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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल
राजा दासगुप्ता हमारे समय के महत्त्वपूरण बंगाली फ़िल्म निर्देशक है। सुनील दीपक द्वारा लिया उनका साक्षात्कार बिजूका के पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं। साक्षात्कार का अँग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद युवा पत्रकार पंकज जोशी ने किया है।
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युवा फ़िल्म निर्देशकों को सार्थक सिनेमा पर काम करने की ज़रुरत है...
सुनील दीपक

सुनील: राजा, अपने पिछले कामों को ध्यान में रखते हुए, आप एक फ़िल्म निर्माता के रूप में स्वयं को कहाँ पाते हैं? आप में किन संदर्भों में और कैसे बदलाव आए हैं?

राजा: अभी तक मैंने केवल छोटे पर्दे पर काम किया है, जिसमें अधिकांश बंगाली चैनल्स के लिए फ़िक्शन तैयार किए हैं। मैंने लगभग हर विधा पर काम किया है, और अब पिछले चार वर्षों से मैं अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने के बारे में सोच रहा हूँ। मुझे नहीं लगता कि एक फ़िल्म निर्माता के तौर पर मुझ में कोई बदलाव आए हैं, क्योंकि मैं अपने आप को हर विधा से जुड़ा पाता हूँ। हाँ, समय के साथ-साथ अनुभव ज़रूर बढ़ता जाता है। इसलिए, मुझे किसी भी चीज़ को करने में सहजता महसूस होती है।

सुनील: मैंने सत्यजीत रे या रित्विक घतक जैसे लोगों का बनाया नियोरियलिस्टिक सिनेमा देखा है, और मेनस्ट्रीम की कुछ ऐसी लोकप्रिय फ़िल्में भी देखी हैं जिन्हें उत्तम कुमार और सुचित्रा सेन की भावुक फ़िल्मों के समकक्ष रखा जा सकता है। हालाँकि, जितनी भी समकालीन फ़िल्में मैंने देखी हैं उन पर बॉलीवुड का बहुत प्रभाव दिखता है। क्या आप भी इससे सहमत हैं? क्या आपको लगता है कि फ़िल्मों में किसी विशेष बंगाली संवेदनशीलता के लिए उचित स्थान है। हाँ या नहीं, और आप ऐसा क्यों सोचते हैं?

राजा: हाँ, बॉलीवुड के प्रभाव के बारे में आपका सोचना बिल्कुल ठीक है। किं‍तु उनका क्रियान्वयन बहुत ढीले तरीके से किया जाता है। दरअसल, वर्तमान में अधिकतर निर्माता ग़ैर-बंगाली हैं और वे अपने निर्देशकों पर इस तरह की सामान्य कृतियाँ बनाने के लिए दबाव डालते हैं। और, मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है कि आजकल के तथाकथित काबिल युवा निर्देशक भी बहुत खोखला सिनेमा बना रहे हैं... मैंने अनुभव किया है कि वि‍श्वभर में इसी तरह का काम हो रहा है।

हाँ, फ़िल्मों में अब भी विशेष बंगाली संवेदनाओं के लिए पर्याप्त स्थान है, किंतु खेद इस बात का है कि ऐसा करने के लिए चुनिंदा निर्देशक ही हैं। पिछले दो-तीन सालों में केवल दो निर्देशकों ने इसे सफलता से किया है। आप सुमन मुखर्जी की “हर्बर्ट” (उनकी पहली फ़िल्म) और गौतम घोष (जो कि जाने-माने निर्देशक हैं) की “कालबेला” देखें। और मुझे उम्मीद है कि बिरसा की फ़िल्म “033” भी ऐसी ही फ़िल्म होगी।

सुनील: आपकी सभी कृतियों में से कौन-सी तीन ऐसी हैं जिनसे आप सबसे अधिक संतुष्टि हुए और क्यों?

राजा: मेरी टेलीफ़िल्म्स “मुखगुली”, “अन्य नक्शी” और मेरा धारावाहिक “एकुशा पा”। “मुखगुली” इसलिए क्योंकि इसमें में वृद्धाश्रम जैसी अति संवेदनशील विषय पर काम कर रहा था। “अन्य नक्शी” इसलिए क्योंकि इसमें मुस्लिम रूढ़िवाद के बारे में संदेश था। और “एकुशा पा” एक कैंपस की कहानी थी जिसमें युवावर्ग केंद्र में था।

सुनील: मुस्लिम रूढ़िवाद पर आपकी फ़िल्म अन्य नक्शी कब बनाई गई थी? फ़िल्म निर्माता सामान्यत: इस तरह के संवेदशील विषयों पर फ़िल्म बनाने से परहेज़ करते हैं, क्योंकि इनसे विवादों और प्रतिरोधों को हवा मिलती है। हाल ही में पश्चिम बंगाल में भी बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन का कड़ा विरोध किया जा रहा है। आपको अपनी फ़िल्म के लिए किस तरह की प्रतिक्रियाएँ मिली, विशेषकर मुस्लिमों के द्वारा?

राजा: अन्य नक्शी मैंने 2003 में बनाई थी जिसे एक प्रमुख बंगाली चैनल ईटीवी पर दिखाया गया था। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि उसकी कोई आलोचना नहीं हुई और न ही विवाद या विरोध प्रदर्शन हुए। कई प्रगतिशील मुस्लिमों ने टेलीफ़िल्म को सराहा और उसकी प्रशंसा की। इस हिसाब से मैं स्वयं को भाग्यशाली मानता हूँ।
सुनील: क्या आप किसी पुस्तक, किसी व्यक्तित्व या किसी घटना पर आधारित कोई फ़िल्म बनाना चाहते हैं?

राजा: हाँ, मैं सिराज-उ-दौल्लाह के सेनापति मीर जाफ़र जैसे व्यक्तित्व पर फ़िल्म बनाना चाहता हूँ, जिसे भारतीय इतिहास में ग़लत रूप से एक देशद्रोही बताया जाता है। मैं इन ग़लतियों को ठीक करना चाहता हूँ। मैंने निजी तौर पर इस पर बहुत शोध किया है और अपने दावों को साबित करने के लिए मेरे पास ठोस सबूत भी हैं।


सुनील: मीर जाफ़र पर फ़िल्म बनाने के आपके विचार को लेकर मैं बहुत हैरान हूँ। सभी लोगों की तरह, मेरे मन में भी उसकी छवि एक देशद्रोही की ही है। इसलिए मैं इसके पीछे छिपी कहानी के बारे में उत्सुक हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि इस तरह की फ़िल्म वर्तमान का आईना भी बन सकती है क्योंकि आजकल कई कारणों से सत्य को तोड़ा-मरोड़ा जाता है और समस्याओं से जुड़े जनप्रतिनिधि उसके पीछे की जटिलता को कम ही दर्शा पाते हैं।

राजा: मीर जाफ़र की फ़िल्म एक अंतर्राष्ट्रीय प्रोजेक्ट होगी...और गिल के जाने के बाद अब मुझे इस प्रोजेक्ट पर संदेह है। हमने इस पर बहुत चर्चा की थी और इसे लेकर बहुत उत्साहित भी था। लगता है कि अब ये सिर्फ़ एक सपना रह जाएगा!!!

सुनील: आपके बेटे बिrrरसा भी एक फ़िल्म निर्माता हैं। आप उन्हें या अन्य युवा फ़िल्मकारों को क्या सलाह देंगे?

राजा: फ़िलहाल, बिrrरसा अपनी पहली फ़ीचर फ़िल्म के पोस्ट प्रोडक्शन पर काम कर रहा है जो कि इस साल अगस्त में रिलीज़ होगी। मैंने कभी उसे कोई सलाह नहीं दी और न ही कभी उसने कभी मुझसे कोई सलाह मांगी। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा मेरे साथ 1979 में मेरी पहली डॉक्यूमेंटरी के समय हुआ था। न तो मैंने कभी अपने पिता से कोई सुझाव माँगा था और न उन्होंने आगे होकर कोई सुझाव दिया। सुनील, समय बहुत तेज़ी से बदल रहा है और ये एक तरह का जनरेशन गैप है। अब, युवा फ़िल्मकारों को मेरी सलाह यही है कि: बस “बेहतर” फ़िल्में बनाएँ (वो भी अपनी पसंद की) लेकिन याद रखें कि आप इस पर बहुत पैसा लगाते हैं और एक फ़िल्मकार होने के नाते आपके ऊपर एक ‘सामाजिक ज़िम्मेदारी’ होती है। ये एक कविता लिखने जैसा बिल्कुल नहीं है... जिसमें सिवाय एक काग़ज़ के टुकड़े और स्याही की कुछ बूंदों को छोड़कर... आपको एक पैसा भी खर्च नहीं करना पड़ता है।

सुनील: फ़िल्मों और सामाजिक ज़िम्मेदारी के संबंध में, क्या आपको लगता है कि फ़िल्में या बंगाली फ़िल्में अब भटक गई हैं? क्या ये बाज़ार का प्रभाव है? और क्या सामाजिक ज़िम्मेदारी अब बस छोटे पर्दे और कुछ फ़िल्मों तक सीमित रह गई है?

राजा: जैसा कि आपने ही कहा... ये सब कुछ पूरी तरह से बाज़ार का ही प्रभाव है।

सुनील: धन्यवाद राजा।
अनुवादः पंकज जोशी
आशीष झा द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘मातृभूमि ए नेशन विदाउट वुमेन’ का बिजूका लोक मंच में 9 मई रविवार को अपने सदस्यों के बीच प्रदर्शन किया गया। आशीष झा बहुत युवा फ़िल्म निर्देशक है, अभी तक उन्होंने प्रदर्शित फ़िल्म के अलावा अनवर (2007) A VERY VERY SILENT FILM (2001) फ़िल्में निर्देशित की है।इन थोड़ी ही फ़िल्मों के माध्यम से आशीष झा ने अपनी पहचान एक कलात्मक फ़िल्म निर्देशक के रूप में बनायी है। इस बार बिजूका के साथियो के लिए हम फ़िल्म मातृ भूमि पर वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री जवाहर चौधरी का लेख प्रस्तुत कर रहे हैं.. उम्मीद है पाठकों को पसंद आयेगा।

मातृ भूमि
ए नेशन विदाउट वुमन


जवाहर चौधरी

भारत में कन्या भ्रूण हत्या का प्रसंग सदियों पुराना है। इसके कारणों को दोहराने की आवश्यकता नहीं है। पिछली जनगणना में हमारे अनेक राज्यों में स्त्री-पुरुष अनुपात में चिंताजनक अंतर सामने आया है। सामान्य रूप से देश में प्रति हज़ार पुरुषों पर नौ सौ छत्तीस स्त्रियाँ होती हैं, किन्तु कहीं-कहीं यह मात्र सात सौ के आसपास हो गया ! हरियाणा में तो लड़कियों की इतनी कमी है कि वहाँ दक्षिण और अन्य जगहों से ख़रीद कर विवाह करने के प्रकरण भी सामने आए हैं। आज भी लड़कियों को मारने की प्रथा पूर्ण रूप से बंद नहीं हुई है। फर्क़ केवल यह है कि भ्रूण परीक्षण से पता करके अब उन्हें जन्म से पहले ही मार दिया जाता है।

‘मातृ भूमि- ए नेशन विदाउट वुमन’ मनीष झा की 2003 में रिलीज, इस मायने में एक महत्त्वपूर्ण फ़िल्म है कि यह कन्या हत्या की इस समस्या को गहरे असर के साथ दर्शक के मन में उतार देती है। फ़िल्म का आरंभ प्रसव के दृश्य से होता है और लड़की पैदा होती है, जिसे दूध के तपेले में डुबो कर मार दिया जाता है। यह प्रथा, विकृत प्रवृति और मानसिकता का प्रतिनिधि दृश्य आक्रोशित करने वाला है। गाँव में पाँच लड़कों और अधेड़ जमींदार पिता का एक परिवार है। लड़के विवाह योग्य हैं, पर पंडित द्वारा आसपास दूर-दूर तक छान मारने पर भी कोई लड़की उपलब्ध नहीं है। हालात इतने बिगड़े हुए हैं कि छोटे लड़के यौन शोषण का सहज शिकार होते हैं, बल्कि गाय-भैस और बकरियों को भी नहीं छोड़ा जाता है। बाप दहेज के लालच में लड़के को लड़की के कपड़े पहना कर ब्याहने से भी नहीं चूक रहे हैं। पूरा गाँव स्त्री की छाया से भी महरूम है।

ऎसे में पास ही के गाँव में कहीं एक लड़की कलकी का पता चलता है, जिसे उसके पिता ने बहुत छुपाकर पाला है। पंडित जमीदार को सूचना देता है। बात आगे बढ़ती है, पर लड़की का पिता एक लाख रुपए के प्रस्ताव के बावजूद जमींदार के बड़े लड़के से अपनी लड़की का विवाह नहीं करता है। लेकिन पाँच लाख व पाँच गाएँ लेकर पाँचों लड़कों से कलकी को ब्याह देता है।

ससुराल में कलकी को अपने पाँच पतियों के साथ ससुर को भी झेलना पड़ता है। सप्ताह में हर दिन कलकी को एक के साथ सोना पड़ता है। सारे पुरुषों में सबसे छोटा बेटा सुदर्शन और स्वभाव से मानवीय होने के कारण कलकी उसे पसंद करने लगती है। यह बात अन्य भाइयों और पिता को खटकती है और षडयंत्र पूर्वक वे उसकी हत्या कर देते हैं। ज़ाहिर है अब कलकी पर इनकी पशुता दूने वेग से आक्रमण करती है। मौक़ा देख कर वह घरेलू नौकर-लड़के के साथ भागने का असफल प्रयास करती है, फलस्वरूप लड़के को जान गवानी पड़ती है। अब कलकी को गौशाला में साँकल से बाँध दी जाती है। बारी-बारी से ‘मर्द’ उसका यौन शोषण करते रहते हैं।

इस बीच गाँव के दलित लोग जमींदार के घर नौकर रहे रघु नाम के दलित लड़के की मौत का बदला लेने छुप कर धावा बोलने रात में आते हैं। वे दो लोग होते हैं और कुल्हाड़ी से वार करने की नियत से गौशाला के रास्ते जमींदार और उसके बेटों पर हमला करने का सोचते हैं। गौशाला में उन्हें जमीदार की बहू कलकी बँधी दिख जाती है। वे जमींदार और उसके बेटों पर कुल्हाड़ी से हमला करने का ख्याल छोड़ देतें हैं। उनमें से एक कलकी के साथ बलत्कार करता है और यह लगभग हर रात का रूटिन हो जाता है। कलकी गर्भवती हो जाती है। इस ख़बर से गाँव के दलित लोग मानते हैं कि जमींदार के घर पैदा होने वाले बच्चे के बाप वे हैं। बात बढ़ती है, और सवर्ण और दलित के बीच का सामूहिक संघर्ष में बदल जाती है। इधर जमींदार कुपित होकर कलकी को मार डालना चाहता है। उस पर केरोसिन छिड़कता है और उसे आग लगाने वाला होता है, तभी नौकर रघु की जगह रखे नये लड़के से यह देखा नहीं जाता और वह सब्जी काटने के चाकू से जमींदार की पीठ पर एक के बाद एक कई वार कर देता है। जमींदार मर जाता है। कलकी बच जाती है। अगले दृश्य में कलकी एक लड़की को जन्म देती है।

दरअस्ल यह भविष्य की चेतावनी देने वाली कहानी है। यह दुनिया में कहीं भी हो सकता है, लेकिन भारत के संदर्भ में तो है ही। भ्रूण हत्या के मामले में भारत जितना जाहिल और गँवार है उतना शायद ही कोई और देश होगा। किन्तु केवल अशिक्षित और परंपरावादी लोगों पर दोष मढ़ कर हम या कोई भी, इस पाप से मुक्ति महसूस नहीं कर सकता है। सैकड़ों वर्ष पुरानी इन परंपराओं के पीछे पुरुषों की कायरता ही प्रमुख है, जो अपनी बेटियों का भरण-पोषण और रक्षा करने से बचते रहे हैं। बात-बात में धर्म और सँस्कृति को याद करने वाला समाज अपनी ही बच्चियों के मामले में इससे विमुख कैसे हो जाता है ! धर्म में ‘ पवित्रता का प्रावधान’ इन हत्याओं के लिए कितना ज़िम्मेदार है कि व्यक्ति पाप करके किन्हीं पूजाओं और दान से इसे ‘धो’ सकता है। यह धारणा किसने पैठा दी है कि विशेष मुहुर्त में गँगा स्नान करने से पापियों के पाप धुल जाते हैं। या पापी के मरने के बाद भी ब्राह्मण-भोज और कुछ क्रियाएँ करने से उसे स्वर्ग में जगह मिल जाती है। पाप से बचने के प्रावधान पाप के बढ़ाने के उपाय ही हैं। जब तक यह बात समझ में नहीं आती कायरों के समाज में न अपराध कम होंगे न पाप यानी अपराध…

फ़िल्म का सबसे अच्छा पक्ष उसका निर्देशन और फ़िल्माँकन है। विषय में संभावना होने के बावजूद कहीं भी अश्लीलता नहीं है। मनीष झा की समझ को देख आश्चर्य होता है। यद्यपि वे कम ही आयु के, एक दम नौजवान हैं, किन्तु दर्शक को बार-बार लगता है कि श्याम बेनेगल की फ़िल्म देख रहे हैं। किसी सामाजिक समस्या पर उद्देश्यपूर्ण फ़िल्म बनाना आज वैसे भी लीक से हट कर चलना है। उस पर विषय की प्रस्तुति ऎसी है कि दर्शक के मन में गहराई तक उसका असर होता है और वह इस समस्या से ख़ुद को बेहद चिंतित पाता है। फ़िल्म को अनेक देशी-विदेशी अवार्ड मिले हैं। कलकी के रूप में तुलिका जोशी और जमींदार की भूमिका में सुधीर पांडे अद्भुत हैं। इनके अलावा सभी कलाकारों से मनीष झा ने बहुत सधा हुआ काम लिया है।

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16 कौशल्यापुरी, चितावद रोड, इन्दौर-45001 फ़ोन- 098263 61533

हिंदी फिल्मों में मानसिक रोग


सुनील दीपक

कुछ दिन पहले अपर्णा सेन द्वारा निर्देशित फिल्म "15 पार्क एवेन्यू" देखी, जिसका विषय है स्कित्जोफ्रेनिया, वह मानसिक रोग जिसमे रोगी सच और कल्पना का अंतर खो बैठता है. फिल्म देख कर हिंदी फिल्मों में मानसिक रोग के विषय को किन विभिन्न तरीकों से लिया गया है इसके बारे में सोच रहा था.
बढ़ते शहरीकरण, टूटते संयक्त परिवार, काम में तरक्की पाने और पैसे कमाने की होड़, इन सब बदलावों से जीवन स्तर अच्छे हुए हैं पर साथ ही साथ अकेलापन, उदासी और तनाव जैसे मानसिक रोग बहुत तेज़ी से बढ़े हैं. मानसिक रोगों को दो श्रेणियों में बाँटा जा सकता है. पहली श्रेणी में वह मानसिक रोग आते हैं जैसे गहरी उदासी, जिसमें व्यक्ति यथार्थ और कल्पना का अंतर समझता है. दूसरी श्रेणी में आते हैं स्कित्जोफ्रेनिया जैसे रोग, जिसमें व्यक्ति यथार्थ के जीवन और कल्पना के जीवन की सीमारेखा नहीं पहचान पाता. विश्व स्वास्थ्य संसथान का कहना है कि अगले दशकों में मानसिक रोग बहुत तेज़ी से बढ़ेंगे.
मानसिक रोग फ़िल्म को नाटकीय तनाव देने का काम अच्छा कर सकते हैं हालाँकि मानसिक रोग का प्रतिदिन का यथार्थ इतना निराशात्मक और बोझिल हो सकता है जिससे फिल्म देखने वालों को हताशा और तकलीफ़ हो जाये. शायद इसीलिए हिंदी फिल्मों ने मानसिक रोग के विषय को अक्सर असफल प्रेम का नतीजे के रुप में प्रस्तुत किया है और उसे कथा के दुखांत से जोड़ कर ट्रेजेडी फिल्म बनाई हैं. इस रुप में मानसिक रोग फिल्म का मुख्य विषय नहीं होता बल्कि प्रेम कथा को नया मोड़ देने का माध्यम बन कर रह जाता है.
स्कित्जोफ्रेनिया को कई बार व्यक्तित्व के दो हिस्सों में बँट जाने, यानि एक शरीर में दो विपरीत व्यक्तित्वों का रहना, स्टीवनसन के सुप्रसिद्ध उपन्यास डा जैकिल और मिस्टर हाईड से प्रभावित हुआ कथानक भी कुछ भारतीय फिल्मों ने चुना है जिनमें से उन्लेखनीय हैं "रात और दिन" (1967, निर्देशक सत्येन बोस) जो नरगिस की सशक्त अभिनय की वजह से प्रभावशाली बन गयी थी. इसी से कुछ मिलते जुलते कथानक वाली एक अन्य फ़िल्म जो कुछ समय पहले आई थी, "मदहोश" (2004) जिसमें बिपाशा बसु ने स्कित्जोफ्रेनिया के रोग को सतही और अप्रभावशाली तरीके से दिखाया था. इस तरह की फ़िल्में इस रोग की सही तस्वीर नहीं दिखातीं बल्कि उसे केवल कहानी में अप्रत्याशित मोड़ लाने का बहाना बना कर रह जाती हैं.
असफल प्रेम और मानसिक रोग के विषय पर केंद्रित फ़िल्मों के बारे में सोचा जाये तो सबसे पहले असित सेन की "खामोशी" (1967) को भूल पाना कठिन है. "खामोशी" में थी वहीदा रहमान, प्रेम में ठुकराए आहित प्रेमियों को मानसिक पीड़ा से निकालने के प्रेम का नाटक करने वाली नर्स के रुप में, जो हर बार खुद प्रेम करने लगती है और रोगी के जाने के बाद पागल हो जाती है. उनके साथ असफल प्रेमी के रुप में थे राजेश खन्ना और धर्मेंद्र. हालाँकि खामोशी की कहानी मानसिक रोगियों की पीड़ा दिखाने में सक्षम थी पर साथ साथ कुछ नकली भी, उसके पागलपन में किसी उपन्यास की नाटकीयता थी. प्रमुख पात्रों को छोड़ कर, फ़िल्म में दिखाये गये मानसिक रोग अस्पताल में अन्य सभी रोगी, रोगी कम और विदूषक अधिक थे जिनका काम फ़िल्म को कुछ हल्के फुल्के क्षण देना था.
खामोशी जैसी ही कहानी थी कुछ दिन पहले आई प्रियदर्शन द्वारा निर्देशित फ़िल्म "क्यों कि" (2005) की. "खामोशी" की अतिनाटकीयता, उसके मानसिक रोग के चिकित्सकों के केरिकेचर, उसके विदूषक जैसे मानसिक रोगी, सभी कमियाँ "क्यों कि" में और भी कई गुणा बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत की गयीं थीं. कोशिश कर भी मैं यह फिल्म पूरी नहीं देख पाया, उसकी चीख चिल्लाहट से सिर दुखने लगा था, इसलिए इसके बारे में और कुछ कहना बेकार है.
एक और फ़िल्म थी कुछ साल पहले की, "तेरे नाम" (निर्देशक सतीश कौशिक, 2003) जिसका विषय भी मानिसक रोग ही था. हालाँकि "क्यों कि" की तरह इसमें भी व्यवसायिक फ़िल्म वाली अतिश्योकत्ताएँ थी, पर इसमें मानसिक रोगियों पर अकसर होने वाले अमानवीय व्यवहार, हिंसा और अँधविश्वास का चित्रण था जो वे सब लोग पहचान सकते हैं जिन्हें कभी किसी मानसिक अस्पताल में जाने का मौका मिला है. मानसिक अस्पताल अक्सर अस्पताल नहीं पागलखाने कहलाते हैं और वहाँ मानव अधिकारों को बात तो छोड़िये, मानसिक रोगियों से अमानवीय व्यवहार होता है.
नई फ़िल्मों में मुझे अधिक विश्वासनीय लगी थी "मैंने गाँधी को नहीं मारा" (2005, निर्देशक जाह्नू बरुआ) जिसमें मानसिक रोग का असफल प्रेम से कोई सम्बंध नहीं था, बल्कि जिसका मानसिक रोगी एक बूढ़ा प्रोफेसर था जिसकी अल्सहाईमर जैसे रोग से यादाश्त गुम रही थी. फिल्म में रोगी की बेटी, फिल्म की नायिका का प्रेमी उसे ठुकरा देता है. समाज में मानसिक रोगों के साथ बहुत से अंधविश्वास जुड़े हैं और रोगियों और उनके परिवारों को इसकी वजह से बहुत कठिनाईयाँ उठानी पड़ती हैं.
"सदमा" तथा "कोई मिल गया" जैसी फ़िल्मों ने मानसिक विकास की कमी की बात को लिया है पर यह बात मानसिक रोगों की बात से भिन्न है, हालाँ कि दोनो बातों में कुछ साम्यताएँ भी हैं और लोगों का दोनो ही तरह के रोगियों के प्रति व्यवहार अक्सर घृणा और भर्त्सना भरा होता है.
अब बात करें १५ पार्क एवेन्यू की.
१५ पार्क एवेन्यू देखने की बहुत दिनों से इच्छा थी. अपर्णा सेन ने परोमा और 36 चौरँगी लेन जैसी फ़िल्में बनायी हैं इसलिए उनकी फिल्मों से भावपूर्ण कथानक और सुरुचि की आशा स्वस्त ही बन जाती है. फ़िर अगर फ़िल्म में वहीदा रहमान, शबाना आज़मी, कोंकणा सेन शर्मा, शेफाली शाह, सोमित्र चैटर्जी, ध्रृतिमान चैटर्जी, राहुल बोस जैसे सुप्रसिद्ध अभिनेता हों तो न भूल पाने वाली फ़िल्म देखने की आशा और भी बढ़ जाती है. पर जब आशाएँ इतनी ऊँचीं उठी हों तो उनका पूरा होना भी उतना ही कठिन हो जाता है, और शायद इसीलिए फिल्म देख कर अच्छा तो लगा पर यह नहीं लगा कि "वाह क्या बढ़िया फिल्म थी".
कथा साराँशः १५ पार्क एवेन्यू कहानी है श्रीमति गुप्ता (वहीदा रहमान) की और उनकी दो बेटियों, अँजली (शबाना आज़मी) और मिताली यानि मिट्ठू (कोंकणा सेन) की. मिट्ठू मानसिक रोगी हैं, उन्हें स्कित्जोफ्रेनिया है और वह अपनी कल्पना के घर को खोजना चाहती हैं जो १५ पार्क एवेन्यू पर है जहाँ उनके अनुसार उनके पति और बच्चे उनकी राह देख रहे हैं. अँजली तलाकशुदा हैं और विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं और उनके सम्बंध अपने साथ पढ़ाने वाले एक अन्य शिक्षक (कँवलजीत) से हैं. अँजली के मन में एक तरफ घर में प्रतिदिन का मानसिक रोगी के साथ रहने का तनाव है, दूसरी तरफ अपनी छोटी बहन के लिए प्यार भी है, और किसी की देखभाल में अपना जीवन पूरा न पाने का क्रोध भी है.
इस रोजमर्रा के एक तरह चलते जीवन में नयी घटना घटती है जब एक दिन अँजली के कालेज जाने के बाद घर में एक झाड़फूँक करने वाले बाबा जी को बुलाया जाता है. बाबा जी मिट्ठू में घुसी "चुड़ेल" को भगाने के लिए उसे झाड़ू से खूब मारते हैं और कहते हैं अब वह ठीक हो जायेगी. शाम को जब अँजली घर वापस लौटती है तो मिट्ठू अन्य बातों के साथ उसे बताना चाहती है कि दिन में उसे खूब मारा गया पर अँजली अपने जीवन की बातों और काम में व्यस्त है और मिट्ठू की बातें सुन कर भी नहीं सुनती, उसे लगता है कि हर बार की तरह मिट्ठू बिना सिर पैर की काल्पनिक बाते कर रही है.
उसी दिन रात को मिट्ठू कलाई काट लेती है. अँजली अपराध बोध से घिर जाती है, उसने अपनी बातों में खो कर, अपनी छोटी बहन की सही बात को झूठ माना. कुछ ठीक होने पर मनोचिकित्सक (ध्रृतिमान चैटर्जी) की सलाह पर अँजली माँ और मिट्ठू के साथ कुछ दिन आराम करने भूटान चली जाती है.
भूटान में एक नदी के किनारे घूमती मिट्ठू को जयदीप (राहुल बोस) देख लेता है जो अपनी पत्नी (शेफाली शाह) और बच्चों के साथ वहाँ छुट्टियों में आया है. दस साल पहले जयदीप और मिट्ठू का विवाह होने वाला था, जब बलात्कार के बाद मिट्ठू अपना मानसिक संतुलन खो बैठी थी और जयदीप मँगनी तोड़ कर चला गया था. जयदीप के मन में भी मिट्ठू को ले कर अपराध बोध है और वह उससे मिलने की कोशिश करता है.
पहले तो अँजली गुस्सा होती है, उसे डर है कि मिट्ठू की तबियत फ़िर से न बिगड़ जाये पर फ़िर देखती है कि मिट्ठू ने जयदीप को नहीं पहचाना और उससे एक अजनबी की तरह बात करती है. दूसरी तरफ, जयदीप की पत्नी परेशान है, उसे विश्वास है कि जयदीप अपनी पुरानी प्रेमिका के चक्कर में पड़ गया है., तब जयदीप उसे बताता है कि मिट्ठू मानसिक रोगी है और वह सिर्फ अपने पिछले बरताव के अपराध बोध से मुक्त होने की कोशिश कर रहा है.
टिप्पणीः फ़िल्म के सभी अभिनेता बहुत बढ़ियाँ हैं. कोंकणा सेन की तरीफ़ सबसे अधिक करनी चाहिये क्योंकि मानसिक रोग जो चेहरे से झलक कर चेहरे को बदल देता है, इसको वे बहुत प्रभावशाली ढ़ँग से दिखातीं हैं. फ्लैशबेक में दिखाये कुछ भागों को छोड़ कर बाकी सारी फिल्म में कोंकणा का नीचे झुकते होंठ और आँखों में झलकता खोयापन उनके रोग को विश्वासनीय बना देता हैं हाँलाकि उसकी वजह से वे "हीरोइन" नहीं लगतीं. उनका मिर्गी का दौरा पड़ने का दृश्य बिल्कुल विश्वासनीय है.
बाकी सभी अभिनेता भी बढ़ियाँ हैं. छोटे से भाग में मिट्ठू के पिता के भाग में सोमित्र चैटर्जी को देख कर बहुत अच्छा लगा. ध्रृतिमान चैटर्जी जिन्हें देखे पँद्रह बीस साल हो गये थे और जो "गोपी गायन बाघे बायन" के दिनों से मुझे बहुत अच्छे लगते थे, उन्हें देख कर भी बहुत अच्छा लगा.
इन सब अच्छे अभिनेताओं के होते हुए भी, फ़िल्म में क्या कमियाँ थीं जिनकी वजह से मेरे विचार में यह फ़िल्म उतनी प्रभावशाली नहीं बनी? मेरे विचार में फ़िल्म का कथानक ही इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी है. कथानक में वह नाटकीय घटनाएँ, मिट्ठू का जयदीप से प्यार, उसका बलात्कार, जयदीप का रिश्ता तोड़ कर उसे छोड़ कर चले जाना, यह सब बातें जो फिल्म में उतार चढ़ाव और दिलचस्पी ला सकती थीं, सभी छोटे छोटे फ्लैशबैक में ही सीमित रह जाती हैं. फिल्म का मुख्य केंद्र है दस साल बाद जयदीप का मिट्ठू से मिलना पर इसमें कोई अंतर्निहित नाटकीयता या तनाव नहीं बनता क्योकि मिट्ठू उसे पहचान भी नहीं पाती.
इस सारे हिस्से में तनाव बनाया गया है जयदीप की पत्नी के शक का और समझ नहीं आता कि जयदीप पत्नी को ठीक से सब कुछ क्यों नहीं बताता? इसकी वजह से फिल्म का कथानक कुछ नकली सा हो जाता है.
फ़िल्म अँग्रेज़ी में है. फ़िल्म के सभी मुख्य कलाकार आपस में अँग्रेजी में ही बात करते हैं पर कभी सड़क पर या काम करने वाली से हिंदी और बँगाली में भी बात कर सकते हैं. यह सच है कि आज का पढ़ा लिखा भारतीय उच्च मध्यम वर्ग अँग्रेजी में ही अपनी बात आसानी से कह पाता है और उसके सोच तथा व्यवहार में पश्चिमी उदारवादी विचार उसकी भारतीयता के साथ घुलमिल गये हैं. श्रीमति गुप्ता का पति के छोड़ जाने के बाद दूसरा विवाह करना या अँजलि का अपने मित्र के साथ अमरीका न चलने पर उसका पूछना "क्या तुम बिना विवाह के शारीरक सम्बंधों की नैतिकता की बात तो नहीं सोच रही हो?", जैसी बातें इसी बदलाव को दर्शाती हैं.
मानसिक रोग के साथ जीने में फ़िल्म के पात्रों के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं आने वाला, जैसे पहले जीवन चल रहा था, वैसा ही चलता रहेगा, कोई चमत्कार नहीं होने वाला, यही फ़िल्म का अंतिम संदेश है. ऐसे आशाहीन जीवन में अचानक निर्देशक अपर्णा सेन अंत में नया प्रश्न उठा देती हैं, "सोचो कि अगर मिट्ठू की बातों को कल्पना कहने और सोचने वाले अगर गलत हों? अगर सचमुच कोई ऐसा जीवन स्तर हो जहाँ मिट्ठू के कल्पना का जीवन सच हो पर हम उस जीवन स्तर को नहीं देख सकते तो कैसा होगा?" फिल्म का अंत इसी फँतासी वाले प्रश्न से होता है जब मिट्ठू किसी अन्य स्तर पर बने अपने १५ पार्क एवेन्यू वाले अपने घर को खोज लेती हैं जहाँ उनका मिलन अपने पति और पाँच बच्चों से होता है.
कुछ यही अंत था ख्वाजा अहमद अब्बास की 1963 की फिल्म "शहर और सपना" का जिसमें सड़क पर पुरानी पाईप में जीवन बिताने को मजबूर युगल अंत में उसी पाईप में छुपा अपने सपने का घर पाता है. शायद यही एक रास्ता है आशाहीन जीवनों को परदे पर निराशा से बचाने का!