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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

युवा कवयित्री सुजाता की कुछ कविताएँ,

नमस्कार मित्रो... आज आपके समक्ष प्रस्तुत हैं युवा कवयित्री सुजाता की कुछ कविताएँ,  जिनकी अभिव्यक्ति में स्त्री विमर्श के मुहावरे बहुत मुखरित रहते हैं।

कविता :

1. वे कितनी घृणा करते हैं हमसे

वे आत्ममुग्ध हैं,
वे घृणा से भरे हैं।
वे पराक्रम से भरपूर हैं। 
नहीं जानते अपनी गहराई।

जो उपलब्ध हैं स्त्रियाँ उन्हें 
वे हिकारत से देखते हैं,
और थूक देते है उन्हें देख कर
जिन्हें पाया नही जा सका ।

वे ज्ञानोन्मत्त हैं 
ब्रह्मचारी !
कोमलांगिनियों के बीच 
योगी से बैठे हैं 
अहं की लंगोट खुल सकती है कभी किसी भी वक़्त।
उन्हे नहीं पता कि
हमें पता है
कि वे कितनी घृणा करते हैं हमसे 
जब वे प्यार से हमारे बालों को सहला रहे होते हैं।

उन्हें पहचानना आसान होता 
तो मैं कह सकती थी
कि कब कब मैंने उन्हें देखा था
कब कब मिली थी 
और शिकार हो गयी थी कब!

2. तुम्हे चाहिए एक औसत औरत

तुम्हे चाहिए एक औसत औरत
न कम न ज़्यादा 
बिल्कुल नमक की तरह 
उसके ज़बान हो 
उसके दिल भी हो
उसके सपने भी हो

उसके मत भी हों, मतभेद भी
उसके दिमाग हो 
ताकि वह पढे तुम्हे और सराहे
वह बहस कर सके तुमसे और 
तुम शह-मात कर दो
ताकि समझा सको उसे 
कि उसके विचार कच्चे हैं अभी 

अभी और ज़रूरत है उसे
तुम- से विद्वान की ।

औसत औरत को तुम 
सिखा सकोगे बोलना और 
सिखा सकोगे कि कैसे पाले जाते हैं 
आज़ादी के सपने

पगली होती हैं औरतें 
बस खिंचीं चली जाती हैं दुलार से

इसलिए उसके भावनाएँ भी होंगी 
और आँसू भी 
और वह रो सकेगी 
तुम्हारी उपेक्षा पर 
और तुम हँस सकोगे उसकी नादानी पर 
कि कितना भी कोशिश करे औरत 
औसत से ऊपर उठने की
औरतपन नहीं छूटेगा उससे 

तुम्हारा सुख एक मुकम्मल सुख होगा 
ठीक उस समय तुम्हारी जीत सच्ची जीत होगी 
जब एक औसत औरत में 
तुम गढ लोगे अपनी औरत।

3. तुम पढ़ती क्या रहती हो

किताब पढ़ती औरतें
अश्लील दिखती हैं 
ऊबी हुई वे दिखती हैं 
ममत्व से भरी 
कि जैसा उन्हें होना चाहिए

किताबें जो नहीं सिखातीं उन्हें
बच्चों को प्यारा और गोल मटोल 
बनाए रखने का सलीका
किताबें जो आखिरकार 
रीढ़ पर रेंगते हुए
गर्दन तक आती हैं
नोच लेती हैं मुखौटे
और नंगे कर देती हैं चेहरे
प्यारे भोले लोग 
उन्हें पिशाच कहते होंगे

मेरी मानो
समय रहते
झाड़ फूंक जंतर करा लो
पढ़ती औरतों 
और अश्लील किताबों का!

4.  मुझे कविता कहने की आदत अब तक तो न थी

किन्हीं गड्ढों में बहुत गहरे पाँव फिसल गया है
पढ़ते हुए कोई उपन्यास नही सूझ रहे अर्थ ठीक ठीक
मैं औरत हूँ असम्पृक्त , बिना जड़ की पेड़ 
जो लटक गई है लताओं के गले में बेशर्म सी

इस रात में मुझे वफादार होना था और मैं मंसूबे बना रही थी
कि कैसे सेंध लगानी है मुझे अपने भीतर और सायरन बजने से पहले
भाग जाना है वापस गड्ढों की फिसलन में
ये दोनों जीवन निभाने को चाहिए चूहे सी दिलेरी 
इसलिए कुतर लिए है उपन्यास के पन्ने मैंने जल्दी जल्दी
अब कम से कम तुम्हारे हाथ नही लगेगा कोई सुराग
कविताओं का 

मैं औरत हूँ छपी हुई एक शादी के इश्तेहार सी अखबार मेँ 
एकदम चकाचक , जिसमें एक अनजाना कुँआ है 
जहाँ आत्महत्याएं करना आसान है सुनते हैं 
मुझे नींद में बकने की बीमारी अब तक तो नही थी
इतनी शर्तें लगाओगे मन्नत के धागों की तरह 
पेड़ की सूखी टहनियों- से मेरे उलझे बालों में 
तो इन सारी धूप बत्तियों की खुशबू ले उड़ूँगी एक दिन 
जब फिसलूँगी धम्म से ,तुम्हारी बिछाई काई पर जिसे हरियाली कहते हो

कुँए की मुंडेर पर कितने बन्दर हैं बैठे और देखो
वे बैठे बैठे सुजान हो गए हैं , और रस्सियाँ पागल सी
घिस गई हैं 
उन्हें लगा होगा घिस घिस कर तेज़ होंगी 
तब किसी उन्मादी रात वे हड़का देंगी बन्दरों को लेकिन
घिस कर टूटने की पूरी संभावना ने बंदरो को बेचैन कर दिया है
मैं औरत हूँ घिसी हुई रस्सी जैसी
और तमाशा बनने से पहले निशाँ छोड़ जाना चाहती हूँ 
मुझे नींद में चलने की अब तक आदत तो नही है
और जागते में अक्सर ठप्प रही हूँ किसी खराब घड़ी की तरह
बजेगी जो किसी सही वक़्त पर अलार्म की तरह 
कनफोड़ आवाज़ में रह-रह कर निश्चित अंतराल पर बार-बार !

( प्रस्तुति-बिजूका)

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