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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

युवा कार्यकर्ता और लेखिका कात्यायनी की दो कविताएँ

नमस्कार साथियो... आज आपके लिए प्रस्तुत है युवा कार्यकर्ता और लेखिका कात्यायनी की दो कविताएँ।  इन पर आपके विचारों का स्वागत है।

कविता :

1. फ़ि‍लिस्‍तीन - 2015

वहाँ जलते हुए धीरज की ताप से गर्म पत्‍थर
हवा में उड़ते हैं,
पतंगें थकी हुई गौरय्यों की तरह
टूटे घरों के मलबों पर इन्‍तज़ार करती हैं,
वीरान खेतों में नए क़ब्रिस्‍तान आबाद होते हैं,
और समन्‍दर अपने किनारों पर
बच्‍चों को फुटबॉल खेलने आने से रोकता है।
वहाँ, हर सपने में ख़ून का एक सैलाब आता है
झुलसे और टूटे पंखों, रक्‍त सनी लावारिस जूतियों,
धरती पर कटे पड़े जैतून के नौजवान पेड़ों के बीच
अमन के सारे गीत
एक वज़नी पत्‍थर के नीचे दबे सो रहे होते हैं।
फ़ि‍लिस्‍तीन की धरती जितनी सिकुड़ती जाती है
प्रतिरोध उतना ही सघन होता जाता है।

जब संगीनों के साए और बारूदी धुएँ के बीच
'अरब-बसन्त' की दिशाहीन उम्‍मीदें
बिखर चुकी होती हैं
तब चन्‍द दिनों के भीतर पाँच सौ छोटे-छोटे ताबूत
गाज़ा की धरती में बो दिए जाते हैं
और माँएँ दुआ करती हैं कि पुरहौल दिनों से दूर
अमन-चैन की थोड़ी-सी नींद मयस्‍सर हो बच्‍चों को
और ताज़ा दम होकर फिर से शोर मचाते
वे उमड़ आएँ गलियों में, सड़कों पर
जत्‍थे बनाकर।

उत्‍तर-आधुनिक समय में ग्‍लोबल गाँव का जिन्‍न
दौड़ता है वाशिंगटन से तेल अवीव तक,
डॉलर के जादू से पैदा वहाबी और सलाफ़ी जुनून
इराक़ और सीरिया की सड़कों पर
तबाही का तूफ़ान रचता है।
ढाका में एक फैक्‍ट्री की इमारत गिरती है
और मलबे में सैकड़ों मज़दूर
ज़ि‍न्‍दा दफ़्न हो जाते हैं
और उसी समय भारत में एक साथ
कई जगहों से कई हज़ार लोग
दर-बदर कर दिए जाते हैं।
कुछ भी हो सकता है ऐसे समय में।
गुजरात में गाज़ा की एक रात हो सकती है,
अयोध्‍या में इतिहास के विरुद्ध
एक युद्ध हो सकता है,
युद्ध के दिनों में हिरोशिमा-नागासाकी रचने वाले
शान्ति के दिनों में कई-कई भोपाल रच सकते हैं
और तेल की अमिट प्‍यास बुझाने के लिए
समूचे मध्‍य-पूर्व का नया नक़्शा खींच सकते हैं।

जब लूट से पैदा हुई ताक़त का जादू
यरुशलम के प्रार्थना-संगीत को
युद्ध गीतों की धुन में बदल रहा होता है,
तब नोबेल शान्ति पुरस्‍कार के तमगे को
ख़ून में डुबोकर पवित्र बनाने का
अनुष्‍ठान किया जाता है
और मुक्ति के सपनों को शान्ति के लिए
सबसे बड़ा ख़तरा घोषित कर दिया जाता है।
सक्रिय प्रतीक्षा की मद्धम आँच पर
एक उम्‍मीद सुलगती रहती है कि
तमाम हारी गई लड़ाइयों की स्‍मृतियाँ
विद्युत-चुम्‍बकीय तरंगों में बदलकर
महादेशों-महासागरों को पार करती
हिमालय, माच्‍चू-पिच्‍चू और किलिमंजारो के शिखरों से
टकराएँगी और निर्णायक मुक्ति-युद्ध का सन्देश बन
पूरी दुनिया के दबे-कुचले लोगों की सोई हुई चेतना पर
अनवरत मेह बनकर बरसने लगेंगी।
इसी समय गोधूलि, जीवन के रहस्‍यों, आत्‍मा के उज्‍ज्‍वल दुखों,
आत्‍मतुष्‍ट अकेलेपन, स्‍वर्गिक राग-विरागों,
भाषा के जादू और बिम्‍बों की आभा में भटकते कविगण
अपनी कविताओं में फिर से प्‍यार की अबाबीलों,
शान्ति के कबूतरों, झीने पारभासी पर्दों के पीछे से
झाँकते स्‍वप्‍नों और अलौकिकता को
आमंत्रित करते हैं और कॉफी पीते हैं,
और बार-बार दस त‍क गिनती गिनते हैं
और डाकिए का इन्‍तज़ार करते हैं।

जिस समय विचारक गण भाषा के पर्दे के पीछे
सच्‍चाइयों का अस्थि-विसर्जन कर रहे होते हैं
इतिहास के काले जल में
और सड़कों पर शोर मचाता, शंख बजाता
एक जुलूस गुज़रता होता है
कहीं सोमनाथ से अयोध्‍या तक, तो कहीं
बगदाद से त्रिपोली होते हुए दमिश्‍क और बेरूत तक,
ठीक उसी समय गाज़ा के घायल घण्‍टाघर का
गजर बजता है
गुज़रे दिनों की स्‍मृतियाँ अपनी मातमी पोशाकें
उतारने लगती हैं,
माँएँ छोटे-छोटे ताबूतों के सामने बैठ
लोरी गाने लगती हैं
और फ़ि‍लिस्‍तीन धरती पर आज़ादी की रोशनी फैलाने में
साझीदार बनने के लिए
पूरी दुनिया को सन्देश भेजने में
नए सिरे से जुट जाता है।

2. 2014 कुछ इम्‍प्रेशंस

चिकने चेहरे वाला
वह सुखी-सन्‍तुष्‍ट आदमी
कितना डरावना लग रहा है
धीरे-धीरे गहराते अन्धेरे की इस बेला में।
००

जो उम्‍मीदें खो चुका है
बहुत सारी दूसरी चीज़ों के साथ
उसका रोना-झींकना
ऊब और झुँझलाहट पैदा करता है
लेकिन बीच-बीच में उससे मिलने को
जी चाहता है यह पूछने के लिए
कि उसकी गुमशुदा चीज़ों में से 
क्‍या कुछ मिल गई हैं ?
००

जो पराजयों के चयनित इतिहास को
निचोड़कर नई सैद्धान्तिकी गढ़ रहा है
खण्‍ड से समग्र की
और पेड़ से जंगल की पहचान करता हुआ,
वह नया इन्‍द्रजाल रचता कापालिक है बौद्धिक छद्मवेशी।
००

सबसे ख़तरनाक है
जानते-बूझते झूठी दिलासा देने वाला
मिथ्‍या आशाओं की मृगमरीचिका
रचने वाला आदमी।
लेकिन नहीं, उससे कम घातक नहीं है वह आदमी
जो चुपचाप इन्‍तज़ार करने की,
हवा का रुख भाँपते रहने की सीख देता है
या फिर यह बताता है कि
रोज़-रोज़ धीरे-धीरे बनती हुई यह दुनिया
एक दिन खुद-ब-खुद बदल जाएगी।
००

सबसे कुटिल किस्‍म के बेरहम हैं वे लोग
जो क़त्‍लगाहों के बाहर
मुफ्त शव-पेटिकाएँ बाँट रहे हैं,
यन्त्रणागृहों के बाहर टेबुलों पर 
मरहमपट्टी का सामान सजाए बैठे हैं,
और लुटे-पिटे लोगों के बीच
रोटी-कपड़ा-दवाइयाँ और
किताबें बाँट रहें हैं
और छोटी-छोटी पुड़ियों में
थोड़ी-थोड़ी आज़ादी भी।
००

इन सभी कपट प्रपंचों और दुरभिसन्धियों के विरुद्ध 
खड़े हैं ईमानदारी से कुछ लोग
जो पुरानी जीतों को
हूबहू पुराने तरीके से ही
लड़कर दुहराना चाहते हैं.
उन्‍हें मठवासी भिक्षु बन जाना चाहिए
अन्‍यथा इतिहास में लौटने की 
कोशिश करते हुए वे
अजायबघरों में पहुँच जाएँगे
या फिर कुछ अभयारण्‍यों में देखे जाएँगे।
००

समय का इतिहास
सिर्फ़ रात की गाथा नहीं.
उम्‍मीदें यूटोपिया नहीं,
यूटोपिया से निर्माण परियोजना तक का
सफ़रनामा होती हैं
और रात की हर गाथा को भी
उम्‍मीदों के बार-बार आविष्‍कार के
जादुई यथार्थ को जानने के बाद ही
लिख पाना मुमकिन होता है।

( प्रस्तुति-बिजूका)

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