें छेद की जगह पर ट्रिगर उग आये हैं। यह जैसे भी हो रहा है, लेकिन ऎसा होता देख बंसी भी जोश से भर गया है। उसे लग रहा है कि उसके बैग़ में बम भरे हैं ।

 एक क्षण को स्क्रीन पर अँधेरा छा गया है। टोलियों की आवाज़ आ रही है, टोलियाँ नज़र नहीं आ रही है। दूसरे क्षण स्क्रीन पर भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त उभर आये हैं। वे असेंबली हॉल में खड़ें हैं और उनके हाथ जेब में रखे बम की और बढ़ रहे हैं। बंसी का हाथ अपने बैग़ में गया और चौड़ी मुट्ठी में एक हथ गोला पकड़ बाहर आया। मुँह से हथगोले की पीन निकाली। मग़ज़ की स्क्रीन पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली हॉल में बम फेंका और ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद’ नारा लगाने लगे, इधर बंसी ने भी उन्हीं के अँदाज़ में हथगोला फेंका और उत्साह से कुर्राटी भरने लगा।

 डामोर ने पीछे गर्दन घुमाये बग़ैर ही पूछा- क्या हो गया वीडियोग्राफ़र साब, कुर्राटी क्यों भर रहे हो ?

 बंसी की तरफ़ से कोई जवाब न सुन ; डामोर फिर सोमु भील से बात करने लगा।

 -सोमु रात में कैसी झमाझम बरसात हुई थी, तूने देखी थी कि नहीं.. ?

डामोर ने पूछा। -अरे साब… क्यों नहीं देखी.. मैं तो गस्त पर था तब… सोमु भील ने कहा- भीग गया.. बहुत ठंडा पानी था


 ख़ैर… गस्त पर था तो तूने देखी ही होगी… डामोर क़िस्सा शुरू करने के अँदाज़ में बोला और फिर क़िस्सा सुनाने लगा- पर शायद इन्द्र ने न देखी होगी ! क्योंकि उसका वह वक़्त सूरा और सुन्दरी के मद में गाफिल रहने का है। लेकिन सुबह नारद या किसी और चमचे ने बताया होगा, तो सुनकर इन्द्र के बाल सुलग उठे होंगे। इन्द्र ईर्ष्यालु तो है ही, और ज़रा-ज़रा-सी बातों पर बिगड़ने में कुख्यात भी माना जाता है।

 डामोर आगे बोला- जानते हो सोमु…इन्द्र ने क्या किया होगा ?

सोमु ने कहा- आप ही बताओ साब !

 डामोर बताने लगा- इन्द्र तुरंत महादेव के पास गया होगा। बसंत की शिकायत करते लहज़े में कहा होगा कि बरसात करना बसंत का काम नहीं। जितनी बरसात करनी थी, मैंने अपने कार्यकाल के दौरान कर दी। आज बसंत ने बरसात करावा दी, कल कोई और देवी-देवता करवा देगा ! अगर ऎसे ही चलता रहा तो मुझे कौन पूछेगा ?

 सोमु …. यह वैसा ही मामला है, जैसा अपने थाने में बीट या तफ्तीश को लेकर अधिकारियों में कुत्ता फजीती होती है ! कोई ऎसा मामला हुआ जिसमें अच्छा माल मिलने की उम्मीद हो, तो दूसरे की बीट का मामला भी अपनी बीट में हेंच लाएँगे। लेकिन मामला माथा दुखाने वाला और अंटी का माल ख़र्च कराने वाला लगे, तो अपनी बीट का मामला भी दूसरे की बीट में धकेल देंगे।

 सोमु हँसा…..। पर उसकी हँसी से डामोर के क़िस्सा सुनाने पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा। क्योंकि डामोर एक बार क़िस्सा सुनाना शुरू हो जाए तो फिर अधबीच में रुकना मुश्किल होता है, रुके तो क़िस्सा कहने को जीभ में खुजली मचती है। कभी वह ख़ुद को ज़बरन रोक भी ले, पर जीभ की खुजली को कैसे रोके ? उसे क़िस्सा कहना ही होता है और कहना ज़ारी है- तो जब इन्द्र महादेव के पास पहुँचा होगा ! जैसे अपना टी.आय. दो-चार पैग पेट में उडेंल कर थाने में बैठा रहता है, ऎसे ही महादेव चिलम सूत-साँत कर और भाँग के एक-दो अंटे गटककर ग़म ग़लत करते बैठे होंगे। पहले तो उन्होंने इन्द्र को टालने की कोशिश की होगी, पर जब इन्द्र अपने स्वभाव के मुताबिक़ गिड़गिड़ाता हुआ वहीं खड़ा रहा होगा, तब महादेव ने कहा होगा- देखो भई…. बसंत में बरसात कराकर तुम्हारे हक़ का अतिक्रमण कोई देवी-देवता नहीं कर रहा है। बसंत प्यार और मस्ती का मौसम है, सो देवी-देवता तो मौज़-मस्ती में व्यस्त हैं। गयी रात जो कुछ हुआ, इस बरस ऎसा कई बार हुआ, यह दरअसल ग्लोबल वार्मिंग का असर है, और इसे कन्ट्रोल करने का रिमोट व्हाइट हाउस की तिज़ोरी में बंद है, तिज़ोरी की चाबी उसमें रहने वाले राक्षस की कमर के कंदोरे में बँधी है। अभी कुछ देश के मुखिया क्वेटा में राक्षस के सामने गिड़गिड़ाये भी.. कि वह जलवायु नियंत्रण में कुछ मदद करे… पर उसने ठेंगा दिखा दिया…… और फिर महादेव एक और चिलम भरते हुए बोले होंगे- भई .. हमें तो ख़ुद ही.. फ़िक़्र खा रही है कि पोंद के नीचे से हिमालय पिघल गया तो हम कहाँ खेमा तानेंगे !

 महादेव, इन्द्र और व्हाइट हाउस के राक्षस को आपस में जैसे निपटना होगा, निपटेंगे। पर बरसात की वजह से ज़रूरत और अपेक्षा से ज़्यादा चलती ठंडी हवा बेकसुर बापड़े डामोर, सोमु को आर पर आर गड़ाये जा रही है। दिन में ऎसी न चुभी थी, पर अभी लग रहा है कि इसलिए न चुभी थी कि दिन भर आर को पैनी करने में व्यस्त रही होगी।

 सोमु और डामोर ज़ोर से हँसे… एक क्षण को ठंड उनकी हँसी के इर्द-गिर्द छिटक गयी। बंसी अभी भी ख़ामोश बैठा है। लेकिन जैसे ही डामोर ख़मोश हुआ, तो उसे लगा ठंड फिर से दाँत गड़ाने लगी। वह बोला- यह ठंड भी हिन्दी फ़िल्म के ख़लनायक की तरह कर रही है।

 ड्रायवर सोमु भील ने पूछा- साब ठंड और ख़लनायक का क्या रिश्ता ?

 -अरे भई… अपने को पुलिस की ट्रेनिंग में चाँदमारी करती बखत उस्ताद क्या सिखाता है कि अपना ध्यान टॉरगेट पर रखो और ट्रिगर दबा दो…. अब ख़लानायक को हीरोइन का बलात्कार ही करना है, तो गैलचौदा टॉरगेट पर ध्यान लगाने की बजाए हीरोइन की छातियों में दाँत गड़ाता है ! अरे भई… बलात्कार ही करना है… तो टॉरगेट पर ध्यान लगाओ… अर्जुन की तरह मछली की आँख पर निशाना साधो…. जैस इन दिनों हमारी संसद का ध्यन वनवासियों के सफाया करने पर है…। पर क्या है सोमु … कि ये भी दुर्योधन और दुशासन की तरह करते हैं… लगे द्रोपदी का चीरहरण करने…. साड़ी हेंच-हेंचकर पसीना..पसीना हो रहे… साड़ी ख़तम नहीं हो रही… कहते हैं किसन्या साड़ी को लम्बी करता जा रहा था… अरे तो भई… लक्ष्य क्या है… ! साड़ी हेंचना… कि चीरहरण करना… ! दुर्योधन सहित कितने एक से एक धुरंधर बैठे थे वहाँ.. ! कोई भी एक उठता, और पेटीकोट पकड़कर हेंच लेता…! दूसरा पोलका फाड़ देता.. लो हो गया… पर लगे हैं… साड़ी हेंचने में….. ज़रा अपनी संसद से ही सीख लो… वहाँ न कोई भारत माता की साड़ी को हाथ लगाता है… न उन्हें अभद्र बोलता है… व्हाइट हाउस के राक्षस के मन माफिक नीतियाँ पारित करके, भारत माता का चीरहरण कर देता है कि नहीं….! चल भारत माता और संसद की बात तेरे मग़ज़ में न आये तो…ये तो तू भी देखता-सुनता ही है… आज फलाँ गाँव या शहर में फलानी औरत का बलात्कार। फलानी औरत को डाकन-चुड़ैल कहकर नंगी कर घुमायी। जानता है कि नहीं.. जानता है.. आख़िर तू भी पुलिस में है…!

 सोमु—हाँ.. हाँ.. क्यों नी जानता साब.. , यह तो होता ही रहता है… !

 -फिर…… डामोर बोलने लगा- ऎसा ही एक वो था.. रावण… सीता को अपहरण कर लिया और उसे अशोक वाटिका में बैठाल दिया… भेज रहा है प्रस्ताव पर प्रस्ताव और वह ठुकारए जा रही है… रावण प्रस्ताव भेजने में लगा रहा … और उधर राम ने चढ़ाई की तैयारी कर ली, एक दिन आया और रावण को ठाँस दिया….
 पर क्या है सोमु… इन फोकट्यों के पास कोई काम नहीं रहता… इसलिए टाइम पास किया करते… अपन को देखो… रात-दिन जुते रहते हैं… रावण की जगह अपन जैसा कोई होता तो हवा में ही खेल कर लेता… अपन को तो वैसे भी अपनी ही लाड़ी का मुँह देखे कई-कई दिन हो जाते हैं… भागते-दौड़ते सटासट चार-छः सटके मार चल देते हैं… हर बखत पिछवाड़े में कोई न कोई खूँटा घुसा जो रहता है….. साली पब्लिक का भी काम नहीं कर पाते…. क्योंकि आज सी एम जी ऊँकड़े पड़ने आ रहे हैं… कल पी एम फलाने सिंह जी भटे बघारने आयेंगे… अरे भई आपको जो कुछ करना है….. वहीं से बैठे-बैठे उँगली करो…. सब हो जायेगा फटाफट…. करना कुछ नहीं… खाली-माली नौटंकी करने चले आते हैं मुँह उठाकर….और जनता के करोड़ों रुपयों का सत्यानाश कर जाते हैं।

 डामोर का बोलने में वैसे ही अच्छा रियाज था। फिर अभी तो जब पिछले गाँव में सी एम जी का काफिला रुका था.. तो सी एम जी भाषण शुरू करे और भारत माता की जै बोले इत्ती देर में महुआ स्कॉच के दो गिलास गटक लिये थे। महुआ स्कॉच गटकने के बाद डामोर के बोलने की क्षमता दो-तीन गुना बढ़ जाती है। हालाँकि जब वह तुरुंग में बोलता, तो उसका उद्देश्य देवी-देवता या किसी और के मान-अपमान करने का नहीं होता। जैसा उसके मन में आता… वैसा बोलता रहता। और अगर उस वक़्त भी बोलने के पीछे कुछ उद्देश्य था.. तो वह था- ठंड को उल्लू बनाना। लेकिन ठंड कोई भोली-भाली भीलनी नहीं थी, जिसे कोई सरकारी अधिकारी और एन.जी.ओ. कर्मी अपनी बातों से, गिलास-दो गिलास ताड़ी, महुआ या फिर कटोरा भर राबड़ी ही में गपला (बहलाना-फुसलाना) ले। ठंड बड़ी श्याणी थी भई… बस.. ज़्यादा से ज़्यादा यह होता .. कि जब डामोर.. और सोमु ठहाका लगाते तो वह कुछ क्षण के लिए उनके इर्द-गिर्द छिटक जाती। लेकिन जैसे ही ठहाका रुकता… वह वापस हिन्दी फ़िल्म के ख़लनायक की तरह दाँत गड़ाने लगती। डामोर फिर कोई क़िस्सा सुनाने लगता।

 डामोर और सोमु ठंड से बचने को जो कुछ भी कर रहे थे, लेकिन जीप में पीछे बैठा बंसी कुछ नहीं कर रहा था, बल्कि क्षण भर पहले तक तो जैसे उसे ठंड छू ही नहीं रही थी। उसके सिर के बालों में से पसीने की रेल कान की बग़ल से नीचे उतर रही थी।

 उसके मग़ज़ में होह… होह…और कुर्रर्र…. कुर्रर्र…. गूँज रही थी। लेकिन अब होह… होह…और कुर्रर्र…. कुर्रर्र….

मग़ज़ में धीमें-धीमें यों घुल रही है जैसे पानी में मिश्री की डली, और डली के साथ-साथ एक शंका भी घुल रही है- कूल्हों के नीचे…. नहीं.. सिर्फ़ नीचे ही नहीं…., टाँगों के बीच भी… गीला-गीला हो गया है। बंसी ने ख़ुद से पूछा- क्या मैं डर गया… मैंने डर के मारे पैशाब कर दी….! डरना तो मेरे ख़ून में नहीं…. फिर ऎसा कैसे हो सकता है…! वह अपने ही प्रश्नों के उत्तर खोजता… तब तक डामोर सोमु की तरफ़ देखता बोला- लगता है वीडियोग्राफ़र सपने में कुर्राटी भर रहा है…? लेकिन ठंड अपनी तो जैसे मार ही ले रही है…! डामोर क़िस्से सुनाने में उस्ताद है। अपनी औकात उससे होड़ करने की तो दूर.. बराबरी की भी नहीं हैं....। और ईमान-धरम की बात तो ये है भई.. कि डामोर की क़िस्सागोई से अपना मन गलतान हो गया है। अपन ने पहले सोचा था कि आपको ‘आओ..बनायें अपना ह्रदय प्रदेश.. स्वर्णिम ह्रदय प्रदेश… ’ यात्रा की सीधी-सीधी कहानी कह देंगे.. और फुर्सत..! पर अब बीच में भाँजी मारने का मन हो गया है…। यात्रा के साक्षी बंसी से जुड़े कुछ क़िस्से सुनाने को जीभ में खुजली मच रही है। और चूँकि क़िस्से सुनाने के अपने ढंग के पेटंट की समझ .. डामोर में शायद ही कभी आये…. ! आ भी गयी तो.. निर्लज और क्रूर प्रोफेशनलिज्म नहीं आयेगा। और किसी अमेरिकी कंपनी की इस पर अभी नज़र न पड़ी, पड़ेगी तो वह हमारे क़िस्से हमें ही डामोरिया अंदाज़ में सुनाकर करोड़ों रुपयों के वारे-न्यारे कर लेगी। खैर… मैं अपने अनगढ़िया और डामोरिया मिलेजुले अंदाज़ में कुछ क़िस्से सुनाता हूँ। और एकदम फोकट में…. बंसी.. बंसी के बाप और उसके पुरखों के कुछ क़िस्से, क्योंकि इन क़िस्सों को सुनाये बग़ैर कहानी कही तो…. कहानी समझना कम सरल होगा ।