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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

विमर्श:- दिनेश कर्नाटक

आज का विमर्श
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साहित्य विचार, संवेदना तथा कला से मिलकर बनता है। अनुभव इसे विश्वसनीय बनाता है। केवल अनुभव, विचार, संवेदना या कला से रचना नहीं बनती। कबीर की कविता मूलतः विचार की कविता है। लेकिन वहां सिर्फ विचार नहीं है। संवेदना, कला भी है। तभी कबीर आज भी हमें अच्छे लगते हैं। और शायद आने वाले कई युगों तक उनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।
साहित्य में कुछ लोग विचार तो कुछ अनुभव तो कुछ कला को रचना की एकमात्र कसौटी मान लेते हैं। इतना ही नहीं यह आग्रह दलित, स्त्री तथा आदिवासी लेखन के संदर्भ में यहां तक पहुंच जाता है कि अगर इन वर्गों के लोगों ने लिखा है तभी वह प्रमाणिक है। यहां पर अनुभव को रचना की सफलता की एकमात्र कुंजी मानने की गलती की जाती है।
साहित्य सूचना तथा तथ्य से नहीं बनता। अख़बार में कई घटनाएं आती हैं, जिनको पढ़कर हम हिल जाते हैं। मगर उनका प्रभाव  "कफ़न" "पूस की रात" और "वह तोड़ती पत्थर" के असर को हमारे भीतर से मिटा नहीं पाता। यह असर साहित्य का है।
रचना विचार, संवेदना, कला तथा अनुभव के समन्वय से ही संभव है। अगर समन्वय है तो वह अपना असर छोड़ेगी। नहीं है तो समय के प्रवाह में कहां खो गई इसका पता नहीं चलेगा ।
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अमिताभ मिश्र:-
विमर्श के लिए ही सही कि एक कविता आंदोलन विचार कविता के नाम से ही चलाने का प्रयास किया गया था।  कविता में दरअसल विचार से ज्यादा संवेदना की जरूरत है।  ज्ञानात्मक संवेदना या संवेदनात्मक ज्ञान के बारे में मुक्तिबोध बात कर चुके हैं।

दिनेश कर्नाटक:-
अमिताभ जी, यह जानना सुखद है कि आपकी इन बातों को लेकर सहमति है। मगर कई लोग तो अनुभव की प्रमाणिकता तथा विचार के सवाल को लेकर साहित्य को ख़ारिज करते हुए दिखते हैं।

अमिताभ मिश्र:-
मेरे मत से बुद्धि बहुत है और बाकी बहुत ज्ञान उपलब्ध है सब जगह कमसकम कविता में संवेदना की जगह बची रहे।  वरना तो जीवन से भी लुप्तप्राय है यह चीज।

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