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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

लघु कथाएं : विजयदान देथा

आज हम मशहूर कहानीकार विजयदान देथा जी की दो लघु कहानियां दे रहे हैं। आप सब अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत करायें।

लेखक- विजयदान देथा
1. मेहनत का सार 

एक बार भोले शंकर ने दुनिया पर बड़ा भारी कोप किया। पार्वती को साक्षी बनाकर संकल्प किया कि जब तक यह दुष्ट दुनिया सुधरेगी नहीं, तब तक शंख नहीं बजाएँगे। शंकर भगवान शंख बजाएँ तो बरसात हो।

अकाल-दर-अकाल पड़े। पानी की बूँद तक नहीं बरसी। न किसी राजा के क्लेश व सन्ताप की सीमा रही न किसी रंक की। दुनिया में त्राहिमाम-त्राहिमाम मच गया। लोगों ने मुँह में तिनका दबाकर खूब ही प्रायश्चित किया, पर महादेव अपने प्रण से तनिक भी नहीं डिगे।
संजोग की बात ऐसी बनी कि एक दफा शंकर-पार्वती गगन में उड़ते जा रहे थे। उन्होंने एक अजीब ही दृश्य देखा कि एक किसान भरी दोपहरी जलती धूप में खेत की जुताई कर रहा है। पसीने में सराबोर, मगर आपनी धुन में मगन। जमीन पत्थर की तरह सख्त हो गई थी। फिर भी वह जी जोड़ मेहनत कर रहा था, जैसे कल-परसों ही बारिश हुई हो। उसकी आँखों और उसके पसीने की बूँदों से ऐसी ही आशा चू रही थी। भोले शंकर को बड़ा आश्चर्य हुआ कि पानी बरसे तो बरस बीते, तब यह मूर्ख क्या पागलपन कर रहा है!
शंकर-पार्वती विमान से नीचे उतरे। उससे पूछा, "अरे बावले! क्यूँ बेकार कष्ट उठा रहा है? सूखी धरती में केवल पसीने बहाने से ही खेती नहीं होती, बरसात का तो अब सपना भी दूभर है।"
किसान ने एक बार आँख उठा कर उनकी और देखा, और फिर हल चलाते-चलाते ही जवाब दिया, "हाँ, बिलकुल ठीक कह रहे हैं आप। मगर हल चलने का हुनर भूल न जाऊँ, इसलिए मैं हर साल इसी तरह पूरी लगन के साथ जुताई करता हूँ। जुताई करना भूल गया तो केवल वर्षा से ही गरज सरेगी! मेरी मेहनत का अपना आनंद भी तो है, फकत लोभ की खातिर मैं खेती नहीं करता।"
किसान के ये बोल कलेजे को पार करते हुए शंकर भगवान के मन में ठेठ गहरे बिंध गए, सोचने लगे, "मुझे भी शंख बजाए बरस बीत गए, कहीं शंख बजाना भूल तो नहीं गया! बस, उससे आगे सोचने की जरूरत ही उन्हें नहीं थी। खेत में खड़े-खड़े ही झोली से शंख निकला और जोर से फूँका। चारों ओर घटाएँ उमड़ पडीं - मतवाले हाथियों के सामान आकाश में गड़गड़ाहट पर गड़गड़ाहट गूँजने लगी और बेशुमार पानी बरसा - बेशुमार, जिसके स्वागत में किसान के पसीने की बूँदें पहले ही खेत में मौजूद थीं।

2.  ठाकुर का आसन 

गढ़ के बड़े चबूतरे पर संगमरमर के नक्काशीदार मयूरासन पर ठाकुर बैठा था। चबूतरे पर कश्मीरी गलीचा बिछा था।
पास ही फर्श पर चौधरी बैठा था। ठाकुर बिना बात ही भगवान जाने आज क्यों बहुत खुश था। मूँछों पर ताव देते हुए चौधरी ने मसखरी के सुर में कहा, 'चौधरी , मैं मयूरासन पर बैठा तो तू फर्श पर बैठ गया। अगर मैं फर्श पर बैठ जाऊँ तो तू कहाँ बैठेगा?'
चौधरी ने कहा, 'हुकम, आप फर्श पर विराजेंगे तो मैं चबूतरे के नीचे जमीन पर बैठूँगा। मुझे आपसे नीचे ही बैठना पड़ेगा।'
'तू नीचे ही बैठेगा इसके क्या माने? मैं फर्श पर बैठूँ तो तू कहाँ बैठेगा?'
चौधरी ने कहा, 'जमीन पर बैठें आपके दुश्मन। जमीन पर बैठने के लिए हमीं बहुत हैं। पिछले जनम में आपने अच्छे करम किए इसलिए आप के नीचे तो हमेशा आसन रहेगा।'
ठाकुर ने कहा, 'नहीं रे पगले, मान ले कभी ऐसा मौका आ जाए। तू टाल-मटोल मत कर, साफ-साफ बता! अगर मैं जमीन पर बैठा तो तू कहाँ बैठेगा?'
चौधरी मुस्कराकर बोला, 'हुकम, अगर आप जमीन पर बैठे तो मैं थोड़ा गड्ढा खोदकर नीचे बैठ जाऊँगा।'
ठाकुर ने पूछा, 'अगर मैं गड्ढे में बैठ गया तो तो तू कहाँ बैठेगा?'
चौधरी चक्कर में पड़ गया, सोचकर जबाव दिया, 'अगर आप गड्ढे में बैठे तो मैं थोड़ी मिट्टी हटा और नीचे बैठ जाऊँगा।'
'पर चौधरी, अगर मैं वहाँ बैठ गया तो तू कहाँ बैठेगा?'
चौधरी बोला, 'मैं उससे भी गहरे गड्ढे में बैठ जाऊँगा। आपका आसन तो हमेशा ऊँचा ही रहेगा सरकार!'
पर ठाकुर को तसल्ली नहीं हुई। कहा, 'पर चौधरी, मैं उस गहरे गड्ढे में बैठ गया तो तू कहाँ बैठेगा?'

इन बेहूदे सवालों से चौधरी तंग आ गया। ढीठता से बोला, 'मैं बार-बार कह रहा हूँ कि आप ऊपर ही विराजें, पर आप गहरे गड्ढे में ही बैठना चाहें तो आपकी मर्जी! मैं उसमें रेत डालकर ऊपर बड़ी शिला रख दूँगा।'

प्रस्तुति- बिजूका समूह
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टिप्पणियाँ:-

प्रणय कुमार:-
विजयदान देथा क़िस्सागो की शैली में अपनी बात कहने में बेजोड़ हैं,कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर बेजोड़ कथाकार!

आलोक बाजपेयी:-
देथा जी की कहानियां विश्लेषण के लिए अलग मापदंडो की मांग करती हैं। किसी भी आलोचक के लिए एक चुनौती हैं।
उनके लेखन , शिल्प, भाषा और विषय की ज़मीन कौन सी है। साथ ही उनकी लेखकीय पक्षधरता क्या है, इस पर भी देखना होगा।

जय:-
बिज्जी मौलिक लेखक नही ।उन्होंने लोककथा को मध्यम वर्ग के उपभोग हेतु मध्यम वर्ग के मुहावरे में ढाला है

आलोक बाजपेयी:-
साहित्य या किसी भी विधा में मौलिकता ढूंढना या उसका दावा बड़ा कठिन काम है। प्रश्न लेखक की सृजन छमता का है। raw material तो ज्यादातर स्व से प्रथक ही होता है।
मध्य वर्ग भी एक अनगढ़ सी कैटगोरी बन चुकी है क्योंकि वर्ग निर्धारण को मशीनी मार्क्सवादी अंदाज में किया जाना अपर्याप्त हो चुका है। फिर साहित्य कर्म और उसकी अपील प्रायः वर्गीय सीमाओ से परे चली ही जाती है।

जय:-
मै अपनी बेसिक मार्क्सवादी ट्रेनिंग के हवाले से साहित्य को मोटे तौर पर वर्ग विभाजित मानता हूँ
जब मै कहता हूँ उनकी रचना मौलिक नही है तो मेरा मतलब है वे लोककथा के प्रस्तोता है ।इसी रूप में उनका महत्व है

आलोक बाजपेयी:-
कही ऐसा तो नहीं कि लोक कथा मात्र उनकी शैली हो ?
ध्यान देने लायक यह बात भी है कि यदि लोक कथाएँ इतनी अधिक मात्रा में स्मृति चेतना में  उपलब्ध  रहीं तो किसी अन्य रचनाकार ने उन्हें क्यों नहीं अपनाया।
हो सकता है मैं कुतर्क पर उतार आया होऊं।

सुषमा अवधूत :-
Badhi ya kahaniya
Sahi hai manav ko hamesha karm karna chahiye
Dusri bhi badhiya end mast

उदय अनुज:-विजयदान देथा इसीलिये जाने जाते हैं। उन्होंने लोक कथाओं के प्रसंगों को मानवीय सम्वेदनाओं और जीवन सरोकारों से जोडकर उस किस्सा गोई को एक नया रूप दिया है।

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