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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

अग्निशेखर जी की दो कविता टिप्पणी सुरेन्द्र रघुवंशी जी की

अग्निशेखर जी की दो कविता
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(1)  चौखट
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वहाँ टीले पर रवडी है
दरवाजे की एक चौखट
अपना घर ढूंढती हुई

अभी अभी ३ससे होकर
गुजरे हैं हम
एक तरफ शून्य है
दूसरी ओर सन्नाटा
और हमें मालूम नहीं
इस समय जहाँ पर हैं हम
अतीत की गहराई है
या भविष्य का मौन

धूप और बरसात में
अकेली २वडी यह चौखट
जैसे हवा में
किसी गहरे घाव का
सूखा हुआ निशान।
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(2) संग्रहालय में कटे हुए पाँव

जाने किसने
घबराकर किसी बडे प्रश्न का
गला घोंटा है
और ये इतिहास की चिता से बाहर
२ह गए पाँव
बोलते नहीं झूठ
गवाहो की तरह
जाने कहाँ से चलकर
पहुँचे है ये कटे हुए पाँव
हमारे समय में
और यहाँ से
चुपचाप निकल पडते हैं
भविष्य की यात्रा पर
जाने किस उम्मीद में
सीने के भीतर
२क्त में स्वपन छिपाये
निकल पडा यह आदमी
दिगंत में
थक कर टूट जाने की नियति में
मौन हो जाने के लिए
एक दिन तक
गिरवी है
दुःख के पास
उसके ये पाँव।
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( चयन और प्रस्तुति: पूर्णिमा मिश्रा जी )
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1 टिपण्णी:- सुरेन्द्र रघुवंशी जी

अग्निशेखर की कविता 'चौखट'  एक अलग और पारदर्शी किस्म की ताजगी भरी कविता है। कि जहाँ हमारी प्रतिबद्धताओं की चौखट हो वहीँ घर होने की संभावनाओं को तलाशा जा सकता है । रेगिस्तान और पहाड़ों पर भी । कहीं भी । बस चौखट होने की अनिवार्यता ही हमें मनुष्यता की सीमा में खड़ा करती है जहाँ से हमारे हाथ में वर्तमान के डोर होती है जिसका दूसरा सिरा इतिहास से जुड़ा होता है।
               दूसरी कविता 'संग्रहालय में कटे पाँव' के पाँव भी मुझे इसी चौखट के भीतर से निकलते हुए प्रतीत होते हैं ।निहितार्थ में और गहनता में भी अग्निशेखर जी को बधाई बेहतरीन चयन के लिए पूर्णिमा मिश्रा जी की और भाई राजेश झरपुरे जी को धन्यवाद।

2 टिप्पणी:- अरुण आदित्य जी

अपना घर ढूंढती हुई ये जो चौखट है इसके पार कश्मीरी  विस्थापन की पूरी त्रासदी को महसूस किया जा सकता है।ऐसी त्रासदी जिसके एक तरफ शून्य है दूसरी ओर सन्नाटा।'हवा में किसी गहरे घाव का सूखा हुआ निशान' अद्भुत बिम्ब।
संग्रहालय में कटे हुए पांव इतिहास की ज्यादतियों से निकलकर  भविष्य की उम्मीद-यात्रा पर ले जाने का प्रयास करते हैं। दोनों कविताओं के लिए शुक्रिया अग्निशेखर भाई।

3 टिप्पणी:- प्रज्ञा जी
अग्निशेखर जी की कविता में चौखट सुरक्षा और घर के प्रतीक के रूप में  किसी अंतहीन स्मृति की तरह है और वे जो बचे हुए दुःख के  पांव हैं वे कभी न मिटने वाले लगते है वे अतीत  शिनाख्त करते हैं। अमिट संत्रास की कवितायेँ।

4 टिप्पणी:- अनूप सेठी
चौखट कविता के शुरू में ही एक लटकी हुई चौखट का बिम्ब एक पेंटिंग की तरह खड़ा हो जाता है। एक तरफ शून्य दूसरी तरफ सन्नाटा रिक्तता के बोध को गहरा, व्यापक और मारक बनाता है। हमें अनुत्तरित भी कर जाता है। इस कविता के लिए अग्निशेखर जी और बिजूका का आभार।

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