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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कहानी:-दिल की इक आवाज़ ऊपर उठती हुई․:- मुकेश वर्मा

तीन सौ सड़सठवीं मंजिल से गिरते हुये जब वह अपने होश-हवास पर कुछ काबू कर पाया तो उसने देखा कि वह नीचे गिरता ही जा रहा है। वह मदद के लिये उस बड़ी इमारत के सामने चिल्‍लाया लेकिन ऊपर के कई माले हमेशा की तरह सख्‍त बंद हैं। मकानों की दरारों में से रह-रह कर सिगरेट का धुआँ और शराब की गंध लापरवाही से निकल रही है।
अपने जिस्‍म को पत्‍थर की तरह ठीक सीधे और नीचे ही नीचे जाते देखते हुए उसके दिमाग़ में सिर्फ़ मदद․․․ मदद की एक ही आवाज़ गूँज रही है। उसे तीन सौ पाँचवीं मंजिल के टैरिस पर एक हैरतज़दा आदमी दिखाई पड़ा। उसने हाथ फैलाकर कहाः- ‘मैं नीचे गिरता जा रहा हूँ, बताओ मैं क्‍या करूँ․․․ मेरी मदद करो।' टैरिस पर सकपकाया खड़ा आदमी अकबका गया और लगभग हकलाते हुये चिल्‍लाया, ः- ‘अरे रुको․․․ क्‍या करते हो․․․ मर जाओगे․․․ मैं फिर कहता हूँ कि․․․ वहीं रुक जाओ․․․'
गिरता हुआ वह झल्‍लाना नहीं भूला, ‘मालूम है․․․ मुझसे बेहतर कौन जान सकता है․․․ स्‍साले․․․। लेकिन तब तक वह दो सौ अठासी नम्‍बर के फ्‍लैट के करीब पहुँच गया है। उसने फिर मदद की गुहार की। दरवाज़े पर एक चुस्‍त-दुरुस्‍त बदगुमान शख्‍़स पतलून के जेबों में हाथ घुसेड़े उसे ताक रहा है। उसने तेज़ आवाज़ में पूछा, ‘क्‍या है रे, काय को चिल्‍लाता है? क्‍या नाम है तेरा? काय को कूंदा? भीख माँगने का नवा तरीका निकाला है? दो लात देऊँगा तो और फटाफट नीचे पहुँचेगा․․․
उसने चाहा कि रुककर वह इस बदतमीज आदमी से निपट ले लेकिन उसे अपनी हालत का ध्‍यान आया। उसने खुद ही कुछ करने में दिमाग लगाया। जब वह फ्‍लैट नं․ 259 के पास से निकला तो उसने बिना देखे कहा- ‘भाई, मैं नीचे गिरता जा रहा हूँ․․․ हालाँकि ज़मीन पर हरा लॉन है लेकिन फिर भी चोट तो लगेगी․․․ अब मुझे जरा जल्‍दी से बताओ कि․․․ गिरते वक्‍त मेरा सही पॉस्‍चर क्‍या रहे․․․ कि पैरों को सीधा रखूँ․․․ या सिर को हाथों से थामे रहूँ․․․ ताकि चोट खतरनाक न बन सके․․․' फ्‍लैट की खिड़की से आसमान को घूरता एक मनहूस और बेरोजगार नौजवान उसे देख बहुत दिनों बाद आश्‍चर्य-चकित हुआ और हँसने लगा। फिर यकायक चौंककर बोला- ‘भाई साब, आप कहाँ नौकरी करते थे․․․ जगह बताओगे․․․? टेम्‍परेरी या परमानेन्‍ट․․․ मुझे ज्‍यादा फ़र्क़ नहीं पड़ेगा․․․'
दुनिया से एक बार फिर दुःखी होकर, अब उसने कभी कहीं पढ़े गये योग के बारे में सोचा। यदि वह श्‍वास को रोक लेने का अभ्‍यास करे या फेफड़ों में से हवा निकाल ले तो․․․ क्‍या शरीर हल्‍का होकर फूल की तरह आहिस्‍ते से ज़मीन पर रख जायेगा․․․ क्‍या ऐसा हो सकता है?․․․ ऐसा न हो कि फूल जैसा हल्‍का, होकर वह इमारत के किसी ख़तरनाक कोने से टकरा कर छार-छार हो जावे․․․ हाथ पाँव टूटे तो भी चल जायेगा लेकिन․․․ कहीं जान से हाथ धोना पड़ा तो․․․' यह ‘तो' इतना बड़ा बनकर उसके सामने आया कि इस बार वह फूट-फूटकर रोने लगा।
कुछ बच्‍चे, बचपन और जवानी की सरहद पर खड़े फ्‍लैट नं․ 226 के तंग बरामदे में कौन सा खेल खेलें, इस बात को लेकर झगड़ रहे हैं। एक भर आवाज़ चीखा․․․
‘सुपरमैन․․․ सुपरमैन․․․'
‘इसकी लाल चढ्‌ढी कहाँ है․․․?
‘हवा में․․․ कहाँ गया․․․?'
‘नीचे․․․ भई नीचे․․․!' कोरस में आनन्‍द के स्‍वर गूँज उठे।
‘सुपरमैन․․․ सुपरमैन․․․ ऽऽऽ․․․
इस क्षण वह फ्‍लैट नं․ 203 के सामने से गिरता हुआ गिरता गया। दीवार पर लटके काँच में सूरत निहारता एक अधेड़ शेविंग कर रहा है। देखकर उसने दाढ़ी पर चिपका साबुन पोंछा और जोर से हँसा और जोर-जोर से हाथ हिलाने लगा। गिरते आदमी ने फिर वही पूछना चाहा लेकिन वह हाथ ही हिलाता रहा। यकायक उसने पूछा- ‘कैसे गिरे․․․ अचानक․․․ खुली खिड़की से? ․․․ और जोर से खिड़की बंद कर ली।
वह अभी भी हवा में है। बेचैन है। उसके शरीर का क्‍या पॉस्‍चर होना चाहिये, वह समझ नहीं पा रहा है। उसने बड़ी अजीजी से उस फ्‍लैट को देखा जिसके बाथरूम की बाहर वाली निकपाट खिड़की चौपट खुली है।
‘․․․बेशर्म․․․ गुण्‍डे․․․ बदमाश․․․'
टॉवल की ओर लपकती औरत मुँह खोलकर चीखी। खिड़की से नीचे देखती औरत का मुँह खुला का खुला रह गया।
उसके भाग्‍य का गुण्‍डा बदमाश फ्‍लैट नं․ 178 के पास फड़फड़ा रहा है।
सामने ड्राइर्ंगरूम में तीन लोग बैठे और एक खड़ा व्‍हिस्‍की पी रहा है। एक चिल्‍लाया-‘देख, क्‍या सीन है․․․! सबकी आँखें उसी तरफ मुड़ गईं।
‘․․․क्‍या कहता है․․․ आओ सट्‌टा लगावें․․․ आसमान से उतरा फरिश्‍ता या अंतरिक्ष से आया चोर․․․ लगाते हैं․․․ फरिश्‍ते पर एक के चार․․․ चोर पर एक के आठ․․․ माल निकाल․․․ जल्‍दी बे․․․
फ्‍लैट नं․ 149 के किचन में आटा गूँथती काली औरत ने कहा-' ․․․एक वो है जो ऊपर से कूद पड़ा और ․․․ एक तुम हो निठल्‍ले․․․ निकम्‍मे․․․ काम के न काज के․․․ दुश्‍मन अनाज के․․․ मैं नौकरी न करूँ तो भूखे मर जाओ․․․ उसे देखो․․․ और कुछ शर्म करो․․․। उसने दरवाज़े से नीचे गिरते आदमी को एक बार देखा और चुप बैठा रहा। जब गिरते आदमी ने उसे देखा, तब भी वह उसी तरह चुप बैठा रहा। औरत के अधिक बड़बड़ाने पर वह चुप उठा। चप्‍पलें पैरों में फँसाकर बाहर निकल आया और आदतन सीढि़याँ उतरने लगा। नीचे उतरते हुये ऐसा लगा कि वह नीचे गिर रहा है। उसने जेब ढूँढ़ी लेकिन आखिरी बीड़ी वहाँ भी नहीं है।
उस वक्‍त फ्‍लैट नं․ 118 के बाजू से वह गुजर रहा है जिसके टैरिस में दर्जनों कैक्‍ट्‌स के गमलों के बीच से पीले पत्तों वाली एक बेल दीवार दरके कोने से बार-बार बाहर उमड़ रही है। अस्‍त-व्‍यस्‍त मोटी औरत ने लगभग कान खींचते हुये लड़के को बुरी तरह से डपटा।
‘․․․छोड़․․․ छोड़․․․ उसने देखा․․․ दरवाज़ा भी ठीक से बंद नहीं करता․․․ हाय रे․․․ वह नीचे गिरा जा रहा है․․․ उसने देख लिया․․․ ज़रूर देखा होगा․․․'
लड़के ने ढीठता से कहा- ‘․․․किसने देखा․․․?'
पसरी औरत बेदम हाँफ रही है।
․․․उसने ․․․ और किसने․․․ अरे वो मुआ․․․ जो नीचे गिरा जा रहा है․․․ लड़के ने हाथों में ताकत भरी और गिचगिचा कर बोला-‘कौन गिरा․․․ आप तो मुझे देखो कि आपके लिये मैं कितना नीचे गिर सकता हूँ․․' कहते हुए मनीबैग से फूली और तीन जगह से उधड़ी चितकबरी पैंट पाँव से परे ठेल दी।
फ्‍लैट नं․ 94 के बूढ़े ने उसे बहुत पहिले से देख लिया। फ़क़र् केवल इतना रहा कि वे उसे चिडि़या समझकर खुशी-खुशी सोच रहे थे कि आकाश में अभी भी चिडि़यें हैं। लेकिन उनकी बत्तीसी निपक कर बाहर आने को हुई जब उन्‍हें कुछ-कुछ आभासित हो सका कि इतनी बड़ी तो चिडि़या नहीं हो सकती। ऐनक लगाकर वे सप्रमाण जान पाये कि कमबख्‍़त यह तो आदमी है, बेकार ही नीचे को भागा जा रहा है। रेलिंग से सटी कुर्सी पर फिर लेटते हुये वे बुदबुदाये- ‘आह! जवानी की मौज भी क्‍या होती है․․․ ज़मीन आसमान सब एक हो जाता है․․․ कहीं भी चले जाओ․․․ ऊपर नीचे, दायें-बायें, चारों दिशायें․․․ सभी सनसनाती․․․ तब कुछ भी ग़जब करने का मन होता था․․․ अब न उम्र रही और ․․․ न कोई ग़जब हुआ․․․ अब तो देखने से भी डर लगता है․․․।' उन्‍होंने टटोल कर गोली खाई और आसमान से मुँह फेरकर करवट बदल ली।
जिस दम वह फ्‍लैट नं․ 72 के नजदीक पहुँच रहा है। उसके भीतर के हॉल में पहिले से कुछ परेशान हाल लोग आपस में उलझ रहे हैं। उन्‍हें कुछ सूझ नहीं रहा है। तभी जिसने उसे देखा, उसके साथ कई और लोग समवेत भी चिल्‍लाये। ‘․․․वह․․․ वह ․․․ देखो․․․ देखो․․․ कैसे․․․ हाँ․․․ गज़ब․․․ एकदम․․․ फाइन यार․․' उनमें से सिर खुजलाता आदमी जिसने सबसे बाद में देखा, मुँह फाड़कर आया और सबसे आगे हो गया। ‘․․․अरे ․․․ हाँ․․․'
उसकी हाँ इतनी बड़ी और लम्‍बी हुई कि उसमें सबकी हाँ घुस गई और दूर तक और देर तक फैली रही। ‘․․․आइडिया․․․ हाँ․․․ आइडिया․․․ ऐइटाइ तो आमी खूंजछिलाम․․․ आर ऐइटाइ पालामछिलम ना․․․ आखिर आश्‍मान से टोपका․․․ छोप्‍पर फोड़ के․․․'
सब लोग उसके चारों ओर इकट्‌ठा हो गये।
‘․․․ दादा ․․․ की भालो․․․???'
‘․․․ अपुन को एकटो नोइ आइडिया आई․․․ अपुन को बीमा के बारे में एड फिलिम कोरबो․․․ तो ․․․शूनो․․․ आमार कम्‍पनी की महिमा․․․ जार लाइफ़ का बीमा कराया, ओ आदमी ․․․ 300 वीं मंजिल से नैचूँ को कूदा․․․ बूझले तो न․․․ अमार कम्‍पनी सच ए फॉस्‍ट․․․ के श्‍शाला जब वो 200वीं मंजिल पे पौंचा तो कम्‍पनी ने क्‍लेम का चेक हाथ में पोकरा दिया․․․ व्‍ही ऑर फास्‍ट, व्‍ही ऑर अहैड द शाला टाइम․․․ है न' ․․․ आइडिया․․․ एकदम नोइ․․․'
यह दुनिया का नियम है कि जो नीचे गिरता है, वह गिरता ही जाता है। प्रकृति भी इसमें आड़े नहीं आती बल्‍कि अपनी सारी गुरुत्‍वाकर्षण शक्‍ति के साथ जुट जाती है।
वह फ्‍लैट नं․ 28 के सामने रुकना चाहता है। लेकिन बावजूद हरचंद कोशिशों के रुकना हो नहीं पा रहा है। उस फ्‍लैट की तीसरी खिड़की से भी निकला एक कोमल कमजोर हाथ उसे रोकना चाह रहा है लेकिन रोक पाना नहीं हो रहा है।
यूँ तो बड़ा कहा जाता है कि प्‍यार में बड़ी ताकत होती है। आज यह कहना बेकार सिद्ध हुई कि गिरने से प्‍यार रोक सकता है अलबत्ता कारण ज़रूर बन सकता है। बात सिर्फ़ इतनी भर नहीं बल्‍कि आगे यह भी जताया जाता है कि दुनिया की कोई ताकत किसी को गिरने से रोक नहीं सकती। लेकिन केवल लेखक ही है जो यह कमाल दिखा सकता है, भले ही काग़ज़ के मैदान में और कलम के माथे पर भल-भल स्‍याही बहाता हुआ․․․
․․․ और ऐसा हुआ भी। हुआ यह कि फ्‍लैट नं․ 23 से नीचे आते-आते वह हरे लॉन तक आ ही गया। पके आम सा टपका। धम्‍म्‌ की इक आवाज़, वह भी हल्‍की सी। धूल झाड़ी। उठ कर चल दिया, इस बार भी बिना बताये कि अब कहाँ जा रहा है। आप कहेंगे कि ऐसे कैसे??? लेकिन आप भी तो दिल ही दिल में चाहते यही थे․․․ तो अब क्‍यों कैसे-कैसे की रट लगा रखी है?
अगर दिल की बात पूरी हो जाये तो भला आपको क्‍या और क्‍यों कर आपत्ति होना चाहिये․․․!!!
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टिप्पणी:-

प्रज्ञा:-
वाह । गजब कहानी। ये ख़त्म कहाँ हुई। ज़िन्दगी के बिलकुल आस पास। मुकेश वर्मा जी को हार्दिक बधाई।

दिनेश कर्नाटक:-
मुकेश वर्मा जी की कहानी पसंद आई। आइडिया अच्छा है। इस बहाने लोगों के मिजाज सामने आए। मगर अंत...कहानी जिस प्रवाह से चल रही थी अंत ने उसे किसी निर्णायक दिशा की ओर ले जाने अथवा सवाल खड़ा करने के बजाय ऐसी जगह पर लाकर छोड़ दिया जहाँ पर सवाल उठ रहा है कि कहानी का ढांचा खड़ा ही क्यों किया गया। यानी गिरने वाले आदमी को 389 वीं मंजिल से गिरकर भी बचना था तो उसे गिराया ही क्यों ?

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