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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

मणि यानी कमांडोज की गोली का टारगेट

मणि यानी रत्न होता है। मणिपुर का मतलब रत्नो का नगर है। पर लगता है इन शब्दों का यह अर्थ डिक्सनरी में ही होता है। मणिपुर के बासिंदों के लिए मणि का अर्थ बहुत अलग है। या कह सकते हैं कई शब्द ! जैसे हत्या, बलात्कार, जेल, भूख और किसी भी तरह के दमन को सहने वाला, यानी मणि है, और इन्हीं मणियों से मिलकर बनता है मणिपुर। क्या ख़ूब नाज़ होगा मणिपुरियों को अपने मणि होने पर ? अपने देश की सेना, अपने राज्य की पुलिस के कमांडोंज की बदूँक से छूटी गोली जब उनके पेट, सीने और कनपटी में उतरती होगी। तब वे मरने में कितना सुकून महसूस करते होंगे ? यह मणिपुर का ही कोई बंदा ठीक से बया कर सकता है, हम शेष भारतीय तो दूर बैठे महसूस ही कर सकते हैं। आज मणिपुर में मणि यानी कमांडोज की गोली का टारगेट है। वाह… रत्न की क्या इज़्ज़त है !

मणिपुर में राज्य और केन्द्र सरकार के खूंखार सेनिक और कमांडोज शांति का प्रयास कर रहें हैं। एक पुलिस अधिकारी की इस बात से समझ में आता है कि वे किस तरह के प्रयास कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी कहता है- ‘या तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहें या फिर कुछ करने का फ़ैसला करें। सच्चाई ये है कि पिछले दो साल में हम और भी तेज़ी से जवाबी हमले कर रहे हैं। पंजाब में देखिए समस्या कैसे दूर हुई।, उनके प्रयास और सोचने के ढंग से लगता है कि भविष्य में मणिपुर बूढ़ों का राज्य रह जायेगा। क्योंकि सेनिक और कमांडोज एक-एक कर हर जवान स्त्री-पुरुष को ख़त्म कर देंगे।

मणिपुर में शांति स्थापित करने के प्रयास का लम्बा इतिहास है। सन 2000 की बात है। असम राइफल के बहादुर जवानों ने दस मणियों को धूल चटा दी। और भला वे क्यों न चटाते धूल ? सरकार उन्हें तनख्वाह ही इस बात की देती है। इनमें एक वह युवक भी था, जिसे देश की सरकार ने 1988 में राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार प्राप्त इस युवक को धूल चटाने पर, शायद उन्हें सरकार ने शूरवीर पुरस्कार दिया हो ! लेकिन इस जघन्य हत्याकांड के ख़िलाफ़ कई मणियों के मग़ज़ की कोशिकाएँ सुन्न पड़ गयी। एक मानवाधिकार कार्यकर्ता 28 बरस की इरोम शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठ गयी। मारे गये लोगों के परिवारों को न्याय मिले और काला क़ानून (1958 का आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट) हटाया जाये जैसी इरोम की माँगे हैं।

अब इरोम कोई महात्मा गाँधी तो है नहीं, जिसके भूख हड़ताल पर बैठने से देश में हड़कंप मच जाये। राज करने वाले भी गोरे अंग्रेज नहीं, जो गाँधी की भूख हड़ताल तुड़वाने को काले क़ानून को रद्द करने पर विचार करे। अब देश जिन काले अंग्रेजों के हाथ में हैं, वे इतने बेशर्म और पत्थर ह्रदय हैं कि उन्हें इरोम जैसी कितनी ही महिलाओं के भूख हड़ताल पर बैठने से कोई फर्क़ नहीं पड़ता है। इस बात की पुष्टि इससे भी होती है कि (सन 2000 से 09) अब तक इरोम की भूख हड़ताल ज़ारी है। उसे सरकार के लोगों द्वारा ज़बरन नाक में नली डालकर तरल भोजन दिया जा रहा है। सरकार ज़बरन और ज़्यादती करने में ही हुनरमंद है। सोचने की बात है कि लम्बे समय से भूखी इरोम के शरीर में कितना कुछ बदल गया होगा। उसकी हड्डियाँ भीतर ही भीतर गल रही होगी ! उसकी आँते शायद अब रोटी पचाने लायक भी न बची हो। लेकिन सरकार अड़बी (जिद) पड़ी है कि काला क़ानून नहीं हटायेगी। है न, गोरों से ज़्यादा क्रूर काले अंग्रेज ?

यह तथ्य बहुत कम लोग जानते होंगे और पढ़ी-लिखी खाती-पीती नयी पीढ़ी तो शायद बिल्कुल ही नहीं जानती होगी ! खाते-पीते वर्ग की नयी पीढ़ी डिस्कोथेक, हुक्का बार, वाइन बार, मल्टीप्लेक्स, मॉल में अपना समय इतना ख़र्च करती है कि इतिहास, साहित्य और संस्कृति जैसे विषयों को पढ़ने और जानने के लिए उसके पास वक़्त का टोटा पड़ जाता है। उनके पास वक़्त से भी बड़ा जो टोटा है, वह है जानने की इच्छा का, संस्कार का। बापड़ों को ऎसा संस्कार ही न मिला कि उनका रुझान इन विषयों के प्रति हो। दूसरी तरफ़ जो अनपढ़ और ग़रीब पीढ़ी है, वह तो उदर पूर्ति के पाटों के बीच ही पीस कर रह जाती है। सदा ही गोरे और काले दोनों अंग्रेजों की साम्राराज्यवादी नीतियाँ यही तो चाहती रही है।

यहाँ यह बताना ठीक ही होगा कि जब 1947 में गोरे अंग्रेजों ने भारत छोड़ दिया। मणिपुर के महाराजा ने मणिपुर को संवैधानिक राजतंत्र घोषित किया। उन्होंने अपनी संसद के लिए चुनाव भी करवाए। लेकिन शायद दिल्ली ने महाराजा पर ऎसा दबाव बनाया कि मणिपुर का भारत (1949) में विलय करने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था। विलय के बाद मणिपुर को सबसे निचले स्टेट का यानी सी ग्रेड राज्य का दर्जा दिया गया। फिर 1963 में केन्द्र शासित प्रदेश और फिर 1972 में राज्य का दर्जा दिया गया। लेकिन भारत सरकार का मणिपुर के साथ जो बर्ताव था, वह मणिपुर के चेतना से लबरेज़ लोगों से देखा नहीं गया। 1964 में ऎसे ही लोगों ने भारत सरकार के ख़िलाफ़ बग़ावत का बिगूल फूँक दिया। उन्होंने यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नाम से भूमिगत आँदोलन की शुरुआत कर दी। फिर 70 के दशक में पी.एल.ए, प्रीपाक, के.सी.पी और के.वाई.के.एल जैसे दूसरे संगठन भी बने। राष्ट्रवाद को लेकर सबकी अपनी-अपनी धारणाएँ थीं, लेकिन वे लड़ रहे थे, मणिपुर की आज़ादी के लिए। इन्ही सब आँदोलनों को कुचलने के लिए मणिपुर में (1958 का आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट) काला क़ानून लागू किया गया था, जो आज तक ज़ारी है।

मणिपुर में सबसे ज़्यादा विरोध का उफान 2004 में देखने को मिला। कुछ समय के लिए पूरे देश का ध्यान मणिपुर की ओर आकर्षित हुआ। 2004 में असम रायफल्स के जवानों ने अपनी वीरता का झंडा कुछ इस अंदाज़ में गाड़ा कि देश का हर जागरूक और संवेदनशील तबका थू.. थू.. करे बिना न रह सका। मामला यूँ था कि एक रात असम रायफल्स के जवान 32 बरस की थांग्जम मनोरमा को उसके घर से उठा ले गये। वे इसलिए नहीं उठा ले गये थे कि मनोरमा ने कहीं बम फोड़ दिया था या कुछ और गंभीर अपराध कर दिया था, बल्कि उसके साथ ज़बरदस्ती करने को ले गये थे और सामूहिक रूप से की भी। बलात्कार के बाद मनोरमा की हत्या कर फेंक दी गयी। इस घटना ने मणिपुरी महिलाओं के मान-सम्मान की धज्जियाँ बिखेर दी। पूरा मणिपुर सड़क पर उतर आया। महिलाओं ने मणिपुर की राजधानी इंफाल में भारतीय सेना के कार्यालय के सामने नग्न होकर विरोध जताया और नारा दिया- इंडियन आर्मी रेप अस।

इस घटना से केवल मणिपुर सरकार की ही नही, केन्द्र सरकार की भी देश भर में थू.. थू होने लगी। तब अगस्त 2004 में केन्द्र सरकार को इंफाल नगर पालिका क्षेत्र से (ए.एफ.एस.पी.ए.) काला क़ानून हटाने को बाद्ध्य होना पड़ा। मणिपुर में सेना का हस्तक्षेप कम हुआ और सेना की जगह मणिपुर पुलिस कमांडोज (एम.पी.सी) ने ले ली। एम पी सी को राज्य के इंफाल पूर्व, इंफाल पश्चिम, थाउबल और बिष्णुपर जिलों में तैनात हैं। इनकी तैनाती ऎसी ही है जैसे नागनाथ को हटाया और सांपनाथ को तैनात किया हो।

इस बल का गठन 1979 त्वरित कार्यवाही बल के रूप में किया गया था। इस बल के बारे में राज्य के पूर्व महानिरीक्षक थांग्जम करुणमाया सिंह का कहना है कि ए.पी.सी के जवानों को ख़ास आॉपरेशन्स के लिए प्रशिक्षित किया गया है और उन्हें तभी गोली चलाने का निर्देश है जब उन पर गोलीबारी हो रही हो। उन्हें महिलाओं, बूढ़ों और बच्चों का ध्यान रखने को कहा जाता है। लेकिन 23 जुलाई 09 की सुबह क़रीब साढ़े दस बजे ख्वैरम्बंड बाज़ार में तलाशी अभियान के दौरान जो घटना घटी, वह पूरी तरह से उक्त कथन का मखौल उड़ाती है।

2008 में इस बल ने कुल सत्ताइस बार नाम कमाया, पर ये मुठभेड़ और उत्पीड़न के मामले इसने सुनसान जगह में निपटाये थे। पर बल के कमांडोज और नेतृत्व करने वालों को शायद लगा कि उनका नाम कम हुआ। शायद उन्हें वह कहावत याद आयी कि जंगल में मोर नाचा, किसने देखा। तब शायद उन्होंने अपने अचूक निशाने का हुनर (23 जुलाई 09 को) बीच चौराहे पर दिखाने का सोचा होगा। शायद इस सोच का सफल और चर्चित परिणाम- रबीना देवी, संजीत चोंग्खम और उस गर्भवती स्त्री के शव हैं। कमांडोज की सूझबूझ और दूरदर्शिता तो देखिए, उस गर्भवती महिला के बच्चे को पेट ही में मारकर, जन्म लेकर बच्चे की पी.एल.ए के संगठन से किसी भी रूप में जुड़ने की संभावनाओं को पूर्णतः समाप्त कर दिया। कमांडोज ने मणिपुर राज्य विधान सभा से लगभग 500 मीटर की दूरी पर यह कारनामा कर दिखाया, ताकि विधान सभा में बैठने वाले मंत्री गोलियों की आवाज़ सुन सके और जाँबाज कमांडोज के लिए उचित पुरस्कारों के प्रस्ताव तुरंत पारित करवा सके।

कमांडोज का यह दावा सही है कि संजीत पहले पी.एल.ए से जुड़ा हुआ था, इस आरोप के कारण संजीत को सन 2000 में हिरासत में लिया था और फिर छोड़ दिया था। फिर 2006 में संजीत अपनी तबीयत ख़राब रहने की वजह से पी.एल.ए से अलग हो गया था। 2007 में संजीत को राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत फिर से हिरासत में लिया और 2008 में छोड़ दिया था। कमांडोज उसे बार-बार पकड़ते, बंद करते और फिर छोड़ देते थे। कोई तो वजह थी, जिसकी वजह से उसे छोड़ना पड़ता था- शायद सिद्ध नहीं होता था कि संजीत के पी.एल.ए से संबंध है या कुछ ओर बात थी ! क्या था यह तो वही जानते होंगे, लेकिन उसे बार-बार छोड़ना पड़ जाता था। वह अपने परिवार के साथ खरई कोंग्पाल सजोर लीकेई में रहते हुए एक निजी अस्पताल में अटेंडेंट की नौकरी करता था, यह बात वहाँ सब जानते थे।

‘तहलका’ पत्रिका में छपी तस्वीरों में से किसी में भी वह कमांडोज के साथ झूमाझटकी करता, भागता या गोली चलाता नज़र नहीं आ रहा है। पुलिस कमांडोज उसे घेरे खड़े हैं। फिर उसे खींचते और धकियाते एक फार्मेसी के स्टोर रूम की तरफ़ ले जाते नज़र आ रहे हैं। थोड़ी देर बाद उसकी लाश को घसीट कर बाहर लाते हैं। उन तस्वीरों और संपूर्ण घटनाक्रम को जानने के बाद तो ऎसा ही लगता है कि कमांडोज ने 23 जुलाई 09 को मनमाने ढंग से सब्जी वाली रबीना देवी, गर्भवती स्त्री और संजीत की हत्या कर दी। वास्तविकता क्या है यह कोई ईमानदार एजेंसी की जाँच रिपोर्ट से पता चलेगा ! पर इस बात से जाँबाज कमांडोज का नाम पूरे देश में हो ही गया ! इससे राज्य सरकार और केन्द्र सरकार की इस समझ का भी पता चलता है कि वे अपने अधिनस्थ काम करने वाली सरकारी एजेंसियों को किस तरह से प्रशिक्षित करते हैं ! सवाल यह है कि क्या अपने हक़ के लिए लड़ने वालों से निपटने का यही एक मात्र तरीक़ा है ?

बात मणिपुर की तो है ही, पर अकेले मणिपुर की ही नहीं है। आज देश के कई हिस्सों में अपनी अलग-अलग माँगों और अधिकारों के लिए लड़ने वाले किसान, मज़दूर, आदिवासी, दलितों को सरकार गोली की भाषा से ही समझा रही है ।

इस सरकार और इस व्यवस्था से कुछ विनम्र सवाल है कि क्या सरकारी आतंकवाद कभी थमेगा ? कभी सरकार और उसके अधिनस्थ काम करने वाली एजेंसियों को यह समझ में आयेगा कि वे सब शोषण करने और आमजन को कुचलने के लिए नहीं, बल्कि उसके हर अधिकार को सम्मान और सुरक्षा प्रदान करने के लिए चुने और नियुक्त किये जाते हैं ? क्या यह सरकार आमजन के मन में यह भरोसा पैदा कर सकती है कि वह साम्राज्यवादी ताक़तों की अंगुली के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली नहीं है ? क्या देश के सभी हिस्सों से भूख, भय, बेरोज़गारी, शोषण, दमन जैसी समस्याओं को खदेड़कर देश में शांति और सद्भाव का माहौल तैयार करने का विश्वास पैदा कर सकती है ?

क्या सरकार के पास ऎसा कोई रास्ता है जिससे लोगों के सवालों और समस्याओं के हल खोजे जा सके ? बात केवल राज्य और देश की सरकारों की नहीं है, बल्कि क्या इस पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था के ही पास ऎसा कोई रास्ता है ? अगर नहीं, तो फिर अकेली सरकार नहीं, इस पूरी साम्राज्यवादी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की ज़रुरत है ! यह काम जितना ज़ल्दी होगा, सुकून उतना नज़दीक होगा।

बिजूका फ़िल्म क्लब, इन्दौर द्वार 6 सितंबर 09 को मणिपुर के मुद्दे पर केन्द्रित निर्देशक कविता जोशी द्वारा बनायी डॉक्यूमेण्ट्री
फ़िल्म ‘ टेल फ्रॉम द मॉर्जिन’ का प्रदर्शन किया गया। फ़िल्म देख दर्शक स्तब्ध थे। दर्शकों ने मणिपुर में चल रहे दमन घोर निंदा की। दर्शकों ने कहा- एक झूठ लगातार जनता के सामने टी.वी. और अख़बार के माद्धय से परोसा जाता है कि देश में लोकतंत्र है। लेकिन मणिपुर, छत्तीसगड़, लालगढ़ और देश के कई हिस्सों में राज्य और केन्द्र सरकार जो कर रही है, वह सब किसी भी लोकतांत्रिक देश में संभव नहीं है।
बिजूका फ़िल्म क्लब के चुनिंदा दर्शकों के लिए फ़िल्म ‘ टेल फ्रॉम द मॉर्जिन’ नौवीं प्रस्तुति थी। मणिपुर की समस्या पर शब्बर हुसैन, संदीप कुमार, रेहाना, डॉ. यामिनी, प्रत्युष, चेतन, कॉ. आफ़क़ ,कॉ. सत्यनारायण वर्मा, कॉ. राजेन्द्र केसरी, रोहित पटेल और सत्यनारायण पटेल आदि ने अपने विचार रखे।



सत्यनारायण पटेल
बिजूका फ़िल्म क्लब
एम-2/199, अयोध्या नगरी
इन्दौर-11, (म.प्र.),
09826091605,
ssattu2007@gmail.com

8 टिप्‍पणियां:

  1. अजीब बात है गुजरात में शोहराबुद्दीन और इशरत के मामले पर अपनी छातियां पीट पीट कर स्यापा करने वाली कांग्रेस यहां पर अपने मुंह पर उंगली रख कर चुपचाप बिल में सरक गये हैं

    कहां गये मोदी को मौत का सौदागर बताने वाले?

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  2. असल मे पावर एक ऐसी चीज है जिसके हाथ मे आते ही सब उसका दुरुपयोग ही करते है । कही कमानडो तो कही पुलिस सब रछक की जगह भछक की तरह ही काम करते है। आप उतनी दुर मणिपुर की बात कर रहें है मुम्बई मे एक पुलिस वाले ने तो बिच सडक पर बने एक पिकेट चौकी मे एक नाबालिक लडकी के साथ बलत्कार किया जिस वह पैसे एठने के लिए उसके पुरुस दोस्त के साथ ले आया था। यहा 1958 का कौन सा काला कानून लागु है। पुलिस आप के साथ कुछ भी कर सकती है वो भी देश के किसी भी कोने में यदि आप कमजोर तबके से हैं उसके लिए उसे किसी काले कानुन की जरुरत नही हैं। इस तरह तो हम सभी को हथियार उठा लेना चाहिए और आजादी की मांग करनी चाहिए। यह सरकार न हमे सुरझा देती है (जब चाहे कोई कसाब आ कर हमे मार सकता है )न सडक न बिजली न पानी न भर पेट दो वक्त की रोटी (आप को मालुम है देश मे कितने प्रतिशत लोग रात को खाली पेट सोते है और आज भी भुख से मौते हो रहीं हैं )सरकारी अस्पतालो में इलाज की जगह मिलती है लापरवाही और मौत। अब और कितनी समस्या आप को बताऊ व्यवस्था से परेसान देश का हर कमजोर तबका आजादी चाहता है। पर ये आजादी हम ले किससे। खराब और सड चुकि व्यवस्था से लडा जाता है और उसे ठीक किया जाता है। उससे अलग हो कर आजादी की मांग नहीं की जाती। हमसे आजादी ले कर पाकिस्तान की आज क्या हालत है आप देख रहें हैं और अपने ही पुर्वी पाकिस्तान के साथ उसने क्या किया और उससे आजाद हो कर बना बग्लादेश के क्या हाल है वो भी आप जानते होगे। दुसरे देशो के सह पर मणिपुर मे जो हो रहा है उसे आजादी की लडाई का नाम न दे। सरकारी तंत्र के दमन के खिलाफ वहा के लोग जो भी आनदोलन करे पुरा देश उनका साथ देगा यदि वह इस देश और हमे अपना माने।

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  3. dear sattu bhai,
    aapne jo likha hai wo suni sunao bato par adharit hai aur mere khayal se aapne manipur sirf TV par ya bharat ke nakshe par hi dekha hoga.
    mani pur ka aatankwad aur shesh bharat ka aatankwad do alag chije hai. waha commando force ko jo adhikar diya hai usi ki wajah se manipur ab tak desh se juda hai nahi to waha bhi jammu kashmir jaise halat ho jate. mujhe khed hai ki aap sikke ka ek hi paksh dekhte hai aur dusra nahi.
    aap itne ssare blog likhte hai aur masha allah hans me bhi chhapte hai lekin aapne koi bhi blog in aatankwadiyo ke pratikar karne par nahi likha. aur jis film ki bat aap kar rahe ho uski koi credibility nahi hai. Tehalka ka kam hi hai anti government jana aur usko isi bat ke paise miltye hai jaise rajendra yadav ki hans ko dalito ke bare me likhne ke, chahe usme kitni hi ghatiya kahaniya kyo na chhape.
    manipur ke bare me janana ho to ek bar manipur jaaiye aur 4-5 din ghum kar aaiye aur fir blog likhiyega.
    saadar

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  4. सूचना विस्फोट के इस दौर में मणिपुर केबारे में जानने या लिखने के लिए वहां जाना कितना जरूरी है क्या आपको नहीं पता. उक्त तर्क के आधार पर तो हमें गाँधी से लेकर मार्क्स तक किसी की चर्चा नहीं करनी चाहिए क्योंकि वे भी हमारे समकालीन नहीं हैं.
    बात केवल इतनी है साथियों अगर आपके परिवार में आप का अपना बेटा आप के साथ नहीं रहना चाहता तो कब तक उसे अपने साथ जोड़े रखा जा सकता है. मणि पुर हो या कश्मीर घाटी ये सामाजिक सांस्कृतिक भोगोलिक रूप से कभी भारत का हिस्सा नहीं थे और सच पूछिए तो उत्तर भारत के कुछ राज्यों को छोड़ कर आपका भारत कहाँ बसता है.

    आप को ६० साल कम लगते हैं किसीका दिल जीतने के लिए ?? तो बन्दूक के जोर पर तो आप हजार सालों में भी किसी को अपना बना नहीं सकते......

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  5. Dear Staym bhai,
    lal salam!
    Thanks for the initiative. I'm really glad to see your continuous support and solidarity to us. I'm sure with all your supports, one day we will get the justice. The following is my comments:


    Dear Satyam Bhai, Congratulations! for highlighting the issues of the exploited people and thanks for your solidarity to those people who are fighting for their right to live with dignity.
    Mr. Vishal, thanks for your wonderful comments on this write up. You behave as if you know very well Manipur, but you don’t know anything about Manipur. I feel sorry for you. Though, Satyam didn’t go to Manipur so far, he has the right information and knowledge about the place. I would like to request you, Mr, Vishal to go to Manipur (again, if you had already been there). Listen to those cries of mothers whose sons and daughters have been killed and their bodies even couldn’t find, to those cries of girls who have been raped, see the tears of those widows falling unendedly whose husbands have been killed in fake encounters, see the conditions of those mothers whose sons and daughters have been disappeared forcefully, watch those children who have been waiting in vain for their fathers’ coming back, see the conditions of youths who have become disable due to third degree torture of security forces. I don’t want to say anymore, just give a thought on this: even after more than fifty years of AFSPA (1958), why the number of insurgent groups have been on rising rather than decreasing. The Act was enacted to control insurgency in the region. Is the purpose served? And finally, insurgents might have a different demand, that is a different thing but the people of Manipur want to live with dignity. If those security forces who come there to protect the people are turning their guns to them, people of Manipur will not remain in silent.

    Please convey my lal salam to Comrade Vinit, Jaya and all other friends.

    In solidarity

    --
    Moirangthem Prakash
    Institute of Rural Mangement, Anand (IRMA)

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  6. dear bro,
    seen ur comments and some part of ur info may be correct but but but........
    who killed more ppl- soldiers/militant
    manipur will be happy- with india/china/mianmar
    kashmiri militants are- patriot of pakistan
    we (india) have done nothing for- manipur/kashmir
    lots of manipuri's are working in india- we behave with them as slave?
    moirangthm prakash pls tell me-
    is thr any nexus of militants, police and politicians of manipur/
    it is right that each family give?
    which family is preferring to get higher studies frm manipur?
    and why u r doing ur masters frm anand- u shud study in manipur and work for manipuri without building any nexus, and why u r calling them insurgent instead of militant.
    regards

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  7. Dear Vishal,

    Thanks for your responses and concern about Manipur. Your arguments are based on your presumptions only. One good example is that you presumed that I’m doing some masters course from Anand, which is totally wrong. I’m not a student here, I’m teaching here. Never analyse things on the basis of mere assumptions. I don’t want argue with you regarding who killed more people either by insurgents or security forces. Only facts will tell the truth. Here also you presumed only insurgents killed people. You are right because only those cases of insurgents’ attacks are reported in so-called national media. Other reports of massacre of innocent people by security forces never reported. People’s voice against security forces is the clear testimony of how security forces treat civilians. Security forces never distinguish between civilians and insurgents; all are insurgents in their eyes.

    I challenge you, how many of you treat we people from Northeast India as Indian. There is not even a single person from the region who didn’t face discrimination outside the region. We are tired of questions like, where do you come from? Why do you come to India? How do you come here? Do you need Visa to come here? Etc… Despite repeatedly saying that we are from northeastern part of India, they never treat us as fellow Indians. Here you are also saying, lots of manipuri's are working in india . What does it mean? It clearly shows that you also don’t think Manipur as a part of India. I would rather happy, if you said many manipuris are working in different parts of the country. That is why the alienation feeling is very common with these people. Hope, you can understand their feelings if they are treated step motherly. Thank you dear brother, at least you address me as brother.

    As far as studying outside Manipur is concerned, push factors are not the sole cause. There are many pull factors also. In this age of globalization, people go anywhere, where there are opportunities. Not only in India, many Manipuris are working in Europe, US and many other advanced countries.

    I’m writing this not an individual who wants to be separated from India. I just want to highlight how common people are suffered due to this conflict and what they want – to live with dignity like you. If you want to discuss on such issues, please do some study about Manipur and why there is such problem. Only after that I’ll respond to you.

    In solidarity


    Moirangthem Prakash
    Institute of Rural Mangement, Anand (IRMA)

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  8. Dear bro,
    seen ur balanced comments in responce to my comments.some part of it is correct and some have confusions. I visited manipur twice and faced lots of difficulties there. First of all I faced two militants who tried to tell me.........get out from here you bastard. another....some of my very good friend are from manipur since my college days. we eat,drink..........shared one room for years in fact two of my colleagues are from manipur. Lots of sharing done and I had a charm to visit Manipur.
    1. My comments are based on my experiences and sharing with friends. Yes you are right that anybody can work anywhere across india, they have right.
    2. Manipuri's feel alien in country(everybody asks them from where you are?) - this is just because manipuri ppl are look alike chinese or nepali or sikkim or tibet ppl so they ask. This is not to distinguish them. If distinguish is there then nobody can work as you also accepted that many manipuri ppl are working across India.
    3. military kills innocent ppl- some part may be true. If you build a huge dam for electricity and irrigation then some villages have to sacrifice.U can remember Punjab experience.
    4. Why Manipuri society is closed?


    As per your suggestion I will read/study Manipur. can you help me for this purpose?

    Regards

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