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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

दिसम्बर की सर्दी में तेरा जाना, यार..उपेन… कुछ जँचा नहीं

दिसम्बर की सर्दी में तेरा जाना, यार..उपेन… कुछ जँचा

ये भिन्न-भिन्न बोलियाँ / ये लाठियाँ, ये गोलियाँ

यह उपेन्द्र मिश्र की कविता की पंक्तियाँ हैं। उपेन्द्र मिश्र मुझसे तक़रीबन चौदह-पन्द्रह बरस बड़ा था। लेकिन हमारी मित्रता में उम्र कभी आड़े नहीं आयी। हम जब भी मिलते थे, समान उम्र दोस्तों की ही मानिंद मिलते थे। संदीप नाईक, राजेन्द्र बन्धु, और उपेन्द्र मिश्र देवास में ही रहते थे। मैं और बहादुर पटेल अपने गाँव लोहार पिपल्या में रहते थे। लोहार पिपल्या देवास से नौ किलो.मी. दूर आगरा-बाम्बे मार्ग के किनारे क्षिप्रा से एक किलो.मी पहले है।

जब शुरुआत में उपेन्द्र मिला था। वह देवास में वहाँ से आया था, जहाँ जमाने भर से लोग जाते हैं, यानी कि वह बम्बई से नया-नया देवास में आया था। लेकिन असल में उत्तर प्रदेश का था, उसके भइय्यन और बम्बइया दोनों ही लटके-झटके शामिल थे। वह पत्रकार और भाभी सरकारी कॉलेज में प्रोफेसर थी। शायद वही मुख्य वजह थी कि वह देवास आ गया था।
दोस्ती की शुरुआत के बाद हमें आपस में घुलने-मिलने में ख़ासा वक़्त नहीं लगा। लगभग रोज़ का मिलना। शाम ढ़लने तक एकलव्य की लायब्रेरी में और रात को बस स्टैण्ड के आसपास किसी जगह पर। कभी संदीप के कमरे पर । कभी बी.बी. श्रीवास्तव के आफिस पर, जो अब साधु बन गया है और काला कुन्ड के जंगल में अपना आश्रम खोलकर बैठा है। कभी-कभी जब हम देवास नहीं जाते। इनमें से कोई न कोई हमारे गाँव आ जाते। जब मैं क्षिप्रा में फोटो स्टूडियो पर बैठने लगा, तो उस पर भी चले आते। बी.बी तो देवास साइकिल ही से क्षिप्रा आता। वहाँ भी अपनी कहानी या कविता सुनते-सुनाते।

एकलव्य राधागंज, देवास में महीने की हर पाँच तारीख को गोष्ठी किया करते। जिसमें सब अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ करते। प्रकाश कांतजी के बाल तब एक दम काले और घने थे और वे अरलावदा से आते थे। जीवन सिंहजी के सिर पर तब बालों का इतना ज़्यादा टोटा नहीं था। प्रकाश कांतजी, जीवन सिंहजी, हमसे उम्र में काफी बड़े थे, और हमारे लिए तो बड़े अचम्बे भी थे, क्योंकि देवास में सबसे ज़्यादा बाहर के पत्र-पत्रिकाओं में यही दोनों छपते थे। इनसे दोस्ती वाला मामला नहीं था। एक आदर और लिहाज वाला तआरूफ़ था। अब जैसा घर आना-जाना पहले न था, गोष्ठियों में ही मिलते थे। लेकिन हम जो बारह-पन्द्रह बरस आपस में छोटे-बड़े थे, हमारा एक टुल्लर था, जिसमें बाद में मनीष वैद्य भी शामिल हुआ। इसके अलावा लिखने-पढ़ने वालों में मालवी बोली के महत्त्वपूर्ण कवियों मदन मोहनजी, नगजीराम साथी से भी मिलना-जुलना गोष्ठियों में हीहुआ करता था। अच्छा.... हाँ.. एक बात और…. दुर्गा उत्सव, गणपति उत्सव के मौक़ों पर और कई बार केवल कविता के ही मौक़े पर हम गाँवों में साइकिल से कविता पाठ के लिये जाते थे। और बड़े लटके-झटकों के साथ मंच से कविता पढ़ते थे।

फिर कब उपेन्द्र से वह उपेन हो गया याद नहीं। काली-उजली रात, सूर्या होटल, रूपाली ढाबा, प्रेस्टीज होटल और फिर चामुन्डा की टेकड़ी पर की बैठकों ने हमें शहर के प्रेस्टीज वालों से अलग एक ही थैली के चट्टे-बट्टे बना दिये । हँस में राजेन्द्र यादव ने न लिखने के कारण लिखा तो उपेन ने हँस के भीच बहस में न लिखने के कारण का कारण लिखा। निडरजी के घर के ओटले पर, घन्टाघर, नगर निवास सिनेमा के सामने या कहीं भी कभी भी महफिल जमती तो सारे चट्टे-बट्टे हाज़िर हो जाते।
6 दिसम्बर 1992 के बाद इन्हीं सब चट्टों-बट्टों से दूर होकर 35 कि.मी. दूर मैं इन्दौर में नौकरी करने आ गया था। फिर इन्दौर से ठेट बम्बई जितनी दूर ग्वालियर के तिघरा पी.टी.एस. में प्रशिक्षण के लिए जा फँसा था। लेकिन दिल के तार सबसे जुड़े थे, ख़त लिखना-भेजना भी चलता था। ग्वालियर लौटने के बाद मैं इन्दौर प्रलेसं से जुड़ा था। फिर विवेक भाई को पटा-पुटुकर देवास में भी प्रलेसं की इकाई बनवायी थी। ‘एक दिन कहानी पर’ आयोजन किया था। बहादुर पटेल, उपेन, सबने दौड़-दौड़कर काम किया था। आयोजन में भालचन्द्र जोशी, दिलीप सिंह पवांर, संदीप नाईक, मनीष वैद्य ने अपनी-अपनी कहानी पढ़ी थी। तब तक ऎसे महत्त्वपूर्ण और चन्द्रकांत देवताले, कमला प्रसाद जैसे नरे बड़े-बड़े लोगों के बीच पढ़ने लायक मेरे पास तो कहानी ही नहीं थी, तब मैं ज़्यादातर कविताएँ और लघुकथाएँ ही लिखता था, हालाँकि एक-दो कहानी इन्दौर से निकलने वाले अख़बार में आ चुकी थी। उस आयोजन में ही प्रलेसं देवास इकाई गठन हुआ। उस दिन बहादुर को प्रलेसं देवास इकाई का सचिव बनाया गया, दूसरे टर्न में उपेन देवास इकाई का सचिव बना। उपेन के समय में चाल थोड़ी धीमी थी, लेकिन कभी काम रुका नहीं।

उपेन के जाने से पहले प्रलेसं, देवास इकाई का मनीष वैद्य सचिव और बहादुर अध्यक्ष था। ये दोनों भी पट्ठे भिड़े रहते थे, जैसा तै हो जाता करने लगते। कभी नहीं नटते। क्योंकि एक भरोसा था, एक उत्साह था और प्रतिबद्धाता थी एक ख़ास विचारधारा के प्रति। लेकिन फिर जब इनके सामने विचारधारा की दलाली करने वालों की पोल खुली, प्रलेसं देवास और इन्दौर इकाई औंधे मुँह जा गिरी।

उपेन ने अपने देवास के शुरुआती दिनों में स्थानीय अख़बारों में काम किया। सुदामाप्रसादजी की रचनाओं का समग्र- शेषःनिशेष संपादन किया था। उपेन पी. यू. सी. एल. से भी जुड़ा हुआ था। मेधा पाटकर को बुला देवास में नर्बदा के मुद्दे पर व्याख्यान करवाना हो। हरसूद के मुद्दे पर सिल्वी और आलोक को बुलाकर बैठक करवाना हो। मेंहदीखेड़ा गोली कांड को लेकर जो भी भाग दौड़ करनी हो। साम्प्रदायिकता का मसला हो, कुछ और उपेन कभी पिछे नहीं हटता। फिर उपेन काफी समय से स्वतंत्र पत्रकारिता ही कर रहा था। पिछले दो-तीन सालों से उस पर एक ही धुन सवार थी, वह थी देवास नगर निगम द्वारा किये गये कुछ महत्त्वपूर्ण घपलों को उजागर करने की। उसने कुछ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज भी जुटाये थे। नगर निगम देवास के भू माफिया और नगर निगम में बैठने वाले सफ़ेद पोश उसे अपना दुश्मन ही समझने लगे थे। धमकी, गाली-गलोच और धक्का-मुक्की से भी जब उपेन नहीं माना और भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले रखा, तो भ्रष्टाचारियों ने उस पर प्राण घातक हमला करवाया। वह गंभीर घायल हुआ। कुछ महीने प्लास्टर और पट्टियाँ बंधी रही। एक हाथ टूटने की वजह से स्कूटर नहीं चला पा रहा था, लेकिन पाँव साबुत थे। पैदल, बस और आॉटो से भाग-दौड़ करता था। भ्रष्टाचारियों के ख़िलाफ़ पूरा मामला देवास कोर्ट में ले गया था, लेकिन जैसा कि हमारे यहाँ न्याय नाम की चिड़िया आसानी से दिखाई नहीं पड़ती है। वह अभी उपेन को भी नज़र नहीं आयी थी। वह उन दिनों दो-तीन बार मेरे पास इन्दौर आया था। जब वह बस उतर मुझे फ़ोन कर बुलाता और मैं उसके पास जाता। वह सड़क किनारे खड़ा प्लास्टर चढ़े एक हाथ को गले में झूलती धोली डोरी में रखे और दूसरे हाथ में तमाम दस्तावेज से भरी प्लास्टिक की थैली लिये मिलता।

उन दिनों उसे दोस्तो से ही नहीं, उन संगठनों से भी उम्मीद थी, जिनके लिये वह सर्दी-गर्मी में दौड़-भाग करने से कभी नहीं नटता था। उसने जिन लोगों से मुझे उसकी मदद करने के बाबद बात करने को कहा, मैंने उनसे की भी। वे मेरी तुलना में उसकी मदद मुझसे बेहतर करने की स्थिति में भी थे। लेकिन उन्होंने उसकी मदद करने में कोई रुचि नहीं दिखायी। उनका अपनी अभिजात्य क़िसिम की व्यस्तताएँ थी, या केवल बताने भर को थी। मैं वस्तुस्थिति से अवगत था।
मैं उसे अपनी बाइक पर बैठाल कर अपने स्तर पर इस अख़बार के दफ़्तर गया, उस अख़बार के दफ़्तर गया। लेकिन भ्रष्ट देव देश के हर कोने में पाया जाता है जनाब। भ्रष्ट देव के कई बार दर्शन हुए। कुछ ने आसवासन दिया, किसी ने कुछ थोड़ा-बहुत छापा भी। लेकिन अख़बारों के लिए विग्यापन बड़ा चढ़ावा होता है। अतः जितनी मदद उसे चाहिए थी उतनी नहीं मिल सकी। उपेन के पास आने वाली धमकियों का ताँता कभी नहीं टूटा। लेकिन वह लड़ता रहा। लम्बी लड़ाई में अकेला पड़ता गया। शायद यही वजह थी कि कभी कम-ज़्यादा पी भी लेता। इन सब बातों के बावजूद वह किसी भी सूरत में शारीरीक रूप से ऎसा कमज़ोर नहीं था कि अचानक बाट पकड़ लेगा। मैं तो बाट देख रहा था, कि उपेन ज़ल्द इन टंटों से निज़ात पाकर उपन्यास पूरा करेगा।

हाँजी… दोस्तो में भी बहुत कम लोग जानते होंगे कि उपेन ने एक उपन्यास लिखना शुरू किया था। उसने मेरे साथ उपन्यास का कथानक जितना बाँटा था, मुझे अच्छा लगा था। दो-तीन बरस तक तो मैं छेदा धरता रहा। जब भी अकेला मिलता, कहता उसे लिख डालो। उसे पढ़ने की भूख बढ़ती जा रही है। लेकिन वह दूसरे-दूसरे मामलों में उलझता रहा। मेरी भी व्यस्तताएँ कम नहीं थीं, उपन्यास लिखवाने का तगादा कम पड़ता गया। उपेन कई कामों के साथ एक अधूरा उपन्यास भी छोड़ गया। आधा-अधूरा लिखा तो था, पर अब क्या मालूम कि पाँडुलिपी को कहीं अवेर के रख छोड़ गया है कि बोतल में भर देवास के मीठे तालाब में बहा गया है।

एक दिन बहादुर ने बताया कि उपेन को पिलिया हो गया है। बाम्बे हॉस्पीटल में भर्ती है। मुझे हँसी आयी थी। ख़ुद से कहा था- बहादुर को पता नहीं, पिलिया को उपेन हो गया होगा। और फिर पिलिया भी कोई ऎसी बीमारी है, जिसके लिए बाम्बे हॉस्पीटल में भर्ती होना पड़े। मेरे दायजी को पिलिया हुआ, बई को हुआ, दोनों बच्चों को हुआ, उनके लिए या और भी किसी के लिए दवा लानी पड़ती, तो मैं अलका-ज्योति सिनेमा की बग़ल वाली मिठाई की दुकान से पाव भर पेड़े लेकर इन्दौर सेन्ट्रल जेल रोड पर स्थित उस दुकान पर पहुँच जाता, जिसमें काला चश्मा लगाये और हाथ में बग़ैर मूठ का डन्डा लिये एक डोकरा बैठे होते। डोकरा बा पेड़ा में दवा मिलाकर सात ख़ुराक बना देते। वही सबको खिलाई और सभी ठीक हुए। लेकिन उपेन का पिलिया इतना नामी अस्पताल ठीक नहीं कर सका। उपेन को बम्बई रेफर किया गया।

और फिर बम्बई से तो वह आया ही था। वहाँ उसने अपने छात्र जीवन में स्टूडेन्ट फेडरेशन के साथ काफी काम किया था। अख़बारों से भी जुड़ा था। उसकी पूरी एक मण्डली थी वहाँ भी। देवास और बम्बई दोनों जगह की मण्डलियों को उससे काफी उम्मीद थी। पचास बरस भी कोई जाने की उम्र थी, और वह भी पिलिया जैसी ओछी बीमारी के बहाने से…! यार…..उपेन कुछ जँचा नहीं। पता नहीं तुझे मालूम होगा कि नहीं.. तुझे बताऊँ भी कैसे ! तेरे होते जिनकी निंद नागझीरी के केदार खो तरफ़ भाग गयी थी, उन्होंने तेरे जाने की ख़बर सुन, दाँत पिल्का..पिल्काकर देवास में मीठाई बाँटी यार…। अच्छा हुआ स्साला…. रास्ते का काँटा हट गया, उन्होंने कहकर एक दूसरे के हथेली पर हथेली मार ताली बजायी।

और मैं कितना बेबस..कितना पंगु और लाचार….. चाहकर भी उन एडीडॉस के जूते पहनने वालों, पान,पाउच और ज़र्दे से हुए उन काले-पीले दाँतों वालों का एक दाँत भी अपनी पनही से नहीं तोड़ सकता। काश मेरे पास टेप रेकार्डर की तरह की कोई मशीन होती, जिसे रिमाइन्ड कर सकता, तो मैं उसे अपनी पहली मुलाक़ात यानी एकलव्य की पाँच तारीख वाली गोष्ठी तक रिमाइन्ड करता। और फिर.. फिर.. करता। और वही.. वही सुनता- ये भिन्न-भिन्न बोलियाँ / ये लाठियाँ, ये गोलियाँ।
मैं जानता हूँ। उपेन तुम्हारी कविता अलाने-फलाने की तुलना में पासंग भी नहीं। लेकिन जिस रात मैंने तुम्हारी यह कविता सुनी थी, उस रात मुझे वह एक ख़ूबसूरत कविता लगी थी और तब मैं ज़्यादा कवियों को जानता भी नहीं था।
सत्यनारायण पटेल
14. 01. 2010

4 टिप्‍पणियां:

  1. उपेन के न रहने से हमारे समय की बड़ी क्षति हुई है. मैं उन्हेम तो नहीं जानता था, लेकिन जीवन सिंह जी, प्रकाश कांत जी, संदीप नाइक सभी से कभी न कभी मिला हूं और लगता रहा है कि हिंदी लेखक समाज की सारी खामियों के बावज़ूद कहीं न कहीं सभी एक समानता और न्याय-पूर्ण समाज को बनाने के संघर्ष और चिंता में लगे हुए लोग हैं. जैसा आपने उपेन के बारे में लिखा है, वह उन्हें हमारे और करीब करता है. क्या कहें....हम सब अब कम होते जा रहे हैं.
    यह बहुत उदास और हताश करने वाली सूचना थी. उनके बारे में और लिखें...

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  2. satyanarayan upen ke jane par tumane bahut dil se likha. upen ka jana hamare liye dukhad hai.
    srdhanjali.

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