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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

मुनाफाखोरो को बिजली के खंभे पर लटकाया जायेगा : हरिशंकर परसाई 

साथियो नमस्कार,

आइये आज पढ़ते हैं हरिशंकर परसाई जी का एक व्यंग्य ।

मुनाफाखोरो को बिजली के खंभे पर लटकाया जायेगा : हरिशंकर परसाई 
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एक दिन राजा ने खीझकर घोषणा कर दी कि मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भे से लटका दिया जायेगा।
सुबह होते ही लोग बिजली के खम्भों के पास जमा हो गये। उन्होंने खम्भों की पूजा की, आरती उतारी और उन्हें तिलक किया।
शाम तक वे इंतज़ार करते रहे कि अब मुनाफ़ाख़ोर टांगे जायेंगे, और अब। पर कोई नहीं टाँगा गया।
लोग जुलूस बनाकर राजा के पास गये और कहा,"महाराज, आपने तो कहा था कि मुनाफ़ाख़ोर बिजली के खम्भे से लटकाये जाएेंगे,पर खम्भे तो वैसे ही खड़े हैं और मुनाफ़ाख़ोर स्वस्थ और सानन्द हैं।"
राजा ने कहा,"कहा है तो उन्हें खम्भों पर टाँगा ही जायेगा। थोड़ा समय लगेगा। टाँगने के लिये फन्दे चाहिये। मैंने फन्दे बनाने का आॅर्डर दे दिया है। उनके मिलते ही, सब मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भों से टाँग दूँगा।
भीड़ में से एक आदमी बोल उठा,"पर फन्दे बनाने का ठेका भी तो एक मुनाफ़ाख़ोर ने ही लिया है।"
राजा ने कहा,"तो क्या हुआ? उसे उसके ही फन्दे से टाँगा जाएेगा।"
तभी दूसरा बोल उठा,"पर वह तो कह रहा था कि फाँसी पर लटकाने का ठेका भी मैं ही ले लूँगा।"
राजा ने जवाब दिया,"नहीं, ऐसा नहीं होगा। फाँसी देना निजी क्षेत्र का उद्योग अभी नहीं हुआ है।"
लोगों ने पूछा, "तो कितने दिन बाद वे लटकाये जाएेंगे।"
राजा ने कहा, "आज से ठीक सोलहवें दिन वे तुम्हें बिजली के खम्भों से लटके दीखेंगे।"
लोग दिन गिनने लगे।
सोलहवें दिन सुबह उठकर लोगों ने देखा कि बिजली के सारे खम्भे उखड़े पड़े हैं। वे हैरान हो गये कि रात न आँधी आयी न भूकम्प आया, फिर वे खम्भे कैसे उखड़ गये!
उन्हें खम्भे के पास एक मज़दूर खड़ा मिला। उसने बतलाया कि मज़दूरों से रात को ये खम्भे उखड़वाये गये हैं। लोग उसे पकड़कर राजा के पास ले गये।
उन्होंने शिकायत की, "महाराज, आप मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भों से लटकाने वाले थे, पर रात में सब खम्भे उखाड़ दिये गये। हम इस मज़दूर को पकड़ लाये हैं। यह कहता है कि रात को सब खम्भे उखड़वाये गये हैं।"
राजा ने मज़दूर से पूछा,"क्यों रे, किसके हुक़्म से तुम लोगों ने खम्भे उखाड़े?"
उसने कहा,"सरकार, ओवरसियर साहब ने हुक़्म दिया था।"
तब ओवरसियर बुलाया गया।
उससे राजा ने कहा, "क्यों जी तुम्हें मालूम है, मैंने आज मुनाफ़ाख़ोरों को बिजली के खम्भे से लटकाने की घोषणा की थी?"
उसने कहा, "जी सरकार!"
"फिर तुमने रातों-रात खम्भे क्यों उखड़वा दिये?"
"सरकार, इंजीनियर साहब ने कल शाम हुक़्म दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ दिये जायें।"
अब इंजीनियर बुलाया गया। उसने कहा उसे बिजली इंजीनियर ने आदेश दिया था कि रात में सारे खम्भे उखाड़ देना चाहिये।
बिजली इंजीनियर से कैफ़ियत तलब की गयी, तो उसने हाथ जोड़कर कहा,"सेक्रेटरी साहब का हुक़्म मिला था।"
विभागीय सेक्रेटरी से राजा ने पूछा, "खम्भे उखाड़ने का हुक़्म तुमने दिया था।"
सेक्रेटरी ने स्वीकार किया, "जी सरकार!"
राजा ने कहा, "यह जानते हुये भी कि आज मैं इन खम्भों का उपयोग मुनाफ़ाखोरों को लटकाने के लिये करने वाला हूँ, तुमने ऐसा दुस्साहस क्यों किया।"
सेक्रेटरी ने कहा,"साहब, पूरे शहर की सुरक्षा का सवाल था। अगर रात को खम्भे न हटा लिये जाते, तो आज पूरा शहर नष्ट हो जाता!"
राजा ने पूछा, "यह तुमने कैसे जाना? किसने बताया तुम्हें?
सेक्रेटरी ने कहा, "मुझे विशेषज्ञ ने सलाह दी थी कि यदि शहर को बचाना चाहते हो तो सुबह होने से पहले खम्भों को उखड़वा दो।"
राजा ने पूछा, "कौन है यह विशेषज्ञ? भरोसे का आदमी है?"
सेक्रेटरी ने कहा, "बिल्कुल भरोसे का आदमी है सरकार। घर का आदमी है। मेरा साला होता है। मैं उसे हुजूर के सामने पेश करता हूँ।"
विशेषज्ञ ने निवेदन किया, " सरकार, मैं विशेषज्ञ हूँ और भूमि तथा वातावरण की हलचल का विशेष अध्ययन करता हूँ। मैंने परीक्षण के द्वारा पता लगाया है कि जमीन के नीचे एक भयंकर प्रवाह घूम रहा है। मुझे यह भी मालूम हुआ कि आज वह बिजली हमारे शहर के नीचे से निकलेगी। आपको मालूम नहीं हो रहा है, पर मैं जानता हूँ कि इस वक़्त हमारे नीचे भयंकर बिजली प्रवाहित हो रही है। यदि हमारे बिजली के खम्भे ज़मीन में गड़े रहते तो वह बिजली खम्भों के द्वारा ऊपर आती और उसकी टक्कर अपने पाॅवरहाउस की बिजली से होती। तब भयंकर विस्फोट होता। शहर पर हजारों बिजलियाँ एक साथ गिरतीं। तब न एक प्राणी जीवित बचता, न एक इमारत खड़ी रहती। मैंने तुरन्त सेक्रेटरी साहब को यह बात बतायी और उन्होंने ठीक समय पर उचित कदम उठाकर शहर को बचा लिया।
लोग बड़ी देर तक सकते में खड़े रहे। वे मुनाफ़ाख़ोरों को बिल्कुल भूल गये। वे सब उस संकट से अविभूत थे, जिसकी कल्पना उन्हें दी गयी थी। जान बच जाने की अनुभूति से दबे हुये थे। चुपचाप लौट गये।
उसी सप्ताह बैंक में इन नामों से ये रकमें जमा हुईं - सेक्रेटरी की पत्नी के नाम- २ लाख रुपये; श्रीमती बिजली इंजीनियर- १ लाख; श्रीमती इंजीनियर -१ लाख; श्रीमती विशेषज्ञ - २५ हजार; श्रीमती ओवरसियर-५ हजार ।
उसी सप्ताह 'मुनाफाख़ोर संघ' के हिसाब में नीचे लिखी रकमें 'धर्मादा' खाते में डाली गयीं - कोढ़ियों की सहायता के लिये दान- २ लाख रुपये; विधवाश्रम को- १ लाख; क्षयरोग अस्पताल को- १ लाख; पागलख़ाने को-२५ हजार; अनाथालय को- ५ हज़ार।

प्रस्तुति-बिजूका समूह
द्वारा प्रदीप मिश्र जी
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टिप्पणियाँ:-

प्रदीप मिश्रा:-
वर्त्तमान को खोलती हुयी समसामयिक रचना। एक लेखक इसी तरह से हस्ताक्षहेप कर सकता है। परसाईं जी को प्रणाम।

दीपक मिश्रा:-
अद्भुत। आप आज को साक्षात् देख सकते हैं इस रचना में।

प्रदीप मिश्रा:-
दीपक भाई कालजयी रचानाएं शायद ऐसी ही होती हैं। जब लिखा होगा तब भी प्रासंगिक थी और आज तो उससे भी ज्यादा।

अजय कुमार गौतम:-
बहुत प्रासंगिक व्यंग्य.. सच्चाई को बताता हुआ

उदय अनुज:-
परसाई जी की रचनाएँ सचमुच हर समय जीवित रहने वाली हैं �उदय अनुज

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