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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

गम्मत

यह कहानी 2010 में परिकथा के युवा कहानी विशेषांक में पहली बार प्रकाशित हुई थी, उसके बाद कुछ और जगहों पर भी प्रकाशित हुई। फिर 2011 में सत्यनारायण पटेल के दूसरे कहानी संग्रह- लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ में भी संकलित की गयी है। bizooka2009.blogspot.com पर अभी तक हमने कहानी प्रकाशित नहीं की , लेकिन अभी सोचते हैं कि यहाँ कहानी प्रकाशित करने में भी कोई हर्ज नहीं है। जब ‘गम्मत’ परिकथा में छपी थी, तो पाठकों ने जी भर कर इसका स्वागत किया था। कई ने लम्बी-लम्बी प्रतिक्रिया परिकथा में लिखी। वरिष्ठ समीक्षक प्रो. विजय शर्मा (जमशेदपुर) ने तो पहनी पर पाँच पेज का पूरा लेख ही लिखा था, जिसे हमने ब्लॉग पर लगाया भी था। युवा आलोचक प्रो. अरुण होता (कलकत्ता) ने इस कहानी के प्रति जो प्रेम और दीवानगी दिखायी, उसे यहाँ बया करना कठिन है। कई पाठक मित्रों ने एस.एम.एस. पर प्रतिक्रिया भेजी। कई ने फ़ोन किये और जो रू-ब-रू प्रतिक्रिया दे सकते थे, उन्होंने तो रू-ब-रू भी दी। कहानी पर प्रतिक्रिया अभी भी आती है। कोई उसकी तारीफ़ करता है, तो कोई आलोचना। कुछ भाई तो फ़ोन पर या फिर रू-ब-रू गाली देने से भी नहीं चूकते। कुछ मित्र फ़ोन करके या फिर एस.एम.एस. करके ‘गम्मत’ की फोटोकॉपी मँगवाते हैं। सभी पाठक मित्रों की भावना, स्नेह, आदर और गालियों का सम्मान करते हुए ‘गम्मत’ पुनः प्रकाशित की जा रही है। अब यह इस ब्लॉग पर सदा उपल्बध रहेगी।


 कहानी
  
सत्यनारायण पटेल




होह……..होह…….होह.. ……………………... कुर्रर्रर्र….. कुर्रर्रर्र….. कुर्रर्रर्र.…
सी एम जी के काफिले के आगे सड़क पर वार्नर जीप बेखटके दौड़ रही है। जीप में हवा बेधड़क और ज़रूरत से ज़्यादा आ रही है। गयी रात, आधी रात के बाद हुई झमाझम बरसात का पानी पीकर हवा के नाखुन उग आयें हैं- ठंडे और पैने नाखुन। हवा की चाल में ग़ज़ब की तेज़ी है। जीप के हुड का कपड़ा फड़फड़ा रहा है। सोमु भील जीप चला रहा है, उसकी बग़ल में सहायक उपनिरीक्षक एम. के. डामोर और पीछे की सीट पर बंसी बैठा है। सभी ने गरम कपड़े पहने हैं। ठंड के मारे सोमु भील और डामोर के मुँह के जबड़े थ्रेसर के छलने की तरह हिल रहे हैं। ऊपर-नीचे के दाँत आपस में टकरा रहे हैं। डामोर को ठंड से बचाव का एक रास्ता सुझता है- आपस में बोलते रहना। इसलिए वह क़िस्से सुनाने लगता है। सोमु उसके क़िस्से सुनता है। हाँ.. हूँ.. कर हुँकारे भी भरता है। पर बंसी जाने किस लोक में खोया है, उसे न डामोर की आवाज़ सुनायी दे रही है, न ठंड लग रही है, बल्कि उसकी कनपटियों से पसीने की रेले ढुलक रही हैं- खारी और पारदर्शी रेले। बंसी को देखने से तो यही लगता है कि वह जीप में पिछली सीट पर बैठा है और उसे ठंड नहीं लग रही है। पर दरअसल ज़ेहनी तौर पर बंसी जीप में नहीं है। वह अपने मग़ज़ की स्क्रीन पर नाचती टोली में होह… होह… होह… कर नाच रहा है, कुर्राटी भर रहा है, और यही वजह है कि ठंडी हवा चलने के बावजूद, बंसी की कनपटियों से पसीने की रेले ढुलक रही हैं। उसके मग़ज़ की स्क्रीन पर नाचती टोलियों की संख्या बढ़ती जा रही है। टोलियों में नाचने वाले केसरा भील, अलीया भील, छीतू भील, भुवान तड़वी, बिरसा मुन्डा और चन्द्रशेखर आज़ाद जैसे कई लोग अपने-अपने परगनों की सीमाओं को पीछे छोड़ और इतिहास के पन्नों से बाहर आकर बंसी के मग़ज़ की स्क्रीन पर नाचते नज़र आ रहे हैं। चन्द्रशेखर आज़ाद बीच-बीच में टोली का जोश बढ़ा रहे है।


बंसी मग़ज़ की स्क्रीन पर देख रहा है- लम्बे समय से खूँटी और कन्धे की शोभा बढ़ाने वाले तीर-धनुषों ने कन्धे और खूँटी पर टँगे रहने से इंकार कर दिया है। जैसे वे ख़ुद ब ख़ुद खूँटी और कन्धे से उतरकर नाचती-गाती टोलियों के हाथों में आ गये हैं। बाँसुरियों ने हुलिए बदल लिए हैं और उनमें छेद की जगह पर ट्रिगर उग आये हैं। यह जैसे भी हो रहा है, लेकिन ऎसा होता देख बंसी भी जोश से भर गया है। उसे लग रहा है कि उसके बैग़ में बम भरे हैं ।

 एक क्षण को स्क्रीन पर अँधेरा छा गया है। टोलियों की आवाज़ आ रही है, टोलियाँ नज़र नहीं आ रही है। दूसरे क्षण स्क्रीन पर भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त उभर आये हैं। वे असेंबली हॉल में खड़ें हैं और उनके हाथ जेब में रखे बम की और बढ़ रहे हैं। बंसी का हाथ अपने बैग़ में गया और चौड़ी मुट्ठी में एक हथ गोला पकड़ बाहर आया। मुँह से हथगोले की पीन निकाली। मग़ज़ की स्क्रीन पर भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने असेंबली हॉल में बम फेंका और ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद’ नारा लगाने लगे, इधर बंसी ने भी उन्हीं के अँदाज़ में हथगोला फेंका और उत्साह से कुर्राटी भरने लगा।

 डामोर ने पीछे गर्दन घुमाये बग़ैर ही पूछा- क्या हो गया वीडियोग्राफ़र साब, कुर्राटी क्यों भर रहे हो ?

 बंसी की तरफ़ से कोई जवाब न सुन ; डामोर फिर सोमु भील से बात करने लगा।

 -सोमु रात में कैसी झमाझम बरसात हुई थी, तूने देखी थी कि नहीं.. ?

डामोर ने पूछा। -अरे साब… क्यों नहीं देखी.. मैं तो गस्त पर था तब… सोमु भील ने कहा- भीग गया.. बहुत ठंडा पानी था


 ख़ैर… गस्त पर था तो तूने देखी ही होगी… डामोर क़िस्सा शुरू करने के अँदाज़ में बोला और फिर क़िस्सा सुनाने लगा- पर शायद इन्द्र ने न देखी होगी ! क्योंकि उसका वह वक़्त सूरा और सुन्दरी के मद में गाफिल रहने का है। लेकिन सुबह नारद या किसी और चमचे ने बताया होगा, तो सुनकर इन्द्र के बाल सुलग उठे होंगे। इन्द्र ईर्ष्यालु तो है ही, और ज़रा-ज़रा-सी बातों पर बिगड़ने में कुख्यात भी माना जाता है।

 डामोर आगे बोला- जानते हो सोमु…इन्द्र ने क्या किया होगा ?

सोमु ने कहा- आप ही बताओ साब !

 डामोर बताने लगा- इन्द्र तुरंत महादेव के पास गया होगा। बसंत की शिकायत करते लहज़े में कहा होगा कि बरसात करना बसंत का काम नहीं। जितनी बरसात करनी थी, मैंने अपने कार्यकाल के दौरान कर दी। आज बसंत ने बरसात करावा दी, कल कोई और देवी-देवता करवा देगा ! अगर ऎसे ही चलता रहा तो मुझे कौन पूछेगा ?

 सोमु …. यह वैसा ही मामला है, जैसा अपने थाने में बीट या तफ्तीश को लेकर अधिकारियों में कुत्ता फजीती होती है ! कोई ऎसा मामला हुआ जिसमें अच्छा माल मिलने की उम्मीद हो, तो दूसरे की बीट का मामला भी अपनी बीट में हेंच लाएँगे। लेकिन मामला माथा दुखाने वाला और अंटी का माल ख़र्च कराने वाला लगे, तो अपनी बीट का मामला भी दूसरे की बीट में धकेल देंगे।

 सोमु हँसा…..। पर उसकी हँसी से डामोर के क़िस्सा सुनाने पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा। क्योंकि डामोर एक बार क़िस्सा सुनाना शुरू हो जाए तो फिर अधबीच में रुकना मुश्किल होता है, रुके तो क़िस्सा कहने को जीभ में खुजली मचती है। कभी वह ख़ुद को ज़बरन रोक भी ले, पर जीभ की खुजली को कैसे रोके ? उसे क़िस्सा कहना ही होता है और कहना ज़ारी है- तो जब इन्द्र महादेव के पास पहुँचा होगा ! जैसे अपना टी.आय. दो-चार पैग पेट में उडेंल कर थाने में बैठा रहता है, ऎसे ही महादेव चिलम सूत-साँत कर और भाँग के एक-दो अंटे गटककर ग़म ग़लत करते बैठे होंगे। पहले तो उन्होंने इन्द्र को टालने की कोशिश की होगी, पर जब इन्द्र अपने स्वभाव के मुताबिक़ गिड़गिड़ाता हुआ वहीं खड़ा रहा होगा, तब महादेव ने कहा होगा- देखो भई…. बसंत में बरसात कराकर तुम्हारे हक़ का अतिक्रमण कोई देवी-देवता नहीं कर रहा है। बसंत प्यार और मस्ती का मौसम है, सो देवी-देवता तो मौज़-मस्ती में व्यस्त हैं। गयी रात जो कुछ हुआ, इस बरस ऎसा कई बार हुआ, यह दरअसल ग्लोबल वार्मिंग का असर है, और इसे कन्ट्रोल करने का रिमोट व्हाइट हाउस की तिज़ोरी में बंद है, तिज़ोरी की चाबी उसमें रहने वाले राक्षस की कमर के कंदोरे में बँधी है। अभी कुछ देश के मुखिया क्वेटा में राक्षस के सामने गिड़गिड़ाये भी.. कि वह जलवायु नियंत्रण में कुछ मदद करे… पर उसने ठेंगा दिखा दिया…… और फिर महादेव एक और चिलम भरते हुए बोले होंगे- भई .. हमें तो ख़ुद ही.. फ़िक़्र खा रही है कि पोंद के नीचे से हिमालय पिघल गया तो हम कहाँ खेमा तानेंगे !

 महादेव, इन्द्र और व्हाइट हाउस के राक्षस को आपस में जैसे निपटना होगा, निपटेंगे। पर बरसात की वजह से ज़रूरत और अपेक्षा से ज़्यादा चलती ठंडी हवा बेकसुर बापड़े डामोर, सोमु को आर पर आर गड़ाये जा रही है। दिन में ऎसी न चुभी थी, पर अभी लग रहा है कि इसलिए न चुभी थी कि दिन भर आर को पैनी करने में व्यस्त रही होगी।

 सोमु और डामोर ज़ोर से हँसे… एक क्षण को ठंड उनकी हँसी के इर्द-गिर्द छिटक गयी। बंसी अभी भी ख़ामोश बैठा है। लेकिन जैसे ही डामोर ख़मोश हुआ, तो उसे लगा ठंड फिर से दाँत गड़ाने लगी। वह बोला- यह ठंड भी हिन्दी फ़िल्म के ख़लनायक की तरह कर रही है।

 ड्रायवर सोमु भील ने पूछा- साब ठंड और ख़लनायक का क्या रिश्ता ?

 -अरे भई… अपने को पुलिस की ट्रेनिंग में चाँदमारी करती बखत उस्ताद क्या सिखाता है कि अपना ध्यान टॉरगेट पर रखो और ट्रिगर दबा दो…. अब ख़लानायक को हीरोइन का बलात्कार ही करना है, तो गैलचौदा टॉरगेट पर ध्यान लगाने की बजाए हीरोइन की छातियों में दाँत गड़ाता है ! अरे भई… बलात्कार ही करना है… तो टॉरगेट पर ध्यान लगाओ… अर्जुन की तरह मछली की आँख पर निशाना साधो…. जैस इन दिनों हमारी संसद का ध्यन वनवासियों के सफाया करने पर है…। पर क्या है सोमु … कि ये भी दुर्योधन और दुशासन की तरह करते हैं… लगे द्रोपदी का चीरहरण करने…. साड़ी हेंच-हेंचकर पसीना..पसीना हो रहे… साड़ी ख़तम नहीं हो रही… कहते हैं किसन्या साड़ी को लम्बी करता जा रहा था… अरे तो भई… लक्ष्य क्या है… ! साड़ी हेंचना… कि चीरहरण करना… ! दुर्योधन सहित कितने एक से एक धुरंधर बैठे थे वहाँ.. ! कोई भी एक उठता, और पेटीकोट पकड़कर हेंच लेता…! दूसरा पोलका फाड़ देता.. लो हो गया… पर लगे हैं… साड़ी हेंचने में….. ज़रा अपनी संसद से ही सीख लो… वहाँ न कोई भारत माता की साड़ी को हाथ लगाता है… न उन्हें अभद्र बोलता है… व्हाइट हाउस के राक्षस के मन माफिक नीतियाँ पारित करके, भारत माता का चीरहरण कर देता है कि नहीं….! चल भारत माता और संसद की बात तेरे मग़ज़ में न आये तो…ये तो तू भी देखता-सुनता ही है… आज फलाँ गाँव या शहर में फलानी औरत का बलात्कार। फलानी औरत को डाकन-चुड़ैल कहकर नंगी कर घुमायी। जानता है कि नहीं.. जानता है.. आख़िर तू भी पुलिस में है…!

 सोमु—हाँ.. हाँ.. क्यों नी जानता साब.. , यह तो होता ही रहता है… !

 -फिर…… डामोर बोलने लगा- ऎसा ही एक वो था.. रावण… सीता को अपहरण कर लिया और उसे अशोक वाटिका में बैठाल दिया… भेज रहा है प्रस्ताव पर प्रस्ताव और वह ठुकारए जा रही है… रावण प्रस्ताव भेजने में लगा रहा … और उधर राम ने चढ़ाई की तैयारी कर ली, एक दिन आया और रावण को ठाँस दिया….
 पर क्या है सोमु… इन फोकट्यों के पास कोई काम नहीं रहता… इसलिए टाइम पास किया करते… अपन को देखो… रात-दिन जुते रहते हैं… रावण की जगह अपन जैसा कोई होता तो हवा में ही खेल कर लेता… अपन को तो वैसे भी अपनी ही लाड़ी का मुँह देखे कई-कई दिन हो जाते हैं… भागते-दौड़ते सटासट चार-छः सटके मार चल देते हैं… हर बखत पिछवाड़े में कोई न कोई खूँटा घुसा जो रहता है….. साली पब्लिक का भी काम नहीं कर पाते…. क्योंकि आज सी एम जी ऊँकड़े पड़ने आ रहे हैं… कल पी एम फलाने सिंह जी भटे बघारने आयेंगे… अरे भई आपको जो कुछ करना है….. वहीं से बैठे-बैठे उँगली करो…. सब हो जायेगा फटाफट…. करना कुछ नहीं… खाली-माली नौटंकी करने चले आते हैं मुँह उठाकर….और जनता के करोड़ों रुपयों का सत्यानाश कर जाते हैं।

 डामोर का बोलने में वैसे ही अच्छा रियाज था। फिर अभी तो जब पिछले गाँव में सी एम जी का काफिला रुका था.. तो सी एम जी भाषण शुरू करे और भारत माता की जै बोले इत्ती देर में महुआ स्कॉच के दो गिलास गटक लिये थे। महुआ स्कॉच गटकने के बाद डामोर के बोलने की क्षमता दो-तीन गुना बढ़ जाती है। हालाँकि जब वह तुरुंग में बोलता, तो उसका उद्देश्य देवी-देवता या किसी और के मान-अपमान करने का नहीं होता। जैसा उसके मन में आता… वैसा बोलता रहता। और अगर उस वक़्त भी बोलने के पीछे कुछ उद्देश्य था.. तो वह था- ठंड को उल्लू बनाना। लेकिन ठंड कोई भोली-भाली भीलनी नहीं थी, जिसे कोई सरकारी अधिकारी और एन.जी.ओ. कर्मी अपनी बातों से, गिलास-दो गिलास ताड़ी, महुआ या फिर कटोरा भर राबड़ी ही में गपला (बहलाना-फुसलाना) ले। ठंड बड़ी श्याणी थी भई… बस.. ज़्यादा से ज़्यादा यह होता .. कि जब डामोर.. और सोमु ठहाका लगाते तो वह कुछ क्षण के लिए उनके इर्द-गिर्द छिटक जाती। लेकिन जैसे ही ठहाका रुकता… वह वापस हिन्दी फ़िल्म के ख़लनायक की तरह दाँत गड़ाने लगती। डामोर फिर कोई क़िस्सा सुनाने लगता।

 डामोर और सोमु ठंड से बचने को जो कुछ भी कर रहे थे, लेकिन जीप में पीछे बैठा बंसी कुछ नहीं कर रहा था, बल्कि क्षण भर पहले तक तो जैसे उसे ठंड छू ही नहीं रही थी। उसके सिर के बालों में से पसीने की रेल कान की बग़ल से नीचे उतर रही थी।

 उसके मग़ज़ में होह… होह…और कुर्रर्र…. कुर्रर्र…. गूँज रही थी। लेकिन अब होह… होह…और कुर्रर्र…. कुर्रर्र….

मग़ज़ में धीमें-धीमें यों घुल रही है जैसे पानी में मिश्री की डली, और डली के साथ-साथ एक शंका भी घुल रही है- कूल्हों के नीचे…. नहीं.. सिर्फ़ नीचे ही नहीं…., टाँगों के बीच भी… गीला-गीला हो गया है। बंसी ने ख़ुद से पूछा- क्या मैं डर गया… मैंने डर के मारे पैशाब कर दी….! डरना तो मेरे ख़ून में नहीं…. फिर ऎसा कैसे हो सकता है…! वह अपने ही प्रश्नों के उत्तर खोजता… तब तक डामोर सोमु की तरफ़ देखता बोला- लगता है वीडियोग्राफ़र सपने में कुर्राटी भर रहा है…? लेकिन ठंड अपनी तो जैसे मार ही ले रही है…! डामोर क़िस्से सुनाने में उस्ताद है। अपनी औकात उससे होड़ करने की तो दूर.. बराबरी की भी नहीं हैं....। और ईमान-धरम की बात तो ये है भई.. कि डामोर की क़िस्सागोई से अपना मन गलतान हो गया है। अपन ने पहले सोचा था कि आपको ‘आओ..बनायें अपना ह्रदय प्रदेश.. स्वर्णिम ह्रदय प्रदेश… ’ यात्रा की सीधी-सीधी कहानी कह देंगे.. और फुर्सत..! पर अब बीच में भाँजी मारने का मन हो गया है…। यात्रा के साक्षी बंसी से जुड़े कुछ क़िस्से सुनाने को जीभ में खुजली मच रही है। और चूँकि क़िस्से सुनाने के अपने ढंग के पेटंट की समझ .. डामोर में शायद ही कभी आये…. ! आ भी गयी तो.. निर्लज और क्रूर प्रोफेशनलिज्म नहीं आयेगा। और किसी अमेरिकी कंपनी की इस पर अभी नज़र न पड़ी, पड़ेगी तो वह हमारे क़िस्से हमें ही डामोरिया अंदाज़ में सुनाकर करोड़ों रुपयों के वारे-न्यारे कर लेगी। खैर… मैं अपने अनगढ़िया और डामोरिया मिलेजुले अंदाज़ में कुछ क़िस्से सुनाता हूँ। और एकदम फोकट में…. बंसी.. बंसी के बाप और उसके पुरखों के कुछ क़िस्से, क्योंकि इन क़िस्सों को सुनाये बग़ैर कहानी कही तो…. कहानी समझना कम सरल होगा ।


 बात उन दिनों की है.. जब बंसी प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी में नहीं रहता था। यानी जब वह अपने बाप कल्या और माँ राळी के साथ रहता था। तब उन्हीं की कमाई की राबड़ी पीकर बंसी की नसों में ग़ज़ब की बर्राटी (उन्मतता ) दौड़ने लगती। जब किसी मौक़े पर अड़ोसी-पड़ोसी नाचते-गाते.. कुर्राटी भरते… तो बंसी भी ऎसी कुर्राटी भरता कि आसपास के टापरे ही नहीं, बल्कि फलियों तक को गूँजा देता। यूँ तो बंसी का बाप अपने समुदाय में नवी समझ को झट से लपक लेने वाला माना जाता , पर अशिक्षा के अंधेरे में डोटाते हुए नवी समझ उस तक पहुँचते-पहुँचते पुरानी पड़ जाती। और कई बार समुदाय में व्याप्त अंधविश्वासों को मानने से वह नकार न पाता। एक बरस जब बंसी पाँच-छः बरस का था, तब कपटी इन्द्र ने बरसात के मौसम में किसानों को पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसा दिया। किसान इन्द्र को पटाने के लिए तमाम तरह के टोने-टोटके और धत्तकरम कर रहे थे। तब कल्या के समुदाय के लोगों ने डोडर अमावस के दिन बंसी और उसके सराबरी के चार-पाँच छोरों के नंग-धडंग टुल्लर को गाँव-फलिया में घुमाने का टोटका आजमाने का सोचा… जो कल्या को कई वजहों से नहीं जँचा । लेकिन समुदाय में टोटके को आजमाने पर सहमति बन गयी, सो उसे भी मानना पड़ा। बंसी के माथे पर पलाश के पत्ते बाँधे, बंसी को एक लम्बा बाँस थमाया। बाँस के माथे पर एक दादुर (मेंढ़क) बाँधा। नंग-धड़ंग टुल्लर को गाँव-फलिया में घुमाया गया। टुल्लर जिस घर सामने से गुज़रा, उस घर की औरतों ने टुल्लर पर पानी उड़ेला। टुल्लर ने पानी से गीली ज़मीन पर लोट लगायी। टुल्लर के साथ चलने वाले लोगों को घरों से आटा-दाल, महुआ स्कॉच आदि सामान दिया। महुआ स्कॉच तो लोग लेते जाते और पीते जाते। फिर एक खेत में कंडे जलाये.. कंडे जलाते वक़्त जान बूझकर कुछ ज़्यादा धुआँ किया कि शायद धुएँ से भरमाकर बादल बरसने लगेंगे। पर कपटी इन्द्र न धुएँ से भरमाया। न ही तड़पते दादुर और लोट लगाते छोरों को देख उसे लाज-शरम आयी। पर उसे पटाने के नाम पर एक पार्टी ज़रूर हो गयी। ख़ूब महुआ स्कॉच पी। माँदल-बाँसुरी की आवाज़ पर भरपुर नाचे। मज़े से कंडों की अंगार पर बनाये दाल-पानिये झाड़े। बंसी और छोरों के लिए तब तो वह सब मस्ती भरा खेल ही रहा। लेकिन जब इस सब के वावजूद पानी नहीं बरसा, तो बंसी के मन में आया कि कोई भगवान-अगवान नहीं होता है। होता तो वह हमें लोटता देख ज़रूर थोड़ा पानी बरसा देता। मन में आयी यही बात उसने न सिर्फ़ अपने बाप कल्या से कही, बल्कि अपनी बोली में पूछा भी कि अगर अपना टापरा में आटा न होता। भूख पेट में कुर्राटी भर रही होती, मैं रोटी के लिए ऎसे लोट लगाता तो आप क्या करते ? कल्या ने अपनी बोली में कहा था कि छीतू भील की तरह कहीं से भी लूट कर ले आता। छीतू भील कौन था… ? तब बंसी को न समझ में आया और न उस वक़्त उसके संबंध में कुछ पूछा। लेकिन मन में जो आया, उसने कल्या से कहा कि जब एक बाप अपनी संतान के लिए कहीं से भी लूट कर ला सकता है, तो फिर भगवान कैसे चुपचाप रह सकता है ? पर वह कुछ तब करे जब कि वह हो ! नहीं कर रहा है, इसका मतलब नहीं है। बंसी का तर्क सुन कल्या के मग़ज़ में भी ‘भगवान के होने के प्रति’ खुटका हो जाता। वह कभी-कभी मज़ाक में राळी से पूछता कि बंसी मेरा ही छोरा है न… तूने मेरे साथ दगा तो नहीं किया ? फिर कभी-कभी बंसी कुछ ऎसी बात बोल उठता कि कल्या का मन गलतान (पुलकित) हो जाता। फिर कल्या को जाने क्या जँची कि उसी बरस आली गाँव छोड़कर एक क़स्बे में आ बसा। कल्या के पीछे उसका छोटा भाई भी अपना परिवार लेकर चला आया । क़स्बे के बाहर एक खेत किनारे कुछ टापरे खड़े देख.. वहीं उन्होंने अपना भी टापरा खड़ा कर लिया। उसी खेत वाले पटेल ने उन्हें अपने यहाँ खेती में काम पर रख लिया । टापरों से थोड़ी दूरी पर पटेल का भी एक घर था। पर उस घर में कोई रहता नहीं था। बस खेती-बाड़ी की ज़रुरत का सामान पड़ा रहता। कभी-कभार पटेल साब दोपहर में आराम करते। बंसी के काका का छोरा सोमला और वहाँ पहले से रह रही मंगली साथ-साथ खेला करते। शुरूआत में मंगली बंसी और सोमला के साथ कम खेलती। क्योंकि एक तो वह दोनों से छोटी थी और फिर उससे भी छोटी उसकी बहन थी…। जब मंगली की माँ पटेल के खेत में काम करती तो मंगली बहन की देखभाल करती। उस दिन मंगली बहन को बबूल पर बंधी झोली में सुलाकर झूले दे रही थी। सोमला और बंसी खेल रहे थे। दोनों खेलते-खेलते पटेल साब के घर के पीछे चले गये। वहाँ बंसी को काग़ज़ की एक पुड़िया दिखी। उसने सोमला को बतायी। सोमला ने कहा कि ये तो मिर्ची की पुड़िया है। मेरे टापरे में ऎसे ही काग़ज़ में माँ ने मिर्ची बाँधकर रखी है। बंसी ने पुड़ी खोली तो देखा, उसमें मिर्ची नहीं है। उसमें तो हल्के मटमेले रंग का फुग्गा है। सोमला और बंसी फुग्गे को देखने लगे। दोनों को यह बात तो समझ में आ गयी कि फुग्गा है, पर यह समझ नहीं आया कि इतने बढ़िया फुग्गे में किस गधे ने नाक छिकर दी। फुग्गे को लेकर वे दोनों खेत के उस कोने पर पहुँचे जहाँ पानी चल रहा था। फुग्गे को उलट-पलटकर अच्छे से धोया। फिर पोंछा और मुँह से हवा भरी। फुग्गा फूलकर कद्दू के बराबर का हो गया। दोनों ने पहली बार अपने जीवन में इतना बड़ा फुग्गा देखा था। कहीं से ढूँढ़-ढाँढ़कर एक धागा हासिल किया। फुग्गे में बाँधा और बारी-बारी से मेड़ पर ले लेकर दौड़ने लगे। खेत में सोमला, बंसी, मंगली की माँ, और दो-तीन दाड़कने काम कर रही थी, काम करते-करते प्यास लगी तो बंसी की माँ राळी गागर लेकर वहीं पानी लेने आयी। जहाँ बंसी ने फुग्गा धोया था। राळी ने देखा कि छोरे क्या लेकर मेड़ पर दौड़ रहे हैं ? जब दौड़ते हुए उसके पास आये.. तो वह देखकर चौंक गयी.. ये क्या.. ? तब बंसी की बारी थी, तो बंसी ने धागा पकड़ रखा था और फुग्गा हवा में उड़ रहा था। राळी ने अपनी बोली में कहा था कि फेंक इसको…! बंसी ने पूछा था- क्यों…? राळी ने कहा- ये गंदा है ! बंसी ने कहा- हमने धो लिया है..। राळी ने कहा- ये ऎसे खेलने का नहीं है..। बंसी ने पूछा- तो फिर कैसे खेलने का है…? राळी ने कहा- तेरे से तो भगवान भी न जीत सकता। वह पानी की गागर ले चली गयी। तो भई… बंसी के बचपन के ऎसे अनेक क़िस्से हैं, पर यहाँ अभी इतना ही, ज़रुरत पड़ने पर आगे और सुनाऊँगा। पहले एक नान कमर्शियल, लेकिन ज़रूरी ब्रेक लेते हैं। यहाँ किसी विग्यापन की बात नहीं करनी है, ब्रेक में भी कहनी तो कहानी ही है, कहानी भी बंसी की ही, पर थोड़ी पुरानी है। सन तारीख़ आदि… मालूम नहीं है, वह पहले की कहनी है। हाँ.. यह याद थोड़ी देर से आयी, इसलिए ख़ेद और क्षमा सहित.. पहले पुरानी कहानी हाज़िर है। तो हुज़ूर ए आला…. बंसी का बाप कल्या और उसका बाप मल्या और उसके दादा पर दादा वाली इस पगडंडी पर चलते हैं तो केसरा भील, अलीया भील, छीतू भील.. भुवान तड़वी जैसे कई नाम याद आते हैं। सतपुड़ा की ऊँची-नीची घाटियों और जंगल झाड़ियों में रहने वाले गोंड, कोरकू, तड़वी, किराड़, कोली और मुन्डा में से ही एक जनजाति का ख़ून बंसी की रगों में भी दौड़ता है …। यूँ तो बंसी की वंशावली के कई क़िस्से हैं…. और समय-समय पर फेलोशिप के नाम पर सरकार और पूँजीपति दान दाता एजेन्सियों से प्रोजेक्ट लेकर रुपये ऎंठने वाले भिन्न-भिन्न मति के तथाकथित विद्वानों ने भी अनेक धारणाएँ थोपी हैं। और सत्तधीशों ने इनके साथ भरपूर अमानवीय खेल न सिर्फ़ इतिहास में खेले हैं, बल्कि मालदार कंपनियों के ईशारों पर इनके साथ तरह-तरह के खेल खेलन ज़ारी हैं। उन्हें कभी इनके टापरों के आसपास खड़े जंगल सोने के लगते हैं, कभी टापरों, खेतों और जंगलों के नीचे कोयला, बॉक्साइड, सोना, चाँदी और भी बहुत कुछ क़ीमती चीज़ें नज़र आती हैं, जिन्हें हथियाने के लिए बंसी के पुरखों को सदा ही खदेड़ा गया और बापड़ों को आज भी खदेड़ा जा रहा है। तो भई.. लगे हाथ बंसी के पुरखों की कहानी भी हो जाये… कहानी तो क्या बस यूँ समझो.. यह पुरखा पुराण है… जो कहानी का ही हिस्सा है… पर थोड़ा अलग है और कुछ ज़्यादा पुराना है। तो भई…. बंसी भील के पुरखों के जन्म के यूँ तो अनेक क़िस्से हैं, पर बहरहाल यह हाज़िर है- एक बार ऎसा हुआ कि महादेव बाबा नंदी के साथ भ्रमण को निकले। हाँ भई… वही महादेव… जिनको भोला भंडारी भी कहते हैं। तो भोला भंडारी एक हाथ में त्रिशूल, एक हाथ में कमंडल और गले में साँप और कमर के नीचे शेर की खाल को टॉवेल की तरह लपेट, जंगल में भ्रमण कर रहे थे। क्यों कर रहे थे ? यह पूछने की हिमाकत न तब किसी ने की थी जब- वे कामुक होकर एक स्त्री का पीछा करते हुए यहाँ-वहाँ जीवन के बीज बगराते दौड़ रहे थे। कहते हैं- धरती पर कुल बारह जहग उन्होंने जीवन के बीज बगाराये। जहाँ-जहाँ बीज बगरे… वहाँ-वहाँ उन बीजों से जीव तो नहीं…पर एक-एक शिवलिंग ज़रूर उग आया। अगर तब कभी किसी ने पूछा होता, तो उसका भी क़िस्सा होता ही ! अब आज ही देख लो रायसिना टीले से खोखलतंत्र की खाप पंचायत रोज़ ही कुछ न कुछ फरमान ज़ारी करती है और सैनिकों की टुकड़ियाँ, मंत्रियों के गिरोह जंगलों में भ्रमण को निकल पड़ते हैं। और अब अगर कुछ लोग इनके भ्रमण की वजह पूछते हैं, तो उनके क़िस्से भी आये दिन पत्र-पत्रिकाओं में छपते हैं और टी.वी. पर दिखाये और सुनाये जाते हैं। उन दिनों पत्र-पत्रिका नहीं थे, तो क़िस्से सुनाने की परंपरा तो थी ही। इसके अलावा ख़बरों को इधर-उधर करने में नारद की भूमिका महत्तवपूर्ण हुआ करती। आज ख़बरों को इधर-उधर पहुँचाने के साधन ख़ूब हो गये हैं, पर इस सबके बावजूद नारद की अपनी भूमिका है। नारद अपने ढँग का बिरला मीडियाकर्मी है। साम्राज्यवादी सत्ताएँ चाहे जितने लोगों का ख़ून चूसे और उनका जॉब ख़तरे में डाले पर नारद के जॉब को कभी कोई ख़तरा नहीं पहुँचाया जा सकता है। क्योंकि नारद….. सत्ता द्वारा फेंके जाने वाले टुकड़ों पर पलने वाला मीडियाकर्मी है। हाँ....तो भैय्या भोला भंडारी भ्रमण करते… करते… करते….करते…. थकान महसूस करने लगे। जब और कुछ दूर भ्रमण करने के बाद उन्हें एक थोड़ी ठीक-ठाक जगह नज़र आयी, तो सुस्ताने का मन हुआ। उन्होंने वहीं अपना त्रिशूल गाड़ा। नंदी को छोड़ा और गले में लिपटे साँप को भी चरने-चुगने को छोड़ा। फिर सबसे पहले एक चिलम भरी और कुछ ज़ोरदार कश लिये। इससे यह हुआ कि भोले बाबा का दिशा फ़ारिग़ होने का मन बन गया। उन्होंने इधर-उधर देखा, तो उन्हें कुछ दूरी पर एक नदी दिखी। बाबा ने ख़ुद कमंडल उठाया और नदी तरफ़ बढ़ लिये। दिशा-फ़ारिग़ से जब वे निर्वत हो गये। उन्हें नदी में से नहाकर निकलती हुई एक सुन्दरी नज़र आयी। कपड़ों के विकास की कहानी तो अपन सब जानते ही हैं, उन दिनों कहाँ था ऎसे कपड़े-लत्तों का चलन ! खुला खेल फरुखाबादी वाला हिसाब था, और अगर थोड़ा-बहुत लाज-लिहाज़ था, तो कमर में एक बेलड़ी बाँध उसमें आगे-पीछे दो चौड़े पत्ते लटका लेते थे। वही सुन्दरी ने भी किया था। जब भोले बाबा ने भी कसे माँस वाली क़ुदरती सुन्दरी के बदन पर पानी की बूँदे फिसलते देखी, तो क्या बतायें…. अपने दिल को फिसलने से रोकना, उन्हें सृष्टि का सबसे कठिन काम जान पड़ा… । भोले बाबा का दिल उछल कर सीधा सुन्दरी के क़दमों में छप्प…..। जैसे दिल भोले बाबा का नहीं.. आदिवासी क्षेत्र में सर्वे करने आये.. किसी एस.पी., कलेक्टर या फिर एन.जी.ओ. कर्मी का हो..। सुन्दरी एक क्षण को चौंकी कि यह कैसी मछली, उसके गुड़गी-गुड़गी तक पानी में डूबे क़दमों के पास छप्प-से आ गिरी। उसने ज़रा ग़ौर से देखा, फिर भी वह उस मछली को पहचान नहीं पाई, और उसे ज़ल्द ही यह समझ में आ गाया कि यह तो मछली ही नहीं है। यह कुछ और ही है। वह अपने सीने पर उभरी कच्चे गोदड़िया लिम्बू की-सी गोलाइयों को सिर के लम्बे-काले घने बालों से ढाँक इधर-उधर देखने लगी। तब उसे शेर की खाल लपेटे भोले बाबा नज़र आये, और नज़र आया उनकी गाँजे की तुरंग से हुई लाल आँखों में उमड़ता बसंत। क्या मस्त सिचुएशन है भिड़ू…. ! यह अपनी बम्बई के गीतकारों को नज़र आ जाती, तो जाने कितने बोरे भर गीत लिख मारते। कैमरा मैन जाने कितने एंगलों से शूट करता। फलाने लट्ठ टाइप के निर्देशकों की गंजियों से पसीने की धाराजी बह चलती। पर तब यह सब कहाँ था भई…. ? बाबा सुन्दरी के नज़दीक पहुँचे, और उन्होंने डर फ़िल्म के चाकलेटी छोरे की तरह कि… कि…. किरण नहीं कहा, बल्कि फटाक से कह डाला कि मामला दिल दाँ है। सुन्दरी भी आज की हीरोइन की माफिक बिंदास न थी कि सीधे डायलाग मारती कि मेरे घर चले या तुम्हारे…? इसलिए सुन्दरी ने थोड़ी बहुत ना-नकुर की। लेकिन फिर बाबा ने वहीं से एक टेसू का फूल तोड़ सुन्दरी के भाल पर मल दिया। और सुन्दरी मुस्करा दी.. ………….उसके भीतर भी कुछ-कुछ हुआ….. बस फिर क्या था… बाबा तो मँजे खिलाड़ी थे ही….हो गया खेल…। और फिर भोले बाबा ने वहीं आश्रम बनाया और धूनी रमाकर बैठ गये। उसी आश्रम में उनके दो छोरे हुए। एक गोरा और एक साँवला। छोरे धीरे-धीरे बड़े भी हुए। गोरा तो भोले बाबा और सुन्दरी की हाँ में हाँ मिलाने वाला निकला। लेकिन साँवला एक दम बाबा पर गया, केवल रंग और क़द-काठी से ही नहीं। ग़ुस्सेल भी भोले बाबा की तरह ही। एक बार उसे किसी बात पर बाबा के नंदी पर भयानक ग़ुस्सा आया। इतना कि अगर उस छेरे को भी बाबा की तरह तीसरी आँख होती, तो शायद खुल जाती। पर चूँकि तीसरी आँख थी नहीं, इसलिए खुली भी नहीं। साँवला छोरा तीर-धनुष चलाने में उस्ताद था, सो उसने उठाया अपना तीर-धनुष और नंदी के शरीर में एक छेद का इज़ाफ़ा कर दिया। यह देख….बाबा को भी ग़ुस्सा आया। और फिर बाबा तो.. बाबा ही ठहरे, और उनके ग़ुस्से के क़िस्से भी जग ज़ाहिर है। लेकिन उन्हें इतना ग़ुस्सा नहीं आया कि उनकी तीसरी आँख के खुलने की नौबत आती। उन्होंने इतना ही किया कि साँवले छोरे को अपने आश्रम से भगा दिया। इसीलिए शायद यह मान्यता भी है कि बंसी भील के पुरखों का पुरखा भोले बाबा का वही साँवला छोरा है। आज की पीढ़ी अपने को भोले बाबा का वशंज मानकर भले ही पोमाती हो.. पर अपना बंसी सोचता है- वह भोले बाबा नहीं… कोई ढोंगी साधु या फरारी काटने वाला रहा होगा.. जिसने सुन्दरी को गपलाया.. और उसी का वंश बढ़ते… बढ़ते… इतना बढ़ा। और शायद इसीलिए सी एम जी की पार्टी उनके क्षेत्रों में कभी हिन्दू संगम और शबरी मैला आयोजित करवाती है। कभी हनुमान की तस्वीर बाँटती है। कभी शिवलिंग की स्थापना करवाती है, और कभी शिवगंगा यात्रा निकालने पर ज़ोर देती है। भई… बंसी के पुरखों के बारे में एक बात और जान लो- तीर-धनुष चलाने में अर्जुन जैसों का नाम चाहे जितना रहा हो… लेकिन बंसी भील के पुरखों ने इस विद्या में अर्जुन जैसे कई उस्तादों के उस्तादों को पानी पिलाया है। भील का मतलब ही भेदनेवाला होता है …; और फिर एकलव्य की कहानी तो सभी ने सुनी-पढ़ी है। पक्षपात के कारण आज भी अच्छे-अच्छे विद्याधरों को उनका मान-सम्मान नहीं मिलता है। उनका हक़ नहीं मिलता है। धन्ना सेठों की औलादे मनचाही शोहरत के शिखरों पर चढ़ जाती हैं। उनके भांड और हरबोले उन्हीं के गीत गाते नज़र आते हैं। इतिहास के पोथी-पानड़ों को उलटो-पलटो तो बंसी भील के पुरखों के अनेक क़िस्से बिलखते मिलते हैं। सब तो नहीं, पर आगे बढ़ने से पहले कुछ तो सुनना ही पड़ेंगे ! जैसे इनका एक पुरखा कवि भी हुआ है- वालिया भील उर्फ वाल्मीकि । उस कवि ने एक जगह लिखा है- ‘मा निषाद ! प्रतिष्ठा त्वमगमः शाश्वतीः समाः।। / यतक्रौंचमिथुनादेकमवधीः कामौहितम् ।। यानी कि एक निषाद् (भील) के तीर ने कामातुर क्रौंच पक्षी को निपटाया। जैसे एक बार यशोदा माय और नंदलाल बा का छोरा किसन्या…. हाँ.. भई वही किसन्या.. जो दही बेचने वालियों की मटकी फोड़ देता… जो नदी में नहाती छोरियों के कपड़े लेकर पेड़ पर चढ़ जाता, और तब तक न देता… जब तक कि छोरियाँ उसकी हर बात न मान लेती। उसी किसन्या ने यादवों के साथ मिलकर गुजरात तरफ़ से बंसी भील के पुरखों पर हमला बोल दिया। तो भील ही के एक तीर ने किसन्या की छाती चीरकर, उसके जीव को पक्षी की तरह उड़ा दिया। और राम बनवास की टूटी-भागी कहानी तो अपन सब जानते ही हैं….. और भी बहुत कुछ…. पर यह शायद कम जानते हों कि बनवास वापसी के बाद…. जब राज्याभिषेक का मौक़ा आया… तो राम ने निषाद यानी भील को याद किया…. क्योंकि जंगल में राम की सेवा कह लो या मदद … निषाद ने की थी। सोचो- आज भला कोई रायसिना के टीले पर बनी इमारत में खोखलतंत्र की खाप पंचायत के सरपंच का पद भार ग्रहण करता है, तो किसी आदिवासी को याद कर बुलाता है…. ? अजी बुलाना तो छोड़ो… उस दौरान केसरा भील, अलीया भील, छीतू भील, भुवान तड़वी, बिरसा मुन्डा सरीका उनका कोई वंशज…. जो आज अपने हक़ अधिकार की बात करता हो….. उसे उधर से गुज़रने भी दिया जा सकता है….? हाँ.. ऎसे अवसरों पर भीलों को नचाना हो तो बात अलग है… बस, ट्रक या फिर ट्रेन में भेड़-बकरियों की तरह भरकर बुला लेंगे ! जैसे हमारे सी एम जी आदि …. बुलाते रहते हैं। अगर राम भी आदिवासियों के एहसान के तले दबा न होता… तो वह राम… ‘जो उस वक़्त के फलाने राम बापू और प. फलाने किशोर नागर जैसे ढोंगी साधु-संतों के बहकावे में आकर बापड़े शम्बूक के प्राण छीन लेता है।, क्या वह किसी भील को बुलाता.. ? भई …. अपनी कहानी का जो बंसी है न… यह चूँकि क़स्बाई और शहरी लोगों के संम्पर्क में ज़्यादा रहा, इसलिए कुछ अलग दिखता ही नहीं…. अलग सोचता भी है…। और उसे लगता है कि … नहीं… हरगिज़ नहीं बुलाता…। अपना बंसी समझता है कि सत्ताधीश किसी के सगे नहीं होते हैं। ज़रूरत पड़ने पर गधे को भी बाप कहते हैं। काम निकलने पर बाप के पोंद पर भी लात जमा देते हैं। वह कहता है--- स से होता सत्ता / स से होता साँप / दोनों का गुण एक- डसना। लेकिन भई.. वह कहते है न…. कि कुछ चीज़े ऎसी होती है कि आदमी कितना ही बदले पर उसके भीतर उसके पुरखों के जीन स्थानांतरीत होते रहते हैं। जीन ही नहीं… ये शुगर की इस रली बीमारी को ही देख लो। पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरीत होती रहती है कि नहीं ! तो ऎसी ही कुछ चीज़े हैं, जो भीलों में भी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आयी है। जैसे तीर-धनुष चलाने की निपुणता। बाँसुरी बजाने का लाजवाब ढँग। नाच-गाना। नशा… आदि….आदि… ऎसा ही कुछ बंसी में भी चला आया है। भई … आपको जानकर जैसा भी लगे.. पर सच है कि आज का बँसी भील को बाँसुरी और तीर-धनुष ठीक से पकड़ने भी नहीं आते हैं। पर हाँ… बँसी भील सीटी ग़ज़ब की बजाता है। पत्थर से अचूक निशाना साधता है और वीडियोग्राफ़ी तो अच्छी करता ही है। हो सकता है, बाँसुरी बजाने का गुण सीटी बजाने में …. और तीर-धनुष चलाने का गुण पत्थर चलाने में बदल गया हो ! और सतर्क नज़रों से वीडियोग्राफ़ी में भी दृश्य और बिम्ब अच्छे ही पकड़ता है। तो भई …. बंसी भील आम भीलों से थोड़ा अलग होने के बावजूद… उसकी नाक आम भीलों की ही तरह कुछ चौड़ी और ज़रा चपटी है। लेकिन आम भीलों की तुलना में बंसी भील का रंग कुछ उजला और क़द भी थोड़ा-सा ज़्यादा है, इस बात को लेकर लोग सत्रह तरह की बातें करते हैं, एक तो यही कि बंसी भील की माँ या उसके बाप कल्या भील या फिर उसके बाप मल्या भील की माँ का कनेक्शन किसी राजपूत से रहा है। यानी वह भील नहीं भिलाला है। भिलाला यानी जो भीलों और राजपूतों के मिश्रण से जन्मा हो ! कोई राजपूत औरत और भील पुरुष के संबंध से पैदा हुआ हो, ऎसा देखना तो दूर, किसी ने सुना भी नहीं। लेकिन राजपूत तो जंगल में किसी जानवर का शिकार करने निकलते और सामने जवान भीलनी पड़ जाती, तो पहले उसी का शिकार कर लेते। महादेव ने तो भीलनी से दो ही छोरे पैदा किये थे, पर राजपूतों ने तो भिलालों के फलिये के फलिये बसा दिये। कल्या भील ने बंसी का रंग देखकर ही उसके हाथ पर बंस्या भील गुदवा दिया था। बंसी भील है या भिलाला इससे अपन को क्या ? अपने लिए तो जैसे फलाने भावी पी एम जी वैसे बंसी भील। अपन को तो बंसी की कहानी कहनी है, इसलिए अपन बंसी की कहानी पर ही ध्यान लगायेंगे, जैसे डामोर भी कहता है- कि मछली की आँख पर ही ध्यान लगाओ। मछली कितनी लम्बी-चौड़ी और किस रंग की है, किस जाति और नस्ल की है, इन सब बातों से अपना क्या लेना-देना है ! तो भई … अपना ये बंसी… आज जैसा भी है… इसमें उस फुग्गे वापरने वाले पटेल का बड़ा योगदान है। क्योंकि उसी ने जब एक दिन छः-सात बरस के बंस्या को कल्या से तर्क करते देखा-सुना.. तो कल्या को सलाह दी थी कि बंस्या को स्कूल में भर्ती करा दे। कल्या जो कि झट से नवी बात को लपक लेने वाला था, उसे पटेल की बात जँच गयी और वह बंस्या को स्कूल में बैठालने ले गया। इत्त्फ़ाक से मास्टर भी भला ही मिला… उसने स्कूल के रजिस्टर में बंस्या का नाम बंसी लिख लिया। अपनी कहानी का बंसी तभी से बंसी है। जब बंसी दसवी-ग्यारहवी पढ़ गया तो वह प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी में आ गया था। यहाँ पहले तो वह एक फोटो स्टूडियो पर काम करता रहा। यहीं उसने स्टील फोटोग्राफ़ी का काम सीखा। फिर वीडियोग्राफ़ी भी सीखी। लेकिन वह जिस स्टूडियो पर काम कर रहा था, उसका मालिक़ कुछ जल्दी-जल्दी बूढ़ा हो रहा था। मालिक़ का छोरा फोटोग्राफ़ी का काम तो जानता था, लेकिन उसे वह ज़ारी नहीं रखना चाहता था। इसलिए जब छोरा दूसरे काम में बाहर निकल गया और मालिक़ ने बूढ़ापे के कारण काम बंद कर दिया, तो बंसी की फिर काम की तलाश शुरू हुई। यह उन्हीं दिनों की बात है, जब देशभर में टी.वी. चैनलों की अचानक बाढ़-सी आयी थी। बंसी ह्रदय प्रदेश के एक चैनल में चिपक गया। उन्हीं दिनों व्यावसायिक राजधानी के एक प्राइमरी स्कूल में एक निमाड़न फूलमती नयी-नयी मास्टरनी बनी, ‘ जो बंसी के किराये के कमरे के सामने ही, किराये के कमरे में रहती थी, उससे बंसी की नज़रे उलझी। उसी से फिर कोर्ट में शादी की, दो बच्चों का बाप बना। एक घर का मालिक़ बना। उधर माँ-बाप असमय ही निकल लिये थे, तो फिर उस क़स्बे में जहाँ बँसी के माँ-बाप रहते थे, बँसी का आना-जाना न के बराबर हो गया था। खैर.... अब बंसी बच्चा नहीं। पिछले-तीस बत्तीस सालों में बंसी की ज़िन्दगी काफी बदल गयी। यानी अपने आधे-अधूरे आज़ाद और इतने ही विकसित देश से महज तेईस बरस छोटा, या कह लो चालीस बरस की ज़िन्दगी का मालिक़ है। अब ह्रदय प्रदेश के एक टी.वी चैनल के लिए वीडियोग्राफ़ी करता है। आज सी एम जी की ‘आओ.. बनायें अपना ह्रदय प्रदेश…’ यात्रा को कवर करने आलीराजपुर के लिए निकला है। बस में चढ़ने से पहले बंसी ने एक-दो पत्रिकाएँ ख़रीद ली हैं। बस में चढ़ा तो खिड़की की बाजू की सीट मिल गयी। उसके बैठते ही बस चल पड़ी, तो उसने ख़ुद ही से कहा- अरे वाह.. बस मेरे ही इंतज़ार में खड़ी थी शायद….! बंसी ने अपने पैरों की सैंडिलें उतारी… थोड़ा इत्मीनान से हुआ और पढ़ने लगा। व्यावसायिक राजधानी से राजा भोज की नगरी के बीच कुछ स्टोरियाँ, ‘साहित्यिक कहानियाँ नहीं, वो … स्टोरियाँ छपती है न.. क्या बोलते हैं उनको … बढ़ेगा किसानों का संकट, मैं कोई त्योतिष नहीं जो बता दूँ कि महँगाई कब कम होगी। अमर कथा का अंत, फलाने के नहीं रहने से एक युग का अंत। ढिमका के चले जाने से पार्टी का ढर्रा बिगड़ा। फलाने के आने से फलाना पार्टी छोड़ देगा, फलानों की कोई शर्त नहीं सुनी जायेगी। पार्टी ने कॉमरेड फलाने के ख़िलाफ़ अनुशासनत्मक कार्यवाही की। अनुशासनत्मक कार्यवाही के बाद कॉमरेड फलाने ने आत्महत्या की। अपने विचार और सिद्धांत से पार्टी के भटकने पर…. एक और कॉमरेड फलाने ने अस्सी बरस की उम्र में आत्महत्या की। फलाने छात्र को पुलिस ने शंका के आधार पर गोली मारी। आॉपरेशन ग्रीन हंट ज़ारी रहेगा। इस टाइप के शीर्षकों वाली स्टोरियाँ पढ़ता रहा। पढ़ता तो है वह साहित्यिक रचनाएँ भी ख़ूब, पर उन्हें सफ़र में नहीं, घर में रहता है तब। राजा भोज की नगरी से आगे एक क़स्बे तक का रास्ता- ‘मीठे आलस्य की चटनी के साथ’ झपकी ने कब चट कर लिया, बंसी को पता ही नहीं चला। जब बंसी की आँखें खुली। उसने कन्डक्टर की आवाज़ सुनी- चलो यहाँ वाले उतरो। बंसी को पिछले दिनों इस क़स्बे से ख़ूब फेमस हुआ गीत याद आ गया- अमु काका बाबा ना पोर्या रे, कोंडळ्यो खेला डूँ / अमु कुक्षी हाट जावाँ रे, कोंडळ्यो खेला डूँ। इस गीत में जो मस्ती है, वह बाहर इस क़स्बे में नज़रों की सीमा तक नज़र नहीं आ रही, और बंसी की नज़रों में अट रहे हैं। क़स्बे की सड़क के दोनों बाजू जगह-जगह बिजली के खम्बों पर, मकानों पर यशोदा के छोरे किसन्या के लगे पोस्टर, बेनर फ्लैक्स। पोस्टर पर पं.फलाना किशोर नागर भी जमे बैठे हैं, जो पिछले उन्नीस-बीस बरसों से भागवत, रामायण जैसी किताबों को बाँच-बाँच कर संत की छवि बना चुके है। अपनी अंटी में माल भी काफ़ी जमा कर चुके है। अख़बारों में आये दिन नागरजी के प्रवचनों के अंश छपते हैं, उन्हें पढ़कर और कभी उनके प्रवचन का फुटेज लेने गाया, तो जो सुना उससे ही बंसी ने जाना कि पं फलाने नागर ग्यान को सदैव पर्दे में रखने की सलाह देते है। उनका मानना है कि ग्यान जग ज़ाहिर होने से महत्त्वहीन हो जाता है। नागरजी अपनी सभा में युवा पीढ़ी को आह्वान कर कहते है- संसार बिगड़ चुका है। तुम सदमार्ग पर चलकर ख़ुद को और संस्कृति को बिगड़ने से बचाओ। बंसी को शंका हुई कि वह किसी क़स्बे में ही है ! उसे तो ऎसा लग रहा है, जैसे वह किसी अलानी-फलानी धार्मिक नगरी में आ पहुँचा है। बंसी सोचता है- एक तरफ़ सी एम जी ‘आओ, बनायें अपना ह्रदय प्रदेश…’ यात्रा निकाल रहे हैं। दूसरी तरफ़ ह्रदय प्रदेश में सैकड़ों जगहों पर पं. फलाना किशोर नागर, फलाना राम बापू, फलाने ठाकुर जी, फलानी चमकेश्वरी देवी आदि जैसे ढोंगी, लोगों का मग़ज़ बदलने में लगे हैं। बंसी गोसेन के हाइकु बुदबुदाता है- घणा चढ़ाव• / भगवान क• फूल / मन मैं• काटा। फिर जैसे चेताता है- मच्छी नी छोड़• / बगलो भगत छे / दूर रयजो गोसेन बंसी का स्कूल के दिनों का दोस्त है। अभी बंसी जहाँ है, वहाँ से कुछ ही किलो मीटर दूर उसी क़स्बे में रहता है, जहाँ बँसी पढ़ा करता था। मास्टर है और निमाड़ी बोली में हाइकु लिखता है। बंसी को गोसेन के कई हाइकु याद हैं और इसी तरह मौक़े के मुताबिक याद आ जाते हैं, तो बुदबुदा भी लेता है। वह कई बार हाइकु की ही तरह अपने भीतर रिसते विचार भी आड़ी-तिरछी लाइन में बुदबुदा लेता है। बंसी को हाइकु का व्याकरणिक कोई नियम-क़ायदा मालूम नहीं है। लेकिन गोसेन अक़्सर बँसी को हाइकु के बारे में समझाने की कोशिश करता। पर बंसी कभी शब्द और मात्रा के बंधन में न बंधा। कहने का मतलब यह कि बंसी केवल अपने ज़ेहन में आयी बात कहना चाहता है। बात जैसे भी आड़े-टेड़े अंदाज़ में आयी- वैसे ही कहना चाहता है। वह मानता है कि बात का अर्थ महत्त्पूर्ण है, कहने का ढंग किसी का ज़्यादा या कम अच्छा हो सकता है। बहस का विषय बात कहने का ढंग नहीं, बात से निकलने वाला मर्म होना चाहिए। जो जैसा भी कहा जाए.. वह वैसा ही समझ में आ जाए। बंसी और गोसेन में अनेक बातों पर तर्कों के बाण घन्टो चला करते। कभी क़स्बे से थोड़ी दूर बहती नदी पर चले जाते, पूरा दिन ऎसी ही मग़ज़पच्ची में उजाड़ देते। उन्हीं दिनों गोसेन की संगती में ही उसे कोर्स के अलावा भी बहुत कुछ पढ़ने का चस्का लगा, जो सदा बढ़ता रहा। गोसेन से ख़त, फ़ोन के मार्फत दोस्ती का तार जुड़ा रहा। गोसेन का जब भी व्यावसायिक राजधानी आना होता, दोनों मिलते भी। गोसेन की याद आने पर, बंसी के भीतर जैसे नदी उफान पर आ गयी। लेकिन फिर नदी पर बने बाँध और बाँध के पानी में डूबे सत्रह-अट्ठारह गाँवों की याद रिस आयी। उनको ज़बरन विस्थापित किये जाने वाले दृश्य मग़ज़ की स्क्रीन पर चलने लगे। उनका हाहाकार कानों में गूँजने लगा। और बंसी की आँखों के कोटर डबडबा गये। उसने उधर से ध्यान हटाते हुए ख़ुद से कहा- उधर से अगर इधर ही से लौटना हुआ, और सब कुछ ठीक रहा, तो गोसेन से मिलता चलूँगा। बंसी को अपनी बीवी और गोसेन की नौकरी अच्छी लगती है- टाइम-टेबल से पढ़ाया और घर। और कुछ नहीं तो बच्चों को मन माफिक पढ़ा तो सकता है। इसमें तो बंसी को चैनल के मुताबिक़ सब कुछ बनाकर देना होता। वह जो शूट करता है। उसके मन में जो बिंब बनते हैं। वह कभी व्यक्तिगत रूप से कहीं इस्तेमाल कर सका, तो करेगा। बाक़ी चैनल तो अपने मन माफिक स्टोरी चाहते हैं। लेकिन कभी-कभी बंसी अपनी बीवी और गोसेन के बारे में यह भी सोचता है- यह भी कौन-से अपने मन माफिक पढ़ाते हैं… जो पिंजरा मैकाले ने बना दिया है…. उसी में चक्कर काटते हैं…जो सिलेबस शिक्षा माफिया ने थोप दिया है… उसी का रट्टा लगवाते हैं…। बंसी खिड़की की बाजू वाली सीट पर बैठा ही इसलिए था कि वह बाहर के नज़ारे को भीतर समेटता रहे। वह जब यात्रा करता है, तो उसका यह एक ख़ास मक़सद होता है। मक़सद पर अमल भी करता है। वह केवल कैमरे से ही वीडियोग्राफ़ी नहीं करता, बल्कि जैसे कैमरा ख़ामोशी से अपने भीतर, बाहर का शोर-ग़ुल समेटता रहता है, वैसे ही बंसी भी नज़रों से बाहर का नज़ारा अपने भीतर समेटता रहता। बस के आगे कुछ दूरी पर सड़क के आधे हिस्से को बनाया जा रहा है। एक भीलनी रोलर पर मग से पानी डाल रही है ताकि रोलर पर डामर चिपके नहीं। एक दूसरी भीलनी बन रही सड़क पर एक छेददार डिब्बे से पिघला डामर छिड़क रही है। बंसी को दोनों भीलनी मंगली ही लग रही हैं। वही पड़ोसन मंगली.. जिसके भाल पर भगोरिया हाट में सोमला ने वैसे ही गुलाल मला था, जैसे कभी भेले बाबा ने सुन्दरी के भाल पर टेसु का फूल। सोमला भील बंसी भील से साल-दो साल बढ़ा था। दोनों में उम्र के अलावा एक और फर्क़ था और वह यह कि बंसी स्कूल जाता और सोमला नहीं जाता। लेकिन भगोरिया हाट में बंसी सोमला के साथ गया था। उस दिन सोमला ने बालों में तेल लगाया था, कंघी की थी। चड्डी के ऊपर टेसु के फूल वाली बुशर्ट पहनी थी। आँखों में सुरमा रचाया था। सोमला ने बाँसुरी को भी लाड़ी की तरह सजाया था। सोमला ने बाँसुरी के उस छोर पर, ‘जो मुँह से दूर रहता है, केसरिया और गुलाबी रंग के रिबन के फूल बाँधे थे। केसरिया और गुलाबी रिबन मंगली अपनी चोटी में बाँधा करती, और वैसे ही फूल बनाती जैसे बंसी ने बनाकर बाँसुरी पर बाँधे थे। गाँव के बाहर रास्ते पर ऎसे किशोर और जवान छोरे-छोरियों के टुल्लर के टुल्लर बन गये थे- सोमला भील ने अपने होटों पर ऊँगली को ऊपर-नीचे घिसटते हुए कुर्रर्रर्र….कुर्रर्र…. कुर्राटी भरी…. किसी ने गीत छेड़ दिया- आयो रे भाया ! भंगर्यो आयो। तेवार्यो गुलाल्यो भंगर्यो आयो। आया रे भइया ! भगोरिया आया / त्यौहार गुलाल का आया। बारा मोहीनां मां भंगर्यो आयो, लाड़ी हेरने चाटको लायो । बारह महीना बाद भगोरिया आया / लाड़ी (दुल्हन) चुनने का मौक़ा लाया। बंसी जब भी किसी जवान होते भील और भीलनी को देखता, उसे सोमला और मंगली की सिर्फ़ याद ही न आती, बल्कि सभी भील और भीलनी सोमला और मंगली ही लगते। सोमला और मंगली ने किशोर उम्र में ही भगोरिया हाट में एक-दूसरे के भाल पर गुलाल मल दिया था। सोमला और मंगली के एक-दूसरे को जीवन साथी चुनने पर किसी ने कोई एतराज नहीं किया। न जाति के अहम ने सिर उठाया.. न गोत्र ने चूँ-चपड़ की.., बल्कि बंसी के काका डल्या और मंगली का बाप ने तो पटेल से उधार पैसा लेकर बकरा और महुआ स्कॉच की पार्टी भी की थी। बस उन्हें ये लगता था कि अभी उम्र नहीं थी। थोड़े और बड़े हो जाते तब करते, तो ठीक रहता। बंसी अपने काका और मंगली के बाप की बात सुन मुस्कराकर रह जाता। उसे ज़ल्दी की वजह सोमला ने बता रखी थी। बात दरअसल यह थी कि किशोर तो वे हो ही चुके थे। मंगली सोमला से दो-चार साल छोटी थी, पर उसके दुबले-पतले बदन में जैसे हवा घुस गयी थी। साँवली चमड़ी पर कहीं कोई सल न था और चमड़ी चिकनी-चिकनी दिखती थी। वह खेत पर काम करती या सोमला, बंसी के साथ खेलती तो सीने पर दो नारंगी गटर-गटर हिलती। सोमला को गटर-गटर हिलती नारंगी ख़ूब लुभाती। वह उन्हें छूने को ललचाता। जब वह ललचाता तो उसे पटेल की याद आती। फुग्गा याद आता। बंसी को कही अपनी माँ राळी की बात याद आती कि ये फुग्गा यूँ खेलने का नहीं है। वह फुग्गा किस खेल में काम आता है, सोमला समझ गया था। इसलिए उसे डर था कि पटेल फुग्गे का उपयोग मंगली के साथ न कर ले। जब भी साँझ को वे कुछ खेलने की बात करते। सोमला झट से कह देता-छिपा छई। छिपा छई में ढूँढ़ने का दाम ज़्यादातर बंसी पर रहता। मंगली और सोमला खेत में खड़ी फ़सल में जा छुपते। बंसी बड़ी मुश्किल से ढूँढ पाता। लेकिन जब दाम सोमला पर होता, तो मंगली अपनी झोपड़ी के पीछे ही छुपती। वह सोमला को ईशारे से यह भी बता देती कि बंसी किधर छुपा है। फिर भी वह सोमला को न दिखती। उस पर दाम न चढ़ता। सोमला फ़सल में छुपे बंसी को खोज निकालता और उस पर दाम चढ़ा देता। जब हमेशा ही बंसी पर दाम चढ़ता। मंगली पर कभी दाम नहीं चढ़ता। मंगली फ़सल में बंसी के साथ छुपती भी नहीं। बंसी ने एक दिन सोमला से पूछा। सोमला ने पहले इधर-उधर की बात की, पर जैसे कि बंसी की तर्क करने की आदत थी। सोमला ज़्यादा देर इधर-उधर की बात न कर सका और उसने पूरी कहानी बता दी। तब फिर उन्होंने तय किया था कि इस बरस भगोरिया में अपने प्रेम का इज़हार सबके सामने कर देना है। कहानी जानने के बाद तो बंसी आदतन अपने ही पर दाम रखता। सोमला और मंगली की याद से बंसी को याद आयी व्यावसायिक राजधानी के एक आयोजन में अपने चैनल के लिए फुटेज लेते वक़्त सुनी संदीप श्रोत्रिय की कविता- यह वही आबनूसी मंगली है / जो कुछ साल पहले / भगोरिया हाट में / सोमला के माथे पर / गुलाल लगाकर भाग गयी थी। मंगली अब अच्छी तरह जान रही है / डामर कब पिघलती है ! / इंजन कैसे ठंडा होता है ! / सड़क कैसे बनती है ! आटा,दाल और लूण क्या भाव है ! तो भई… बंसी की नज़रे जैसे ही बस में लौटी.. रुकी बस फिर चल पड़ी। बस में अब काफी सवारियाँ भरी हैं। सवारियों से ज़्यादा शोर-ग़ुल भरा है। बस के भीतर बैठे बंसी की नज़रें बस के बाहर से और कई बार बस के आगे से बहुत कुछ समेट रही हैं। ज़्यादातर खेतों में पतले, नुकीले काँटे और पीले फूलों वाला धतूरा हवा को चुभता-सा खड़ा है। सी..सी.. कर दौड़ती है भीलनी हवा। बीच-बीच में इक्का-दुक्का खेत.. जहाँ सिंचाई के साधन है.. वहाँ खरीब और रबी की फ़सलें- गेंहूँ,चना और मक्का एक ही मौसम में खड़ी है। भीलनी हवा उन फ़सलों के गले लगती। कुछ खुसुर-फुसर या सलाह-मशवरा करती। बर्राटी भर दौड़ती गहरे महुओं के झूँड और लम्बे-लम्बे ताड़ के पेड़ों की ओर। प्रसिद्ध भगोरिया उत्सव अभी आठ-दस दिन दूर है। पर भीलनी हवा तो मानो अभी से पलाश पर केसरिया और महुओं पर पीला रंग उड़ाती दौड़ रही है। ताड़ की गरदन में लटकी है, गारे की एक मटकी। मटकी के ख़ालीपन को ताड़ की गरदन से बूँद-बूँद चू कर भरती ताड़ी। भीलनी हवा चढ़ जाती ताड़ पर। मटकी में से घूँट दो घूँट ताड़ी पीती। कुर्राटी मारती बढ़ जाती आगे। टेसुओं और महुओं के लूम के लूम को चुमती और गुदगुदाती। बंसी की आँखें समेट रही है वह सब, जो इतनी तेज़ी से उसका कैमरा भी नहीं समेटता। बस दौड़ रही सामने से दौड़ती आती हवा के भीतर। भीलनी हवा ने पीले और सुनहरी रंग के घोल में रंगी एक लुगड़ी ओढ़ी है। भीलनी हवा की लुगड़ी लहरा रही, धरती से नज़रों के छोर तक। जब थोड़ी भीलनी हवा बंसी की साँस से भीतर उतर गयी, बंसी के भीतर खड़े एक ख़्याल ने पूछा सवाल- ज़्यादातर खेतों में फ़सल की जगह अकड़ू भुट्टे की तरह क्यूँ खड़ा है, पीले-पीले फूलों से लदा धतूरा ? सवाल ने मानो भीलनी हवा के मग़ज़ में छेद कर दिया। भीलनी हवा लड़खड़ायी, मानो फँस गयी हो भुतालिया (चक्रवात) में। और निकल गयी उसकी सारी हवा- फुस्स….। क्षण भर को तो भीलनी हवा गूँगी हो गयी। लेकिन फिर बंसी की तरफ़ कातर नज़रों से देखा। बंसी की आँखों में उसकी कातर नज़र अटक गयी। मग़ज़ के भीतर भीलनी हवा की साँस तेज़ी से चलने लगी। बरेल बोली में जो उसने कहा, वह बंसी ने समझा कि यह सी एम जी से पूछो, जिसकी यात्रा कवर करने जा रहे हो। जो प्रदेश को सोने का बनाने पर तुले हैं….फिर जैसे भन्नाकर मंगली की तरह नज़रो के सामने खड़ी हो गयी। उसके साँवले चेहरे पर विश्व बैंक और स्विस बैंक में जमा घृणा से कई गुना ज़्यादा घृणा उभर आयी। फिर पिछले उन्नीस–बीस बरसों में फिरे मौसम के मिजाज के भाल पर थूक वह चढ़ गयी ताड़ पर। ताड़ के रस से भरी, ताड़ की गरदन में लटकी, काली मटकी को उठायी और एक साँस में गटक ली पूरी की पूरी.. और गाने लगी- ताड़ी को मत बनाना रे सोने की…. सोने की बनी तो पी न सकूँगी रे… पी न सकी तो जी न सकूँगी रे… ताड़ी को मत बनाना रे सोने की…। गाते-गाते मंगली.. .. नहीं…नहीं… भीलनी हवा नज़रों से ओझल हो गयी। धरती के माथे से पीली-सुनहरी धोती खिसल गयी। या फिर धरती ने करवट ले ली। मानो कम उम्र में ही सोमला की पींडलियों की नीली-नीली नसों में पड़े बल की तरह कालीकट सड़क भी खा गयी बल। बल खायी नसों में रेंगते ख़ून की तरह रेंगती बस। आगे पसरे अँधेरे में फैलाती क्रत्रिम रोशनी। रास्ते में पड़ते हाट-बाज़ार से सौदा लेकर बस में चढ़ी सवारियाँ दाल, शकर जैसी और कई रोज़मर्रा की चीज़ों के ज़िन्दगी की पहुँच से दूर होने के सुना रही एक-दूसरी को क़िस्से। जब बस ज़िला आलीराजपुर के बस अड्डे पहुँची। बंसी ने अपने मोबाइल की घड़ी में समय देखा। भीतर ही भीतर ख़ुद से बोला- चार आना रात ख़र्च हो गयी, लेकिन बारह आना अभी बची है। बची रात को काटने के लिए कहीं ठिकाना ढूँढना पढ़ेगा। यहाँ तो अभी से घुपा-घूप हो गया और सड़के ऊँघने लगीं। व्यावसायिक राजधानी में तो इस वक़्त चकाचक और भूरी सड़क पर सज-धज कर चटोरी रात, किसी मालदार कंपनी की लोक कल्याण कारी योजना से फँड लेकर समाज सेवा करने वाले एन.जी.ओ. कर्मी की तरह मज़े मार रही होगी। बंसी ने ख़ुद से कहा- एन.जी. ओ. कर्मी / यौन कर्मी / जुमले दो अर्थ पर्याय । वह बस अड्डे से बाहर निकला। हवा… अपने हाथ में ठन्डी छूरी आने से इतरा रही है। उसे एक आकृति दिखी। थोड़ा नज़दीक आने पर आकृति आदमी जैसी दिखी। फिर कुछ-कुछ आदमी जैसा लगभग आदमी ही दिखा। अब इतना पास आ चुका कि बंसी को उसके सिर पर बँधा फेंटा और गले में लॉकेट की तरह पहनी गोफन भी दिखने लगे। उसने बदन के ऊपरी हिस्से पर तो बुशर्ट पहनी है। लेकिन नीचे क्या पहना है, चड्डी या फिर लंगोट ! बंसी को समझ नहीं आया। क्योंकि बुशर्ट थोड़ी नीचे तक झूल रही है। उसके नीचे कुछ पहना है या नहीं, मालूम नहीं हो रहा है। बंसी ने ख़ुद से कहा- ख़ैर.. जो पहना होगा, वो पहना होगा, अपन को तो ठहरने के ठिकाने के बारे में पूछना है। वरना रात के साथ बतियाते हुए सुबह का इंतज़ार करना बोरियत भरा होगा। रात को ओढ़कर सोना तो और भी रिश्की ! बंसी ने उससे पूछा। लेकिन वह कुछ नहीं बता सका। वह आलीराजपुर का नहीं, पड़ोस के किसी गाँव का था। बंसी की उससे बात ख़त्म हुई ही कि उसी की वेशभूषा में एक और आदमी जैसा, बल्कि लगभग आदमी, अँधेरे में से उपक आया। लेकिन यह भी बंसी की कुछ मदद नहीं कर सका। बंसी वापस बस अड्डे के भीतर आया। चाय की गुमटी वाले की गरदन , अपनी नारियल समान खोपड़ी को मुश्किल से संभाल पा रही थी, वह ऊँघ के मारे इधर-उधर लुढ़क जाती। बंसी ने उसे बस देखा.. उससे कुछ पूछा नहीं और यह सोचता बाहर निकल गया कि किसी और से पता कर लूँगा, इसकी नींद में खलल न करूँ … । लेकिन बाहर कोई नहीं मिला तो फिर उसी के पास आ पहुँचा। उसकी आँखों पर जमी ऊँघ की परत को बंसी ने उसके कंधे झिंझोड़ कर कुछ क्षण के लिए दूर हटाया और रात काटने के ठिकाने के बारे में पूछा। उसने आँखें खोले बग़ैर बंसी को फलाँ पैलेस नाम की एक जगह बतायी, जो वहाँ से नज़दीक ही है। वहीं जाकर बंसी ने बची हुई बारह आना रात को नींद में ख़र्च की। और यूँ ख़र्च की कि नींद बाक़ी रही.. रात खुट गयी। बंसी सुबह के कामों से फ़ारिग़ होकर आलीराजपुर ज़िले के एक गाँव फकतला पहुँचा। यहाँ हेलीपैड बनाया गया है। सी एम जी का हेलीकाप्टर यहीं उतरेगा। यहीं से पूरे ज़िले की गम्मत यात्रा अर्थात ह्रदय प्रदेश बनाओ यात्रा शुरू होनी है। बहुत बड़ा शामियाना ताना गया है। मंच बनाया गया है। मीडिया कर्मियों, नेताओं और जनपद सदस्य, स्वयं सहायता समूह, पंच, सरपंचों को बैठने के लिए मंच से नीचे अगल-बग़ल कुर्सियाँ लगी हैं। मंच के सामने शामियाने में आम लोगों को बैठने के लिए भी कुछ दरियाँ बिछायी गयी हैं। धीरे-धीरे लोग जमा हो रहे हैं। पुलिस वाले और सी एम जी की पार्टी के कार्यकर्ता व्यवस्था जमाने में लगे हैं। आम लोगों को शामियाने में जाने का रास्ता और ख़ास लोगों के जाने का रास्ता अलग-अलग है। रह-रह कर लोग आसमान में उस तरफ़ देखते हैं, जिस तरफ़ सूरज है। उधर से ही पधारेंगे सी एम जी। सुबह की साढ़े ग्यारह बज गयी है। सुबह सात बजे से इंतजाम ड्यूटी में लगे पुलिस वाले उकता गये हैं। वे कुढ़कुढ़ाते हुए बात ही बात में सी एम जी को ग़ालियाँ बक रहे हैं। इंतजाम ड्यूटी में आसपास के ज़िलो का पुलिस बल भी यहाँ बुलाया गया है। यहाँ चाय-पानी का कोई बंदोबस्त नहीं है। आसपास दूर-दूर तक उजाड़ बइड़ियाँ (पहाड़ियाँ) हैं। खेत हैं। खेतों में कुएँ, ट्यूवेल या पानी का कोई साधन नहीं है। सब दूर पीले-पीले फूलों वाला धतूरा ही खड़ा अट्टहास कर रहा है। आदिवासियों को बाँटे गये पर्चों में सी एम जी के इस दावे ‘ज़िले में हज़ारों कुएँ ‘कपिल धारा’ योजना के अन्तर्गत खुदवायें हैं, की धोती खोल रहा है। कुछ कर्मचारी जो अपने साथ बोतल में पानी भर कर लाये थे, उनका पानी ख़त्म हो गया है। जहाँ लोगों की गाड़ियाँ खड़ी करवायी जा रही हैं।, वहाँ एक बइड़े पर एक आदिवासी औरत और उसकी दो नन्ही छोरियाँ छोटी-सी दुकान लगाये बैठी हैं। दुकान पर बीड़ी, सिगरेट, ज़र्दा पाउच, भुगड़े और बिस्कुट हैं। थोड़ी देर बाद पानी का एक टैंकर लाया गया। लोग उस पर टूट पड़े। जिनके पास बोतल है, बोतल में पानी भर रहे हैं, जो रिते हाथ हैं, वे हथेलियों की पौस से पानी पी रहे हैं। बंसी ने बुदबुदाया- बूझ गयी / होठों की प्यास / मन खाली कटोरा। बंसी घूम-फिरकर पूरे कार्यक्रम स्थल का जायज़ा ले रहा है। शामियाना की बग़ल में एक छोटा शामियाना भी ताना है, जिसमें आदिवासियों के चित्रों की प्रदर्शनी लगायी गयी है। जाने कहाँ से मक्का और काँदे के पौधे उखाड़कर लाये और वहाँ मिट्टी में रोपे हैं। किसी ने जाम फल की टोकरी भरकर रखी है। आदिवासियों के पहनने के गहने, वस्त्र, चित्रकारी के नमूने और बाँसुरी रखी है। एक टोकने में तीन-चार कड़कनाथ मुर्गों के पाँव बँधे हुए देख बंसी ने ख़ुद से कहा- आज़ाद देश का / मुर्गा तक बंधक / कैसी गम्मत। हालाँकि अब इस क्षेत्र में पहले की तुलना में कड़कनाथ का टोटा पड़ गया है। सहज ही नहीं मिलते हैं। खोज-बीन कर लाना पड़ते हैं। क्योंकि सत्ता के चापलूस समय-समय पर प्रचार करते रहते हैं कि यह मुर्गा खाने से आदमी का पौरुषत्व बढ़ जाता है। कहते हैं कि उम्र के चौथे पड़ाव पर खड़े नेता भी कई युवतियों की जवानी के उफान को शांत करने की कूबत हासिल कर सकते हैं। कड़कनाथ के गोश्त के आगे थ्री नाट थ्री, पॉवर प्लस और वियाग्रा जैसी दवाइयाँ धूल हैं। राजधानी में मंत्रियों के बंगलों में कड़कनाथ इसी क्षेत्र से जाते हैं। यह बरसों से चली आ रही परंपरा है। आजकल के अफ़सर, नेता और मंत्री तो उस परंपरा को ज़िन्दा रखे हुए है… बस । बंसी के मग़ज़ के जल में बूँद की तरह कुछ शब्द टपके- परंपरा ज़िन्दी / ज़िन्दगी क• खतरो। बड़ी आफत। छोटे और बड़े शामियानों के बीच आठ-दस ट्रॉयसिकल खड़ी हैं। उन पर वे छोरे-छोरी भी बैठे हैं, जिन्हें सी एम जी के हाथों वे तीन पहिया की साइकिलें सौंपी जानी हैं। चूँकि वे दोनों शामियाने के बीच हैं, और अब सूरज एक दम सिर पर है, तो उनके बालों के भीतर से पसीने की रेले निकल कर गालों पर आ रही हैं। वे रह-रह कर उधर देख रहे हैं, जिधर से सी एम जी का हेलीकाप्टर आने वाला है। बंसी सब कुछ को अपने कैमरे में और मग़ज़ में समेट रहा है। उसका काम ही समेटना है। बंसी के होंठों से व्यवस्था का उपहास करती मुस्कान के साथ झरा- ज़िन्दगी का दाणा ग़ज़ब / समेटाय कम / बिखरे ज़्यादा। बंसी हेलीपैड के पास जाता है। हेलीपैड के आसपास बाँस बाँधे हुए हैं। बाँस के बाहर आसपास छोटे-बड़े आदिवासी खड़े हैं। बाँस के घेरे के भीतर हेलीकाप्टर के उतरने वाले स्थान को छोड़, बाहरी स्थान पर टैंकर से पानी का छिड़काव किया जा रहा है, ताकि जब हेलीकाप्टर उतरे तो धूल कम उड़े। घेरे के भीतर जिनकी ड्यूटी लगी, वे पुलिस वाले रह-रह कर घेरे के बाहर खड़े लोगों को बाँस के बेरिकेड्स से दूर होने का और बाँस को न छूने का कह रहे हैं। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी दूसरे अधिकारियों से वायरलेस के ज़रिए सी एम जी का लोकेशन मालूम कर रहे हैं। आदिवासियों की भीड़ में बंसी को जैसे सोमला भील नज़र आया। सड़क बनाने वाली मंगली। बंसी ने सोमला भील से पूछा- कौन आ रहा है यहाँ….? -ऎं… सोमला भील ने ऎसे कहा जैसे वह क्या पूछ रहा है, उसे समझ में नहीं आया। बंसी ने भी यही समझा। उसने फिर पूछा- किके देखने आवेला हो। याँ कूण आवीला…..। सोमला भील ने अपनी बोली में जो कहा उसका मतलब है कि- मुझे नहीं मालूम कौन आ रहा है, मैं तो यहाँ उड़न खटोला देखने आया हूँ। बंसी ने और कई सोमलाओं से पूछा और ज़्यादातर ने उड़न खटोला देखने आने का ही बताया। बंसी एक किशोर सोमला की ओर कुछ पूछने के लिहाज़ से बढ़ा। बंसी कुछ पूछता उससे पहले ही उस किशोर सोमला ने ऊँची और नंगी पहाड़ी की ओर ऊँगली का इशारा करते हुए ज़ोर से कहा- उ आवी री यो रे…. सोमलाओं की पूरी भीड़ उधर देखने लगी। सभी मीडिया कर्मियों के कैमरों के मुँह हेलीकाप्टर की तरफ़ हो गये। हज़ारों आँखों में एक साथ एक ही हेलीकाप्टर उड़ रहा है। बंसी चाहता है आँखों में उड़ते हेलीकाप्टर को शूट करना, लेकिन करता है, हेलीपैड के ऊपर, हवा में उड़ते हुए, नीचे उतरने का जायज़ा लेता हेलीकाप्टर। फिर उतरता हुआ, और उतरा हुआ भी। जब हेलीकाप्टर के पंखों का चक्कर खाना बंद हुआ। तब पहले पॉयलेट उतरा। फिर पॉयलेट ने सी एम जी की तरफ़ का फाटक खोला। सी एम जी भीतर ही से हाथ जोड़े बाहर निकले। पीछे सी एम जी की लाड़ी भी उतरी। लाड़ी की साड़ी का पल्लू माथे पर और क़दम अपने लाड़े के पीछे-पीछे। एक दम सीता जैसी भली दिखती। बंसी ने ख़ुद से कहा- बापड़ी कितनी भली दिखती है, चुनाव के दौरान डंपर घोटाला उजागर कर दूसरी पार्टी वालों ने कैसा नाम उछाला था ! और सी एम जी को सफ़ाई में क्या-क्या न कहना पड़ा था ! डंपर घोटाले की अभी जाँच चल रही है। सी एम जी को भरोसा है कि वे सब कुछ मैनेज कर लेंगे, उन्होंने मैनेजमैन्ट के गुर आर एस एस की शाखाओं में सीखे हैं…. और देखना एक दिन …जाँच में दूध का दूध और पानी का पानी साबित करवा देंगे। बंसी ने ख़ुद से कहा- न्याय काली भैंस / जिका हाथ में डांग / उका साथ जाय। क़रीब एक घन्टे देरी से पधारे सी एम जी बेरिकेड्स के भीतर घूमते हुए, बेरिकेड्स के बाहर खड़े ग्रामीणों, विद्यार्थियों से हाथ मिला-मिलाकर उनकी समस्याएँ पूछने लगे। सी एम जी ने एक छात्र सोमला से पूछा- स्कूल में समय पर भोजन मिलता है कि नहीं ? छात्र ने जवाब दिया- रोटी मिलती है सब्ज़ी नहीं ! लेकिन सी एम जी आगे बढ़ गये। सोमला छात्र का जवाब सी एम जी को घेरे चापलूसों और अंगरक्षकों में से जाने किसकी कठोर पीठ से टकराकर पीछे औंधे मुँह गिर पड़ा। बंसी ने छात्र के चेहरे पर अपने सवाल के गिर पड़ने का दुख बाँचा। सी एम जी ने एक किसान सोमला से पूछा- कपिल धारा के अन्तर्गत कुआ खुदवाने को रुपया मिला कि नहीं ? किसान सोमला पढ़ा-लिखा न होने के कारण फर्राट हिन्दी को फटाक से न समझ पाया, थोड़ा समय लगा। फिर अपनी बोली में सोचा और टूटी-फूटी हिन्दी में अनुवाद किया। इसमें कुछ वक़्त लगा। उसने जवाब दिया- म्हारा फलिया मां (में) कपल साहूकार को नी ? सी एम जी अपने घेरे सहित आगे बढ़ गये। उनके घेरे में अंगरक्षक, क्षेत्र के प्रभारी मंत्री फलाने धार्डिया, विधायाक और आदिम जाति कल्याण मंत्री फलाने वाह जैसी हस्तियाँ हैं। सोमला किसान की भूखी और लगभग बीमार आवाज़ में इस मजबूत घेरे को भेदकर सी एम जी के कानों तक जाने की कूबत नहीं है, सो सोमला किसान के जवाब का हश्र भी वही हुआ, जो सोमला छात्र के जवाब का हुआ। सी एम जी के घेरे के आस-पास मंडराती मीडिया कर्मियों की मंडली। मंडली में से एक ने सी एम जी से पूछा कि सर…. आप भारतीय संस्कृति का काफ़ी आदर करते हैं और…। -हाँ , बिल्कुल करता हूँ। अभी चार-छ दिन पहले राजधानी में चलती गाड़ी रुकवाकर, और ख़ुद खड़े होकर एक ब्यूटी पार्लर पर लगा अश्लील होर्डिंग उतरवाया, आपने अख़बार में पढ़ा ही होगा। बंसी ने सी एम जी का जवाब सुना, तो उसे दो दिन पहले अखन्डवा ज़िले के अमलगाँव में घटी घटना याद आ गयी। वहाँ एक संत साहब के समाधि स्थल के पास ‘लोक कला और सांस्कृतिक’ आयोजन में रसिया से बुलाए गए बेले डाँस ट्रूप की डाँसर क्रिस्टिना जब मंच पर आयी, तो जैसे मंच की धड़कने बढ़ गयी। क्रिस्टिना ने छोटी-सी चड्डी, छोटी-सी चोली पहनी थी। चड्डी, चोली, कलाई में बँधी पट्टी का ही रंग पीला नहीं था, बल्कि बाल भी पीले थे। मानो सबके हिस्से की बंसत ऋतु केवल क्रिस्टिना के भीतर-बाहर से छलक रही थी। जब उसने ठुमका लगाया, मंच से काफ़ी दूर-दूर तक बैठों पर उसके बदन से छलकते बसंत के छींटे उड़े। क्रिस्टिना की मादकाता ने नज़दीक ही बैठे आदिवासी कल्याण मंत्री फलाने वाह और उनके संगी साथियो को तो सराबोर किया ही, लेकिन आख़िरी छोर तक बैठे शहरी और आदिवासी सोमला भी बसंत के छींटों से भीगने लगे। उनके भीतर से कुर्राटी मारती मस्ती फूटने लगी। वे क्रिस्टिना के साथ बसंत के रंग में भीगने को व्याकुल हो मंच की ओर दौड़े। कुछ तो मंच पर चढ़ने लगे। कुछ के हाथ में तो टेसु के फूल, शायद वे भोले बाबा की तरह क्रिस्टिना के भाल पर मलना चाहते थे। लेकिन यह सब देख बापड़ी क्रिस्टिना के तो होश फाख्ता हो गये। वह डर कर भागी। फिर वह साँस्कृतिक गम्मत तो वहीं ठप हो गयी। सोमलाओं से क्रिस्टिना को बचाने में बापड़े पुलिस वालों के कई डंडों का नुकशान हो गया। गनीमत थी कि ये निमाड़ के सीधे और ग़रीब शहरी और सोमला थे। संघी, बजरंगी या शिव सैनिक होते, तो क्रिस्टिना का क्या होता ? बंसी इसी के संबंध में कुछ पूछना चाह रहा था कि सर..अखन्डवा ज़िले में दो दिन…. बंसी का इतना ही बोलना हुआ कि मानो सी एम जी पूरा प्रश्न समझ गये। उनकी नज़र कुछ टेड़ी हो गयी। तभी बंसी को पीछे से एक ज़ोरदार धक्का लगा। बंसी रिंग राउन्ड के अधिकारियों की ओर लड़खड़ाता बढ़ा। रिंग राउन्ड के एक अधिकारी ने कोहनी मारी। बंसी वापस अपनी जगह आ गया। तब सी एम जी ने कहा- उस संबंध में हमने मंत्री फलाने वाह से स्पष्टीकरण माँगा है। मंत्री फलाने वाह तो वहीं सी एम जी के साथ चल रहे है, लेकिन फिर बंसी ने यह नहीं पूछा कि मंत्री फलाने वाह का क्या कहना है ? फिर सी एम जी हेलीपैड से अपने घेरे सहित मंच की ओर बढ़े। इंतजमियों ने हेलीपैड से मंच तक की दूरी तय करने के लिए कार का बंदोबस्त किया हुआ था। लेकिन सी एम जी कार में नहीं बैठे। हेलीपैड से मंच तक, तक़रीबन सौ क़दम की दूरी और मंच के बाईं बाजू में लगी प्रदर्शनी से मंच तक क़रीब पन्द्रह-बीस क़दम की दूरी को सी एम जी ने पैदल ही पार की। प्रदर्शनी में सी एम जी ने पिथोरा कला की तारीफ़ की। सी एम जी और उनकी लाड़ी ने जाम फल खाये। सी एम जी ने बाँसुरी बजायी। सी एम जी घेरे सहित प्रदर्शनी में आगे बढ़े। घेरे ने कड़कनाथ को आँखों भर निहारा और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रख आगे बढ़ गये। सी एम जी ने विकलांगों को ट्रायसिकल बाँटी। वहीं प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के शिलान्यासों पर से केसरिया कपड़ों का घूँघट उठाया। गले में केसरिया दुपट्टा डाले देश भक्तों ने ‘सी एम जी ज़िन्दाबाद’ नारा लगाया। सी एम जी के होठों से केसरिया मुस्कान के दाने बिखरे.. और फिर सी एम जी पैदल ही मंच की ओर बढ़ चले। मंच पर चढ़कर सी एम जी मुँह खोले आधे मुस्काराते और आधे हँसने की सी मुद्रा में हाथ हिला और हाथ जोड़ सामने बैठे सोमला भीलों और ग़ैर सोमला भीलों का अभिवादन स्वीकारने लगे। जल्दी-जल्दी होती गतिविधियों को सभी वीडियोग्राफ़रों, फोटोग्राफ़रों की तरह बंसी भी केसरिया दृश्यों को कैमरे में समेटता रहा। मंच संचालाक ने मंचासिनों का केसरिया हार-फूल से स्वागत के बाद चन्द्रशेखर आज़ाद की जन्म भूमि भाबरा से आये एक अधेड़ युवक को आमंत्रित किया। युवक जो कि मंच के दाईं बाजू से मंच पर आने को तैयार खड़ा था यानी चन्द्रशेखर आज़ाद स्टाइल में बदन पर जनेऊ-अनेऊ पहन, धोती-वोती बाँध। मूँछे-ऊछें चिपका-उपाकर एक दम तन्नाट-वन्नाट। जब मंच संचालक ने उसे मंच पर बुलाया, तो बस… उसे तीन सीढ़ियाँ चढ़ने भर का वक़्त लगा। क्षणभर को सोमला भीलों और ग़ैर सोमला भीलों को लगा- सचमुच का चन्द्रशेखर आज़ाद मंच पर चढ़ आया। पहले तो लोगों ने चन्द्रशेखर आज़ाद की केसरिया और रेशमी धोती को आँखों भर निहारा… फिर ताली और सीटी बजाकर नकली चन्द्रशेखर आज़ाद का सच्चीमुच्ची का स्वागत किया। नकली चन्द्रशेखर आज़ाद ने असली में पूरा ‘वन्दे मातरम्’ गीत गाया। पूरे लटके-झटके के साथ वन्दे मातरम् गाकर मंच और मंच के सामने बैठों की दाद बटोरी। लेकिन वह बंसी की ही दाद बटोरने में असफल रहा। पर उसे बंसी की दाद से कोई फर्क़ नहीं पड़ता, जिसकी दाद से फर्क़ पड़ता, उनकी भरपूर मिली। गीत समाप्त कर नकली चन्द्रशेखर आज़ाद जब असली सी एम जी के चरणों में झुका, सी एम जी ने उसे गले लगा लिया। उसका असली नाम पूछा। हष्टपुष्ट अधेड़ युवक ने सी एम जी को अपना नाम बताया। बंसी ने अपने कैमरे की स्क्रीन पर क्लोजप में उसके होठों के हिलने से नाम का अनुमान लगाया- फलाने नटनागर बंसी भीतर ही भीतर ख़ुद से संवाद करने लगा- क्या आज असली चन्द्रशेखर आज़ाद होता, तो वह सी एम जी के चरणों में सिर झुकाता ? - नहीं वह ऎसा हरर्गिज़ नहीं करता। -फिर ? - शायद यह गम्मत देख उसका ख़ून खौल उठता ! - फिर ? - शायद तीरसठ साल से इस क्षेत्र को अनपढ़, पिछड़ा बनाये रखने की साजिश करने वाली साम्राज्यवादी व्यवस्था के सी एम जी की फालिये से गरदन उतार लेता ! मंच संचालक ने सी एम जी से पहले क्रमशः क्षेत्रिय विधायक और प्रभारी मंत्री को भाषण देने के लिए पुकारा। जब दोनों ने सी एम जी को सह्रदय, कर्मठ, विवेकशील, जुझारू, विकास पुरुष आदि.. आदि कहकर अपना स्थान ग्रहण किया। तो बंसी के मन में भी चंद लाइन रिस आयीं- इक्कीसवीं सदी का / देखो ठाठ / खड़ी सोमला की खाट / फले-फूले चारण भाट । अब सी एम जी को संचालक ने आमंत्रित किया। सी एम जी ने माइक पर आकर बोलना शुरू किया- भारत माता की जै… वंदे मातरम् । मंच पर विराजित और सामने बैठे भाइयों और.., सी एम जी ने संचालक से पूछा- ये लोग पत्नी को क्या कहते हैं ? संचालक ने कहा- सर.., ‘लाड़ी’ कहते हैं। सी एम जी ने फिर जनता से मुखातिब हो बोलना शुरू किया- मेरी ‘लाड़ी’ को छोड़कर’ बहनों। मंच पर और सामने बैठे सोमला भीलों और ग़ैर सोमला भील श्रोताओं में भी एक ठहाका गूँजा। सी एम जी ने ठहाके को पूरे सम्मान से पूरा होने दिया। बल्कि उन्होंने भी ठहाके में ईमानदारी से भागीदारी निभाई। बंसी ने ठहाका अच्छे से समेटा। सामने सी एम जी के ऊपर के दोनों बड़े दाँतों के बीच के छेके से ठेठ कंठ के कव्वे तक को कैमरे में क़ैद किया। ठहाका रुका तो सी एम जी की फिर गम्मत शुरू हुई- आज मैं आपको कुछ देने नहीं आया हूँ। आज तो मैं मँगता बनकर आया हूँ। आज मैं आपसे कुछ माँगना चाहता हूँ। मैं मँगता बना हूँ अपने प्रदेश के लिए । ह्रदय प्रदेश के विकास के लिए। क्योंकि ह्रदय प्रदेश का विकास मैं अकेला नहीं कर सकता। इसलिए आज मुझे आपसे माँगना ही पड़ेगा और आपको देना ही पड़ेगा। ह्रदय प्रदेश मेरे अकेले का नहीं है। जितना मेरा है, उतना ही आप भाइयों और बहनों का भी है। इसलिए अपने प्रदेश के भाइयों और बहनों के सामने मैं आज मँगता बन कर हाथ फैलाता हूँ। मैं अपने ह्रदय प्रदेश के विकास की ख़ातिर मँगता बनना तो क्या.. ज़रूरत पड़ी तो अपनी जान भी लगा दूँगा। पर आज तो आप को कुछ दूँगा नहीं, माँगूगा। पहली बात तो यह माँगता हूँ कि हर गाँव के हर घर से अपने बच्चों को स्कूल भेजना पड़ेगा…..। दूसरी बात यह कि ….. सी एम जी ने ज़ोर देकर कहा । कह कर उन्होंने एक पोज दिया। पोज में उनकी नज़रे मंच के सामने दरी पर बैठी बाइयों पर टिकी है । सी एम जी की आँखें तो छोटी-छोटी ही हैं, पर फिर भी छेड़े (घूँघट)को ऊँचा कर सी एम जी का भाषण सुन-समझने की मशक्कत करती रेमली और सेमली ने भाँप लिया कि नाशमिटे की आँखें तो उन्हीं पर टिकी हैं। सेमली और रेमली आदिवासियों में थोड़े खाते-पीते घरों की हैं। लेकिन भणी-गुणी नहीं हैं। रेमली के मग़ज़ में शायद यह आया कि कहीं ये उसके गले में फँसी चाँदी की हँसुली न माँग ले। या फिर हाथ के कड़े या मछी जोड़ा। रेमली ने ज़्यादा नहीं तो भी दो-ढाई किलो चाँदी के ज़ेवर पहने हैं और इतने ही सेमली के बदन पर भी। रेमली ने अपने ज़ेवर अपने लुगड़े से ढाँक लिये। सेमली ने उसे ज़ेवर ढाँकते हुए देखा तो उसने भी ढाँक लिये। रेमली ने अपनी बोली में सेमली से पूछा- थार फलिया मां ( में ) स्कूल हं। सेमली ने गरदन हिलाकर मना किया और यही प्रश्न रेमली से भी पूछा, तो रेमली ने भी इंकार में गरदन हिला दी। सी एम जी का पोज ख़त्म हुआ। उन्होंने दूसरी चीज़ माँगी- अपने घर और गाँव की साफ़-सफ़ाई रखनी पड़ेगी….। सरकार ठेठ राजधानी से आपके गाँव की साफ़-सफ़ाई करने नहीं आ सकती। साफ़-सफ़ाई रखोगे तो मलेरिया, डेंगू, चिकुन गुनिया और स्वाइनफ्लू जैसी बीमारियाँ पास नहीं फटकेगी……। बोलो साफ़-सफ़ाई रखोगा कि नहीं….. ? सी एम जी ने इस बार पोज भाइयों यानी सोमला भीलों और ग़ैर सोमला भीलों की ओर देखते हुए दिया। बहुत से कैमरों की फ्लश एक साथ चमकी। बंसी ने भी शॉट कम्पलीट किया। सोमला ज़्यादातर ताड़ी और महुए के सरूर में हैं, कुछ तो इस वजह से और कुछ सी एम जी की लच्छेदार भाषा होने की वजह से उन्हें एक दम कुछ संपट नहीं पड़ती। तब क्षेत्रिय विधायक की दूरंदेशी काम आयी। उसने पहले से ही अपने कुछ कार्यकर्ताओं को, जो कि ग़ैर सोमला लोग थे, सोमलाओं की वेशभूषा पहनाकर उनके बीच बैठा दिया था। ग़ैर सोमला लोगों ने विधायक का इशारा पाकर एक साथ हाथ ऊँचे कर साफ़-सफ़ाई रखने की हामी भरी और तालियाँ बजायी। सभी कैमरे सोमला और ग़ैर सोमलाओं की ओर घूमें, दृश्य को समेट वापस मंच की तरफ़ मुँह किये, नये दृश्य की ताक में खड़े हो गये। तभी एक सोमला बुदबुदया- साफ़-सफ़ाई रखने से बीमारियों की तरह भूख भी न आयेगी…? उसकी बुदबुदहाट को बग़ल में बैठे सी एम जी की पार्टी के कार्यकर्ता ने सुना। वह उसकी तरफ़ देख मुस्कराया और मन ही मन बोला- गैलचौदे… साफ़-सफ़ाई का भूख से क्या लेना-देना। सोमला की इच्छा हुई कि अभी-अभी उसने जो बात बुदबुदायी, वही खड़े होकर सी एम जी से पूछे। अगर सच में साफ़-सफ़ाई रखने से भूख भी न लगेगी, तो अभी से ही सफ़ाई चालू कर दूँगा। सोमला खड़ा होने लगा। अभी आधा ही उठा था कि बग़ल में बैठे कार्यकर्ता ने उसकी मंशा को भाँप लिया। उसने उठते सोमला का हाथ पकड़ नीचे खिंचा। सोमल के कुल्हे धप्प से दरी पर आ टिके। कार्यकर्ता भुनभुनाया- रोटी के अलावा कुछ नहीं दिखता..? सोमला को स्पष्ट कुछ समझ नहीं आया। उसने बैठे हुए पूछा- अं.. ? कार्यकरता ने कहा- भाषण सुन… खड़ा मत हो.. चुपचाप बैठ…। सोमला ताड़ी की तुरंग में था, उसे कार्यकर्ता का व्यवहार ठीक नहीं जँचा। वह कुछ बोलना चाह रहा था…पर फिर बैठ गया। शायद सोचा हो बाद में बात करूँगा। क्योंकि सी एम जी का पोज ख़त्म हो गया था, और गम्मत शुरू हो गयी थी- आजकल मैंने एक नयी बात सुनी…। चुनाओं में नेता लोग दारू बँटवाते हैं… ! सुना अभी पँचायत चुनाव में भी ख़ूब बँटी…. ! भाइयों और बहनों… जो नेता दारू बँटवाकर वोट माँगे, उसे वोट नहीं… लात दो। अभी सी एम जी की बात ख़त्म नहीं हुई, लेकिन तुरंग में बैठे उसी सोमला के मग़ज़ में यह बात खट्ट से जँच गयी। सोमला ने देखा कि उसे पीलाकर भाषण सुनाने लाने वाला कार्यकर्ता भी बग़ल ही में बैठा है। उसी ने अभी उसे अपनी बात कहने से रोका था। फिर जैसे उसके कान में हवा ने बुदबुदाया- काल करे से आज कर.. आज करे सो अब ……….। सोमला भील खड़ा हुआ और ग़ैर आदिवासी को लात जमाने लगा। इंतजाम में लगे पुलिस वाले…. सोमला का हाथ पकड़ लगभग घसीटते हुए शामियाने के पिछवाड़े ले गये और उसके पिछवाड़े पर बेंत की केन इतने प्यार से जमायी कि वह अपने टापरे पर ही जाकर रुका। इस प्रकरण से सी एम जी के भाषण पर कोई फर्क़ नहीं पड़ा, वह लच्छेदार भाषा में ज़ारी रहा। सी एम जी ने ऎसे ही कुछ और माँगा। फिर बहुत ज़ोर देकर बोले- एक आख़िरी बात और माँगता हूँ। बोलो दोगे कि नहीं…. ? सी एम जी ने सभी पर नज़र टिका दी और सभी चुप्प। उन्होंने फिर दोहराया- अरे… बोलो.. दोगे कि नहीं…. ? क्या मेरे भाइयों… और बहनों का दिल इतना छोटा है ? बोलो माँगू….? दोगे….? थोड़ी देर के लिए शामियाने में सन्नाटा तन गया। बापड़े भील श्रोताओं को क्षेत्रिय ग़ैर आदिवासी नेताओं ने सवेरे से घेर-घार कर बैठाला हुआ है। अब तक कुछ भूख के मारे बेदम हो रहे हैं। कुछ शामियाने से थोड़ी दूर, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क के उस तरफ़ एक खाई में ड्रम भरकर रखे ताड़ और महुए का रस ज़्यादा चढ़ा चुके हैं। फिर सी एम जी का भाषण भी बीच-बीच में संघीय हिन्दी में हो जाता है। ऎसे कुछ वाजिब कारणों से उन्हें सी एम जी की आधी-अधूरी बात संपट पड़ी और न भी पड़ी। कुछ की आँखें फटी की फटी और कुछ की खुल नहीं रही हैं। कुछ के चेहरे फक्क हैं और कुछ के बिजूका की भाँति। सी एम जी ने पोज दिया। जब पोज कुछ लम्बा हो गया, तो क्षेत्रिय विधायक के ग़ैर आदिवासी पट्ठों ने ही ज़िम्मेदारी निभाई और माँगने का बोला- माँगो.. माँगो… ग़ैर आदिवासी पट्ठों के आसपास बैठे भीलों ने भी हाँ.. में हाँ.. मिला दी। सी एम जी ने कहा- भाइयों और बहनों…. मैं कहता हूँ, यह नशा त्याग दो….। नशा…. नाश की जड़ है….। इस नाश की जड़ को ही ख़त्म कर दो…। न रहेगा बाँस…, न बजेगी बाँसुरी….। तभी शामियाने में सबसे पीछे एक टुन्न सोमला खड़ा होकर बोलने लगा- हट…थारी राँड सोदूँ … बाँसुरी..नी बजेल… बाँसुरी बजेल…हर हाल में बजेल… और वह कुछ ऎसे करने लगा जैसे पत्थर-वत्थर ढूँढ रहा है। पीछे खड़े पुलिस वालों ने उसे पकड़ा और एक बाजू लेजाकर कुछ ऎसा समझाया ! कि फिर वह सोमला भी शामियाने की तरफ़ नहीं दिखा। फिर सी एम जी ने मंच से घोषणा की- गाँवों में फैलते भ्रष्टाचार पर लगाम कसने और गाँव के विकास और तरक्की के लिए हर गाँव में दस-दस लोगों की विकास समिति बनाओ। यह समिति सीधी मेरे सम्पर्क में रहेगी। मैं गाँवों के विकास में पैसों की कोई कमी नहीं आने दूँगा। सी एम जी ने यह घोषणा करने से पहले शायद सोचा होगा- यह जाँचा-परखा और पड़ोस के एक नम्बर राज्य में आजमाया हुआ आइडिया है। भागवत गीता का एक वाक्य- जैसा कर्म करेगा.. वैसा फल मिलेगा.. अब जिसे ज़्यादातर लोग न्यूटन के सिद्धांत- ‘क्रिया की प्रतिक्रिया, के नाम से जानते हैं, और इस सिद्धांत के व्यख्याकार, प्रयोगधर्मी, धार्मिक और राष्ट्रभक्त सी एम फलाने लोदी जी ने भी ऎसी समितियाँ बनाकर ही आदिवासियों को जोड़ा था, और उन्हें देश भक्ति का अवसर भी प्रदान किया था। तभी पीछे से हेलीकाप्टर ने उड़ान भरी वह शामियाने के ऊपर से उड़ता हुआ गया। सोमला भील हो हल्ला करते खड़े हो ऊपर देखने लगे। लेकिन ऊपर शामियाने की छत देख ठगे-से खड़े रह गये। सी एम जी ने अपना भाषण यहीं ख़त्म करने का सोचा और बोले- जो मेरे साथ ह्रदय प्रदेश के विकास में भागीदार बनेंगे। वे सब मुट्ठियाँ कस कर दोनों हाथ ऊपर करे। पुलिस वालों के एक हाथ में डंडा है, तो एक ही हाथ ऊपर करें। मैं फिर आपको साफ़-साफ़ कह रहा हूँ कि ह्रदय प्रदेश सभी का है। विकास भी सभी को मिलकर करना होगा। जिसको ईश्वर ने जो काम सौंपा है। यानी जो शिक्षक है, वह ईमानदारी से शाला में जाये और शिक्षा दे। जो पुलिस है, वह ईमानदारी से अपना कर्तव्य पूरा करे। जो किसान है, खेती करे, जो मज़दूर है, मज़दूरी करे। नेता है, तो जनता की सेवा करे, हवाला, चारा घोटाला, यूरिया घोटाला, बोफर्स घोटाला जैसे बेइमानी के काम न करे। बेइमानों को मैं नहीं छोड़ने वाला। कहने का मतलब यह कि ईश्वर ने जिसको, जो काम सौंपा है, वह उसे ईमानदारी और निष्ठा से करे। मैं अपने ह्रदय प्रदेश को देश के सबसे विकसित और एक नम्बर राज्य की बग़ल में खड़ा करके ही मानूँगा। जब तक ऎसा न होगा, मैं नहीं मानूँगा कि ह्रदय प्रदेश का विकास हुआ। बंसी के मग़ज़ को प. फलाने किशोर नागर की बातें और सी एम जी की बातें एक-दूसरे का समर्थन करती लगी। उसे इन बातों की जड़ मनु स्मृति से आती लगी। वह बुदबुदाया- ग्यान खाई गहरी / चढ़ना चाहे सोमला / जात की मेड़ ऊँची / तोड़ना चाहे सोमला / पर मारे धक्के पर धक्का / राजा और ग्यान का देवता / विकास की भट्टी का / ईंधन भूखा सोमला / भर न पाता पेट। बंसी सी एम जी के एक-एक वाक्य, भंगिमा को कैमरे और नज़रों से समेट रहा है। मंच पर बैठे अतिथियों के पीछे पन्द्रह-बीस फीट का बैनर लगा है। जिस पर लिखा है- आओ … बनायें अपना ह्रदय प्रदेश… स्वर्णिम ह्रदय प्रदेश। सी एम जी की आदमक़द तस्वीर बनी है और ह्रदय प्रदेश का नक्शा भी बना है। नक्शा एक ही रंग में है और रंग केसरिया है। बंसी ने कैमरे से ह्रदय प्रदेश के नक्शे का एक क्लोजप लिया। केसरिया के पीछे उसे लाल रंग बहता दिखा। बंसी के ज़ेहन में संदेह रिसता है कि यह गम्मत कहीं ह्रदय प्रदेश को फ़रवरी–मार्च 2002 का तथाकथित एक नम्बर राज्य बनाने की तैयारी तो नहीं है…? यह महीना भी फ़रवरी का है। बंसी भीतर ही भीतर थोड़ा विचलित हो गया। सिर के बालों से पसीने की रेल बहने लगी। बंसी ने गोसेन के हाइकु बुदबुदाये- काटाज-काटा / मन की टोपली मँ• / फूल को टोटो । और….. घर-दुकान / मनुस हुया खाक / धरम जिन्दो। सी एम जी ने फिर कहा- मुट्ठियाँ कसकर सभी अपने हाथ ऊपर उठायें और वचन दें कि हम सभी अपने ह्रदय प्रदेश के विकास के सहभागी बनेंगे। अब बचे खुचों ने भी अपनी मुट्ठियाँ कस कर हाथ ऊपर किये। किसी पुलिस वाले ने एक हाथ ऊपर किया। किसी ने डंडे को दोनों पैरों के बीच टिका लिया और दोनों हाथ ऊपर किये। मंच पर बैठे विधायक, फलाने, फलाने मंत्रीजियों और सी एम जी की लाड़ी ने भी मुट्ठियाँ कस कर हाथ ऊपर किये। सी एम जी ने अपनी हल्की फटी आवाज़ में बोला- भारत माता की………. जै….. भारत माता की………. जै… वन्दे…. मातरम् यूँ फकतला में आम सभा का समापन हुआ। तो भई… अब सी एम जी की असल यात्रा की शुरुआत हो रही है। होशियार हो जाओ..। फकतला से आलीराजपुर की दूरी क़रीब पैंतीस किलो मीटर है। रास्ते में कई गाँव और कई फलिये पड़ते हैं। यात्रा का काफिला बढ़ चुका है। सी एम जी की कार के आगे-पीछे सुरक्षा की दृष्टि से पाँच-छः गाड़ियाँ चल रही हैं। सुरक्षा की गाड़ियों के अलावा पीछे क़रीब सौ-सवा सौ कारों का काफिला दौड़ता आ रहा है। वार्नर गाड़ी के आगे जन संपर्क कार्यालय की गाड़ी ह्रदय प्रदेश के विकास के गीत बजाती चल रही है। इन गाड़ियों से तक़रीबन एक किलो मीटर की दूरी पर कुछ गाड़ियाँ दौड़ रही हैं। इन गाड़ियों में केसरिया दुपट्टे वाले कार्यकर्ता बैठे हैं, जो आगे की व्यवस्था देखते और जमाते चल रहे हैं। रास्ते में पड़ते हर गाँव पर कुछ नेता टाइप के लोग सी एम जी पर फूलों की बरसात करने को खाट और तखतों पर केसरिया फूलों का ढेर लगाये खड़े हैं। सोमला भील ताड़ी और महुए के नशे में धुत्त हैं। ढोल, थाली और माँदल बजाते, कुर्राटी भरते नाच रहे हैं। होह……..होह…….होह.. कुर्रर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… बंसी को फकतला की आम सभा में एम.के.डामोर नाम का परिचित पुलिस सहायक उपनिरीक्षक मिल गया। वह पहले व्यावसायिक राजधानी के सेन्ट्रल कोतवाली थाने पर पदस्थ रह चुका है। वहीं से प्रमोशन होकर ज़िला आलीराजपुर के सेन्ट्रल कोतवाली थाने में पदस्थ हुआ है। बंसी भी एम.के. डामोर के साथ वार्नर जीप में बैठ गया। वार्नर जीप पीछे से खुली है। बंसी को काफी सुविधा हो गयी है। जब चाहे आगे, पीछे और सड़क किनारे के सूखे खेतों को, ताड़ और महुए के पेड़ों को कैमरे में समेट लेता है। जहाँ काफिला रुकता है। दौड़कर सी एम जी की गम्मत के दृश्य ले लेता है। सी एम जी ने रास्ते में एक गाँव के हॉस्टल के बच्चों के बीच अपने ख़ूबसूरत दाँतों को पिलकाते हुए तस्वीर खिंचवायी। सोमला और ग़ैर सोमला बच्चों से पूछा- तीन मार्च से परीक्षा है तो पढ़ाई पूरी की कि नहीं ? अच्छा बताओ ज़रा, कृष्ण और सुदामा कौन थे ? शबरी के आश्रम में राम का स्वागत कैसे हुआ था ? जानते हो…, लक्ष्मण ने शबरी का जूठा बैर फेंक दिया था..! वही बैर फिर लक्ष्मण की जान बचाने के लिए संजीवनी बूटी के रूप में काम आया था। हाथ की मुट्ठियाँ कसो, ऊपर उठाओ और बोलो- भारत माता की… वन्दे….. मातरम् रामजी की…….. जै.. कृष्णजी की…….. जै…….. सी एम जी के पूरे काफिले के लिए भारत माता की… जै .. यह संकेत है कि यहाँ की गम्मत ख़त्म। जै.. होते ही सभी अपने-अपने वाहनों की ओर दौड़ पड़ते हैं। बंसी जीप में बैठने को दौड़ा। दौड़ते हुए उसे अपने बचपन की एक रात याद आ गयी। गाँव में गर्मी के दिनों में अक्सर गम्मत वाले आया करते। उस रात भी गम्मत थी। बंसी अपने दोस्त सोमला और गोसेन के साथ गम्मत देख रहा था। गम्मत के हर प्रसंग के बाद जोकर आता। वह चुटकले तो सुनाता ही और साथ में बोलता- बोलो रामजी की… जै… बोलो- किसन कन्हैया की… जै…. बोलो- महापंडित रावण की…. जै…. बोलो- अपनी-अपनी लाड़ी की… रावण तक तो सब लोग एक धुन में धड़ल्ले से जै… बोलते जाते। जब जोकर लाड़ी की जै.. बोलने का कहता, तो जैसे लोगों की तंद्रा टूटती। लोग ही..ही..कर धीमी हँसी हँस देते। जोकर समझ जाता पिछले प्रसंग से लोग बाहर आ गये। वह नये प्रसंग की घोषणा कर पर्दे के पीछे चला जाता। बंसी जीप में बैठ चुका है। बंसी ने ख़ुद से पूछा- सोमला की तंद्रा कब टूटेगी ? अशिक्षा का अँधेरा कब छँटेगा ? कुछ किलो मीटर बाद फिर एक गाँव आया। सी एम जी ने गाँव में उचित मूल्यों की दुकान चेक की, उन्हें कोई कमी नहीं मिली। सी एम जी ने अपने भाषण को अब तक काफ़ी संक्षिप्त कर लिया है। भाषण वही है जो फकतला की आम सभा में दिया। पर अब उसे सूत्र वाक्य की तरह बोलते, जैसे- बच्चों को स्कूल भेजो। गाँव में सफ़ाई रखो। ग्राम विकास कमेटी बनाओ। नशा नाश की जड़ है, त्यागो। कुछ आदिवासी सी एम जी के भाषण के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं। वे सी एम जी को आवेदन देना चाहते हैं। जिसमें उन्होंने किसी पढ़े-लिखे से अपनी समस्या लिखवायी है- हमें वन अधिकार क़ानून के तहत पट्टा मिलना चाहिए.. लेकिन नहीं मिल रहा है। हम चक्कर काट-काट कर परेशान हैं… हमारी सुनवायी नहीं हो रही है। पट्टों के वितरण में धाँधली चल रही है.. उसे रोका जाये। आदि.. आदि.. सी एम जी की पार्टी के मुस्तैद कार्यकर्ताओं की टीम जो उनके साथ चल रही है, उन्होंने आदिवासियों से आवेदन लेकर पढ़ लिया है और उन्होंने आश्वासन भी दे दिया कि आवेदन सी एम जी को दे दिया जायेगा। उस पर की गयी कार्यवाही से आपको जल्दी ही अवगत भी करा दिया जायेगा। आदिवासियों ने सी एम जी से रूबरू बात करने की इच्छा ज़ाहिर की। लेकिन मुस्तैद कार्यकर्ताओं ने विनम्र सख़्ती से समझा दिया कि सी एम जी का अभी भाषण चल रहा है और फिर यात्रा चलेगी। दौरा बहुत टाइट है… आज तो संभव नहीं। इधर तब तक सी एम जी ने अपने भाषण की समाप्ति का संकेत दिया- मेरे साथ- हाथ की मुट्ठियाँ बाँधकर ऊपर उठाओ। बोलो- भारत माता की… जै…. वन्दे…. मातरम् केसरिया दुपट्टे वाले मुस्तैद कर्यकर्ताओं ने अपनी-अपनी गाड़ियों की ओर रूख किया। काफिले के और लोग भी गाड़ियों में बैठे और काफिला आगे बढ़ गया।फिर एक गाँव आया। यहाँ गाँव बाहर बइड़ी पर सी एम और क्षेत्र के प्रभारी मंत्री फलाने धार्डिया ने यहाँ हरियाली परियोजना के तहत किये जा रहे कंटूर ट्रेंच, चेक डेम के कामों की सरहाना की। पहाड़ी (बइड़ी) पर गैंती से दो टिंचे मारे। यहाँ उस भाषण के अलावा पेड़ लगाने की सलाह दी। भारत माता की.. वंदे …काफिला आगे बढ़ा। रास्ते में और भी कई गाँव और फलिया आये। यहाँ भी कुछ सोमला लोग अपनी उसी मस्ती में ताड़ और महुए के रस में गले-गले भरे हैं। वही सब हो रहा है, जो पहले होता आया है यानी ढोल,माँदल, थाली बजाना। कुर्राटी भरना नाचना…. लेकिन कुछ लोग हाथों में आवेदन लिये भी खड़े हैं..। काफिले के रुकते ही केसरिया दुपट्टे वाले मुस्तैद कार्यकर्ता की टीम अपनी-अपनी गाड़ियों से उतरती है और आवेदन वालों को घेर लेती है। टीम पाती है कि इन लोगों की भी मामूली समस्या है। किसी के आवेदन में लिखा है…मनरेगा के तहत जॉब कार्ड नहीं बन रहा है। किसी के में लिखा है- मनरेगा में दाड़की के रुपये बराबर नहीं दिये जा रहे हैं। किसी में लिखा है- मरेगा में जे.सी.बी. से काम कराया जा रहा और हमें काम नहीं दिया जा रहा है। आदि…आदि…. केसरिया दुपट्टे वाले मुस्तैद कार्यकर्ताओं की टीम उन्हें पिछले वालों की ही तरह समझाती है। इधर ग़ैर सोमला, नेता टाइप के लोग सी एम जी पर फूल बरसा रहे हैं। जब फूलों को दोनों हाथों से सी एम जी की तरफ़ उछालते हैं। बंसी भीतर ही भीतर कटता है। स्कूल में पढ़ी- माखन बा की फूल की अभिलाषा, कविता उसके ज़ेहन में गूँजती- चाह नहीं मैं सुर बाला के / गहनों में गुथा जाऊँ / चाह नहीं मैं देवों के सिर पर चढ़ू / भाग्य पर इठलाऊँ / चाह नहीं में प्रेमी माला में / बिंध प्यारी को ललचाऊँ / मुझे तोड़ लेना वन माली / उस पथ पर देना तुम फेंक / मात्र भूमि पर शीश चाढ़ाने / जिस पथ जावें वीर अनेक। बंसी समेट रहा है, न सिर्फ़ फूलों का सिसकना। बल्कि समेट रहा है- भीतर-बाहर के ठहाकों, भाषणों, भारत माता की.. जै.. वन्दे मातरम के शोर में सोमलाओं और मंगलियों के पैरों में बंधे घूँघरूओं, गले में झूलते ढोल, माँदल और थाली की कर्कश ध्वनि, कुर्राटी इन सबके बीच से रिसती बेबस सिसकी का झरना भी। वह महसूस कर रहा है- झरने का खारा और कसेला स्वाद। सायरन बजाता काफिला आलीराजपुर की तरफ़ दौड़ रहा है। सामने से आते वाहन सड़क से नीचे उतर कर खड़े हैं। सड़क के किनारे एक-एक फर्लांग पर खम्बों की कतार की तरह सिपाही खड़े हैं। बंसी सुन रहा है- दोपहर की सांय..सांय में सायरन … बंसी सायरन और दोपहर की सांय..सांय समेट रहा अपने भीतर। डामोर का बीच-बीच में कुछ न कुछ बोलते रहना ज़ारी है- जैसे सी एम जी के पिता बड़े आदर्शवादी मास्टर है। उनका बचपन का नाम फलाँ है…। उनका ससुराल फलाँ जगह है। सी एम जी आर एस एस के बड़े तगड़े कार्यकर्ता है। देखो… लगभग लाख जोड़ों का ब्याह करवाकर.. उनका मामा बन गया…। और ब्याह में भी ग़ज़ब की गम्मत हुई…ब्याह करने वालों में से कुछ जोड़े तो कुआँरे ही होते थे… पर कुछ जोड़ों ने सुना कि सी एम जी की तरफ़ से दहेज में कुछ बर्तन-ठीकरे मिलेंगे.. तो एक-एक.. दो-दो छोरा-छोरी के माँ-बाप ने भी फिर से फेरे फिर लिये। और ह्रदय प्रदेश की दीदी को कैसी ठिकाने बैठायी…! उनकी पढ़ाई फलाँ जगह हुई…। कुल मिलाकर यह कि बड़ा श्याणा है भई… डामोर की जानकारी पर बंसी को आश्चर्य हो रहा है, और वह पूछता है- आप इतना सब कैसे जानते हैं….? डामोर कहता है- मैंने एक डॉक्यूमेंट्री देखी थी.. जिसमें सी एम जी की अब तक पूरी ज़िन्दगी के बारे में बताया है…। बंसी फिर जीप से बाहर देखने लगता है। जीप दौड़ रही है। और अंततः काफिला आलीराजपुर तीन-साढ़े तीन घन्टे में पहुँच गया। सी एम जी विश्रामगृह में गये। हाथ-मुँह धोया। फ्रेश हुए। कुर्ता-पजामा और जॉकेट बदली और बीस-पच्चीस मिनट में रोड शो के लिए तैयार हो गये। विश्रामगृह से कुछ क़दम पैदल रोड शो किया। भीड-भड़क्का ढोल-ढमाका देख एक भीलनी डोकरी, जिसे सड़क पार कर अस्पताल की तरफ़ जाना है, रुक गयी। उसके पीछे किराना दुकान है, जहाँ से उसने पचास रुपये की आधा किलो दाल ख़रीदी है। उसके एक हाथ में वही दाल की पोलीथिन झूल रही है। सी एम जी के आगे-पीछे भीड़ यों दौड़ रही है, जैसे कोई गडरिया अपनी गाडरों (भैड़ों) को सड़क पार कराता है, और पीछे से ट्रक वाला हार्न बजाता गाडरों के ऊपर ही चढ़कर गुज़र जाने का भय पैदा करता चला आता है। गाडरों को बचाने के लिए गडरिया उन्हें जल्दी-जल्दी दौड़ाकर एक तरफ़ ले जाने की कोशिश करता है। सी एम जी के आगे-पीछे दौड़ने वाली भीड़ एक तरफ़ जाने को नहीं, सड़क पर दौड़ते रहने को ही दौड़ रही है। डोकरी शायद कुचलने के डर से या भीड़ में हाथ में पकड़ी दाल की पोलीथिन के फट जाने के डर से सड़क किनारे खड़ी हो गयी है। सी एम जी की आँखें भले ही आकार में छोटी है, लेकिन उनकी नज़र बड़ी पैनी है। उनकी नज़रे भविष्य में भलेही दूर तक न देख पाती हों, लेकिन सड़क पर चश्में के पीछे से भी दूर तक देख लेती हैं। उन्होंने डोकरी को भी सड़क किनारे खड़ी देख ही ली। सी एम जी डोकरी की ओर बढ़ने लगे, उन्हें बढ़ता देख… एक चम्मच भी उधर बढ़ा… सी एम जी ने डोकरी का एक हाथ पकड़कर अपने सिर की फिसलपट्टियों पर रख लिया। चम्मच तेज़ी से डोकरी का दूसरा हाथ पकड़ बोला- डोकरी….आशीर्वाद देने में क्या कंजूसी करती है ? दोनों हाथों से दे……। डोकरी की मर्ज़ी के बग़ैर वह ताक़त के साथ डोकरी का हाथ ऊपर उठाने में सफल हो गया। इस हबड़ाठेस में डोकरी के हाथ से दाल की पोलीथिन छूट गयी। दाल बिखर गयी। लेकिन दाल बिखरने से कुछ सेकंड पहले ही सी एम जी ने डोकरी से आशीर्वाद झटका और बोले- बोलो…. जनता जनार्दन की……… जै…. और आगे बढ़ लिये। दाल तो तब बिखरी जब वे पूरे डेढ़ क़दम आगे बढ़ गये। बंसी को लगा- सी एम जी ने आशीर्वाद माँगा या लिया नहीं, छीना है। सी एम जी के आगे-पीछे दौड़ने वाले पुलिस वालों में क़ायदे से कोई क़ानून का जानकार हो तो इस पर लूट की एफ. आय. आर. दर्ज करे। दाल का हर्जाना भी वसूल करवाये। लेकिन डोकरी गवाह किसे बनायेगी। दाल के ऊपर से गुज़रे काफिले ने तो दाल देखी ही नहीं। जैसे तीरसठ सालों से गुड़कती विकास की गाड़ी के पहियों को सोमलाओं की गर्दन पर से गुज़रते किसी ने नहीं देखा। कोई गवाह नहीं। सी एम जी ने ऎसी गम्मत कई बार की जैसे सड़क पर झाड़ू के दो हाथ फेरे। किसी सोमला के बच्चे को हार पहना दिया। किसी सोमला के बच्चे को गोदी में उठा लिया। किसी लाड़ली लक्ष्मी के गाल को छद्म स्नेह भाव से थपथपाया। रोड शो में सी एम जी यह गम्मत कर रहे हैं। तब तक बंसी काफिले से आगे पहुँच गया है। वह एक चाय की गुमटी वाले से प्लास्टिक का स्टूल लेकर उस पर खड़ा हो, सब कुछ समेट रहा है। तभी पीछे से एक गाय पर एक साँड जबरन चढ़ाई करने के मक़सद से दौड़ा। हाबरी-काबरी गाय का पैर उस स्टूल से टकराया जिस पर बंसी खड़ा है, स्टूल बंसी के पैर नीचे से हट गया। बंसी कूल्हों के बल स्टूल पर गिरा। कैमरा पहले ही हाथ से छूटकर सड़क पर जा गिरा, जो गाय के पीछे दौड़ते साँड की ठोकर से फुटबॉल की मानिंद उछला और फिर गिर कर दाल की तरह दाना-दाना, या कहो पुर्जा-पुर्जा, या कहो सोमला के गालों पर गुलाल मलकर भागी मंगली की साँस के कतरे-कतरे-सा बिखर गया। ‘आओ….., बनायें अपना ह्रदय प्रदेश’ यात्रा आगे बढ़ती है। जन सम्पर्क कार्यालय की गाड़ी पूर्ववत विकसित ह्रदय प्रदेश के गीत बजाती आगे चल रही है। एक के बाद एक गाँव-क़स्बे आते जाते हैं। सूरज को अँधेरे ने निगल लिया है या फिर धरती सूरज के सामने से खिसल गयी है। जो भी हो, लेकिन धरती पर अँधेरे का साम्राज्य छा गया है। गाँवों से ढोल-माँदल की आवाज़ आती है, गाँव नज़र नहीं आते। बिजली कहीं नहीं है। अब सी एम जी वहीं रुकते हैं, जहाँ उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जनरेटर का बंदोबस्त कर रखा है। इस बीच एक क़रीबी फलाने लाल ने सी एम जी को एक सलाह दी कि आदिवासियों से नशा छोड़ने की माँग मत करो। आदिवासी नाराज़ हो सकते हैं, उन्हें पेट भर एक ही चीज़ तो मिलती है। वह भी माँग लेंगे, तो वे बिगड़ सकते हैं। सी एम जी क़रीबी फलाने लाल की बात ग़ौर से सुनने लगे। क़रीबी फलाने लाल वहीं का लोकल ग़ैर आदिवासी था, लेकिन आदिवासियों के इतिहास के बारे में काफ़ी कुछ जानता था। उसने देखा कि सी एम जी उसकी बात ग़ौर से सुन रहे हैं, तो वह अपने ग्यान की पुड़िया थोड़ी और विस्तार से खोलता बोला- फलानी पार्टी की सरकार ने तो उन्हें पाँच लीटर शराब टापरे में बनाने और रखने की छूट दी हुई है। उसने कुछ सोच-विचार कर छूट दी होगी ! नशा छोड़ देंगे तो काम और रोटी माँगेंगे, तब क्या करोगे ? भीलड़े अगर विद्रोही हो उठे तो संभालना मुश्किल होगा ! आप देख ही रहे हो- देश में जाने कहाँ..कहाँ…क़रीब दो-ढाई सौ ज़िलों में.. इन भीलड़ों ने नाक में दम कर रखा है । …ये छीतू भील और भुवान तड़वी के ही वशंज हैं। फलाने लाल ने चेताते हुए कहा- छीतू भील और भुवान ने तत्कालीन राजा और अँग्रज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोही रूख अपना लिया था, उस विद्रोह में छीतू भील के साथ तीर-धनुष लेकर भील ऎसे खड़े नज़र आते थे, जैसे खेत में चने की कतार खड़ी नज़र आती हैं। इन्हीं भीलड़ों ने मुगलों,राजपूतों और फिर अँग्रेज़ों को बरसों-बरस नाकों चने चबवाएँ हैं। ये गुरिल्ला लड़ाई के गुरू हैं। इसलिए नशा छोड़ने की बात ही मत करो ! सी एम जी को क़रीबी फलाने लाल की बात जँच गयी। उन्होंने अपने रटे-रटाये भाषण में कुछ सुधार कर लिया है। अब वे आदिवासियों से धीमी आवाज़ में महुए की दारू छोड़ने की सलाह दे रहे हैं। साथ ही ताड़ी पीने की सलाह पूरे आत्मविश्वास और बुलंद आवाज़ में दे रहे हैं। कह रहे हैं- ताड़ी स्वास्थ्य और सेहत के लिए अच्छी है। फिर और भी कई गाँव गुज़रे …फिर आया भाबरा। भाबरा भी पूरा अंधेरे में डूबा है। लेकिन सभा स्थल को जनरेटरों की मदद से रोशन किया है। सभा स्थल मुख्य सड़क के किनारे ही है। पर सड़क पर सोमला भीलों और मंगलियों के हुजूम के हुजूम ताड़ी और महुआ की मस्ती में पूरे साजो सामान के साथ नाच रहे हैं होह……..होह…….होह.. कुर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… सी एम जी को कार्यकर्ता और रिंग राउन्ड वाले कब मंच पर ले गये। सड़क पर नाचते सोमला भीलों और मंगलियों को भनक भी नहीं लगी। सी एम जी ने भाबरा में चन्द्रशेखर आज़ाद द्वार, चन्द्रशेखर आज़ाद मंदिर बनाने और ज़िला आलीराजपुर का नाम जल्द ही ज़िला चन्द्रशेखर आज़ाद नगर करने की घोषणा कर दी है। सी एम जी का भाषण सुनने वाले सब ग़ैर सोमला हैं। सोमलाओं ने तो सी एम जी की कोई घोषणा नहीं सुनी, उन्हें घोषणाओं से कोई लेना-देना भी नहीं है। वे तो नशे में धुत्त हैं और जैसे वे नाचने, ढोल,माँदल, बाँसुरी बजाने और कुर्राटी भरने को ही धरती पर पैदा हुए हैं। लेकिन बंसी सोच रहा है- कभी राजा आनंद देव राठौड़ ने अलीया भील को हराकर अम्बिकापुर पर कब्जा किया था। फिर उसने अम्बिकापुर का नाम आनंदवाली रखा था। भील आनंदवाली को आवली कहने लगे। फिर आवली को आली कहना शुरू कर दिया। राजा आनंदेव राठौर समझा ऎसा उच्चारण की कठिनाई से हो रहा होगा। पर ऎसा विरोध स्वरूप भी हो सकता है। क्योंकि आनंददेव का रखा नाम हर भील के गले उतरा ही हो यह ज़रूरी नहीं है। जब राजा आनंद देव राठौड़ ने आली से अपनी राजधानी पास ही के क़स्बे राजपुर में स्थापित की तो आली +राजपुर मिलकर बना आलीराजपुर । यह आलीराजपुर पहले ह्रदय प्रदेश के झाबुआ ज़िले में था। फिर इसे स्वतंत्र ज़िला बना दिया। अब सी एम जी ने नाम बदल चन्द्रशेखर आज़ाद नगर रखने की घोषणा कर दी। जब कल दूसरी पार्टी के सी एम जी कोई और फलाने जी बन जायेंगे, वे फिर नाम बदल राजीव गाँधी नगर या कोई और गाँधी नगर रख देंगे। परसों तीसरी पार्टी की सरकार बनी तो वह अम्बेडकर नगर, काँसीराम नगर या कुछ और रख देगी। अब लाखों रुपयों का चन्द्रशेखर द्वार बनेगा जैसे व्यावसायिक राजधानी में जीवित और मृत नेताओं के नाम पर द्वार बनाये जा रहे हैं। वैसे भी ऎसे द्वार इंसानों के तो किसी काम के नहीं होते, पर हाँ.. टाँग ऊँची कर मूतने वालों के लिए बहुत ज़्यादा उपयोगी होते हैं। सी एम जी ने रोज़गार, स्कूल, अस्पताल, वाचनायल या ऎसी कोई घोषणा नहीं की, जिसकी जनता को सख़्त ज़रूरत है। आख़िर हो क्या रहा है, यह लोकतंत्र है कि गम्मत तंत्र है ? जिसके मन में जो आता है, उस नाम की बिरंजी जनता के भाल पर ठोंक देता है। नाम बदल रहे हैं हालात नहीं। बंसी विचलित हो रहा है, लेकिन वह सप्रयास अपना काम कर रहा है। सी एम जी का भाषण ख़त्म हो गया। भारत माता की……. जै…… चन्द्रशेखर आज़ाद की….जै…..वन्दे…… मातरम्… कहने के बाद सी एम जी को चन्द्रशेखर आज़ाद की झोपड़ी के दर्शन करने ले गये। उधर से मस्त सोमलाओं और मंगलियों की भीड़ में से होते हुए लाने की बजाय नाले के ऊपर वाली रपट पर से ले आये। काफिला तैयार ही था, सी एम जी गाड़ी में बैठे और काफिला आगे बढ़ चला। वार्नर जीप में बैठे बंसी को गोसेन का हइकु याद आया और उसकी इच्छा हुई कि इस हाइकु को ज़ोर से चिल्लाकर कहे- हाँडी समाळो / कुतरा की आदत / चाटी जायग• । लेकिन जीप तेज़ी से बढ़ती गयी। बंसी ने जीप की आगे की सीट पर बैठे एम. के. डामोर से पूछा कि अभी और कितना घूमना बाक़ी है। डामोर ने सी एम जी के नाम बहुत दरियादिली से एक गाली ख़र्च करने के बाद कहा कि अभी तो कई गाँव-क़स्बे बचे हैं। लगता है, चप्पा-चप्पा घूमकर ही दम लेगा। बंसी ने कहा- हाँ, ह्रदय प्रेदश को एक नम्बर राज्य की बग़ल में खड़ा करने की जो ठानी है। अब तो पूरी रात ही काली होनी है। -पर एक बात तो है, डामोर ने कहा- सी एम जी है बड़ा गम्मत बाज। फिर से जीप में अँधेरा और ख़ामोशी ठसाठस भर गयी है। जीप अँधेरे में दौड़ रही है। भूखे खेत, उजाड़ टीले, लम्बे ताड़ और गहरे महुवे अँधेरे के बियाबान में खो गये है। डामोर क़िस्से से ठंड को लताड़ रहा है। बंसी की आँखें बंद है। वह अपने भीतर देख रहा है, ख़ुद के पैरों में भी घूँघरू बंधे हैं। बदन पर कपड़ों के नाम पर फाटली चड्डी और बुशर्ट है। भीतर रोशनी का झरना झर रहा है। झरने में सोमलाओं और मंगलियों के टुल्लर के टुल्लर भीग रहे हैं। कुछ आदिवासियों ने अपने हाथ या फिर पैर के अँगूठे को तीर से चीर लिया है और केसरा भील, छीतु भील, भुवान तड़वी के वशंजों के भाल पर सुर्ख़ ख़ून से तिलक कर रहे हैं। यह गद्दी पर बैठने की तैयारी है। कुछ भील माँदल, बाँसुरी, थाली बजा-बजाकर… पैरों में घूँघरू बाँधकर… कुर्राटी भरते हुए नाच रहे हैं… सभी आवाज़ें एकमेक हो रही हैं। सभी टुल्लर- होह………होह…...होह..…. कुर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… बंसी फाग की धून पर- हय.. गम्मत है भई.. गम्मत है- 2 यात्राओं की रेलम-पेल घोषणाओं की ठेलम-ठेलम टुल्लर- होह……..होह…….होह.. कुर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… बंसी- हय.. गम्मत है भई.. गम्मत है- 2 लोक नचेरा नाचे ख़ाली पेट क्रिस्टिना के ठुमके पे मंत्री लोटम-लोट टुल्लर- होह……..होह…….होह.. कुर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… बंसी- हय.. गम्मत है भई.. गम्मत है- 2 हाथ भर काँकड़ी ने सवा हाथ को बीज भूखी मरे जनता राजो मनावे तीज टुल्लर- होह……..होह…….होह.. कुर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… बंसी- हय.. गम्मत है भई.. गम्मत है- 3 जब बंसी के भीतर यह सब चल रहा था तभी डामोर ने पीछे गर्दन घुमाये बग़ैर पूछा- क्या हो गया वीडियोग्राफ़र साब, क्यों कुर्राटी भर रहे हो ? बंसी ने अपने कपड़े गीले होने की वजह खोजना ज़ारी रखते हुए डामोर से कहा- अं…. बस यूँ ही…दिनभर से एक जैसा माहौल देख रहा हूँ, तो ऎसे ही एक कुर्राटी मार दी। बंसी ने भगत सिंह की तरह जोश में जिसे बम की तरह फेंका था, वह दरअसल उसका हैंडी कैमरा था जो जीप के हुड से टकराने के बाद बँसी के पाँवों के पास ही पड़ा था। बंसी ने कैमरा उठाकर बैग में रखा। बंसी को फिर से ठंडी हवा लगने लगी। उसने महसूस किया पूरे बदन में एक जैसी ठंड लग रही है। भीतर ही भीतर संतोष किया। पैशाब नहीं, पूरे बदन से पसीना छूट रहा है, इसी वजह से कपड़े भीग गये हैं। अँधेरे का लम्बा-चौढ़ा समंदर पार कर आती आवाज़ का मग़ज़ में घुलना ज़ारी है- होह……..होह…….होह.. कुर्रर्र….. कुर्रर्र….. कुर्रर्र… ------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- रचनाकालः 18-6-10

1 टिप्पणी:

  1. मन को छुने वाली कथा, बहुत सुन्दर लगी. इसकी भाषा ने दिल मोहा. व्हाईट हाऊस के राक्षस के आगे गिड़गिड़ाते महादेव की परिकल्पना भी अच्छी लगी :)

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