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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

श्याम बेनेगल गंभरी सिनेमा के फ़िल्मकार

भारतीय सिनेमा को अंकुर, निशांत, मंथन और भूमिका जैसी कलात्मक फ़िल्में देने वाले प्रसिद्ध फ़िल्मकार श्याम बेनेगल ने पिछले दिनों दिल्ली के इंटरनेशनल सेंटर सभागार में भारतीय सिनेमा में परंपरा, आधुनिकता और उत्तर आधुनिकता’ विषय पर अपने व्याख्यान के दौरान यह कहते हुए अफ़सोस जाताया कि आज के भारतीय सिनेमा से ग्रामीण भारत एकदम गायब होता जा रहा है। अलबत्ता, उन्होंने कहा कि यह ग्रामीण भारत अब भोजपुरी सिनेमा में नज़र आता है।

आमतौर पर सिनामा में क्या होता है और ख़ासतौर पर से मनोरंजन के नाम से पर क्या-क्या होता है, यह बताते हुए बेनेगल ने इसके बरक्स सत्यजीत राय की फ़िल्मों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राय ने सिनेमा की भाषा को समझा और उसे सौंन्दर्य बोध बनाया। भारतीय सिनेमा पर उनका प्रभाव महत्त्वपूर्ण और अविस्मरणीय है। उन्होंने कह कि सत्यजीत राय, ऋत्विक घटक वगैरह और उनके (बेनेगल) व उनके बाद के कई फ़िल्मकारों की फ़िल्मों को मुख्यधारा का सिनेमा न मानकर, समांतर सिनेमा कहा जाना ग़लत है। उन्होंने कहा कि फ़िल्में सदा ही मनोरंजन करें यह ज़रूरी नहीं है। ख़ुद की फ़िल्मों का ज़िक्र करते हुए कहते कि मैं दर्शकों बाँधना, झकझोरना और चुनौती देना चाहता हूँ। जूनून, त्रिकाल, सूरज का सातवाँ घोड़ा और वैलकम टु सज्जनपुर जैसी दूसरी कई संवेदनशील फ़िल्में बनाने वाले बेनेगल ने आरंभ में राजा राममोहन राय के सामाजिक आँदोलन और रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा परंपरागत समाज को बदलने की शुरूआत का उल्लेख करते हुए बताया कि बगांल में पुनर्जागरण के सूत्रधार वास्तव में टैगोर रहे है। श्री बेनेगल कहते है कि सिनेमा मानवीय स्थितियों को दर्शाने वाला आदर्श माध्यम है, और परंपरागत मूल्यों से जुड़े सिनेमा के तौर पर कुछ कुछ होता है, बागबान का उदहारण दिया, तो वहीं सिनेमा में आए कुछ आधारभूत परिर्वतन के तहत ‘ बंटी और बबली’ व सरकार को उत्तर आधुनिक सिनेमा का उदहारण बताया। आधुनिक सिनेमा की चर्चा करते हुए बेनेगल ने कहा कि तकनीकी क्रांति से सिनेमा की पहुँच वैश्विक हुई है।

इस मशहूर और एक ख़ास नज़रिए और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध फ़िल्माकार की एक चर्चित फ़िल्म समर का प्रदर्शन बिजूका लोक मंच के बिजूका फ़िल्म क्लब में रविवार 17 जनवरी 2010 को शहीद भवन, इन्दौर में रखा गया। ‘समर’ देखने वाले दर्शकों ने कहा कि-

सुश्री सजला श्रोत्रियः फ़िल्म बहुत ही संवेदनशील मुद्दे को केन्द्र में रखकर बनी है। मेरे गाँव दर्जी कराडड़िया में भी यह समस्या है। मैं चाहती हूँ कि इस फ़िल्म को मेरे गाँव में दिखाया जाये, ताकि लोग कुछ सोचे-विचारे। मैं इंदौर के आसपास कई गाँवों में अपनी नौकरी और काम के सिलसिले में जाती हूँ और इस छुआछूत जैसी इस समस्या को बहुत क़रीब से देखती हूँ।

इदरीश अंसारीः फ़िल्म में दलितों का शोषण दिखाया गया है। मैं कुलर, ए सी, फ्रीज आदि सुधारने का आउटडोर काम करता हूँ। काम के सिलसिले में एक बार धार रोड पर एक गाँव में एक व्यक्ति के यहाँ फ्रीज सुधारने गया, तो मुझे नहीं मालूम था कि वह किस जाति का है। लेकिन जब फ्रीज सुधारकर उसके घर से निकला, तो कुछ जान-पहचान के लोग मिल गये, जिनके यहाँ मैं कभी कुछ सुधारने गया था। उन्होंने मुझे कहा कि तुम इस नीच के यहाँ क्यों गये ? और ये ऎसा पैसे वाला हो गया कि फ्रीज भी ख़रीद लाया। और कहा कि अब हम तुम्हें अपने यहाँ कभी कुछ सुधरवाने नहीं बुलाएँगे। यह फ़िल्म दलितों की समस्या पर को अच्छे से उभारती है।

रेहाना हुसैनः अत्याचार करने वाला और सहने वाला दोनों ही बराबर के दोषी है। लेकिन इन मुद्दों को समझने और इनके ख़िलाफ़ लड़ने के लिए शिक्षा की ज़रूरत है। शिक्षा हर आदमी को मिले यह व्यवस्था देखना सरकार की ज़िम्मेदारी है। शिक्षा को महज़ संयोग नहीं मानना चाहिए उस पर छोटे-बड़े सभी वर्ग के लोगों का समान हक़ है। लेकिन अफ़सोस की बात यही है कि इस व्यवस्था में हक़ के लिए लड़ना भी गुनाह मान लिया जाता

रोहितः फ़िल्म अच्छी लगी। फ़िल्म में ठाकुर लोग ग़रीबों के साथ जो बुरा बर्ताव करते हैं, वह बुरा लगा।

प्रत्यक्षः मैंने अपने स्कूल कॉलेज में कभी ऎसा नहीं देखा, जैसा इस फ़िल्म में लोगों के साथ होना दिखाया गया। हाँ इससे उलट बात होते ज़रूर सुनी। हमारे साथी छात्र सोचते हैं और कहते भी हैं कि डाक्टर, इंजीनियर या किसी भी तरह की पढ़ाई या नौकरी की प्रतियोगिता हो। दलित लोगों को आरक्षण मिल जाता है। फिर वह भलेही केवल जाति से दलित हो और आर्थिक रूप से बहुत सक्षम हो। आरक्षण को जातिगत नहीं वर्गीय आधार पर या कहें कि आर्थिक रूप से कमज़ोर छात्रों को देना चाहिए। लेकिन ख़ास जिनको आरक्षण की ज़रूरत होती है, वे तो दूर ही रहते हैं और वह आरक्षण लाभ किसी आय.पी.एस, आय.ए.एस या नेताओं की संतानों को या वे जिनकी सिफारिश कर दे उनकों ही मिलता है।

चन्द्रशेखर बिरथरेः फ़िल्म का कथानक बहुत ही ज़ोरदार है। यह स्थिति समाज में आज भी व्याप्त है। धर्म कब शिक्षित होगा ? आज भी लोग लकीर के फ़क़ीर हैं। देश को आज़ाद हुए बासठ बरस हो गये हैं, पर लगता नहीं। ब्राहम्ण, ठाकुर या पटेल छोटी जातियों के लोगों से आख़िर किस मामले में अलग है। वे भी तो एक इंसान ही हैं। फिर इंसान और इंसान में इतना भेद क्यों है ? फ़िल्म का एक पात्र जिसका नाम मुरली है, वह बहुत कुछ पूर्वाग्रह के आधार पर भी करता है। फ़िल्म में एक कविता बहुत ही ख़ूबसूरती से उपयोग और पाठ हुआ है। प्रकृति किसी के साथ पक्षपात नहीं करती है।फ़िल्म में जो दिखाया गया है, वह जाति से ज़्यादा वर्गीय संघर्ष है। यह बरसों से चलता आ रहा है और अभी जाने कब तक चलेगा

दिव्या पंडितः मैं समझती हूँ कि किसी पर दोष मड़ने की बजाय ख़ुद को बदलने का प्रायास निरंतर करते रहना चाहिए। समाझ में सकारात्मक बदलाव की बेहद ज़रूरत है। फ़िल्म का संदेश भी यही है।
सीमाः छोटी जात की एक महिला कुएँ पर पानी भरने जाती है, तब उसके साथ एक ठाकुर की औरत बहुत ख़राब बर्ताव करती है। ग़रीब महिला एक तो उसे उठाकर उसका कर्ण फूल देती है, और ऊपर से वह उस पर बर्तन फेंक कर मारती है। यह सरसर ग़लत है। पुलिस वाले भी छोटे लोगों को ग़ाली-गलोच देते हैं, डराते-धमकाते हैं। ऎसे लोगों के ख़िलाफ़ लोगों को सामूहिक आवाज़ उठाना चाहिए।

सुरेश उपाध्यायः देपालपुर के पास एक बनेड़िया गाँव है। वहाँ हरिजन बस्ती में एक बार जाने का काम पड़ा था। मैंने देखा कि एक हैंडपम्प जो हरिजन बस्ती से थोड़ी दूरी पर था। उसके आस पास तार फेन्सिग की हुई थी। मैं जिसके यहाँ गया था, उससे पूछा, तो उसने बताया कि वह उधर पटेल का घर है। हैंडपम्प सरकारी है पर वह हमें पानी नहीं भरने देता। मैंने कहा कि शिकायत क्यों नहीं करते। वह बोला- शिकायत कई बार की, जब भी पुलिस गाड़ी आती है, पटेल को पहले से ही पता चल जाता है। तार हटा लेते हैं। पुलिस उलटी हमें डांटती है कि हम झूठी शिकायत करते हैं। समाज को शिक्षा की ज़रूरत तो है,पर वह कैसी हो ? यह हमारे बड़े-बड़े विद्वान या तो जानते नहीं या देना नहीं चाहते।

इदरीश खत्रीः 1857 की क्रांति के 150 वर्ष पूरे होने पर मैं कुछ छात्रों और कलाकारों को लेकर गाँव-गाँव नुक्कड़ नाटक करने गया था। मेरे भी अनुभव जातिगत व्यवस्था को लेकर अच्छे नहीं है। गाँव में नाटक करने से पहले हमें वहाँ के सरपंच से अनुमति लेना होती थी। एक आवेदन पर सरपंच के हस्ताक्षर करवाने होते थे। एक गाँव में मैंने एक अच्छे ख़ासे आदमी से पूछा कि हमें नाटक करना है। सरपंच साहब कहाँ मिलेंगे, उनके हस्ताक्षर करवाना है। उसने पूरी बात समझने के बाद कहा कि चलो मेरे साथ। वह एक बढ़िया घर पर ले गया। बग़ल में ही खेत पर काम करने वाले अपने नौकर को बुलाया और कहा- ले इना काग़ज़ पे थारी घरवाली को अंगूठो लगवई ला।
मैं समझ गया था। उस गाँव की सरपंज उस ठाकुर के नौकर की बीवी थी, जो उसके खेतों में काम कर रही थी। अब वहाँ की पँचायत कैसी चलती होगी और पँचायत में आने वाली राशि का क्या होता होगा, समझा जा सकता है।

सत्यनारायण पटेलः रेहाना ने कहा कि समाज शिक्षा की सख्त ज़रूरत है। सुरेश उपाध्यायजी ने कहा- यह सोचने की ज़रूरत है कि शिक्षा कैसी दी जाये ? बातचीत में सभी साथियों ने दलित और तथाकथित स्वयं द्वारा घोषित ऊँची जाति के बीच चल रहे भेद-भाव पर खुलकर बात की। मैं समझता हूँ कि एक सही राजनीति शिक्षा की समाज को बेहद ज़रूरत है। ऎसी राजनीतिक शिक्षा जो जाति, और दलगत, क्षेत्रिय टुच्ची राजनीति से ऊपर उठकर समाज में परिवर्तन की लहर पैदा कर सके। इस देश और दुनिया में ऎसी शिक्षा मौजूद भी है। उसके कई जानकार भी है। लेकिन आज सवाल जानकारों की निस्ठा पर है। बार-बार देश में घटने वाली तमाम घटनाओं से ऎसा प्रतीत होता है, कि जो देश में परिर्वतन करने को निकले थे, वे ख़ुद परिर्वतित हो गये हैं। वे बदले उनके पक्ष में है, जो देश में इस सड़ी-गली व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। आज इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करना जितना ज़रूरी है, उससे कहीं ज़्यादा उन जानकारों के ख़िलाफ़ भी आवाज़ बुलंद करने की ज़रूरत है, जो जनता को बदलाव का सुनहरी सपना दिखाकर ठग रहे हैं। चीज़े या परिस्थिति कह लो बुरी तरह से गडमड हो गयी है। लोग क्रांतिकारियों का मुखौटा पहनकर या कहो कि लेनिन, शहीद भगत सिंह, चे ग्वेरा और फिदेल कस्त्रो जैसे लोगों का नाम लेकर लोगों को धोका देने लगे हैं। ऎसे लोग जो प्रगतिशील विचारों से ख़ुद को संपन्न बताते हैं। असल में वे प्रगतिशील विचारों के दलाल साबित हो रहे हैं। आज वे जनता के पेट पर सजने वाले मंच पर बैठने में गौरव महसूस करने लगे हैं। प्रगतिशीलता की बात करना और उस पर अमल करने में बड़ा फर्क़ नज़र आने लगा है। इसे पहचानने और इससे बचने की भी ज़रूरत है। फ़िल्मकार ने इस फ़िल्म में समाज के वर्गीय द्वंद्व को ख़ूबी से प्रस्तुत किया है। अपनी बात समाप्त करते हुए मुझे जॉन रस्किन की एक बात याद आ रही है कि हम जो सोचते हैं और विश्वास करते हैं, उससे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है कि हम क्या करते हैं। जो मुझे लगता है कि आज के छद्म प्रगतिशील समाज पर कॉफी सटीक है।

यह आयोजन चल रहा था तभी कॉ. ज्योति बसु के निधन की ख़बर मिली। कार्यक्रम की समाप्ति के उपरांत बिजूका लोक मंच के साथियों ने कॉ. ज्योति बसु को श्रद्धांजलि दी।
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बिजूका लोक मंच
संपर्कः bijukaindore@gmail.com, ssattu2007@ gmail.com, 09826091605, 0939852064, 09300387966, 09302031562, 09893200976, 64, शहीद भवन , न्यू देवास रोड, ( राजकुमार ओवर ब्रीज के पास) इन्दौर (म.प्र.)

थाली में जहर

MUST READ!!!

POISON ON THE PLATTER

We are all heading towards such a disaster, against which all other disasters will stand nowhere। This article is not a part of any horror movie। It is a truth which will display that our health, food and environment are main targets of this new ‘MAN MADE DISASTER’

We all depend on food to live। But have we ever thought of the results if the same food goes against us? The truth is that some Multinational Companies (MNCs) are serving POISON ON THE PLATTER by introducing Genetically Modified (GM) food। They are making it as a source of their tremendous wealth.

Very few of us may know that in this technology, genes of plant seeds can be modified with that of animals, insects or micro-organisms। As such DNA of pig & rice, fish & tomato, bacteria & brinjal can be intermingled। This is all done in the name of increasing food production.

In 1989, 100 people died and up to 10,000 became disabled in US after consuming a drug named L-tryptophan which contained GM ingredients। Its manufacturer was a Japanese company। It was fined with a huge sum of 200,000,000$ by a US court.

In UK, after consuming GM Soya, allergy problems in the people increased drastically।

In Germany, during an experiment on GM corn, 12 cows died। In Philippines, a complete village was infected by severe skin problems after pollen grains of BT cotton spread in the air. The list of such incidents is endless.

According to Swami Ramdev and Jeffery M। Smith (Founder, institute of Responsible technology), using this technology is none other than madness and ignorance.

The irony is that Food & Drug Administration; USA has been approving these foods for a long time। Today, MNCs like Monsanto, Syngenta, and Bayer etc. have entered into the field and are polluting the environment by this new biological ‘Terrorism’.

In Europe, after this technology was welcomed, Bovine growth hormone was injected into the cows to increase milk production। But the growth of Prostate cancer in cows shocked the respective authorities. As such mad cow disease grew exponentially which resulted in the slaughter of thousands of animals!

20 out of 24 European Union countries (Switzerland, France, Italy, Austria, Greece, Poland etc।) have put a ban on the commercial cultivation of GM crops. At this point of time, India is welcoming the same. It is because most of the Indians don’t even know about GM food and its ill effects.

According to Mr। Devinder Sharma, Food & Policy Research analyst, this technology can hurt the ethical, religious and moral values of the people of India as GM food uses the genes of animals, insects and other organisms।

Growth of several skin problems in the areas of BT cotton farms; death of hundreds of sheep in Andra Pradesh, Haryana & Punjab after eating leaves of BT-cotton plants by them; warning by several scientists against BT Brinjal; decrease in soil productivity in the areas of its growth; and many of such incidents & experiments prove the disastrous effects of this technology।

Most of the edible product making companies of US use genetically modified (GM) ingredients। Doritos chips made by PepsiCo and many other brands which contain GM ingredients are imported illegally in India. Even this can’t be said for sure that companies like Domino, Pizzahut, and McDonald etc. are serving us the safe food.

Its high time all of us must act upon the problem. The time has come when consumers, farmers, students and bureaucrats must protest against it. It is better to protest together than to die together, since it has become a question of human existence.


Surendra Kumar Thakkar
BIZOOKA RANGMANCH












नई दुनिया अपना विवेक और साख खो रहा है


30 जनवरी 2010 को नई दुनिया अख़बार में श्री आलोक मेहता का लेख ‘ बदलेगा लाल दीवार का रंग’ पढ़ा। लेख के शीर्षक ही से लगता है कि आलोकजी ने यह भविष्यवाणी की है। क्योंकि अभी प. बंगाल में चुनाव होना बाक़ी है। चुनाव के बाद मालूम होगा कि दीवार का रंग लाल ही है या तीन रंग का हो गया है और इसी आधार पर यह साबित होगा कि श्री आलोकजी कितने काबिल ज्योतिष है ?

श्री आलोक जी को जानने वाले जानते हैं कि वे किस काबिलियत से आउट लुक हिन्दी के संपादक और फिर कैसे नई दुनिया के प्रबंध संपादक की कुर्सी तक पहुँचे ? स्वाभाविक है, जानने वाले इससे पहले के श्री आलोकजी को भी जानते होंगे और जब वे न इस कुर्सी पर थे, न उस कुर्सी पर, तब के आलोकजी को भी जानते ही होंगे। भई… कोई भी मुकाम हासिल करने में मेहनत ख़ूब करनी पड़ती है। श्री आलोकजी भी मेहनती तो है ही। मेहनत के ही दम पर आज वे नई दुनिया के इतने महत्त्वपूर्ण पद पर हैं।

कुछ लोगों को सबकुछ जान लेने का शौक होता है। वे अपने इस शौक को पूरा करने के लिए भी काफी मेहनत करते हैं।जब वे जान लेते हैं, तो जाने अनुसार ही संबंधित इंसान का नामकरण करते हैं, यानी वह नाम जो स्कूल में लिखवाया जाता है, उससे अलग भी कुछ नाम रखते हैं। असल में असल नाम वही होते हैं, जो स्कूल में दर्ज़ नाम से अलग होते हैं। क्योंकि ये नाम इंसान की आदतों, काम, रंग और ऎसी ही विशेषताओं को ध्यान में रखकर रखे जाते हैं, जो उन पर पूरी तरह सटीक बैठते हैं।

ऎसे नाम एक ही इंसान के एक से ज़्यादा भी हो सकते हैं। जैसे किसी का नाम- जुगाड़ू होता है। जुगाड़ू यानी जो किसी भी तरह से कुर्सी, नौकरी, सम्मान या कुछ और …..का जुगाड़ करने में उस्ताद हो, वह जुगाड़ू। ऎसे ही गिरगिट, बग़ैर पैंदे का लोटा, सत्ता का दलाल.. पेशकार, चापलूस, चमचा…आदि जैसे कई नाम होते हैं। ऎसे नाम किसी को भी जब दिये जाते हैं, तो वे ही देतें हैं, जो उन्हें बेहतर ढंग से जानते हैं। भई ….अपन श्री आलोकजी को ज़्याद नहीं जानते, लेकिन नई दुनिया में उनके लेख पढ़ते हुए जितना जाना,उसके मुताबिक अपन को तो वे ‘काँग्रेस के प्रवक्ता’ की भूमिका में नज़र आ रहे हैं। सो जनाब प्रवक्ता नाम ही ठीक जँचता है। बाक़ी जो ज़्यादा बेहतर जानते होंगे वे ज़्याद ख़ूबसूरत नाम देंगे। किसी ने दे भी रखा होगा, तो आगे पीछे अपन को पता चलेगा ही। ख़ैर…… मुद्दे की बात पर चलते हैं।

लेख पढ़ते हुए लगता रहा कि जनाब प्रवक्ताजी ने लेख को बहुत मेहनत से लिखा है। शायद इतनी मेहनत तो उन्होंने उस लेख में भी नहीं कि थी जिसमें उन्होंने अंरूधती राय के लेखन और काम को दो कोड़ी का और शौकिया सिद्ध करने की कोशिश की थी। इसमें उन्हें निशिचत रूप से ज़्यादा सिर्शासन करने की ज़रूरत पढ़ी होगी। क्योंकि अंरूधती राय वाले मामले में केवल उसके एक दो लेख को कुतर्क की कैची से कतरना था और अंरूधती राय कैसी भव्य पार्टियों में जाती है, क्या पीती-खाती है यही भर बताना था !
‘बदलेगा लाल दीवार का रंग’ लेख में उन्हें किसी एक व्यक्ति पर कुतर्कों से प्रहार नहीं करना था। इस लेख में एक बहुत विकसित विचारधारा को मानने वाली पर्टी के कामों को कुतर्क से ख़राब साबित करने की ज़िम्मेदारी निभाना थी, और बापड़े जनाब प्रवक्ताजी ने कोशिश भी जी तोड़ की। अपन को उनकी इस जी तोड़ कोशिश का सम्मान भी करने में कोई हर्ज़ा नी है। हालाँकि पद्मश्री सम्मान की तुलना में अपना सम्मान तो धतूरे का फूल ही है, फिर भी सम्मान।

सभी वामपंथी पार्टियाँ दूध की धूली हैं, यह अपन भी नहीं कहते-सोचते। जो ग़लत है, सो ग़लत है, और उसकी आलोचना करने का हक़ हरेक को है। लेकिन देखना होगा, कितना कहाँ, ग़लत कितना कहाँ सही है। लोगों ने ग़लत की सही आलोचना की है, या सही की ग़लत अलोचना। समझदार पार्टियों ने समय-समय पर अपनी भूल-ग़लतियों को स्वीकार कर सुधारने का साहस भी दिखाया है, जबकि साम्राज्यवादी पार्टियों ने अपनी एक ग़लती को छुपाने के लिए फिर..फिर.. ग़लतियाँ दोहरायी हैं। ग़लतियाँ दोहराने और ग़लतियों को सही ठहराने की काँग्रेस और भाजपा को विशेषग्यता हासिल है, इस बात से दुनिया वाक़िफ़ है। लेकिन अफ़सोस नई दुनिया के प्रबंध सम्पादक अर्थात जनाब प्रवक्ता को जाने किस दृष्टिदोष के चलते काँग्रेस की ग़लतियाँ भी उपलब्धियाँ नज़र आ रही है। भई.. जनाब प्रवक्ता जी के दोनों लेख किसी भी दृष्टि से तर्क संगत नहीं हैं, इतना कहने का हक़ तो नई दुनिया का पाठक होने के नाते अपना भी बनता है। और कहने में भी कोई हिचक नहीं कि दोनों ही लेख में जनाब प्रवक्ता अपने कुतर्कों सहित औंधे मुँह गिरे हैं।

जनाब प्रवक्ता जी ने अपने लेख में सन 1939 से 1975 के इतिहास में दर्ज़ घटनाओं का विशेलेषण भी बड़े ही उटपटाँग ढंग से किया है, जिससे सहमत होना तो दूर की बात है, पर उसे पढ़कर उनकी अग्यानता पर आती हँसी को रोकना भी कम कठिन काम नहीं है। वे इस काल खण्ड की बात करते हुए 1954 में राज्य के शिक्षकों के हक़ की लड़ाई में कॉ ज्योति बसु ने कितनी दृड़ता से संघर्ष किया था। राज्य सरकार को घूटने टेकने पर विवश कर दिया था। 1970 में श्रमजीवियों का आंदोलन इस ताक़त के साथ उभरा था कि तात्कालीन मुख्यमंत्री श्री अजय मुखर्जी को इस्तीफा देना पढ़ा था। श्री अजय मुखर्जी ने 16 मार्च 1970 को इस्तीफा दिया था और 31 मार्च 1970 को पटना रेलवे स्टेशन पर कॉ ज्योति बसु पर गोली चलाई गयी थी। यह अंदाजा लगाया जा सकता है, इस गोली चालान के पीछे किस पार्टी के होनहार नेताओं का हाथ था। ऎसी कई घटनाएँ गिनायी जा सकती है, जिससे साम्रज्यवादी पार्टियों के सड़यंत्रों की पोल खुलती है। लेकिन जनाब प्रवक्ता जी को वह सब याद नहीं है। यह कैसा अल्जाइमर्स है भई ..? जो कम्यूनिस्टों की केवल अच्छाइयों को ही भूलाता है… ?

लेख में कई नक्शलवादी, माओवादी संगठनों के नाम लेकर यह बताने की कोशिश की है कि उनकी समझ इन संगठनों के बारे में भी ख़ासी अच्छी है। लेकिन इन संगठनों की राजनीति में, काम करने के तौर-तरीक़े में और दूसरी वामपंथी पार्टियों की राजनीति और काम-काज के तौर-तरीक़ो को जब वे एक ही पलड़े में तोलते हैं, तो उनकी बुद्धि पर तरस खाने से ज़्यादा क्या किया जा सकता है ? हद तब हो जाती है, जब वे सिद्धार्थ शंकर राय द्वारा अपने मुख्यमंत्रीत्व काल में हक़ और इंसाफ़ की लड़ाई लड़ने वालों के क़त्लो-गारत को भी सही मानते हैं। बात यहीं ख़त्म नहीं होती है, श्रीमती इंदिरा गाँधी द्वारा लगाई गयी इमरजेंसी को भी क़ानून व्यवस्था बनाने के लिए उठाया गया क़दम मानते हैं। वे कॉ. चारू मजूमदार और कॉ. विनोद मिश्र को इस तरह से संबोधित करते हुए लिखते हैं, जैसे ये सख़्श इंसानियत के हक़ में सोचने-विचारने और लड़ने वाले नहीं थे, बल्कि रामगोपाल वर्मा टाइप के फ़िल्मकार की किसी फ़िल्म के टपोरी थे। अगर जनाब प्रवक्ता महोदय कॉ. भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद और अश्फ़ाक उल्ला ख़ाँ के समय पर हुए होते, तो ये उनकी राजनीतिक गतिविधियों को भी आतंकी गतिविधियाँ कहने से नहीं चूकते।

आज़ादी के बाद से रायसीना के टिले पर अगर सबसे ज़्यादा किसी पार्टी का क़ब्जा रहा है, तो वह एक मात्र काँग्रेस पार्टी ही है। काँग्रेस चाहती तो अभी तक देश को विकास की दौड़ में बहुत आगे ले आती, लेकिन काँग्रेस की रग-रग में दौड़ने वाला ख़ून इतना दूषित हो गया कि उसने देश के सर्वांगिण विकास के बारे में कभी सोचा ही नहीं। हाँ… सोचने का ढोंग ज़रूर करती रही। योजनाएँ भी बनाती रही और बजट भी पास कारती रही। लेकिन विकास के नाम पर जो बजट आवंटित किया, वह उनके मंत्रियों की तिज़ोरियों, और तिज़ोरियाँ छोटी पड़ी, तो स्वीस बैंक के खातों में जमा हो गया। योजनाएँ काग़ज़ों पर ज़्यादा बनी, और काग़ज़ों पर निर्मित हुई और फिर अगले बजट से पहले नष्ट भी हो गयी। आज देश के ग़रीब, आदिवासी, दलित और किसान अगर इतने ज़्यादा पिछड़े हुए हैं, तो उसकी सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदार काँग्रेस पार्टी ही है, जिसकी वकालात जनाब प्रवक्ता कर रहे हैं। जनाब प्रवक्ता जी ने पद्म श्री तो पिछले बरस ही प्राप्त कर लिया था, अब काँग्रेस की अंधभक्ति कर किस फल की ताक में हैं ? भई.. अपन को नहीं मालूम।

हाँ… अपन को यह ज़रूर मालूम है कि जो निजी स्वार्थ के लिए सत्ता की ग़लत नीतियों को भी सही साबित करने पर तुला होता है। जो जन विरोधी सत्ता के पक्ष में अपने मंच से लिखकर, भाषण देकर, गाकर सत्ता की ग़लत नीतियों को सही साबित करते हुए प्रचार-प्रासार करता है। या फिर जन विरोधी सत्ता के जलसों में शामिल होकर, अपनी उपस्थिति से आम जन में यह संदेश पहुँचाता है कि देखो…., सत्ताधीश बापड़ा कितना भला है। उसने हमें अपने मंच पर जगह दी। अपनी बात कहने का अवसर दिया। ऎसे सब अव्वल दर्जे के महामहिमो को जनता कुछ न कुछ नाम देती हैं। इधर मालवा-निमाड़ में पिछले 24-25 बरस से अपने हक़ और न्याय की लड़ाई लड़ने वाले नर्मदा बचाओ आंदोलन, आदिवासी मुक्ति संघर्ष जैसे संगठन वाले सत्ता के क़रीबियों और ऎसे महामहिमो के बारे में कुछ यूँ कहते हैं- सत्ता के दलालों को .. .. जूते मारो…. को। समझ गये न…।

जनाब प्रवक्ताजी का लेख पढ़कर समझ में आता है कि सत्तासीन साम्राज्यवादी ताक़तों ने अख़बारों और उनके कर्मचारियों (माफ करना, ऎसे लोगों को पत्रकार कहने का मतलब श्री राजेन्द्र माथुर और राहुल बारपुते जैसे लोगों की तौहिन होगी।) को किस हद तक पालतू बना लिया है। भई… अपन को तो ऎसा ही लगा, इसलिए अपन उस लेख से सफ़ा-सफ़ा असहमत है।

चूँकि ‘नई दुनिया’ अख़बार की एक ख़ास पहचान रही है। वह पहचान श्री राहुल बारपुते, श्री राजेन्द्र माथुर जैसे महान पत्रकारों के दम पर बनी थी। लेकिन अब लगता है, अख़बार की पहचान पहले की पहचान से उलट अर्थ में फैल रही है। यह देख जानकर दुख होता है कि जिस अख़बार को पिछले पच्चीस-तीस बरस से पढ़ते हुए अपन बड़े हुए । जिसमें छपने वाली सामग्री पर भरोसा करते रहे, अब उस पर से भरोसा उठ रहा है। नई दुनिया अपना विवेक और साख खो रहा है।

सत्यनारायण पटेल
बिजूका लोक मंच,
इन्दौर
bizooka2009.blogspot.com
09826091605