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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

अंतोन चेखव की अनुवादित कहानी 'एक छोटा-सा मजाक'

आइये पढ़ते हैं अंतोन चेखव की अनुवादित कहानी एक छोटा सा मज़ाक ।

कहानी

एक छोटा-सा मजाक 
अंतोन चेखव 

अनुवाद - अनिल जनविजय

सरदियों की ख़ूबसूरत दोपहर... सरदी बहुत तेज़ है। नाद्या ने मेरी बाँह पकड़ रखी है। उसके घुंघराले बालों में बर्फ़ इस तरह जम गई है कि वे चांदनी की तरह झलकने लगे हैं। होंठों के ऊपर भी बर्फ़ की एक लकीर-सी दिखाई देने लगी है। हम एक पहाड़ी पर खड़े हुए हैं। हमारे पैरों के नीचे मैदान पर एक ढलान पसरी हुई है जिसमें सूरज की रोशनी ऎसे चमक रही है जैसे उसकी परछाई शीशे में पड़ रही हो। हमारे पैरों के पास ही एक स्लेज पड़ी हुई है जिसकी गद्दी पर लाल कपड़ा लगा हुआ है।

--चलो नाद्या, एक बार फिसलें! --मैंने नाद्या से कहा-- सिर्फ़ एक बार! घबराओ नहीं, हमें कुछ नहीं होगा, हम ठीक-ठाक नीचे पहुँच जाएंगे।

लेकिन नाद्या डर रही है। यहाँ से, पहाड़ी के कगार से, नीचे मैदान तक का रास्ता उसे बेहद लम्बा लग रहा है। वह भय से पीली पड़ गई है। जब वह ऊपर से नीचे की ओर झाँकती है और जब मैं उससे स्लेज पर बैठने को कहता हूँ तो जैसे उसका दम निकल जाता है। मैं सोचता हूँ-- लेकिन तब क्या होगा, जब वह नीचे फिसलने क ख़तरा उठा लेगी! वह तो भय से मर ही जाएगी या पागल ही हो जाएगी।

--मेरी बात मान लो! --मैंने उससे कहा-- नहीं-नहीं, डरो नहीं, तुममें हिम्मत की कमी है क्या?

आख़िरकार वह मान जाती है। और मैं उसके चेहरे के भावों को पढ़ता हूँ। ऎसा लगता है जैसे मौत का ख़तरा मोल लेकर ही उसने मेरी यह बात मानी है। वह भय से सफ़ेद पड़ चुकी है और काँप रही है। मैं उसे स्लेज पर बैठाकर, उसके कंधों पर अपना हाथ रखकर उसके पीछे बैठ जाता हूँ। हम उस अथाह गहराई की ओर फिसलने लगते हैं। स्लेज गोली की तरह बड़ी तेज़ी से नीचे जा रही है। बेहद ठंडी हवा हमारे चेहरों पर चोट कर रही है। हवा ऎसे चिंघाड़ रही है कि लगता है, मानों कोई तेज़ सीटी बजा रहा हो। हवा जैसे गुस्से से हमारे बदनों को चीर रही है, वह हमारे सिर उतार लेना चाहती है। हवा इतनी तेज़ है कि साँस लेना भी मुश्किल है। लगता है, मानों शैतान हमें अपने पंजों में जकड़कर गरजते हुए नरक की ओर खींच रहा है। आसपास की सारी चीज़ें जैसे एक तेज़ी से भागती हुई लकीर में बदल गई हैं। ऎसा महसूस होता है कि आनेवाले पल में ही हम मर जाएंगे।

मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या! --मैं धीमे से कहता हूँ।

स्लेज की गति धीरे-धीरे कम हो जाती है। हवा का गरजना और स्लेज का गूँजना अब इतना भयानक नहीं लगता। हमारे दम में दम आता है और आख़िरकार हम नीचे पहुँच जाते हैं। नाद्या अधमरी-सी हो रही है। वह सफ़ेद पड़ गई है। उसकी साँसें बहुत धीमी-धीमी चल रही हैं... मैं उसकी स्लेज से उठने में मदद करता हूँ।

अब चाहे जो भी हो जाए मै कभी नहीं फिसलूंगी, हरगिज़ नहीं! आज तो मैं मरते-मरते बची हूँ। --मेरी ओर देखते हुए उसने कहा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखों में ख़ौफ़ का साया दिखाई दे रहा है। पर थोड़ी ही देर बाद वह सहज हो गई और मेरी ओर सवालिया निगाहों से देखने लगी। क्या उसने सचमुच वे शब्द सुने थे या उसे ऎसा बस महसूस हुआ था, सिर्फ़ हवा की गरज थी वह? मैं नाद्या के पास ही खड़ा हूँ, मैं सिगरेट पी रहा हूँ और अपने दस्ताने को ध्यान से देख रहा हूँ।

नाद्या मेरा हाथ अपने हाथ में ले लेती है और हम देर तक पहाड़ी के आसपास घूमते रहते हैं। यह पहेली उसको परेशान कर रही है। वे शब्द जो उसने पहाड़ी से नीचे फिसलते हुए सुने थे, सच में कहे गए थे या नहीं? यह बात वास्तव में हुई या नहीं। यह सच है या झूठ? अब यह सवाल उसके लिए स्वाभिमान का सवाल हो गया है. उसकी इज़्ज़त का सवाल हो गया है। जैसे उसकी ज़िन्दगी और उसके जीवन की ख़ुशी इस बात पर निर्भर करती है। यह बात उसके लिए महत्त्वपूर्ण है, दुनिया में शायद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण। नाद्या मुझे अपनी अधीरता भरी उदास नज़रों से ताकती है, मानों मेरे अन्दर की बात भाँपना चाहती हो। मेरे सवालों का वह कोई असंगत-सा उत्तर देती है। वह इस इन्तज़ार में है कि मैं उससे फिर वही बात शुरू करूँ। मैं उसके चेहरे को ध्यान से देखता हूँ-- अरे, उसके प्यारे चेहरे पर ये कैसे भाव हैं? मैं देखता हूँ कि वह अपने आप से लड़ रही है, उसे मुझ से कुछ कहना है, वह कुछ पूछना चाहती है। लेकिन वह अपने ख़यालों को, अपनी भावनाओं को शब्दों के रूप में प्रकट नहीं कर पाती। वह झेंप रही है, वह डर रही है, उसकी अपनी ही ख़ुशी उसे तंग कर रही है...। --सुनिए! --मुझ से मुँह चुराते हुए वह कहती है। --क्या? --मैं पूछता हूँ। --चलिए, एक बार फिर फिसलें।

हम फिर से पहाड़ी के ऊपर चढ़ जाते हैं। मैं फिर से भय से सफ़ेद पड़ चुकी और काँपती हुई नाद्या को स्लेज पर बैठाता हूँ। हम फिर से भयानक गहराई की ओर फिसलते हैं। फिर से हवा की गरज़ और स्लेज की गूँज हमारे कानों को फाड़ती है और फिर जब शोर सबसे अधिक था मैं धीमी आवाज़ में कहता हूँ : --मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या।

नीचे पहुँचकर जब स्लेज रुक जाती है तो नाद्या एक नज़र पहले ऊपर की तरफ़ ढलान को देखती है जिससे हम अभी-अभी नीचे फिसले हैं, फिर दूसरी नज़र मेरे चेहरे पर डालती है। वह ध्यान से मेरी बेपरवाह और भावहीन आवाज़ को सुनती है। उसके चेहरे पर हैरानी है। न सिर्फ़ चेहरे पर बल्कि उसके सारे हाव-भाव से हैरानी झलकती है। वह चकित है और जैसे उसके चेहरे पर यह लिखा है-- क्या बात है? वे शब्द किसने कहे थे? शायद इसी ने? या हो सकता है मुझे बस ऎसा लगा हो, बस ऎसे ही वे शब्द सुनाई दिए हों?

उसकी परेशानी बढ़ जाती है कि वह इस सच्चाई से अनभिज्ञ है। यह अनभिज्ञता उसकी अधीरता को बढ़ाती है। मुझे उस पर तरस आ रहा है। बेचारी लड़की! वह मेरे प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं देती और नाक-भौंह चढ़ा लेती है। लगता है वह रोने ही वाली है। --घर चलें? -- मैं पूछता हूँ। --लेकिन मुझे... मुझे तो यहाँ फिसलने में ख़ूब मज़ा आ रहा है। --वह शर्म से लाल होकर कहती है और फिर मुझ से अनुरोध करती है: --और क्यों न हम एक बार फिर फिसलें?

हुम... तो उसे यह फिसलना "अच्छा लगता है"। पर स्लेज पर बैठते हुए तो वह पहले की तरह ही भय से सफ़ेद दिखाई दे रही है और काँप रही है। उसे साँस लेना भी मुश्किल हो रहा है। लेकिन मैं अपने होंठों को रुमाल से पोंछकर धीरे से खाँसता हूँ और जब फिर से नीचे फिसलते हुए हम आधे रास्ते में पहुँच जाते हैं तो मैं एक बार फिर कहता हूँ : --मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!

और यह पहेली पहेली ही रह जाती है। नाद्या चुप रहती है, वह कूछ सोचती है... मैं उसे उसके घर तक छोड़ने जाता हूँ। वह धीमे-धीमे क़दमों से चल रही है और इन्तज़ार कर रही है कि शायद मैं उससे कुछ कहूंगा। मैं यह नोट करता हूँ कि उसका दिल कैसे तड़प रहा है। लेकिन वह चुप रहने की कोशिश कर रही है और अपने मन की बात को अपने दिल में ही रखे हुए है। शायद वह सोच रही है।

दूसरे दिन मुझे उसका एक रुक्का मिलता है :"आज जब आप पहाड़ी पर फिसलने के लिए जाएँ तो मुझे अपने साथ ले लें। नाद्या।" उस दिन से हम दोनों रोज़ फिसलने के लिए पहाड़ी पर जाते हैं और स्लेज पर नीचे फिसलते हुए हर बार मैं धीमी आवाज़ में वे ही शब्द कहता हूँ :--मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!

जल्दी ही नाद्या को इन शब्दों का नशा-सा हो जाता है, वैसा ही नशा जैसा शराब या मार्फ़ीन का नशा होता है। वह अब इन शब्दों की ख़ुमारी में रहने लगी है। हालाँकि उसे पहाड़ी से नीचे फिसलने में पहले की तरह डर लगता है लेकिन अब भय और ख़तरा मौहब्बत से भरे उन शब्दों में एक नया स्वाद पैदा करते हैं जो पहले की तरह उसके लिए एक पहेली बने हुए हैं और उसके दिल को तड़पाते हैं। उसका शक हम दो ही लोगों पर है-- मुझ पर और हवा पर। हम दोनों में से कौन उसके सामने अपनी भावना का इज़हार करता है, उसे पता नहीं। पर अब उसे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। शराब चाहे किसी भी बर्तन से क्यों न पी जाए-- नशा तो वह उतना ही देती है। अचानक एक दिन दोपहर के समय मैं अकेला ही उस पहाड़ी पर जा पहुँचा। भीड़ के पीछे से मैंने देखा कि नाद्या उस ढलान के पास खड़ी है, उसकी आँखें मुझे ही तलाश रही हैं। फिर वह धीरे-धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगती है ...अकेले फिसलने में हालाँकि उसे डर लगता है, बहुत ज़्यादा डर! वह्बर्फ़ की तरह सफ़ेद पड़ चुकी है, वह काँप रही है, जैसे उसे फ़ाँसी पर चढ़ाया जा रहा हो। पर वह आगे ही आगे बढ़ती जा रही है, बिना झिझके, बिना रुके। शायद आख़िर उसने फ़ैसला कर ही लिया कि वह इस बार अकेली नीचे फिसल कर देखेगी कि "जब मैं अकेली होऊंगी तो क्या मुझे वे मीठे शब्द सुनाई देंगे या नहीं?" मैं देखता हूँ कि वह बेहद घबराई हुई भय से मुँह खोलकर स्लेज पर बैठ जाती है। वह अपनी आँखें बंद कर लेती है और जैसे जीवन से विदा लेकर नीचे की ओर फिसल पड़ती है... स्लेज के फिसलने की गूँज सुनाई पड़ रही है। नाद्या को वे शब्द सुनाई दिए या नहीं-- मुझे नहीं मालूम... मैं बस यह देखता हूँ कि वह बेहद थकी हुई और कमज़ोर-सी स्लेज से उठती है। मैं उसके चेहरे पर यह पढ़ सकता हूँ कि वह ख़ुद नहीं जानती कि उसे कुछ सुनाई दिया या नहीं। नीचे फिसलते हुए उसे इतना डर लगा कि उसके लिए कुछ भी सुनना या समझना मुश्किल था।

फिर कुछ ही समय बाद वसन्त का मौसम आ गया। मार्च का महीना है... सूरज की किरंएं पहले से अधिक गरम हो गई हैं। हमारी बर्फ़ से ढकी वह सफ़ेद पहाड़ी भी काली पड़ गई है, उसकी चमक ख़त्म हो गई है। धीरे-धीरे सारी बर्फ़ पिघल जाती है। हमारा फिसलना बंद हो गया है और अब नाद्या उन शब्दों को नहीं सुन पाएगी। उससे वे शब्द कहने वाला भी अब कोई नहीं है : हवा ख़ामोश हो गई है और मैं यह शहर छोड़कर पितेरबुर्ग जाने वाला हूँ-- हो सकता है कि मैं हमेशा के लिए वहाँ चला जाऊंगा।

मेरे पितेरबुर्ग रवाना होने से शायद दो दिन पहले की बात है। संध्या समय मैं बगीचे में बैठा था। जिस मकान में नाद्या रहती है यह बगीचा उससे जुड़ा हुआ था और एक ऊँची बाड़ ही नाद्या के मकान को उस बगीचे से अलग करती थी। अभी भी मौसम में काफ़ी ठंड है, कहीं-कहीं बर्फ़ पड़ी दिखाई देती है, हरियाली अभी नहीं है लेकिन वसन्त की सुगन्ध महसूस होने लगी है। शाम को पक्षियों की चहचहाट सुनाई देने लगी है। मैं बाड़ के पास आ जाता हूँ और एक दरार में से नाद्या के घर की तरफ़ देखता हूँ। नाद्या बरामदे में खड़ी है और उदास नज़रों से आसमान की ओर ताक रही है। बसन्ती हवा उसके उदास फीके चेहरे को सहला रही है। यह हवा उसे उस हवा की याद दिलाती है जो तब पहाड़ी पर गरजा करती थी जब उसने वे शब्द सुने थे। उसका चेहरा और उदास हो जाता है, गाल पर आँसू ढुलकने लगते हैं... और बेचारी लड़की अपने हाथ इस तरह से आगे बढ़ाती है मानो वह उस हवा से यह प्रार्थना कर रही होकि वह एक बार फिर से उसके लिए वे शब्द दोहराए। और जब हवा का एक झोंका आता है तो मैं फिर धीमी आवाज़ में कहता हूँ : --मैं तुम से प्यार करता हूँ, नाद्या!

अचानक न जाने नाद्या को क्या हुआ! वह चौंककर मुस्कराने लगती है और हवा की ओर हाथ बढ़ाती है। वह बेहद ख़ुश है, बेहद सुखी, बेहद सुन्दर।

और मैं अपना सामान बांधने के लिए घर लौट आता हूँ...।

यह बहुत पहले की बात है। अब नाद्या की शादी हो चुकी है। उसने ख़ुद शादी का फ़ैसला किया या नहीं-- इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। उसका पति-- एक बड़ा अफ़सर है और उनके तीन बच्चे हैं। वह उस समय को आज भी नहीं भूल पाई है, जब हम फिसलने के लिए पहाड़ी पर जाया करते थे। हवा के वे शब्द उसे आज भी याद हैं, यह उसके जीवन की सबसे सुखद, हृदयस्पर्शी और ख़ूबसूरत याद है।

और अब, जब मैं प्रौढ़ हो चुका हूँ, मैं यह नहीं समझ पाता हूँ कि मैंने उससे वे शब्द क्यों कहे थे, किसलिए मैंने उसके साथ ऎसा मज़ाक किया था!.

प्रस्तुति-बिजूका समूह
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टिप्पणियां:-

रेणुका:-
मुझे कहानी की एक मूल बात समझ नहीं आयी। उसने नाद्या को यह बात रु ब रु क्यों नहीं की? यदि मज़ाक था तो बार बार क्यों किया। नाद्या की बढ़ती परेशानी देखने के बावजूद पुनः वही मज़ाक🤔

वीना राजशिव:-
ये तो वाकई मज़ाक ही है मगर मज़ाक कई बार दोहराया नहीं जाता। वो इस मामले में। अगर प्यार था तो कहना चाहिए था। ये तो सीधे सीधे किसी लड़की की भावना के साथ खिलवाड़ ही है।
जबकि लड़के को पता है की वो फिसलने से डरती है यो उसे अकेले सफ़ेद पड़ी नादया को क्यों नहीं रोका जब वो अकेले फिसलने का निर्णय लेती है। भावनओं के साथ खिलवाड़ करना वो भी इस हद तक, निश्चित रूप से नहीं अच्छा लगा और समझ तो आया ही नहीं।

सीमा आज़ाद:-
प्यार की कामना और भावना हर तरह के डर पर भारी पड़ती है, कहानी यही बात कहती है, मुझे अच्छी लगी कहानी।

सुषमा अवधूत :-
कहानी बहुत अच्छी तरह से लिखी है, पर यह मजाक समझ नही आया, यदि डर के कारण नाद्या के साथ कुछ हादसा हो जाता तो? ऐसा मजाक नही करना चाहिये

मुनाफाखोरो को बिजली के खंभे पर लटकाया जायेगा : हरिशंकर परसाई 

साथियो नमस्कार,

आइये आज पढ़ते हैं हरिशंकर परसाई जी का एक व्यंग्य ।

मुनाफाखोरो को बिजली के खंभे पर लटकाया जायेगा : हरिशंकर परसाई 
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एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जायेगा।
सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की, आरती उतारी और उन्हें तिलक किया।
शाम तक वे इंतज़ार करते रहे कि अब मुनाफ़ाख़ोर टांगे जायेंगे, और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया।
लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा,"महाराज, आपने तो कहा था कि मुनाफ़ाख़ोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाएेंगे,पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफ़ाख़ोर स्वस्थ और सानन्द हैं।"
राजा ने कहा,"कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जायेगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आॅर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही, सब मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।
भीड़ में से एक आदमी बोल उठा,"पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफ़ाख़ोर ने ही लिया है।"
राजा ने कहा,"तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाएेगा।"
तभी दूसरा बोल उठा,"पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।"
राजा ने जवाब दिया,"नहीं, ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।"
लोगों ने पूछा, "तो कितने दिन बाद वे लटकाये जाएेंगे।"
राजा ने कहा, "आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।"
लोग दिन गिनने लगे।
सोलहवें दिन सुबह उठकर लोगों ने देखा कि बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं। वे हैरान हो गये कि रात न आँधी आयी न भूकम्प आया, फिर वे खम्भे कैसे उखड़ गये!
उन्हें खम्भे के पास एक मज़दूर खड़ा मिला। उसने बतलाया कि मज़दूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं। लोग उसे पकड़कर राजा के पास ले गये।
उन्होंने शिकायत की, "महाराज, आप मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे, पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मज़दूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।"
राजा ने मज़दूर से पूछा,"क्यों रे, किसके हुक़्म से तुम लोगों ने खम्भे उखाड़े?"
उसने कहा,"सरकार, ओवरसियर साहब ने हुक़्म दिया था।"
तब ओवरसियर बुलाया गया।
उससे राजा ने कहा, "क्यों जी तुम्हें मालूम है, मैंने आज मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?"
उसने कहा, "जी सरकार!"
"फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?"
"सरकार, इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक़्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जायें।"
अब इंजीनियर बुलाया गया। उसने कहा उसे बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।
बिजली इंजीनियर से कैफ़ियत तलब की गयी, तो उसने हाथ जोड़कर कहा,"सेक्रेटरी साहब का हुक़्म मिला था।"
विभागीय सेक्रेटरी से राजा ने पूछा, "खम्भे उखाड़ने का हुक़्म तुमने दिया था।"
सेक्रेटरी ने स्वीकार किया, "जी सरकार!"
राजा ने कहा, "यह जानते हुये भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफ़ाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ, तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।"
सेक्रेटरी ने कहा,"साहब, पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!"
राजा ने पूछा, "यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?
सेक्रेटरी ने कहा, "मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।"
राजा ने पूछा, "कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?"
सेक्रेटरी ने कहा, "बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार। घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।"
विशेषज्ञ ने निवेदन किया, " सरकार, मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण के द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है, पर मैं जानता हूँ कि इस वक़्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे ज़मीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों के द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पाॅवरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता, न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।
लोग बड़ी देर तक सकते में खड़े रहे। वे मुनाफ़ाख़ोरों को बिल्कुल भूल गये। वे सब उस संकट से अविभूत थे, जिसकी कल्पना उन्हें दी गयी थी। जान बच जाने की अनुभूति से दबे हुये थे। चुपचाप लौट गये।
उसी सप्ताह बैंक में इन नामों से ये रकमें जमा हुईं - सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये; श्रीमती बिजली इंजीनियर- १ लाख; श्रीमती इंजीनियर -१ लाख; श्रीमती विशेषज्ञ - २५ हजार; श्रीमती ओवरसियर-५ हजार ।
उसी सप्ताह 'मुनाफाख़ोर संघ' के हिसाब में नीचे लिखी रकमें 'धर्मादा' खाते में डाली गयीं - कोढ़ियों की सहायता के लिये दान- २ लाख रुपये; विधवाश्रम को- १ लाख; क्षयरोग अस्पताल को- १ लाख; पागलख़ाने को-२५ हजार; अनाथालय को- ५ हज़ार।

प्रस्तुति-बिजूका समूह
द्वारा प्रदीप मिश्र जी
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टिप्पणियाँ:-

प्रदीप मिश्रा:-
वर्त्तमान को खोलती हुयी समसामयिक रचना। एक लेखक इसी तरह से हस्ताक्षहेप कर सकता है। परसाईं जी को प्रणाम।

दीपक मिश्रा:-
अद्भुत। आप आज को साक्षात् देख सकते हैं इस रचना में।

प्रदीप मिश्रा:-
दीपक भाई कालजयी रचानाएं शायद ऐसी ही होती हैं। जब लिखा होगा तब भी प्रासंगिक थी और आज तो उससे भी ज्यादा।

अजय कुमार गौतम:-
बहुत प्रासंगिक व्यंग्य.. सच्चाई को बताता हुआ

उदय अनुज:-
परसाई जी की रचनाएँ सचमुच हर समय जीवित रहने वाली हैं �उदय अनुज

हर जगह मोदी-मोदी चिल्लाना समर्थन नहीं साम्प्रदायिकता है।- पवन करण

सुप्रभात साथियों,

आज प्रस्तुत है मौजूद हालात की पड़ताल करता एक लेख। लेख छोटा है किंतु जिस मसले को लेकर चला है वह छोटा नहीं है। समूह में भी ऐसा देखा गया है कुछ साथी पहले से ही अपना मत बनाये हुए रहते हैं और उसके आगे वे अपने विरोधी को देशद्रोही ही मानते हैं। आज साथियों से एक सार्थक चर्चा की आशा करते हैं।

क्योंकि इस विषय पर आजकल अनगिनत चुटकुले भी सोशल मीडिया में चल रहे हैं, साथियों से अनुरोध है अपने विचार रखें और किसी भी तरह के चुटकुले को यहाँ शेयर ना करें।

हर जगह मोदी-मोदी चिल्लाना समर्थन नहीं साम्प्रदायिकता है।- पवन करण

प्रधानमंत्री मोदी के बड़े नोट बदलने के फैसले से होने वाली परेशानी सामने लाने वालों की आवाज दबाने के लिये भाजपा कार्यकर्ताओं और उसके समर्थकों का इकट्ठे होकर मोदी मोदी चिल्लाना समर्थन नहीं सांप्रदायिकता है। जब चार—छह कट्टरपंथी कहीं भी इकट्रठे होकर मोदी—मोदी चिल्लाते हैं, लगता है हिंदू—हिंदू चिल्ला रहे हैं। सरकार समर्थक करेंसी बदलाव से जनता को हो रही परेशानी को हिंदुत्व की आड़ में छुपाना चाहते हैं। जो परेशान है,वह हिंदु नहीं है अथवा हिंदू हो तो परेशानी कैसी। लगता है जनता को अब नोटों से पैदा हो रही जानलेवा परेशानी के साथ—साथ फैसला मनवाने के लिये किसी भी हद तक जाने को तैयार इस हिंदुत्व से भी लड़ना है।

इस बदलाव को बड़ी बेशर्मी से देशभक्ति से भी जोड़ा जा रहा है। इस बदलाव से होने वाली परेशानी को बताने बाले को यह कहकर प्रताणित और अपमानित किया जा रहा है ‘कि देश के उस सैनिक को देखो जो सीमा पर कितने कष्ट सहकर देश की रक्षा करता है और तुम देश के लिये पहली बार किसी प्रधानमंत्री के देश हित में लिये गये इस निर्णय के समर्थन में चार—छह घंटे लाईन में नहीं लग सकते।’ ये अजीब तरह का कुतर्क है। ‘पहली बार’ ये क्रियापद देश के आम नागरिक पर बहुत भारी पड़ रहा है। ये पहली बार, पहली बार उनकी बिटिया की शादी पर भारी पड़ रहा है, ये पहली बार मां बनने जा रही किसी औरत पर बहुत भारी पड़ रहा है, ये पहली बार आपरेशन टेबिल तक पहुंचे किसी गंभीर मरीज के लिये बहुत भारी पड़ रहा है। ये पहली बार किसी घर की पहली बार पूरी तरह से खाली गांठ पर बहुत भारी पड़ रहा है।

इस देश के आम नागरिक को राजनीति वैसे भी उन्माद के सिवाय कुछ नहीं देती। विकास कार्यों का सीधा और बड़ा लाभ बड़े लोगों को ही मिलता है। सड़कों स्कूलों और अस्पतालों की शक्ल में आमनागरिक को मिलने वाले इस विकास की हकीकत हम सबके सामने है। ऐसे में उसका बदलाव की आशा में सरकार को दिया बोट इस हद तक मुसीबत में बदल जाये तो उसके ‘रोष’ समझा जा सकता है और उसके उसी रोष को दबाने का काम इन दिनों सरकार के समर्थक मोदी—मोदी के नारे लगाकर कर रहे हैं। मगर यह तय है कि इस समय सरकार के समर्थकों के ये नारे सरकार को नुकसान ही पहुंचायेंगे, सरकार और प्रधानमंत्री की स्थिती इससे हास्यास्पद ही होगी उनका नारे लगाना जनता की खीज को ही बढ़ायेगा, और ये हो भी रहा है। नोट बदलने के सरकार का फैसले से जनता को पैदा हो रही परेशानी मोदी—मोदी के नारों से दबाने से वह दबेगी नहीं बल्कि और ज्यादा उभरेगी।

प्रस्तुति-बिजूका
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टिप्पणियाँ:-

प्रदीप कान्त:-
कितने भी आलेख लगा लो बाबा

पर

जनता तो परेशान होकर भी फेवर में है इसलिए सब विरोधी देशद्रोही

मनचन्दा पानी:
जहाँ तक मुझे समझ आता है ये सरकार बनी ही धर्म और देशभक्ति को सहारा बनाकर थी। जो सच्चा हिन्दू है, जो सच्चा देशभक्त है वो सरकार के पक्ष में रहे ऐसी धारणा बनायी गयी। जो सरकार का विरोध कर रहा है, चाहे किसी भी बात पर क्यों ना हो, सरकार का विरोधी नहीं धर्म का विरोधी है, देशद्रोही है।

जहाँ धर्म जोड़ दिया जाता है वहां हम अंधे होकर अनुसरण करते हैं, सवाल नहीं करते, तर्क नहीं करते, समझदारी को ताला मार देते हैं, वास्तविकता को भी हम भक्ति के चश्मे से देखते है और सबकुछ भला ही भला दिखाई देता है। ऐसा ही हो रहा है। टीवी पर जो चैनल जनता की सही और सच्ची तस्वीर दिखा रहा है लोग उसको भी देशद्रोही चैनल मानकर नहीं देखते। कतार में खड़ा परेशान होकर अगर कोई व्यक्ति मोदी या सरकार के विरोध में कुछ बोल देता है तो वहां भरे मोदीवादी हिन्दू उस से उसकी जाति पूछने लगते है, उसका धर्म पूछने लगते हैं, अपने वाले नारे लगाने लगते हैं।
हम उस समझ के लोग हैं जहाँ एक गर्भवती महिला घी को खाने के बजाय मातारानी का चिराग जलाती रहती है और जब उसको कुपोषित अपंग बच्चा पैदा होता है तो वो मातारानी का चिराग और ज्यादा समय के लिए जलाने लगती है इस आस में कि शायद पहले उसकी पूजा में कोई कमी रह गयी थी।
और जो सही बात है वो ना उसकी समझ में आएगी ना समझायी जा सकती है क्योंकि धर्म का मामला है।
और जब धर्म-राजनीती एक-दूसरे में घुस जायेंगे तो आँखों पर पट्टी बांधे भक्त कैसे उन्हें अलग करेंगे।

पल्लवी प्रसाद:-
अँधभक्ति की तरह अँधविरोध भी पढ़े लिखों को शोभा नहीं देता। हर चीज के अच्छे बुरे पहलु होते हैं।/ मंडल कमीशन लागु होने पर सड़क पर छात्र जल कर प्राणाहूति दे रहे थे - तो क्या पिछड़े वर्गों का भला न हुआ?- वी.पी. सिंह सरकार/ economic reforms पर भी हाय तोबा हुयी थी तो क्या देश को तरक्की न दिलाई?- कॉंग्रेस सरकार / Demonetisation तो इन के सामने मामूली ही है / कम से कम मैं तो स्वयं को इतना घोर काबिल नहीं मानती कि हर legitimately elected by d people govt. को २४ पहर गरियाते रहुँ।
एक ही तरह के राजनीतिक पोस्ट पढ़ कर काफी ऊब होती है, इन बातों को हम सब tv और newspaper पर देखते हैं। मेरी उम्मीद बिजूका से साहित्यिक पोस्टस् की रहती है व साहित्यिक चर्चा की।

सीमा आज़ाद:-
लेनिन ने मार्क्सवाद को समृद्ध करते हुए साम्राज्यवाद के बारे बताया। उन्होंने बताया कि यह वित्तीय पूंजी का दौर है, जिसमें बैंकिंग पूंजी का महत्व बढ़ जाता है, जो बड़े-बड़े कारपोरेटों तक पहुंचती रहती हैं। मंदी के दौर में मुनाफे की हवस और एकाधिकार के लिए इस पूंजी के अधिग्रहण की होड़ मच जाती है। इस सन्दर्भ में देखें तो भारत जैसे देशों के रूपये बैंक तक पहुंचाने के लिए बांग्लादेश के मोहम्मद यूनुस ने " समूह निर्माण" के माध्यम से साम्राज्यवाद की इसी योजना को पेश किया, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया। अब मोदी जी ये काम कर रहे हैं- पहले ' जन धन योजना' के माध्यम से अब "नोटबन्दी" के माध्यम से। साम्राज्यवाद,( मोदी जिसके बेहतरीन एजेंट हैं) को समझने के लिए लेनिन की पुस्तक " साम्राज्यवाद: पूंजीवाद की चरम अवस्था" जरूर पढ़ें और इसी रोशनी में इसके खिलाफ खड़ें हों। इस साल फरवरी में हमने यानि दस्तक ने कई संगठनों के साथ मिल कर इस पुस्तक का सौंवा साल मनाया था।

उदय अनुज:-
मनचंदा जी! हमारे मुल्क में लोग धार्मिक आस्थाओं में अंधे हो गये हैं। सारी बद्धि टाक में रख दी है। अनपढ़ के नहीं पढ़े लिखे भी इसी श्रेणी में आते हैं। आप भारत के मन्दिरों का सोने और पैसो का चढावा देख लें। इसमें आम गरीब आदमी का योग कम है। पढ़े लिखे बड़े कारोबारी अधिक जुड़े हैं। बी जे पी ने धर्म की आस्था को भुनाया। अन्य दल भी  लोक लुभावन  नारे देकर ही तो राज कर रहे हैं। गरीबी हटाओ -- नेताओं की गरीबी हट गई हैं।
*उदयसिंह अनुज