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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

कलावंती की कवितायेँ

1।।पगड़ी ।।
वह संभालती रही
कभी पिता की पगड़ी
कभी भाई की पगड़ी
कभी पति की पगड़ी
उसने कभी सोचा ही नहीं कि
हो सकती है
उसकी अपनी भी कोई पगड़ी
एक दिन पगड़ी से थककर,
ऊबकर उसने पगड़ी उतारकर देखा
पर इस बार तो गज़ब हुआ
थोड़ा सुस्ताने को पगड़ी जो उतारी
तो देखा पगड़ी कायम थी।
बस माथा गायब था।

2 ।।डर ।।
वह डरती है
जाने क्यों डरती है
किससे किससे डरती है
वह रात से क्या
दिन से भी डरती है
एक पल जीती है एक पल मरती है।
पहले पिता से, भाई से तब पति से ....
आजकल वह
अपने जाये से भी डरती है।
                
 3 ।।मन ।।
एक नाजुक सा मन था
अठखेलियों सा तन था
पूजा सा मन था
देह आचमन था
            वो एक लड़की थी
           भीड़ मेँ चुप रहती थी
           अकेले मेँ खिलखिलाती थी
उजालों से अंधेरे की तरफ आती जाती थी
वो एक औरत थी
कभी बड़बड़ाती थी
प्यार मेँ थी कि नफरत मेँ
बेहोश थी कि होश मेँ थी
बात बात पर हँसती जाती थी
बात बात पर रोती जाती थी
उजालों से अँधेरों की
तरफ आती जाती थी। 
एक नाजुक सा मन था
अठखेलियों सा तन था
पूजा सा मन था
देह आचमन था
उसे जो कहना था
स्थगित करती जाती है
अगली बार के  लिए
जो स्थगित ही रहता है जीवन भर
पूछती हूँ कुछ कहो –
वह थोड़ा शर्माती है
थोड़ा सा पगलाती है
एक लड़की मेरे सपनों मेँ
अँधेरों से उजालों की तरफ आती जाती है
             
  क्षणिकायेँ
               (क)
एक नदी है मृत्यु की
उस पर तुम हो
इस पार मैं
अकबकाई सी खड़ी हूँ।
               (ख)
फूल गिरा था धूल पर
धूल की किस्मत थी
कि धूल कि किस्मत थी
कि फूल के माथे पर था।
           
              (ग)
बहुत झमेलों में भी,
उलझी जिंदगी में भी
मैंने चिड़िया सा मन बचाए रखा,
इतने दिन बाद मिले हो
तो उसे उड़ाने में लगे हो।
                (घ)
एक यात्रा पर
निकले हैं हम दोनों
अपने- अपने घरों में
अपने- अपने शरीर छोड़कर।
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अंजू शर्मा :-
आज की कविताएँ 'जानकीपुल' ब्लॉग से ली गई हैं।
 
 अलकनंदा साने:-
साथियों आज किसी सोशल साईट या पत्रिका से कविता साझा करने का दिन है . अंजू जी ने ''जानकीपुल ब्लॉग'' से ये कवितायेँ साझा की हैं . इन पर आपकी प्रतिक्रिया आमंत्रित है . कृपया ध्यान रहें  चर्चा के बीच कुछ और साझा न करें
 
प्रज्ञा :-
स्त्री मन की विविध छवियों का संसार बसा है इन कविताओं में। खासियत ये है कि छवियों के साथ कितने सरोकार कितने पूर्वाग्रह भी बेसाख्ता चले आये हैं। और पगड़ी का बिम्ब कितनी सघन अनुभूतियों में पिरोया गया है। जहाँ माथा गायब हो जाना वजूद स्वाभिमान सबकी बारीक किरचों को दिखाता है। सबकेबावजूद चिड़िया सा मन बचा रहने की उम्मीद बहुत से रंग और बहुत कुछ का शेष रहना ,बहुत कुछ का बचाया जा सकने में हमारे विश्वास के धागे से सहज जुड़ता है। अच्छी कविताओं से रचनात्मक दिन की शुरुआत।
 
नंदकिशोर बर्वे :-
नारी तेरी यही कहानी -----और नारी तुम केवल अबला नहीं ----जैसी ही नारी मन की विडंबनाओं और मजबूरियों से ओतप्रोत होने के बाद भी सुंदर कविताएँ हैं।
 
नंदकिशोर बर्वे :-
दूसरी क्षणिका की तीसरी और चौथी पंक्ति में फूल और धूल का स्थान परस्पर बदलने से अधिक असरदार हो सकती है। नंदकिशोर बर्वे इंदौर।
 
किसलय पांचोली:-
बहुत ही उम्दा कविताएँ! आभार अंजू जी। उनके शीर्षक भी सटीक हैं। स्त्री को उसके अस्तित्व पर पुनर्विचार करने हेतु झकजोर देती हैं ये कविताएँ।

सुवर्णा :-
सुन्दर रचनाएँ। नारीमन की बात करती प्रभावी कविताएँ और अच्छी क्षणिकाएँ
 
नयना (आरती) :-
बहुत गहरे भाव लिए सारी कविताएं। खासकर "पगडी" और चिडिया सा मन क्षणिका
 
अलकनंदा साने:-
अंजू  मुझे लगता है प्रतिक्रिया जो आती हैं उन्हें भी थोड़ा विस्तारित होने की आवश्यकता है जैसे नंदकिशोर बर्वे जी या प्रज्ञा जी ने दी है उसका लाभ स्वयं टिप्पणीकार को होता है क्योंकि उससे एक समग्र दृष्टी विकसित होती है , जो सिर्फ अच्छा या  बुरा कह देने भर से नहीं हो पाती
 
अंजू शर्मा :-
प्रज्ञा जी ने तो कविताओं के अर्थ खोलकर रख दिए। उनकी टिप्पणी सदा ही सार्थक होती है। और पगड़ी कविता वाकई कम में बहुत कुछ कहती है प्रज्ञा जी।
कविताओं पर चर्चा वस्तुतः पाठक के अपने पाठ के निष्कर्ष की प्रस्तुति से आगे बढ़ती है। यह पाठ अलग अलग हो सकता हैं और लेखक से भी इतर हो सकता है। जैसा कि बृजेश जी ने इसे अपनी तरह रखा। चर्चा जारी रखिये दोस्तों। खुलकर राय दीजिये।
 
बी एस कानूनगो:-
क्षणिकाओं की छोटी छोटी पंक्तियों में इस तरह भी बात कही जा सकती है।मुग्ध हूँ और खुद ऐसे प्रयास का मन बनाता रहता हूँ।जब कही कुछ सीखने की बात आती है हमारे लिए निश्चित सुन्दर हैं।कविताओं ने सचमुच मोह लिया है अंजू जी।
 
आभा :-
Ahaa... पगड़ी और क्षणिकाएँ ज़बरदस्त है। सीधे मन में उतरती हैं। सुबह से पांच बार पढ़ चुकी हूँ हर बार कुछ नया मिलता है। जानकीपुल की वैसे भी मैं एकदम पंखा हूँ या कहूँ विंड मिल हूँ । धन्यवाद अंजू जी इतनी जानदार कवितायेँ पढ़वाने के लिए।
 
अंजू शर्मा :-
अंतर तो है दोनों अत्यंत लघु कविता की अलग विधाएँ हैं। एक हिंदी तो दूसरी जापानी। क्षणिका में कोई व्याकरण नहीं है free verse की तरह पर हायकू में मात्राओं की गिनती जरूरी है जिसे मैं खुले दिन वाली चर्चा के दौरान साझा करूँगी।
 
कविता वर्मा:-
पगडी़ और डर कविता लाजवाब हैं ।दोनों मे स्त्री की विवशता को सरल शब्दों मे व्यक्त किया है ।मन कविता उजाले से अंधेरे और अंधेरे से उजाले का सुंदरता से उपयोग किया है लेकिन इसमे बीच मे सभी पंक्तियों का दुहराव थोडा़ खलता है । क्षणिकाऐं मन को छूती हैं ।धूल और फूल मे शब्ददों की थोडी़ हेराफेरी से शायद ज्यादा प्रेषणीय बन सके।
 
चंद्र शेखर बिरथरे :-
पगड़ी नारी के अस्तित्व की दुहाई देती  कविते है । प्रभावशाली बिम्ब । डर   स्त्री के अवलम्बित होने का दर्द प्रगट  करती है । पगडी एवं डर की विभीषिकाओं से मन की सकारात्मक कविता आशान्वित करती है । क्षणिकाएं  बहुत ही  प्रभावित करती हैं । अच्छी , सुन्दर कविताएं । साधुवाद ।
 
फरहात अली खान :-
क्षणिकाओं में तीसरी वाली पसंद आई और चारों में से अकेली यही क्षणिका प्रभावित करती है।
तीनों कविताओं में 'पगड़ी' का भाव पक्ष सबसे ज़्यादा मज़बूत नज़र आता है। इसकी पाँचवी पंक्ति में जो 'कि' आया है वो छठी पंक्ति की शुरुआत में आता तो पाँचवी पंक्ति और भी ज़्यादा प्रभावी होती। फिर इस कविता में एक ही बात को दो बार लगभग एक ही ढंग से दोहराया गया है:
1. "एक दिन पगड़ी...उतारकर देखा"
2. "थोड़ा सुस्ताने...पगड़ी जो उतारी"
'1' और '2' में एक ही बात का दोहराया जाना इस कविता का सबसे कमज़ोर पक्ष है।
इसके बाद 'डर' में एक असहाय स्त्री के बारे में जिस तरह बताया गया है, वो ज़्यादा प्रभाव नहीं डालता।
'किससे किससे' की जगह 'किस-किससे' सही बैठता।
'तब पति से...' में 'तब' क्यों आया? पता नहीं।
अंतिम पंक्ति में 'जाये' की जगह शायद 'साये' रहा होगा। यानी लिखने में ग़लती हुई शायद।
'मन' वाली स्त्री संकोची किस्म की है।
'नाज़ुक सा मन' और 'पूजा सा मन' पढ़कर फिर से ऐसा लगा जैसे कुछ है जिसकी पुनरावृत्ति हुई।
'अंधेरों से उजालो की तरफ़ आती जाती है' वाली बात समझ में नहीं आती। 'अंधेरों और उजालों के बीच आती जाती है' होता तो साफ़ समझ में आता।

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