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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

THE STONING OF SORAYA M.






In a world of secrecy, corruption and injustice, a single courageous voice can tell a true



story that changes everything.
This is what lies at the heart of the emotionally charged experience of THE STONING
OF SORAYA M. Based on an incredible true story, this powerful tale of a village’s persecution
of an innocent woman becomes both a daring act of witness and a compelling parable about
mob rule. Who will join forces with the plot against her, who will surrender to the mob, and
who will dare to stand up for what is right. It is both a classic fable of good and evil and an
inspiring tribute to the many fighting against injustice all around the world, THE STONING OF
SORAYA M. was a rousing runner-up to “Slumdog Millionaire” as the Audience Favorite at the
Toronto Film Festival.
Academy Award® nominee Shohreh Aghdashloo (“House of Sand and Fog”) stars in
the heroic role of Zahra, an Iranian woman with a burning secret. When a journalist (Jim
Caviezel, “The Passion Of The Christ,” “Déjà Vu”) is stranded in her remote village, she takes a
bold chance to reveal what the villagers will stop at nothing to keep hidden.




Thus begins the remarkable account of what happened to Soraya (Mozhan Marnò), a
kind, spirited woman whose bad marriage leads her cruel, divorce-seeking husband to conspire
against her, trumping up charges of infidelity, which carry an unimaginable penalty. Moving
through a minefield of scheming, lies and deceit, Soraya and Zahra will attempt to prove
Soraya’s innocence in a legal system stacked against her. But when all else fails, Zahra will risk
everything to use the only weapon she has left – her fearless, passionate voice that can share
Soraya’s story with a shocked world.
THE STONING OF SORAYA M. is inspired by Paris-based journalist Freidoune
Sahebjam’s acclaimed international best-seller of the same name which, rife with intrigue and
moral outrage, first brought global attention to the real Soraya, who in 1986 was buried to her
waist in her hometown square and stoned to death by her fellow villagers.
Director Cyrus Nowrasteh, along with his wife and fellow screenwriter Betsy Giffen
Nowrasteh, saw in Soraya one story that stands for thousands of untold tales around the world,
from Africa to Asia, from Europe to America, wherever people are battling prejudice and
injustice. Their screenplay takes the hard facts surrounding Soraya’s fate and carves from them
a lyrical, fable-like passion play that gets under the skin by posing a provocative question: who
among us would throw stones and who would take a stand against them?

नाज़िम हिकमत की लम्बी कविता

तुर्की कवि नाज़िम हिकमत का जन्म 1902 में सलोनिका, ओट्टोमान साम्राज्य ( वर्तमान में ग्रीस का एक राज्य ) में हुआ. घर में रचनात्मक माहौल होने के कारण उन पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ा. कवि होने के साथ-साथ वे नाटककार और उपन्यासकार भी थे. उच्च शिक्षा के लिए नाज़िम मॉस्को गए, जहाँ रहते हुए वे दुनिया भर के कई लेखकों, कवियों और कलाकारों के संपर्क में आए. 1928 में रूस से तुर्की वापस आकर एक प्रूफरीडर, पत्रकार और अनुवादक के बतौर काम करते हुए नाज़िम के कई कविता संग्रह प्रकाशित हुए. अपनी वामपंथी विचारधारा और क्रांतिकारी गतिविधियों के कारण जीवन का एक लम्बा अरसा उन्हें जेल में ही बिताना पड़ा. 1951 में हमेशा के लिए तुर्की छोड़ कर वे तत्कालीन सोवियत संघ चले गए, कुछ समय के लिए यूरोप भी रहे और अंत तक अपनी विचारधारा के लिए काम करते रहे. 1963 में ह्रदयाघात के कारण मॉस्को में ही उनका निधन हुआ.
प्रस्तुत है, अपने जेल के दिनों में उनके द्वारा लिखी गयी एक लम्बी कविता :





जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया

नाज़िम हिक़मत











जब से मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
पृथ्वी सूरज के गिर्द दस चक्कर काट चुकी है

अगर तुम पृथ्वी से पूछो,
वह कहेगी- यह जरा-सा वक़्त भी कोई चीज़ है भला !
अगर तुम मुझसे पूछो,
मैं कहूँगा- मेरी ज़िन्दगी के दस साल साफ़ !

जिस रोज मुझे क़ैद किया गया
एक छोटी-सी पेंसिल थी मेरे पास
जिसे मैंने हफ़्ते भर में घिस डाला।
अगर तुम पेन्सिल से पूछो,
वह कहेगी- मेरी पूरी ज़िन्दगी !
अगर तुम मुझसे पूछो, मैं कहूँगा- ले भला, एक हफ़्ता ही तो चली !

जब मैं पहले-पहल इस गड्ढे में आया-
हत्या के जुर्म में सजा काटता हुआ उस्मान
साढ़े सात बरस बाद छूट गया।
बाहर कुछ अर्सा मौज़-मस्ती में गुज़ार
फिर तस्करी में धर लिया गया
और छः महीने बाद रिहा भी हो गया
कल किसी ने सुना-उसकी शादी हो गई है
आते बसन्त में वह बाप बनने वाला है।

अपनी दसवीं सालगिरह मना रहे हैं वे बच्चे
जो उस दिन कोख में आए
जिस दिन मुझे इस गड्ढे में फेंका गया।
ठीक उसी दिन जनमे
अपनी लम्बी छरहरी टाँगों पर काँपते बछड़े अब तक
चौड़े कूल्हे हिलाती आलसी घोड़ियों में तब्दील हो चुके होंगे।
लेकिन जैतून की युवा शाखें
अब भी बढ़ रही हैं।

वे मुझे बताते हैं
नयी-नयी इमारतें और चौक बन रहे हैं
मेरे शहर में जब से मैं यहाँ आया
और उस छोटे-से घर मेरा परिवार
अब ऎसी गली में रहता है,
जिसे मैं जानता नहीं,
किसी दूसरे घर में
जिसे मैं देख नहीं सकता।

अछूती कपास की तरह सफ़ेद थी रोटी
जिस साल मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
फिर उस पर राशन लग गया
यहाँ, इन कोठरियों में
काली रोटी के मुट्ठी भर चूर के लिए
लोगों ने एक-दूसरे की हत्याएँ की,
अब हालात कुछ बेहतर हैं
लेकिन जो रोटी हमें मिलती है,
उसमें कोई स्वाद नहीं।

जिस साल मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
दूसरा विश्व युद्ध शुरू नहीं हुआ था,
दचाऊ के यातना शिविरों में
गैस भट्ठियाँ नहीं बनी थीं,
हीरोशिमा में अणु-विस्फोट नहीं हुआ था।

आह, समय कैसे बहता चला गया है
क़त्ल किए गये बच्चे के रक्त की तरह।
वह सब अब बीती हुई बात है।
लेकिन अमरीकी डालर
अभी से तीसरे विश्व युद्ध की बात कर रहा है
तिस पर भी,
दिन उस दिन से ज्यादा उलझे हैं
जबसे मुझे इस गड्ढे में फेंका गया
उस दिन से अब तक मेरे लोगों ने ख़ुद को
कुहनियों के बल आधा उठा लिया है
पृथ्वी दस बार सूरज के गिर्द
चक्कर काट चुकी है………..

लेकिन मैं दोहराता हूँ
उसी उत्कट अभिलाषा के साथ
जो मैंने लिखा था अपने लोगों के लिए
दस बरस पहले आज ही के दिन

तुम असंख्य हो
धरती में चीटियों की तरह
सागर में मछलियों की तरह
आकाश में चिड़ियों की तरह
कायर हो या साहसी, साक्षर हो या निरक्षर,
लेकिन क्योंकि सारे कार्यों को
तुम्हीं बनाते या बर्बाद करते हो,
इसलिए सिर्फ़ तुम्हारी गाथाएँ
गीतों में गायी जाएँगी
बाक़ी सब कुछ
जैसे मेरी दस वर्षों की यातना
फालतू की बात है।

( अनुवाद: नीलाभ )