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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

बिजूका की पहली बैठक ---एक रिपोर्ट

12 अप्रैल 2015 को बिजूका की पहली बैठक 

---एक रिपोर्ट 

बेमौसम झमाझम बारिश हो रही थी . एक बार तो लगा कि बैठक स्थगित कर दी जाय, पर जब जुनून चढ़ा हो तो कुछ  फ़र्क नहीं पड़ता..... . अभी एक दिन बिजूका चार पर  चल रही चर्चा में यह तय पाया गया कि लेखक खब्ती होते हैं। मैं और जोड़ना चाहती हूँ कि लेखक सनकी होते हैं, लेखक अवलिया होते हैं।    … शहर में बारिश,शहर में गुलज़ार साहब, शहर में शादियां   … इसके बाद भी एक-एक कर ''हम पांच'' अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय,इंदौर में जुट ही गए.   सत्यनारायण पटेल , ब्रजेश कानूनगो , आनंद पचौरी , कविता वर्मा और मैं. सही समय पर पहुंचे हम लोगों ने तय किया कि  साथियों का थोड़ी देर और इंतज़ार किया जाय. हम यह सोच ही रहे थे कि मेरे मेसेज बॉक्स और व्हाट्स एप पर ''नहीं आ पाने की क्षमा याचना के साथ''  .सरफ़राज़ नूर,चन्द्र शेखर बिरथरे,नंदकिशोर बर्वे,राहुल वर्मा,के सन्देश आने लगे....प्रदीप मिश्र,संजय पटेल,अमीता नीरव, वसुंधरा,मीना शाह, आभा निवसरकर,सौरभ पाण्डे,सुषमा अवधूत,पहले ही असमर्थता व्यक्त कर चुके थे. डॉ. यामिनी,गौरव जायसवाल,वैभव पुरोहित आने वाले थे, लेकिन नहीं आ पाए. अर्चना चावजी नेट की अनुपलब्धता की वजह से असमर्थ रही. हमने इस मौके पर अरूण आदित्य,आकांक्षा पारे,स्वरांगी साने,धनश्री देसाई आदि साथियों को भी याद किया, जो इंदौर में अपनी  सक्रिय उपस्थिति दर्ज किया करते थे और जो आज भी अपने-अपने शहरों में सक्रिय हैं तथा यहाँ भी उतनी ही शिद्द्त , उतनी ही आत्मीयता से जुड़े हुए हैं।
इन बीस  साथियों को भी अपने साथ ही मान कर हमने पहले कुछ चर्चा की और तय किया कि प्रत्येक माह के दूसरे रविवार शाम ४ से ६ बिजूका के सभी समूहों के इंदौर के सदस्यों  की नियमित बैठक की जाय और बाद में इसे विस्तारित कर अन्य शहरों में या इंदौर में ही आयोजित किया जाय. इसके बाद तय हुआ कि हम तीन कवि अपनी पांच-पांच रचनाओं का पाठ करें ,तदनुसार आनंद पचौरी जी ने रचना पाठ की शुरुआत की.पचौरी जी की 'चलो लौट चले', ब्रजेश कानूनगो जी की 'चिड़िया' ने खासा प्रभावित किया.मैंने भी अपनी पांच कवितायेँ सुनाई. कविता वर्मा ने अपनी लघुकथाओं  का पाठ किया . कुछ गपशप के बाद,मौसम का आनंद उठाते पैदल ही चल पड़े  समीप के कॉफी हाउस में. गर्मागर्म कॉफी के साथ इस आनंददायी अवसर का समापन इस विश्वास के साथ हुआ कि  ''हम पांच'' बहुत जल्दी पचास हो जाएंगे ।
अगली बैठक की संभावित दिनांक/समय/स्थान  --- 10 मई , दोपहर 4 से 6 , अहिल्या केंद्रीय पुस्तकालय,रीगल चौराहा.

---एक रिपोर्ट 

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