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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

काव्य की रचना प्रिक्रिया

आज विमर्श के लिए प्रस्तुत हैं काव्य की रचना प्रक्रिया पर अग्रज कवि मुक्तिबोध के एक अत्यंत महत्व पूर्ण लेख के अंश:

काव्य की रचना-प्रक्रिया


रचना प्रक्रिया, वस्तुतः एक खोज और ग्रहण का नाम है।अभिव्यक्ति के कार्य के दौरान में कवि नई खोज भी कर लेता है।इस तथ्य को मैं एक  उपमा-चित्र द्वारा स्पष्ट करना चाहूंगा।
वीरान मैदान, अंधेरी रात, खोया हुआ रास्ता, हाथ में एक पीली मद्धिम  लालटेन।
यह लालटेन समूचे पथ को पहले से उद्घाटित करने में असमर्थ है। केवल थोडी सी जगह पर ही उसका प्रकाश है।ज्यों-ज्यों वह पग बढाता जाएगा, थोडा-थोडा उद्घाटन होता जाएगा।चलने वाला पहले से नहीं जानता कि क्या उद्घाटित होगा।उसे अपनी पीली मद्धिम लालटेन का ही सहारा है।इस पथ पर चलने का अर्थ ही पथ का उद्घाटन होना है, और वह भी धीरे-धीरे, क्रमशः।वह यह भी नहीं बता सकता कि रास्ता किस ओर घूमेगा या उसे किन घटनाओं या वास्तविकताओं का सामना करना पडेगा।कवि के लिए, इस पथ पर आगे बढते जाने का काम महत्वपूर्ण है।वह उसका साहस है।वह उसकी खोज है।बहुतेरे लोग, जिनमें कवि भी शामिल हैं, इस तथ्य को भूल जाते हैं, क्योंकि वे उस पर चलना नहीं चाहते, अथवा बीच में से ही भाग जाना चाहते हैं।
इस रास्ते पर बढने के लिए, निस्संदेह, आत्मसंघर्ष करना पडता है।केवल एक लालटेन है, जिसके सहारे उसे चलना है।
इस उपमा को देखकर बहुतेरे लोग यह आरोप लगाएंगे कि यहां किसी अवचेतनवादी सिद्धांत का निरूपण हो रहा है। किंतु कोई भी रचनाकार यह जानता है कि रचना के बढते जाने के मार्ग का नक्शा, रचना के पूर्व नहीं बनाया जा सकता, और यदि बनाया गया तो वह यथातथ्य नहीं हो सकता।रचना-प्रक्रिया, वस्तुतः, एक स्वायत्त प्रक्रिया है। और वह किन्हीं मूल उद्वेगों और अनुरोधों के सहारे चली चलती है । ये उद्वेग और अनुरोध ही वह लालटेन है, जिसको हाथ में लेकर उसे आगे चलना होता है।
और यह पथ क्या है? वस्तुतः बाह्य संसार का आभ्यंतरीकृत रूप है।बाल्यकाल से ही मनुष्य, बाह्य संसार का अनवरत आभ्यंतरीकरण करता रहता है।और इस प्रकार वह उस आभ्यंतरीकृत बाह्य को उन विशेषताओं से समन्वित और संपादित करता रहा है, जो उसके 'स्व ' की विशेषताएं हैं।
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चूंकि कवि का आभ्यंतर वास्तव बाह्य का आभ्यंतरीकृत रूप ही है, इसलिए कवि को अपने वास्तविक जीवन में, रचना-बाह्य काव्यानुभव जीना पडता है।
कवि केवल रचना-प्रक्रिया में पडकर ही कवि नहीं होता, वरन उसे वास्तविक जीवन में अपनी आत्म-समृद्धि को प्राप्त करना पडता है और मनुष्यता के प्रधान लक्ष्यों से एकाकार होने की क्षमता को विकसित करते रहना पडता है।यही कारण है कि काव्य केवल एक सीमित शिक्षा और संस्कार नहीं है, वरन एक व्यापक भावनात्मक और बौद्धिक परिष्करण (कल्चर ) है---वह कल्चर, वह परिष्कृति, जो वास्तविक जीवन में प्राप्त करनी पडती है।

 000 गजानन माधव मुक्तिबोध
प्रस्तुति:- अरुण आदित्य जी
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टिप्पणी:-

सुरेन्द्र रघुवंशी
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काव्य की रचना प्रक्रिया  में एक अनिश्चित रचना पथ होता है । यह दुर्गम,दुरूह और श्रमसाध्य होता है ।रचनाकार को अनुभवों के ताप में तपना पड़ता ।इसे हम   उसके हिस्से का रचनात्मक तप भी कह सकते हैं।समाज के दुःखों, विडंबनाओं और विद्रूपताओं की चिंता में रचनाकार केमाथे पर स्वेद बहता है और ह्रदय में गहन पीड़ा की नदी भी , जो रचना के जन्म का कारण बनती है। मुक्तिबोध ने भी यही कहा है। कवि रचना के लिए कोई पूर्व नियोजित पथ नहीं बना सकता । यदि बना भी ले तो उस पर रचना के सृजन के दौरान चल नहीं सकता। यदि सायास चलने का भी प्रयास करेगा तो यह बलात् होकर रचना के सौंदर्य के कौमार्य को नष्ट करेगा।
            संवेदनशील होना मनुष्य और कवि होने की पहली शर्त है ।साथ ही एक आवेग होता है रचना का जो परिस्थितियों की प्रतिक्रिया में आपको रचना की गहराई में ले जाता है । कई बार मैं कहा करता हूँ कि रचन्स एक गर्भस्थ शिशु की तरह होती है जिसे हमें जन्म देना ही पड़ता है ।हम न चाहें तब भी । यहाँ आवेग प्रसव का समानार्थी हो जाता है। हम रचना को जन्म नहीं देते बल्कि रचना जन्म ले लेती है ।और इसका समय भी हम निर्धारित नहीं कर सकते।
                    यही वास्तविक और नैसर्गिक सृजन है जिसकी सुखद प्रसव पीड़ा से कवि  या कोई भी रचनाकार निश्चय गुजरता है। कहाँ से और कब गुजरना है यह भी हम तय नहीं कर सकते । रचनाकार का आंतरिक आवेग और परिस्थितियों की वयार उसे उड़ाकर रचना की भूमि पर खड़ा कर देती है जो निश्चित तौर पर मनुष्यता की मिट्टी से निर्मित होती है।भाव यहाँ स्वच्छ आकाश की तरह नीले , निर्मल और आकर्षक हैं जिनकी गहराई जिनकी गहराई में सानंद डूवकर ही रचनाकर्म सार्थक होता है।

अमिताभ मिश्र
मुक्तिबोध बार बार रचना प्रक्रिया की बात करते हैं।  निबंध में, कहानी में, कविता में।
कला का तीसरा क्षण उनकी महत्वपूर्ण थ्योरी है। एक साहित्यिक की डायरी को जितनी बार पढ़ो  नए अर्थ समझ में आते हैं।
मुक्तिबोध के अनुसार कला के तीन क्षण हैं। उनसे ही जानें वे तीन क्षण कौन से हैं—‘कला का पहला क्षण है जीवन का तीव्र उत्कट अनुभव। दूसरा क्षण है इस अनुभव का अपने कसकते-दुखते हुए मूलों से पृथक हो जाना और एक ऐसी फैंटेसी का रूप धारण कर लेना मानो वह फैंटेसी अपनी आंखों के सामने ही खड़ी हो। तीसरा और अंतिम क्षण है इस फैंटेसी के शब्दबद्ध होने की प्रक्रिया का आरंभ और उस प्रक्रिया की परिपूर्णावस्था तक की गतिमानता। …फैंटेसी अनुभव की कन्या है और उस कन्या का अपना स्वतंत्र विकास-मान व्यक्तित्व है। वह अनुभव से प्रसूत है इसलिए वह उससे स्वतंत्र है।’ 

शैली किरण
कविता  स्वतः प्रकट होती है,
भावपूर्ण हृदय से, कवि कभी सामान्य नहीं होता, क्योंकि काव्य ही लेखन की सबसे पुरातन विधा है, अतैव सृष्टि रचियता ब्रहमा से कवि की तुलना उचित है , किन्तु कवि रचना अपलक नहीं करता,  छोटा छोटा कदम रखकर लम्बा सफर तय करता है, क्योंकि जीवन यात्रा में थोडी थोडी चेतना उसे प्राप्त होती है विभन्न अनुभवो से, यदि अंहकार वश कोई यह कह दे कि मैंने रचनाक्रम के पूरे रहस्य को जान लिया है, तो मुक्तिबोध के शब्द मार्गदर्शन करते हैं, "उसे वास्तविक जीवन में अपनी आत्म समृद्धि को प्राप्त करना पडता है"...
आत्म सृमद्धि की आवश्यकता और बढ़ जाती है, जब देश भारत हो, जहाँ रामायण, महाभारत, गीता काव्य असंख्य मानवों की जीवन दिशा निर्धारित करते हों...

आशा पाण्डेय
सही कहा आप लोगों ने,कविता स्वतः प्रकट होती है.और अपने प्रकट होने में लम्बा समय लेती है.मुकि्तबोध ही कहते हैं..."काव्य रचना एक परिणाम है किसी पूर्वगत प्रदीर्घ मनःप्रक्रिया का ,जो अलग-अलग समयों में बनती गई और अपने तत्व एकत्र करती गई है."

परमेश्वर फुंकवाल
अरुण जी,  सुरेंद्र जी बेहद अहम पोस्ट और टिप्पणी। साहित्य रचना अपने आप को रचने जैसा है। यहां फ्लड लाइट की तरह अचानक रोशनी नहीं वरन अपने मन की ज्योति को जागृत कर शनैः शनैः ब्रम्हांड का आलोकन होता है। अच्छा कवि वहीं है जो सच्चा है। शिल्प आदि के आवरण के भीतर भी। धन्यवाद सार्थक विषय के लिए। 

अरुण आदित्य
मुक्तिबोध ने बिलकुल सही कहा है कि 'रचनाकार यह जानता है कि रचना के बढते जाने के मार्ग का नक्शा, रचना के पूर्व नहीं बनाया जा सकता, और यदि बनाया गया तो वह यथातथ्य नहीं हो सकता।' इस बात का एक शानदार उदाहरण क्रांतिकारी कवि पाश की निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में देखा जा सकता है।
मैं कविता से मांगता हूं
तुम्हारे लिए नेलपॉलिस की शीशी
छोटी बहन के लिए रंगदार कढाई वाला धागा
पिता के मोतियाबिंद के लिए दवाई
कविता इह तरह की मांगों को शरारत समझती है
और महीने दर महीने अपने रखवालों को
बेंत के डंडे
और नरम बटों वाली बंदूकें देकर भेजती है।
अवतार सिंह पाश
..................
देखा, प्रेयसी के लिए नेल पॉलिस की रूमानी आकांक्षा का सहारा लेकर चली कविता, कवि को धता बताकर किस तरह बंदूक के साथ केलि करने लगी।
मेरा मानना है कि कविता लिखने के लिए कवि होना पडता है। कवि होना दर असल एक आत्म संघर्ष की प्रक्रिया में शामिल होना है। यह आत्म संघर्ष कुछ और नहीं, एक सच्चा मनुष्य बने रहने की जिद है। अपनी संवेदना को बचाए रखने और कमजोरियों से पार पाने की जद्दोजहद। गरल पीकर भी सरल-तरल बने रहने का आत्म संघर्ष।
बाकी जो मैं नहीं समझा पा रहा हूं , उसे वीरेन दा की इन काव्य-पंक्तियों से बहुत सहज तरीके से समझा जा सकता है
कवि
........
इच्छाएं आती हैं तरह तरह के बाने धरे
उनके पास मेरी हर जरूरत दर्ज है
एक फेहरिश्त में मेरी हर कमजोरी
उन्हें यह तक मालूम है
कि कब मैं चुप होकर गर्दन लटका लूंगा
मगर मैं फिर भी जाता रहूंगा ही
हर बार भाषा को रस्से की तरह थामे
साथियों के रास्ते पर
एक कवि और कर ही क्या सकता है
सही बने रहने की कोशिश के सिवा।
000 वीरेन डंगवाल

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