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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

नौजवान भारत सभा व दिशा छात्र संगठन द्वारा दिल्‍ली में वितरित किया जा रहा पर्चा

बिगुल मज़दूर दस्‍ता, नौजवान भारत सभा व दिशा छात्र संगठन द्वारा दिल्‍ली में वितरित किया जा रहा पर्चा

काले धन की वापसी के नाम पर नोटबन्दी - अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए मोदी सरकार का जनता के साथ एक और धोखा!

साथियो !

पिछले 8 नवम्बर की रात से देश भर में अफरा-तफरी का आलम है। बैंकों के बाहर सुबह से रात तक लम्बी-लम्बी कतारें लगीं हैं,  सारे काम छोडकर लोग अपनी ही मेहनत और बचत के पैसे पाने के लिए धक्के खा रहे हैं। अस्पतालों में मरीजों का इलाज नहीं हो  पा रहा, बाज़ार बन्द पड़े हैं, कामगारों को मज़दूरी नहीं मिल पा रही है, आम लोग रोज़मर्रा की मामूली ज़रूरतें तक पूरी नहीं कर पा रहे हैं। देश में कई जगह सदमे से लोगों की मौत तक हो जाने की ख़बरें आयीं हैं। दिलचस्प बात यह है कि देश के बड़े पूँजीपतियों, व्यापारियों, अफसरशाहों-नेताशाहों, फिल्मी अभिनेताओं में काले धन पर इस तथाकथित “सर्जिकल स्ट्राइक” से कोई बेचैनी या खलबली नहीं दिखायी दे रही है। जिनके पास काला धन होने की सबसे ज़्यादा सम्भावना है उनमे से कोई बैंकों की कतारों में धक्के खाता नहीं दिख रहा है। उल्टे वे सरकार के इस फैसले का स्वागत कर रहे हैं। आखिर माज़रा क्या है?

क्या है कालेधन की असलियत?

दोस्तो, जिस देश और समाज में मेहनत की लूट को कानूनी जामा पहना दिया जाय। जहाँ पूँजीपतियों को कानूनन यह छूट हो कि वह मेहनतकशों के खून-पसीने को निचोड़कर अपनी तिजोरियाँ भर सकें वहाँ "गैर कानूनी" कालाधन  पैदा  होगा ही। आज देश की 90 फीसदी सम्पत्ति महज 10 फीसदी लोगों के पास है और इसमें से आधे से अधिक सम्पत्ति महज एक फीसदी लोगों के पास है। यह देश के मेहनत और कुदरत की बेतहाशा लूट से ही सम्भव हुआ है। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इसमें बेतहाशा बढ़ोत्तरी हुई है।

साथियो, 
काला धन वह नहीं होता जिसे बक्सों या तकिये के कवर में या जमीन में गाड़कर रखते हैं। सच्चाई यह है कि देश में काले धन का सिर्फ़ 6 प्रतिशत नगदी के रूप में है । आज कालेधन का अधिकतम हिस्सा रियल स्टेट, विदेशों में जमा धन और सोने की खरीद आदि में लगता है। कालाधन भी सफेद धन की तरह बाजार में घूमता रहता है और इसका मालिक उसे लगातार बढ़ाने की फिराक में रहता है। आज पैसे के रूप में जो काला धन है वह कुल कालेधन का बेहद छोटा हिस्सा है और वह भी लोगों के घरों में नहीं बल्कि बाजार में लगा हुआ है।*आज देश के काले धन का अधिकांश हिस्सा बैंकों के माध्यम से पनामा, स्विस और सिंगापुर के बैंकों में पहुँच जाता है। *आज असली भ्रष्टाचार श्रम की लूट के अलावा सरकार द्वारा ज़मीनों और प्राकृतिक सम्पदा को औने-पौने दामों पर पूँजीपतियों को बेचकर किया जाता है।* साथ ही बड़ी कम्पनियों द्वारा कम या अधिक के फर्जी बिलों द्वारा, बैंकों के कर्जों के भुगतान न देने और उसे बाद में बैंकों द्वारा नॉन परफ़ार्मिंग सम्पत्ति घोषित करने और उसका भुगतान जनता के पैसे से करने, बुरे ऋणों (बैड लोन) की माफी और उसका बैंकों को भुगतान जनता के पैसों से करके किया जाता है। पूँजीपतियों द्वारा हड़पा गया यह पैसा विदेशी बैंकों में जमा होता है और फिर वहाँ से देशी और विदेशी बाज़ारों में लगता है। हालाँकि इस भ्रष्टाचार में कालेधन का एक हिस्सा छोटे व्यापारियों और अफसरों को भी जाता है लेकिन यह कुल कालेधन के अनुपात में बहुत छोटा है।

मोदी सरकार के काले धन की नौटंकी का पर्दा इसी से साफ हो जाता है जब मई 2014 में सत्ता में आने के बाद जून 2014 में ही विदेशों में भेजे जाने वाले पैसे की प्रतिव्यक्ति सीमा 75,000 डॉलर से बढ़ाकर 1,25,000 डॉलर कर दिया और जो अब 2,50,000डॉलर है। केवल इसी से पिछ्ले 11 महीनों में 30,000 करोड़ धन विदेशों में गया है। विदेशों से काला धन वापस लाने की बात करने और लोगों को दो दिन में जेल भेजने वाली मोदी सरकार के दो साल बीत जाने के बाद भी आलम यह है कि एक व्यक्ति भी जेल नहीं भेजा गया। क्योंकि इस सूची में मोदी के चहेते अंबानी, अडानी से लेकर अमित शाह, स्मृति ईरानी और बीजेपी के कई नेताओं के नाम हैं। क्या हम इन तथाकथित देशभक्तों की असलियत को नहीं जानते जो हर दिन सेना का नाम तो लेते हैं पर सेना के ताबूत में भी इन्होंने ही घोटाला कर दिया था? क्या मध्यप्रदेश का व्यापम घोटाला, पंकजा मुंडे और बसुंधरा राजे के घोटालों की चर्चा हम भूल चुके हैं?क्या हम नहीं जानते कि विजय माल्या और ललित मोदी जैसे लोग हजारों करोड़ धन लेकर विदेश में हैं और यह इन्हीं की सरकार में हुआ। आज देश में 99 फीसदी काला धन इसी रूप में है और हम साफ-साफ जानते हैं कि इसमें देश के नेता-मंत्रियों और पूँजीपतियों की ही हिस्सेदारी है।

अब दूसरी बात, 
आज देश में मौजूद कुल 500 और 1000 की नोटों का मूल्य 14.18 लाख करोड़ है जो देश में मौजूद कुल काले धन का महज 3 फीसदी है। जिसमें जाली नोटों की संख्या सरकारी संस्थान ‘राष्ट्रीय सांख्यकीय संस्थान’ के अनुसार मात्र 400 करोड़ है।* अगर एकबारगी मान भी लिया जाय कि देश में मौजूद इन सारी नोटों का आधा काला धन है (जो कि है नहीं) तो भी डेढ़ फीसदी से अधिक काले धन पर अंकुश नहीं लग सकता। दूसरी तरफ जिन पाकिस्तानी नकली नोटों की बात कर मोदी सरकार लोगों को गुमराह कर रही है वह तो 400 करोड़ ही है जो आधा फीसदी भी नहीं है। दूसरे, सरकार ने 2000 के नये नोट निकाले हैं जिससे आने वाले दिनों में भ्रष्टाचार और काला धन 1000 के  नोटों की तुलना में और बढ़ेगा। अभी यूपी में चुनाव आयोग ने 7 करोड़ के नये  2000 वाले नोट पकड़े हैं, यह इसी बात को साबित करता है। इससे पहले चाहे 1948 या 1978 में नोटों को हटाने का फैसला हो, इतनी बुरी मार जनता पर कभी नहीं पड़ी। *इससे यह सहज ही समझा जा सकता है कि मोदी सरकार का यह पैंतरा जनता को बेवकूफ बनाने के सिवा और कुछ नहीं है। यही बीजेपी 2014 में नोट बैन पर धमाचौकड़ी मचाते हुए विरोध कर रही थी!* आज देश में जो छोटे व्यापारी और अफसर हैं वे  भी काले धन का अधिकतर पैसा जमीन,रियल स्टेट व सोना खरीदने और शेयर में लगाते हैं।

फिर मोदी सरकार ने क्यों लिया यह फैसला?

दोस्तो, मोदी सरकार जब आज देश की जनता के सामने अपने झूठे वायदों,बेतहाशा महंगाई, अभूतपूर्व बेरोजगारी और किसान - मजदूर आबादी की भयंकर लूट, दमन, दलितों, अल्पसंख्यकों पर हमले तथा अपनी सांप्रदायिक फासिस्ट नीतियों के कारण अपनी जमीन खो चुकी है तब फिर एक बार नोट बंद कर कालेधन के जुमले के बहाने अपने को देशभक्त सिद्ध करने की कोशिश कर रही है और अपने को फिर जीवित करना चाहती है। दूसरी बात जब उत्तर प्रदेश और अन्य जगहों पर चुनाव आसन्न है तो ऐसे में जनता की आँख में अपने झूठे प्रचारों के माध्यम से एक बार और धूल झोंकने की साजिश है। साथ ही तमाम खबरें और तथ्य यह बता रहे हैं कि इस घोषणा से पहले ही बीजेपी ने अपने खातों में पैसा जमा कर लिया है। उदाहरण के लिए जैसा कि  नोट बंदी की घोषणा के दिन ही पश्चिम बंगाल बीजेपी ने अपने खाते में 1 करोड़ की रकम जमा करवायी। ऐसी हरकतों से वह आज के धनखर्च वाले चुनाव में बेहतर स्थिति में होगी। तीसरी बात जो सबसे महत्वपूर्ण है, *देश में मंदी और पूँजीपतियों द्वारा बैंकों के कर्जे को हड़प जाने (नॉन परफ़ार्मिंग सम्पत्ति के रूप में और खराब ऋण(बैड लोन) ) के बाद जनता की गाढ़ी कमाई की जो मुद्रा बैंकों में जमा होगी उससे पूँजीपतियों को फिर मुनाफा पीटने के लिए पैसा दिया जा सकेगा।*पूँजीपतियों द्वारा तमाम बड़े लोन बैंकों से लिए गए हैं और उनको चुकाया नहीं गया है। आज सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक 6,00,000 करोड़ रुपये की भयंकर कमी से जूझ रहे हैं। पूँजीपतियों को फिर ऋण चाहिए और सरकार अब जनता के पैसे की डाकेजनी कर बैंकों को भर रही है जिससे इनको ऋण दिया जाएगा, जिसमें 1,25,000 करोड़ रिलायंस और 1,03,000 करोड़ वेदांता को दिये जाने हैं। इस कतार में कई और बड़े पूंजीपति भी शामिल हैं। 

*इस नोट बंदी में जनता के लिए क्या है?*साथियो, मोदी सरकार की *नोट बंदी जनता के लिए वास्तव में एक और धोखा, एक और छल-कपट, एक और लूट के अलावा कुछ नहीं है।* इस बिकाऊ फासीवादी प्रचार तंत्र पर कान देने की बजाय जरा गंभीरता से सोचिए कि आज बैंकों और एटीएम पर लंबी कतारों में कौन लोग खड़े हैं? क्या उसमें टाटा,बिड़ला, अंबानी, अडानी या कोई मोदी और अमित शाह या कोई बड़ा अफसर खड़ा है? तो क्या देश का सारा काला धन 5,000 से 15,000रुपये  कमाने वाले मजदूर और आम जनता के पास है? पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक महिला 2000 रुपये पकड़े बैंक के सामने मर गई, महाराष्ट्र में एक गरीब रुपये के लिए बैंक आया था वापस नहीं होने से वह मर गया, देर रात तक बैंक में काम करने से आठ बैंक कर्मचारी गाड़ी की टक्कर से मर गए। दर्जनों मौतें हो चुकी हैं। क्या सारे काले पैसे के लिए इनकी ही आहुति होनी थी? जो दिल्ली में रिक्शा चलाने वाला मजदूर है, दिहाड़ी मजदूर है, रेहड़ी खोमचा लगाता है, छोटी-मोटी नौकरी करने वाली आम जनता है, वह बैंकों के सामने लाइन में लगी है। कितनों के पास बैंक खाते नहीं हैं, कितनों के पास कोई पहचान पत्र नहीं हैं। लोगों के पास आने- जाने के पैसे नहीं हैं, राशन के पैसे नहीं हैं। दलालों की चाँदी है। अफवाहें उड़ रहीं हैं; कहीं नमक महँगे दामों पर बिक रहा  है  तो कहीं 500 के नोट 300 और 400 रुपये में लिए जा रहे हैं। यही हाल पूरे देश का है। करोड़ों गरीब लोग जिन्होंने  अपनी सालों की कमाई को मुश्किल दिनों के लिए इकट्ठा करके रखा था, सब अपने खून-पसीने की कमाई के कागज बन जाने पर बेचैन हैं। कोई बेटी की शादी को लेकर परेशान है तो कोई अस्पताल में परेशान है। एक महिला लाश लेकर रो रही है कि अंतिम संस्कार के पैसे नहीं है। क्या हम नहीं जानते हैं कि इस देश में अभी भी एक भारी आबादी के पास तो बैंक खाते नहीं हैं, जो अपनी मेहनत पर दो जून की रोटी कमाती है और उसी में से पेट काटकर कुछ पैसे बचाती है? वह आज क्या करे? क्या हम तमाम तकलीफ़ों को चुपचाप सहेंगे क्योंकि मामला "देश"  और "कालेधन" का है? साथ ही ऐसे नये  नोटों के छपने का जो लगभग 15,000 करोड़ रुपया खर्च आयेगा वह भी जनता की गाढ़ी कमाई से ही वसूला जाएगा।

साथियो,  हमें इन जुमलेबाजों की असलियत को समझना होगा। *आज जब फरेबी, नौटंकीबाज मोदी सरकार जनता के व्यापक हिस्से को रोजगार,शिक्षा और चिकित्सा देने में असफल साबित हुई है और इसके अच्छे दिनों की सच्चाई लोगों के सामने आ गयी है तो यह 500 और 1000 के नोटों को बंद करके एक जनविरोधी कार्रवाई कर कालेधन को समाप्त करने की नौटंकी कर रही है। इसका जवाब जनता की व्यापक एकजुटता से देना होगा।*

बिगुल मज़दूर दस्ता नौजवान भारत सभा दिशा छात्र संगठन

पर्चे का ऑनलाइन लिंक - http://www.mazdoorbigul.net/archives/10457
प्रस्तुति: बिजूका
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टिप्पणियां:-

संजीव:-
जनता की सरकार जनता को जनता के लिए मौत बांट रही है।
निराला की कविता है
राजे ने अपनी रखवाली की
जनता ने खेली खून (नोटों) की होली
सारे "काले " गंगा नहा.कर सफेद हो गये। सब "सफेद" अपराधियों की तरह अपनी ईमानदारी का सबूत लिए लाइनों में खडे हैं, भूखे, प्यासे, लाचार,  बेवश, जैसे सारा काला धन उन्होंने ही पैदा किया था। जिनके पास सफेद भी नहीं बे सजा भुगत रहे हैं? क्यों कोई सवाल नहीं कर रहा? लोग सडकों पर हैं पर बंदियों की तरह। यही लोग यही गुस्सा किसी लक्ष्य के लिए निकलता तो मंजर कुछ और होता।
ब्यूरोक्रेसी और सरकार की नपुसंकता जिसके कारण काला धन पैदा होता है सब तमाशा देख कर मजे ले रहे हैं। सजा भुगत रही जनता को लाइनों में खडे देखकर । वोट दिया था इसी तरह  अब नोट भी दो इसी तरह लाइनों में।
वोट पाने वाले तब ऐश कर रहे थे अब भी कर रहे हैं। कोई जनप्रतिनिधि जनता की तकलीफ के साथ खडा है नहीं? तब वोट गिन रहै थे अब वे नोट गिन रहै हैं। गरीबों की सरकार गरीबों के साथ?

पल्लवी प्रसाद:-
परेशानी नि:संदेह है। मेरे जो मित्र सबसे अधिक परेशान हैं लाईन में लगने से वे ही सबसे ज्यादा शहीदों के लिये व्यथित होते हैं, भगत सिंह की कसमें खाते हैं, शहीदों वाली पोस्ट शेयर करते हैं, सेना के फैन इत्यादि हैं। - कमाल का दिलचस्प इत्तेफाक है!

आलोक बाजपेयी:-
आयकर विभाग के मुताबिक़ ब्लैक मनी का सिर्फ़ 5-6℅ ही कैश में होता है। बाक़ी, शेयर, बॉन्ड, ज़मीन, सोना वगैरह में।
94℅ कालाधन खुश होगा इस वक़्त। बचे हुए 6℅ का 10℅ पकड़ने के लिए सरकार ने देश को कतार में खड़ा कर दिया।

प्रदीप कान्त:-
इस देश के आम आदमी की ज़िंदगी कतारों में ही बीतती है ये एक और कतार है और माफ़ कीजिये
इनमे से भी बहुत से ऐसे हैं जो अभी भी अंध भक्त हैं। यानी समस्या अंध भक्ति भी है ।

मैं खुद कई एटीएम घूम चुका हूँ ज़्यादातर पर पैसा ही नहीं खासकर जो शहर के बाहर के हिस्से में हैं । पर लोग खुद को ढाढस भी बंधाते हैं दो चार दिन में सब सामान्य हो जाएगा

क्या हो जाएगा जाकी नए नोटों के हिसाब से एटीएम का केलीब्रेशन ही नहीं

क्या करें इस देश का

रचना:-
आप ग़ौर करें,  तो लाईन में लगने वाले मित्र,  भगतसिंह की कसमें इसीलिए खाते हैं क्योंकि उन्होंने दुर्व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी।  तो अब क्या अचरज है अगर उसी दुर्व्यवस्था से परेशान हैं? मैं भी अतिवादी दृष्टिकोण के ख़िलाफ़ हूँ,  इसीलिए इस निर्णय पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं दी थी।  पर अब तो सच सामने है और हर दिन नये खुलासे हो रहे हैं इस निर्णय की 'अति गोपनीयता' पर और देश भर से आने वाले परिणामों पर।  क्या इससे पहले मुद्रा परिवर्तन के कारण मौतों की घटनाएँ हुई थीं?

पल्लवी प्रसाद:-
हर बड़ी घटना के विभिन्न पहलू होते हैं। हम सब स्वतंत्र हैं अपनी दृष्टि चाहे सकारात्मक पर रखें चाहे नकारत्मक पर।/ बचपन में शायद टीचर ने बताया था कि एक अच्छा लेख वह होता है जो विषय के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलूओं की पड़ताल करता है और अंत सदा उम्मीद/आशा पर करता है - यह बात स्वस्थ जीवन या सामाजिक दृष्टि के लिये भी है।

रचना:-
जी।  शायद आप ठीक कह रही हैं।  यह दोष मेरे दृष्टिकोण में ही है कि पिछले पाँच दिनों से नई मुद्रा न होने के कारण राशन नहीं ले पा रही..  मेरा बेटा पाँच किमी पैदल चलकर ट्यूशन जाने को मजबूर है क्योंकि उसके पास औटो के लिए खुले पैसे नहीं हैं।  और व्यक्तिगतता से ऊपर उठने हुए उन न्यायाधीशों के दृष्टिकोण को भी कोसना चाहूँगी जो हत्या और बलात्कार के दोषियों को प्राणदंड या उम्रक़ैद की सज़ा सुनाते हैं.. बिना उनका दृष्टिकोण समझे..! जी।  बिल्कुल।  और सबसे ज़्यादा तक़लीफ़ उस तबके की सोचिए जिनके पास कोई एटीएम या बैंक अकाउंट नहीं,  अपना पेट काटकर बचाये नाजायज़ नोट जायज़ बदलने के लिए..

प्रणय कुमार:-
क्या यह मंच भी केवल आलोचना के लिए आलोचना करेगा,इक साहसिक पहल के भी निहितार्थ निकाले जा रहे हैं,भई वाह!
एक बार पुनः आश्चर्य नहीं,लगे रहिए,आप ही मोदी सरकार की असली ताकत हैं!!!! रचनात्मक आलोचना भी कोई चीज़ होती है,साहित्यिक-प्रबुद्ध जन भी नारों की शक़्ल में बात कहने लगे तो बेचारगी और खीझ समझ आती है| इस मंच का वैचारिक विमर्श इतना एकतरफ़ा हो जाता है कि पढ़ने से पहले ही निष्कर्ष पता होता है|साहित्यिक रचनाओं के लिए पूरे आदर के साथ! आप काले धन को रोकने के निदान बताएँ, कुछ न करने पर चुने हुए प्रधानमन्त्री के लिए 'फेंकू' विशेषण और किए जाने पर तानाशाह|राजनीतिज्ञों और साहित्यिक जनों की टिप्पणी में कुछ तो अंतर होना चाहिए|

पल्लवी प्रसाद:-
इसी बहाने बच्चों को पैसे और सुविधाओं की कीमत पता चलेगी - वरना प्रायः लगता कि या तो वे दूसरे ग्रह से आये हैं या हम दूसरे ग्रह पर पैदा हुये थे

प्रणय कुमार:-
अभी-अभी लगभग 50 लोगों से इसी मुद्दे पर बात कर आ रहा हूँ,लोग परेशान होते हुए भी सरकार के फैसले को सराह रहे हैं|थोड़ा वक्त दीजिए,चीजें ठीक होंगी|

प्रदीप मिश्रा:-
मैं इस बात से एकदम सहमत नहीं हूँ कि हमारे देश के संविधान के सम्मानित पद पर बैठे व्यक्ति को किसी भी गलत और अपमानित संबोधन से संबोधित किया जाये। यह देश का अपमान है। हम अपने विचार रख सकते हैं। लेकिन किसी का भी व्यक्तिगत अपमान गलत है। मैं इसका विरोध करता हूँ।

संजीव:-
कालाधन पैदा करने में सबसे बडा योगदान नेताओं का व्यक्तिगत तैर फर हैता है। दूसरे उन्हें यह भी पता होता हे कि उनके इलाके में कोन कोन कितने काले धंधे में व्यस्त है और उससे उन्हें कितना मिलता है। तीसरे उनकी धमक और सत्ता की नाराजगी और अपने स्वार्थ के कारण कलेक्टर आदि अधिकारी भी कालेकारखानों को रोकते नहीं हैं।
इस तरह 90% कालाधन सत्ताधारी वर्ग की नाक के नीचे से पैदा होता है। इसके अलावा शासन के कामों के ठेके और कमीशन का खेल सब जानते हैं।
इस सब जानकारी के बाद भी शासक वर्ग कालेधन वालों को व्यक्तिगत रूप से सजा नहीं देता है उन्हें पकडता नहीं है।
अपनी अक्षमता को छिपाने के लिए पूरी  जनता को अपराधी बना देना कहां का न्याय है?
सत्तावर्ग अपनी पार्टी को पिछले चुनाव में मिले धन का स्रोत भी पता कर लेती ईमानदारी से तो आधे कालेधन के स्रोत का पता चल जाता। और जनता पर यह मार नहीं पडती।

प्रदीप कान्त:-
भाई साहब विडम्बना ये है कि इस निर्णय के पक्ष में जनता का वो तबका खड़ा है जो पढ़ा लिखा है

उसका कहना यह है कि एक दिन तो होना था जनहित में !!!!

और थोड़ी सी परेशानी तो भुगतनी पड़ेगी

चाहे मौत हो रही हो
(अंध भक्ति)

प्रदीप मिश्रा:-
पल्लवी जी मेरा कुछ सवाल है। आतंकवादियों को आप इस कदम से समाप्त नहीं कर रहे हैं। कुछ दिनों असुविधा हो सकती है। जिससे उनका कुछ भी नहीं बिगड़ रहा है लेकिन देश करोड़ों रुंपयों के आर्थिक नुकसान के साथ अपने नागरिकों को मौत तक भी पहुंचा रहा है। पाकिस्तान तो चाहता है कि भारत में इसतरह के कदम उठाएं। पाकिस्तान क्या अमरीका और चीन के भी मन की बात है।

संजीव:-
दर असल देश की जनता को भ्रमित किया जा रहा यह कह कर की 500 और 1000 के नोट यानी मुद्रा कालेधन के रूप में देश में है। कोई मुद्रा कालाधन कभी नहीं होती।
कालाधन क्या है? कालाधन मुद्रा के रूप में नहीं होता बल्कि मुद्रा को अर्जित करने का ढंग जब गैर कानूनी हो तब कालाधन पैदा होता है।
धन या पूंजी संबंध का नाम है कान्ट्रेक्ट का नाम है। गलत तरीके किसकी शह से चलते हैं? कौन गलत तरीकों को चलने देता है? तो कालाधन वो गलत तरीके हैं न कि मूद्रा। कालाधन पैदा न हो उसके रास्ते बंद करने थे। जो सही कदम.होता। वो तरीके तो यथावत हैं। तो फिर कालाधन पैदा होगा।

संदीप कुमार:-
मेरा मानना है की यह सरकार का प्रयास है घरेलु बचत को खींच कर बाजार में लाने का क्योंकि सेठ जी लोग काफी पैसा बाहर ले गए है। काला धन केवल बहाना है। दूसरा इस धन का इस्तेमाल 2019 चुनाव में कांग्रेस की तरह कल्याण योजनाएं लाने में करेंगे। बहर हाल दांव उल्टा हो गया लगता हओ

प्रदीप मिश्रा:-
आप बाकी सब छोड़ दीजिए। एक 500 के नोट बनाने की कीमत लगभ 56 रूपए और 1000 के नोट 76 रूपए। सिर्फ निर्माण लगत। यह करोड़ों में है। बाकी दूसरे खर्च छोड़ कर। जरूर पल्लवी जी आप खा लें और खाते वक़्त यह भी सोचियेगा की देश के लाखों लोग इस कदम के कारण भखे पेट सो रहे हैं। वे भ्रस्टाचारी या आतंकवादी नहीं। मज़दूर या किसान जिससे लोग हैं।

संजीव:-
ये तो वही बात हुई कि कक्षा में दो दादा किस्म के बच्चों ने शैतानी की उसमें एक माटसाब का भतीजा था और दूसरा सरपंच का लडका तो मानीटर ने नाम नहीं बताये। मास्टर साब ने पूरी क्लास को कक्षा से बाहर धूप में भूखे प्यासे खडे रहने की सजा सुनादी।
अपनी अक्षमता और दवंगो की दवंगयी के कारण पूरी क्लास सजा पा रही है। वे दोनों बच्चे पीछे के रास्ते पहले ही भागकर घर में माल सूत रहे थे।
भीडतंत्र का यही न्याय हे।
अंधेर नगरी चोपट राजा टके सेर भाजी टके सेर खाजा।
दीवाल गिरी है तो किसी को तो सजा मिलनी ही चाहिये।
चाहे निरपराध जनता ही क्यों न हौ।
जी पिछले 68 वर्षों से। ढाई साल की सरकार तो इस देश में कुछ लोगों के दिमाग में है। कि सरकार तो अस बनी है। हम तो 1947 से ही सरकार को भोग रहे हैं।

संदीप कुमार:-
मायावती, केजरीवाल, कांग्रेस और जयललिता का मजाक तो ऐसे उड़ाया जा रहा है जैसे भाजपा एक-एक रूपये के चंदे का ऑनलाइन ब्यौरा देती है. पैथेटिक

संजीव:-
तुम जिसको *पैसा* समझते हो वह एक *मान्यता* है अगर *किसी दिन सरकार बदल जाए और रातोंरात यह एलान किया जाए कि फलाँ-फलाँ नोट नहीं चलेगा तो तुम क्या करोगे?* मान्यता को बदलने में देर कितनी लगती है? *चंद कागज के टुकड़ों पर किसी का चित्र और हस्ताक्षर करने से वह मुद्रा बन गई और व्यवहारिक काम में आने लगी।* अब मान्यता बदल गई तो वह मुद्रा *दो कौड़ी* की हो जाएगी ! सारा खेल मान्यता का है।

*जड़ वस्तुऐं मूल्यहीन हैं महज एक मान्यता है जिसने उन्हे मूल्यवान बना दिया है!* स्वर्ण रजत हीरे मुद्रा इनका मूल्य महज मान्यता का आरोपण है। *जिस दिन तुम जगत की मान्यताओं से मुक्त हो गये उस दिन सब मिट्टी हो जाएगा उस दिन तुम चेतना को उपलब्ध होगे जो अनमोल है !*

- *_ओशो रजनीश_*

पल्लवी प्रसाद:-
जैसा जोरदार झटका उन्हें लगा है एक पत्थर चलवाने को भी रेजगारी नहीं जुट रही। हमें बहुत वक्त मिल जायेगा। उन्हें दुबारा संगठित होना बहुत मुश्किल प्रतीत होगा। उनकी रातों रात कमर टूट गयी।/ यहाँ हम सब इन्सान हैं न? आपको एक-दो दिन का लाईन में लगना असह्य है कश्मीर के लोग का महीने-दो महीने से क्या हाल होगा कल्पना करें। उनके बच्चे नहीं पढ़ते? राशन नहीं खाते? बीमार नहीं पड़ते?... अन्य के लिये भी समदुःखकातरता रखें।

रचना:-
किसने कहा कि उनके लिए नहीं है पल्लवी जी?
क्या उनकी इस दुर्दशा के लिए ज़िम्मेदार सरकार के किसी क़दम का मैंने समर्थन किया है?
और वैसे भी दोनों बातों में बहुत अन्तर है।
और 8 तारीख की रात से अब तक केवल एक दो दिन नहीं हुए हैं।  आगे भी कब तक ये स्थिति रहने वाली है,  अंदाज़ा लगाना मुश्किल है

पल्लवी प्रसाद:-
बल्कि यह कहना नहीं चाहती लेकिन मेरे यहाँ खुले नहीं थे। नहीं हैं। पहले एकाध दिन नोट चले। मेरे घर के सामने एटीएम है। हम जब चाहें निकाल सकते हैं लेकिन नहीं निकाला न बैंक गये। ऐसा हर कोई नहीं कर पायेगा लेकिन जो कर सकें उन्हें जरूर भीड़ नहीं बढ़ानी चाहिये।

प्रदीप मिश्रा:-
पल्लवी जी यह सरासर धोखा है। इस कदम से न तो भस्टाचार रुकेगा, न ही फेक मनी और ना ही आतंकवादियों के कमर टूटेंगे। यह इतना आसान होता तो बहुत सारे।देश पहले ही कर चुके होते। जो 500 और 2000 के नोट आएं हैं। उनको देखिये। सचमुच चूर्न के नोट जैसे हैं। फिर उनका फेक मनी बनाने में बहुत टाइम नहीं लगेगा।
बड़े नोट सिर्फ बड़े व्यापारियों के पास स्वीकार्य हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि उसपार भी काले धन की गुंजाइस बहुत अच्छी है। छोटे जो ईमानदार हैं सिर्फ वे ही भयभीत हैं।
जहाँ तक कश्मीर की बात है। यह सरकार उसको सुलझाना नहीं चाहती। कोई भी सरकार सुलझाना नहीं चाहती वह उनके राजनितिक दांवपेंच का ठीया है। नहीं तो जब आप सर्जिकल स्ट्राइक दूसरे देश में कर सकते हैं तो अपने देश में क्यों नहीं ?
सिर्फ टैक्स के प्लानिंग इसतरह से कर दिया जाये कि हर व्यक्ति उसको पे करने में आसानी समझे और सरकारी तंत्र जो की मूलरूप से नेताओं के आग्रह से भ्रस्ट है। उसको संभल लें तो भ्रस्टाचार ख़त्म हो जायेगा। एक सामान्य उदहारण देता हूँ। हम घर खरीदते हैं उसका गाइड लाइन 20 लाख होता है। उसपर रजिस्ट्री होती है। लेकिंन पेमेंट 30 लाख देते हैं। इस गाइड लाइन को हमेशा उस नैक पर रखें जिसके ऊपर बिल्डर मांग ही ना पाय। तो देश की आमदनी भी बढ़ेगी और चोरी भी नहीं होगी।

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