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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

राजेश झरपुरे जी की कहानी

कहानी:-सावधान ! दगान होने वाली हैं... 

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        हमारी काॅलोनी में अँधेरा नहीं होता. रात होती थी पर रात जैसी बिल्कुल नहीं. स्याह अँधेरे में डूबी काली, मूक, शांत और सहज रात्रि तो बिल्कुल भी नहीं. गोधूलि बेला से ही काॅलोनी के दुधिया ट्युब लाईटस् और हेलोजन का चटक पीताम्बरी प्रकाशवृत्त काॅलोनी पर छा जाता. काॅलोनी को अँधेरे के खिलाफ़ घेरे खड़े स्ट्रीट लाईटस् पूरी तरह चौकन्ने और किसी भी तरह उसे काॅलोनी में प्रवेश करने से रोकने में बेजा समर्थ थे. झींगुरों के शोर और चमक से काॅलोनी सदैव अछूती रही. उनकी संगीतमय लोरी की धुन कभी काॅलोनी में नहीं गूँजी. कभी कोई तारा आकाश से टूटकर काॅलोनी में नहीं गिरा. गिरा भी होगा तो काॅलोनी के तेज स्ट्रीट लाईट में विलुप्त होकर रह गया होगा. पीताम्बरी वृत के ऊपर आसमान में चन्द्रमा अपनी सम्पूर्ण कलाओं के साथ दमक रहा होता पर तेज रोशनी में सकुचाया सा. दिन के उजाले में किसी आदमी को जितनी दूर से उसके पहनावे, कदकाठी चालढ़ाल और रूपरंग से चीन्हा जा सकता था, उतनी ही सरलता से हमारी काॅलोनी में न कही जाने वाली रात में भी. इस तरह हम और हमारी काॅलोनी अँधेरे से परे रोशनी के एक विशालकाय सुरक्षित घेरे में थी.
     रोशनी के साथ ख़ुशियाँ, उत्साह और उमंग भी ढेरों थीं हमारी काॅलोनी में. किसी एक घर की खुशियों की सुगन्ध मोगरे और रातरानी के फूलों की खुशबू की तरह पूरी काॅलोनी में बिखर जाती. जन्मोत्सव, विवाह और कथा-सत्संग का उन्माद घरों की मुँडेर चढ़कर बोलता. एक घर, एक परिवार, एक कुटुम्ब एक ही जगह कहीं देखे जा सकते थे तो वह हमारी काॅलोनी थीं. 
      सर्वधर्म, सर्वशक्तिमान और तरह-तरह के रीति-रिवाज एक ही मंच पर, एक ही स्वर में अपनी पवित्रता की पराकाष्ठा और धर्म की शालीनता लिये जहाँ विराजमान थे... वह हमारी काॅलोनी थी. बड़े-बुजुर्गों का यथोचित आदर, बच्चों को पूरा प्यार और दुलार, स्त्रियों को पर्याप्त सम्मान व पड़ोसी को रिश्ते में सगे भाई जैसा महत्त्व जहाँ प्राप्त था...वह हमारी सद्भावना काॅलोनी थी. यहाँ ददुआ, नमन, राखीडोह, घोड़ामाड़ी और सीकरी-माँझी जैसी दूर-दूर की कोयला खानों के खानकर्मी रहते थे. वे सब रोज़ानः 30-35 किलोमीटर दूर, तीनों पाली में ड्यूटी करने जाते थे. वे जिस कोलियरी में जाते थे, वहाँ अधिक सुविधा मिलने पर उन्होंने सद्भावना काॅलोनी नहीं छोड़ी.
     हमारी काॅलोनी में लोगों को सर्दी-खांसी होती, जुकाम होता, मलेरिया और साँस उठने जैसी बीमारी भी होती पर जलन, ईर्ष्या और ढाह जैसी मानसिक बीमारियाँ तो बिल्कुल भी नहीं होती. कोयला खदानों की नौकरी में हम अपनी संतानों के भविष्य को बेहद सुरक्षित पाते थे. हमारी दो से तीन पीढ़ी इन अँधेरी खदानों में खप चुकी थीं. हरेक परिवार के पाँच-पाँच सदस्य तक खदानों में कार्यरत थे. सच तो यह था कि इन खदानों की नौकरियों पर हमारा खानदानी हक़ था-जहाँ अँधेरा नहीं होता था, रात नहीं होती थी.
पर हमारी कोयला खदान में जब विदेश से मैजिक मशीन आयी ऐन वक्त़ काॅलोनी के पीछे का स्ट्रीट ट्युब लाईट फ्युज हुआ. अँधेरा चुपके से हमारी काॅलोनी की नालियों से होता हुआ, हमारे घर के पीछवाड़े तक आ गया-दुबका हुआ और डरा सा. हममें से किसी ने भी उस पर ध्यान नहीं दिया. हम सब उस मैजिक मशीन के करतब और चमत्कृत कर देने वाले कार्य से रोमांचित थे.
         पूरी जवानी अँधेरो से खोदकर लाई रोशनी के प्रकाश में उम्र काट देने के बाद जोर-जोर से खाँसता खखारता है-एक बूढ़ा खनिक. वह लगातार छटपटाता है, हाँफता है. पूरी उम्र कोयला खदानों में गुज़ार देने के बाद उसके फेफड़ों में कोयले की एक महीन सुरंग बन चुकी. उसके अन्दर का कोयला लगातार दहकता. उसकी आँखों से निरन्तर लालपीली लपटें उठती. फिर भी ख़ुश था-वह. मेडिकल अनफ़िट होकर अपने आश्रित पुत्र के लिए नौकरी दे पाया था वह. अब वह अक़सर बूढ़ी खदानों के जवानी के दिनों को याद करता और अपने आप ही बुदबुदा उठता. कभी बहुत गुस्से में चीख भी पड़ता    ’’...सावधान! दगान होने वाली हैं.’’ काॅलोनी के पीछवाड़े की नालियों से प्रवेश कर चुका अँधेरा उसकी आँखों से बच नहीं पाया था.
      पहले जब खदान का सायरन बजता , एक शिफ्ट समाप्ति और दूसरी शिफ्ट आरम्भ होने की घोषणा के साथ दिन-रात तीन भागों में बँट जाते थे. खनिक टोकन आॅफ़िस में टोकन जमा करते, जमा किया टोकन वापस लेते, वे जिनकी शिफ्ट समाप्त हो चुकी होती थी. जमा किये टोकन वाले खानकर्मियों की माईनिंग मेट की डायरी में फिर हाॅज़री होती. भूगर्भ में उनके काम और स्थान का बँटवारा किया जाता. एक सेक्शन में टबलोडरों की एक जुट्टी (7 का समूह), टिम्बर मिस्त्री, लाईन प्लेटियर, ट्रामर, साॅकेटमेन, हाॅलेज खलासी, शाटफ़ायरर, माईनिंग मेट, ओवरमेन और अन्डर मैनेजर को मिलाकर, प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में सरफ़ेस में बैठे मटेरियल सप्लाई मजदूर, केपलेम्प,टोकन आॅफ़िस, स्टोरकीपर, सीडीएस आपरेटर, सर्वेयर आदि सब मिलाकर एक सौ खानकर्मी लगते थे. और अधिकतम सवा सौ टन कोयला सेक्शन से बाहर आता था. लगभग सवा टन प्रति कामगार, प्रति पाली, उत्पादन क्षमता थी. पर अब नहीं. अब तो बिल्कुल नहीं. उस मैजिक मशीन के सामने तो आऊटपुट पर मेनशिफ्ट (ओ.एम.एस.) तो कुछ भी नहीं. जाने कैसा जादू किया विज्ञान ने कि एक सौ आदमी का बल और बुद्धि डाल दी एक ही मशीन में. अब मशीन ही ब्लास्टिंग करेगी, वही रूफ़ सपोर्ट करेगी, वही कोयला लोड करेगी. अब न इंडस्ट्रियल रिलेशन मैंनटेन करने की मशक्क़त और न इंडस्ट्रियल डिसपियुट का हैडेक. नो वर्कमेन...नो डिसपियुट, नो सुपरविजन, ओनली मैंनटेनेस एंड स्कील्ड मैंनटेनेस.
          बूढ़ा रिटायर खानकर्मी खाँसते-खाँसते बेहाल हो जाता है, ढेर सारा बलगम कोयले की महीन डस्ट के साथ बाहर आता है और उससे कई गुना अधिक अन्दर ही रह जाता है. काॅलोनी में घुसा अँधेरा शनैः-शनैः अपना विस्तार करता है. मैजिक मशीन काॅलोनी की रोशनी धीरे-धीरे निगलने लगी. वर्कमेनशिप,एम्पलायमेंट, वेलफेयर और वर्किंग कल्चर सब बदलने लगे. 
       डेडवुड वर्कर, नो फ़र्दर एम्पलायमेंट...
       सरप्लस मेनपाॅवर, ड्राईव टू मोटीवेशन फ़ार एक्सेप्टिंग वी.आर.एस. अँधेरे के षडयंत्र में उलझकर रह जाता है- खानकर्मी और खानकर्मियों की सद्भावना काॅलोनी-जहां अँधेरा नहीं होता था, रात नहीं होती थी.
        अँधेरे बढ़ रहे थे. अँधेरे लगातार काॅलोनी की रोशनी को चुनौती दे रहे थे. अँधेरे और रोशनी के बीच खड़े खानकर्मी के पोस्ट ग्रेज्युट बेरोज़गार बेटों को बड़ी बेसब्री से इन्तज़ार था-एम्प्लायमेंट इनल्यू आफ़ डिपेंडेंट आफ़ डेड एम्पलाइ. वह सुबह-शाम पूजता अँधेरे को. अँधेरे खौफ़नाक मनसूबों से लेस थे. वह घर के कोने-कोन तक पसर जाना चाहते थे. बेरोज़गार पुत्र को पूरा विश्वास था-अँधेरे पर. पर खनिक पिता के कमरे का कोई एक कोना अभी भी जगमगता था. अँधेरे उसे पराजित नहीं कर पाते.
          पिताम्बरी प्रकाश का वृत्त दीये की टिमटिमाती रोशनी में बदल चुका था. दो हाथ की दूरी से आदमी चीन्हा नहीं जाता. आसमान से तारे टूटकर सीधे काॅलोनी में गिरते-सब देखते, महसूसते और पड़ौसी द्वारा किया गया टोटका मानकर बेवज़ह लड़ते-आपस में. बात-पड़ौस से पुलिस थाने तक पहुँच जाती. खानकर्मियों की जात-पात, धर्म, झंड़ें और डंड़ें निकलकर बाहर आ जाते. घरों की मुंडेर पर चढ़े सद्भावना के उन्माद को अँधेरे एक जोर का धक्का देते. वह औंधे मुँह ज़मीन पर गिर पड़ता-चारों खाने चित. 
     अँधेरे खिलखिलाकर हँसते.
     घरों में अँधेरे की शह से बौराई कलह दिन-रात चौखट पर डटी रहती. वी.आर.एस. के लोभ में ठगा गया रिटायर्ड खानकर्मी विस्थापना का दुःख झेलते सहमा सा खड़ा दूर से देखता है-सद्भावना काॅलोनी को. जहाँ एक ही परिवार के पाँच-पाँच सदस्य नौकरी पर थे पर अब मशीनों का साम्राज्य है. खानकर्मी पिता अपनी नौकरी के रिटायरमेंट स्टेज पर और जवान बेटे जवानी के अंतिम चरण में भी बेरोज़गार.
         अपने हुनर पर सदैव जिस फोरमेन को गुरूर रहा, वह काॅलोनी के समीप, चाय की गुमठी में बैठा दिन भरता रहता. उसके कार्यकाल में कभी कोई मशाीन एक घंटे से ज़्यादा ब्रेकडाउन में नहीं रही. वह न्यू टेक्नोलाॅजी के कारण डेडवुड घोषित कर दिया गया था. वह बात बड़े पते की करता और दुःखी हो जाता. ’’...मानव और मशीन के बीच यदि उचित सन्तुलन नहीं रखा गया तो वह दिन दूर नहीं जब श्रम कोड़ियों के दाम बिकेगा. बाज़ार हमारी सभ्यता, संस्कृति और सम्बन्धों को निगल जायेगा...जैसे आज कोयला खानें, खानकर्मी और उनकी सद्भावना काॅलोनी को निगल रही हैं.’’ 
        चायवाला गुमठी में बैठे दो ग्राहको को दो कट चाय देता है और बची हुई चाय को फिर दो कट  बनाकर एक स्वयं पीता और दूसरी सेवानिवृत्त फोरमेन को देता. वह जानता था...जब-जब चाय वाला स्वयं चाय पीता, उसे भी एक प्याली पकड़ा देता पर पैसे कभी नहीं लेता. यह बात सद्भावना काॅलोनी के अँधेरे भी जानते थे कि वह गुमठी वाले की एक कट चाय से कभी जीत नहीं पायेंगे. 

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राजेश झरपुरे
नई पहाड़े काॅलोनी, जवाहर नगर, गुलाबरा, छिंदवाड़ा, जिला-छिन्दवाड़ा (म.प्र.) 480-001
मो. 09425837377
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टिप्पणियां:-

कोयला खदानकर्मियों के जीवन का असल चिट्ठा है राजेश जी की   यह संस्मरणनुमा कहानी। खनिको के जीवन  से जुडी सच्चाइयों का यह सूक्ष्म ब्यौरा द्रवित कर देता है वहीं उनकी शोचनीय दशा मन में फांस सी गड़ जाती है।  जिस पेशे में परिवार की कई पीढियां बिना किसी शिकायत खंप गई उसने आखिर क्या दिया। लीलाधर मण्डलोई जी के आत्मकथ्य में भी इसी प्रकार खनिकों के जीवन से जुड़ाव को पढ़ा था।  राजेश जी को मेरी बधाई कि वे इस श्रमसाध्य वर्ग की मूक पीड़ा को संवेदनात्मक तरीके से व्यक्त करने में पूरी तरह सफल रहे।
।। अन्जू शर्मा ।।

संस्करण ..जैसी..अच्छी टिप्पणी है. चित्रात्मकता भी है इसमें. ये मुश्किल रहा होगा कि इस को कहां और कैसे खत्म करें
मुझे कहानी में यह विशेष कौशल जान पड़ता है कि
उसे छोडें कहां
मंडलोई जी की डायरी अंश में वाकई इस जीवन की दारूण बताइ गई हैं.
।। ब्रज श्रीवास्तव ।।

हाँ सही है ब्रज जी। किसी एक व्यक्ति विशेष की कहानी न होने पर भी मुझे इस कहानी ने बाँधा। यही इसकी सफलता भी है।  मशीनी आहटों के खनिकों के जीवन में प्रवेश की तुलना अँधेरे से किया जाना उचित लगा।
।। अन्जू शर्मा


पहली बात तो ये की यह कहानी बिलकुल नहीं है। कायदे से संस्मरण भी नहीं है। मशीन बनाम मानव श्रम कोलेकर लिखी गयी चित्रात्मक टिप्पणी है जिसमे अपने निष्कर्ष व आग्रह इस कदर तै हैं की तटस्थ विश्लेषण भी नहीं हो पाया है। मशीन आने से व विदेसी पूँजी आने क पहले जैसे रामराज्य था। श्रमिकों का जीवन व भारतीय समाज कभी भी इतना अच्छा नहीं था। जात पात सामंती शोषण ठेकेदारों का शोषण सब तब भी भयावह रूप  में  था। इतना सरलीकरण अजीब है। बाकि न पात्र हैं न ही कथात्मकता। हाँ परिवेश का चित्रण है वो भी विश्वसनीय नहीं...!
।। अरूणेश शुक्ल।।



कहानी का अंत: शिल्प ही वह जादू है जो पाठक पर प्रभाव छोड़ सके.हमारे कहानी कार साथी इस पर खूब विचार करते हैं..तब कहीं..इस तरह की कहानी आ पाती है ।
।। ब्रज श्रीवास्तव ।।


बहुत संवेदनशील कहानी है. मेरे जैसे लोग जो शहरों में रहे हैं वे भी अनायास उस कहानी से, वातावरण से जुड़ जाते हैं .और यही इस कहानी का सबसे सशक्त पक्ष है . चाय वाले और सेवा निवृत्त फोरमेन के आपसी सम्बन्ध दिल को छू गए . बधाई।
।। अलकनन्दा।।



अरुणेश जी मेरी एक कहानी है। निम्नमध्यमवर्गीय लोगों के मोहल्ले की कहानी जहां अपने अपने दुखों और परेशानियों से जूझते लोग यथास्थिति स्वीकार कर खुद को उन परिस्थितियों में ढालकर खुश हैं। यहाँ भी नियति के हाथ खुद को सौंप चुके ये लोग उन परिस्थितियों से बाहर निकलना ही नहीं चाहते। दिक्कत तब आती है जब इस दिनचर्या में भी परिवर्तन आता है और इतना भी उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर हो जाता है। राजेश जी ने निजी जीवन से जुडी परिस्थितियों को ही शब्द दिए हैं लिहाज़ा निष्कर्ष तक पहुंचने का जोखिम भी वे उठा पाये हैं।
।। अन्जू शर्मा।।



आपकी बात भी ठीक है पर कहानी आज केवल किस्सागोई भर नहीं है। फिर जिस तरह से यहाँ हालात का सिलसिलेवार ब्यौरा है मुझे पढ़ना अच्छा लगा। एक अनदेखे माहौल से रु ब रु होना कहीं न कहीं खुद को समृद्ध करने जैसा है। पर आपको यदि ऐसा नहीं लगा तो यही कहूँगी कि ऐसा लगना असम्भव तो नहीं।  हम अगली बार राजेश जी की कोई और कहानी पढ़ेंगे। 
।। अन्जू शर्मा ।।



पर अंजू जी इसमें कहानी कहां है। दूसरे निष्कर्ष पर पहुंचे नहीं है जो अपना निष्कर्ष था उसे कहानी का निष्कर्ष बना दिए हैं। यथार्थ आज का इतना एकरैखिक नहीं है जितना यहाँ आया है। पहला हिस्सा तो इतना स्वप्न जैसा है की जब उस तरह का समाज व स्थितियां होंगी तब वो समाज वहां से क्यों निकलना चाहेगा। तब की परेशानियाँ व अन्तर्विरोध भी आने चाहिए थे। सब कुछ उतना अच्छा कभी नही रहा। वो तो बहुत रूमानी  है ।
।। अरूणेश शुक्ल ।।



मुझे कहानी पढ़ते मार्क्स की वह उक्ति याद आई जिसमें वह कहते हैं कि श्रमिक चेतना के अभाव में मशीनों को ही अपना शत्रु समझ लेता है। यह कहानी चेतना के उसी स्तर पर ले जाती है। हिंदी में ऐसी तमाम कहानियाँ हैं जिनमें से बाज़ार में रामधन जैसी कहानी सेलीब्रेट भी की गयी। 
।। अशोक  पांड़े  ।।


राजेश झरपुरे की इस  कहानी में एक ऐसा समाज है जो बाहर से पूरीतरह सुरक्षित दिखाई देता है पर भीतर से बहुत असुरक्षित है ।अभावों में जीते इन लोगों के बीच सभ्य समाज की बुराइयां नहीं हैं । लेकिन वहीँ एक मशीन का आना उस सुरक्षित घेरे को अचानक तोड़ देता है । यह पूंजीवाद के उस प्रारंभिक दौर की याद दिलाता है जब श्रमिकों का ध्यान भटकाने के लिए पूंजीपतियों को नही बल्कि मशीनों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता था । अंततः वे स्थितियां हैं जहाँ संतान नौकरी के लिए अपने बाप के मरने की राह देखती है । समय का यह वीभत्स चित्र है । यह घटना प्रधान कहानी नहीं है न ही इसमें कहानी के पारंपरिक तत्व हैं लेकिन यह कहानी श्रमिकों के जीवन मे छंटनी ,वी आर एस , उनके दमन जैसे पूंजी के खेल का एक गंभीर और यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत करती है ।
।। शरद कोकस।।


राजेश झरपुरे की कहानी ' सावधान !दगान होने वाली है' हमारे समय की बाहर से आकर्षक दिखने वाली बंद पोटली को खोलकर कोयले की काली सच्चाई को झटके के साथ सामने रखती है और हमें आश्चर्यचकित कर देती है। राजेश झरपुरे दिखाई दे रहे उजालों को यथार्थ के अंधेरों की उपस्थिति में सप्रमाण खारिज़ करते हैं। 
               खानकर्मियों की ज़िन्दगी को उनकी समग्र पीड़ा के परिप्रेक्ष्य वे उस समय संजीदगी से देख रहे हैं ; जब सरकारों ने बाजार के आगे घुटने टेकते हुए मृत संवेदनाओं की डंडियों में स्वार्थ के काँच वाले चश्मे पहन रखे हैं। कोई बूढ़ा रिटायर खानकर्मी अपनी जवानी की सारी शुद्ध साँसे देश के विकास के नाम कर बदले में सपरिवार एक आजीवन बीमारी लेकर जी रहा  है ;आज की अंधदौड़ में न कोई यह सवाल है और न ही कोई खबर । 
            हमारी पीढ़ी के प्रमुख कथाकार राजेश झरपुरे कृत्रिम उजालों के मदहोश ज़श्न में डूवे देश के सामने काली कोयला सच्चाई अपनी हार्दिक सरलता के साथ प्रस्तुत करते हैं ;जिसकी कि बहुत ज़रुरत भी है।दूसरी ओर ज़रूरतों का हवाला देकर मनुष्यता को ताक पर रख दिया गया है और उसी दुराग्रह की प्रतिक्रिया और चिंता में राजेश झरपुरे की कलम कथा सृजन पथ पर चल पड़ी है। इस विस्वास के साथ कि वह महीन लकीरें नहीं वरन् ऊर्जावान सार्थक शब्दों को जन्म देगी । इस घोर अंधकार में अंततः हमारे शब्द ही दीपक होंगे , जिनकी रोशनी में मासूम उदास चेहरों को कारण सहित पढ़ा जा सकेगा ।कथाकार राजेश झरपुरे अपनी कहानी में बार-बार इसी रोशनी की बात करते हैं ।
          मशीनें जिस तरह कामगारों का रोजगार छीन रही हैं ,उसकी समग्र वेदना उनकी कहानी में सम्पूर्ण छटपटाहट के साथ देखी जा सकती है।कहानी में खानकर्मियों के जीवन को बहुत सुन्दर चित्रण ।
।। सुरेन्द्रसिंह रधुवंशी ।।

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