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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

नयी पहल

सुरेश सेन निशांत का जन्मः 12 अगस्त 1959 हुआ। 1986 से लिखना शुरू किया.. लगभग पाँच साल तक ग़ज़लें लिखते रहे। तभी उन्हें एक मित्र ने ‘पहल’ पढ़ने को दी। पहल से मिलना, उसे पढ़ना उनके जीवन बहुत ही अद्भुत अनुभव रहा। इसी दरमियान कविता को पढ़ने की समझ बनी। उन्होंने 1992 से कविता लिखना शुरू किया। हाल ही में कुछ कविताएँ पहल, हंस, कथाक्रम, आलोचना, कथादेश कृतिओर, सूत्रा, सर्वनाम, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, लमही, समकालीन भारतीय साहित्य, वागर्थ, परिकथा, बया, आधारशीला आदि देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में निशान्त की कविताएँ प्रकाशित होती रहती है।

निशान्त ने दसवीं तक पढ़ाई के बाद विद्युत संकाय में डिप्लोमा किया और वर्तमान में कनिष्ठ अभियंता के पद पर कार्यरत हैं। निशान्त को पहला प्रफुल्ल स्मृति सम्मान, सूत्रा सम्मान 2008 आदि प्राप्त हुए हैं, उनका पहला कविता संग्रहः वे जो लकड़हारे नहीं हैं, अंतिका प्रकाशन ग़ाज़ियाबाद से 2010 में प्रकाशित हो चुका है। उन्होंने आकण्ठ पत्रिका के अगस्त -2010; हिमाचल समकालीन कविता विशेषांक का सम्पादन भी किया है। हाल में सुरेश सेन निशांत गाँव सलाह, डा. सुन्दर नगर-1,ज़िला मण्डी, हि.प्र. 174401 में रहते हैं। यहाँ हम निशान्त की दस कविताएँ प्रकाशित कर रहे हैं। इन दस कविताओं पर इन्दौर के ही युवा कवि श्री प्रदीप मिश्र की टिप्पणी भी प्रकाशित कई जा रही है। पाठकों की टिप्पणी भी निशान्त के लिए महत्त्वपूर्ण होगी।


श्री प्रदीप मिश्र की टिप्पणी

इन कविताओं को पढ़ते हुए एक मुकम्मल कवि की बेचैनी का अहसास होता है। कवि का वर्तमान हिन्दी कविता के सफर और जरूरत की पूरी जानकारी है। वह मुख्य धारा से क़दमताल में सक्षम है तो भविष्य में कविता को मनुष्य के जीवन के लिए एक जरूरी औजार सिद्ध करने का विवेक रखता है। इसलिए इतनी अच्छी कविताओं के लिए बधाई। अगर एक – इन कविता पर बात करें तो -

मुड़ा-तुड़ा नोट में कविता में पूंजी और हमारे जीवन के सम्बन्ध और उसकी सीमाओं को लेकर बहुत अच्छी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। कवि जब कहता है - लड़ सकती थी माँ / अपने बुरे दिनों से या इतना बड़ा नोट / इतना छोटा मेला। तो कवि का जीवन विवेक साफ़-साफ़ समझ में आता है। आज के पूंजी घमासान में यह कविता मनुष्यता के पक्ष में खड़ी ताक़त की तरह है।

इस वृक्ष के पास- कविता के पड़ते हुए स्त्री समाज से हमारा जुड़ना होता है और कविता के माध्यम से हम स्त्री शक्ति से परिचित होते हैं। कविता में कुछ ख़ास नया नहीं है, इस तरह के कथ्य और भी जगहों पर उपलब्ध मिल जाऐंगे लेकिन अपने शिल्प विधान के कारण कविता अस्तित्व ग्रहण करती है। कविता में रत शब्द का प्रयोग पहले प्रार्थना के लिए किया गया है। लेकिन दुबारा जब यहाँ पर होता है -एक औरत और ईश्वर / रत है बातचीत में तो भावविन्याश गड़बड़ी हो जाती है। यहाँ पर कवि से कुछ संशोधन की अपेक्षा बनती है।

माँ की कोख में- कविता के पड़ते हुए माँ और उसके गर्भ में पल रहे शिशु का आंतरिक संबन्ध और भावों की श्रृँखला दिखाई देती है। यहाँ पर फूलों का संदर्भ दो बार आता है - एक खिलता हुआ फूल / याद आता है माँ को तथा हिलता है बच्चा / सैकड़ों फूलों की ख़ुशबू / हज़ारों पेड़ों का हरापन / अनन्त झरनों का पानी / अपने आँचल से / उड़ेल देती है माँ / ज़िन्दगी के सीने में । इस दुहराव से बचना चाहिए।

सेब- एक औसत कविता है। मुझे लगता है कवि जिस प्रतीक विधान में काम करते हुए अपने मूल्यू अर्जित कर रहा है। वहाँ पर और गहन महत्वपूर्ण प्राप्त हो सकता है।

पीठ- एक आख्यान मूलक कविता है। इस कविता के माध्यम से कवि बचपन में ही काम पर लग जानेवाले बच्चों का स्थिति पर बात करता है। यह विषय कविता के इस कलेवर में पर्याप्त बार प्रयुक्त हो चुका है, अतः बहुत अलग और अनूठे की अपेक्ष नहीं की जा सकती है। लेकिन कवि की कविता यात्रा की महत्त्वपूर्ण कड़ी की तरह इस कविता को देखा जा सकता है। इन पंक्तियों में इस थकी पीठ को / अपने आँसुओं से देती है टकोर एक माँ / एक छोटी बहिन तथा इस पीठ पर / कभी-कभी उपड़े होते हैं / बेत की मार के गहरे नीले निशान। टकोर और उपड़े शब्दों का प्रयोग किया गया है। ये हिन्दी को शब्द नहीं हैं और देशज शब्दों के प्रयोग की जरूरत इन जगहों पर नहीं है।

काग़ज़- बहुत अच्छी कविता है। शिल्प और आख्यान का संतुलन कविता को संप्रेषणीय बनाता है। काग़ज़ के माध्यम से अपने समय के दृश्य को पूरे जीवन विवेक के साथ उद्घाटित किया गया है। कविता के अंत में कवि कहता है - एक बच्चा बनाएगा कश्ती / और सात समन्दर पार की / यात्रा पे निकल जाएगा । यहाँ पर मुझे कविता के कलेवर में अपेक्षानुरूप भावार्थ संचित होता हुआ नहीं दिख रहा है। कहीं अंदर इसमें पलायन की ध्वनि भी सृजित होती है। जबकि कविता अपनी संरचना में संघर्षशील जीवन विवेक के साथ उठती दिखाई दे रही है।
देश कोई रिक्शा तो है नहीं- साइकिल रिक्शा कहें तो ज्यादा ठीक तरह से बात बनेगी। इस कविता को बहुत अच्छे कोण से पकड़ा है और सटीक संरचना के साथ कविता आगे बढ़ती है। कविता में कुछ चीज़ें समझ में नहीं आयीं जैसे यहाँ पर दुनके का अर्थ क्या उनके दुनके में / रत्ती भर भी योगदान है सरकार का, एक जगह सेज शब्द का प्रयोग हुआ है जो अलग अर्थ दे रहा है।

हम बहुत अच्छी कविता है, कविता के इस अंश में निर्वाह की समस्या दिखाई देती है - ध्यान रहे हम / डंक भी मारते हैं / ज़हर बुझा डंक / कोई यूँ ही हमारे छत्ते पे / मारे अगर पत्थर / वैसे हम मधुमक्खियाँ भर नहीं। मुझे लगता है कविता डंक भी मारते हैं पर समाप्त हो जाती है।

बीज एक अच्छी कविता हो सकती है। इसको ठीक से सम्पादित करने की ज़रूरत है। जैसे तुम्हारा सबसे बड़ा सखा / बीज हूँ मैं यहाँ पर दूसरी लाइन की बीज हूँ शब्द को हटा देने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
मैं हूँ तो / सजते रहेंगे गाँव हाट में / छोटी-छोटी ख़ुशियों के मेले तथा मैं हूँ तो / ज़रा-सा भीगने पर / पुलक से भर जाती है / परती धरती इन दोनों बन्धों में दुहराव है। अगर पूरा भी निकाल दिया तो कविता में बात पूरा होती है। घुणों की जगह घुन शब्द आना चाहिए। इस वाक्य में दी का अर्थ समझ में नहीं आया- मैं हूँ तो / हरी रहेगी तुम्हारी दी । इस कविता का अंत बहुत ही अच्छा किया है उसे देखना चाहिए - बीज हूँ मैं / मुझे मत बिसराना / किसी लालच में पड़कर / गिरवी मत रखना / मैं तुम्हारा ईमान हूँ।
इस कवि की सारी कविताओं को पढ़ते हुए कविता के भविष्य को प्रति एक अच्छी आस्था
बनती है। लेकिन शब्दो के प्रयोग और उनके पर्याय को पकड़ने के में रियाज़ कमा दिखाई देती है।
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श्री सुरेश सेन निशान्त की कविताएँ

मुड़ा-तुड़ा नोट
वह मुड़ा-तुड़ा नोट
एक रुपये का
अब भी है
मेरे बचपन की
स्मृतियों की जेब में सुरक्षित ।

वह मुड़ा-तुड़ा नोट
जिसमें गन्ध थी रची-बसी
माँ के पसीने की
जिसमें क्षमता थी इतनी
लड़ सकती थी माँ
अपने बुरे दिनों से ।

मेरे ज़िद करने पर जिसे
अपने दुपट्टे की गाँठ से
खोल दिया था माँ ने
उत्साह से लबालब
ख़ुशी के घोड़े पे सवार
सरपट
निकल पड़ा था
गाँव के मेले में मैं
इतना बड़ा नोट
इतना छोटा मेला
इतना थोड़ा था सामान
दुकानों के मेले की
पूरा मेला घूम-घाम कर
लौट आया मैं
जेब में सुरक्षित लिये
मुड़ा-तुड़ा नोट ।
घर में ख़ूब हंसी थी बड़ी बहिनें
चुपके से रोई थी माँ
अब दूर है माँ
उनकी हंसी और उदासी
दूर है ।

बहुत पास है मेरे
और मुड़ा-तुड़ा नोट
एक रुपये का
अब भी
मेरे बचपन की
स्मृतियों की जेब में सुरक्षित ।
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इस वृक्ष के पास

चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
प्रार्थना में रत है यहाँ एक औरत
उसे विश्वास है
इस वृक्ष में बसते हैं देवता
और वे सुन रहे हैं उसकी आवाज़।

एक औरत और ईश्वर
रत है बातचीत में
चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
ऎसा कौतुक
एक औरत ही रच सकती है
जो ईश्वर को स्वर्ग से उतार कर
एक वृक्ष की आत्मा में बसा दे ।

चिड़ियों की चहचहाहट
हवाओं की सरसराहट
कुछ भी नहीं सुनाई दे रहा है उसे
सिवाय अपने ह्रदय की धड़कनों के
सिवाय अपनी प्रार्थना के ।

वृक्ष के हरे पत्ते
तालियों की तरह बजते हुए
दे रहे हैं उसे आश्वासन
कि उठो माँ
सुन ली है ईश्वर ने तुम्हारी प्रार्थना ।

मंदिर और मस्ज़िद से दूर
उनकी घंटियों और अजानों
से बहुत दूर
प्रार्थना में रत है एक औरत
चुपचाप गुज़रो
इस वृक्ष के पास से
000



माँ की कोख में

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
एक खिलता हुआ फूल
याद आता है माँ को ।

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा

आसमाँ में उड़ती चिड़िया पे
बहुत प्यार आता है माँ को

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा

मछली-सी तैरती जाती है
ख़्यालों के समन्दर में माँ
अपने बच्चे के संग-संग



माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
सैकड़ों फूलों की ख़ुशबू
हज़ारों पेड़ों का हरापन
अनन्त झरनों का पानी
अपने आँचल से
उड़ेल देती है माँ
ज़िन्दगी के सीने में ।

माँ की कोख में
हिलता है बच्चा
पृथ्वी के सीने में भी
उतर आता है दूध
फैल जाता है हरापन
खिलते हैं फूल
निखरती है ख़ुशी ।
000


सेब


सेब नहीं चिट्ठी है
पहाड़ों से भेजी है हमने
अपनी कुशलता की

सुदूर बैठे आप
जब भी चखते हैं यह फल
चिड़िया की चहचहाहट
पहाड़ों का संगीत
धरती की ख़ुशी और हमारा प्यार
अनायास ही पहुँच जाता है आप तक

भिगो देता है
ज़िस्म के पोर-पोर।

कहती है इसकी मिठास
बहुत पुरानी और एक-सी है
इस जीवन को ख़ुशनुमा बनाने की
हमारी ललक ।
बहुत पुरानी और एक-सी है
हमारी आँखों में बैठे इस जल में
झिलमिलाती प्यार भरी इच्छाएँ ।

पहाड़ों से हमने
अपने पसीने की स्याही से
खुरदरे हाथों से
लिखी है यह चिट्ठी
कि बहुत पुराने और एक-से हैं
हमारे और आपके दुख
तथा दुश्मनों के चेहरे

बहुत पुरानी और एक-सी है
हमारी खुद्दारी और हठ

धरती के हल की फाल से नहीं
अपने मज़बूत इरादों की नोक से
बनाते हैं हम उर्वरा ।

उकेरे हैं इस चिट्ठी में हमने
धरती के सबसे प्यारे रंग
भरी है सूरज की किरणों की मुस्कान
दुर्गम पहाड़ों से
हर बरस भेजते हैं हम चिट्ठी
संदेशा अपनी कुशलता का
सेब नहीं
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पीठ


यह दस वर्ष के लड़के की पीठ है
पीठ कहाँ हरी दूब से सजा
खेल का मैदान है
जहाँ खेलते हैं दिन भर छोटे-छोटे बच्चे

इस पीठ पर
नहीं है किताबों से भरे
बस्ते का बोझ
इस पीठ को
नहीं करती मालिश माताएँ
इस पीठ को नहीं थपथपाते हैं उनके पिता
इस दस बरस की नाजुक-सी पीठ पर है
विधवा माँ और
दो छोटे भाइयों का भारी बोझ
रात गहरी नींद में
इस थकी पीठ को
अपने आँसुओं से देती है टकोर एक माँ
एक छोटी बहिन

अपनी नन्हीं ऊँगलियों से
करती है मालिश
सुबह-सुबह भरी रहती है
उत्साह से पीठ

इस पीठ पर
कभी-कभी उपड़े होते हैं
बेत की मार के गहरे नीले निशान
इस पीठ पर
प्यार से हाथ फेरो
तो कोई भी सुन सकता है
दबी हुई सिसकियाँ

इतना सब कुछ होने के बावजूद
यह पीठ बड़ी हो रही है

यह पीठ चौड़ी हो रही है
यह पीठ ज्यादा बोझा उठाना सीख रही है

उम्र के साथ-साथ
यह पीठ कमज़ोर भी होने लगेगी
टेड़ी होने लगेगी ज़िन्दगी के बोझ से
एक दिन नहीं खेल पाएँगे इस पर बच्चे

एक दिन ठीक से घोड़ा नहीं बन पाएगी
होगी तकलीफ़ बच्चों को
इस पीठ पर सवारी करने में

वे प्यार से समझाएँगे इस पीठ को
कि घर जाओ और आराम करो
अब आराम करने की उम्र है तुम्हारी
और मंगवा लेंगे
उसके दस बरस के बेटे की पीठ
वह कोमल होगी
ख़ूब हरी होगी
जिस पर खेल सकेंगे
मज़े से उनके बच्चे
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काग़ज़


इस काग़ज़ पर
एक बच्चा सीखेगा ककहरा
एक माँ की उम्मीदें
इस काग़ज़ पर उतरेंगी
चिड़िया की तरह
दाना चुगने के लिए

एक पिता देखेगा
अपने संग बच्चे का भविष्य
संवरता हुआ

इस काग़ज़ पर सचमुच
एक लड़का सीखेगा ककहरा

एक कवि लिखेगा कविताएँ
इस काग़ज़ पर
एक-एक शब्द को लाएगा
गहन अंधेरों से ढूँढकर

हज़ारों प्रकाश वर्ष की दूरी
तय करेगा इस छोटे से काग़ज़ पर
अपनी चेतना की
रौशनाई के सहारे
एक-एक पंक्ति को
कई-कई बार लिखेगा
तपेगा दुख की भट्टी में
कितने ही रत जगे होंगे उसके
इस काग़ज़ के भीतर
सदियों बाद भी
किसी कबीर का
तपा निखरा चेहरा झाँकता मिलेगा
इसी तरह के किसी काग़ज़ पे

इस काग़ज़ पर
लिखे जाएँगे अध्यादेश भी

इस काग़ज़ पर
कोई न्यायाधीश
लिख देगा अपना निर्णय
क़ानून की किसी धारा के तहत

और सो जाएगा
मज़े से गहरी नींद

इस काग़ज़ पर
एक औरत लिखना चाहेगी
अपने मन और ज़िस्म पे हुए
अनाचार की कथा

इस काग़ज़ पर
एक दूरदर्शी संत लिखेगा उपदेश
जिन पे वह ख़ुद कभी भी
नहीं करेगा अमल

एक मज़दूर लिखेगा चिट्ठी
इस काग़ज़ पर
अपने घर अपनी कुशलता की
आधी सदी के बाद भी
किसी स्त्री के संदूक में
सुरक्षित मिलेगा यह काग़ज़

इस काग़ज़ से
एक बच्चा बनाएगा कश्ती
और सात समन्दर पार की
यात्रा पे निकल जाएगा
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देश कोई रिक्शा तो है नहीं


देश कोई रिक्शा तो है नहीं
जो फेफड़ों की ताक़त की दम पे चले
वह चलता है पैसों से

सरकार के बस का नहीं
देना सस्ती और उच्च शिक्षा
मुफ्त ईलाज भी
सरकार का काम नहीं

कल को तो आप कहेंगे
गिलहरी के बच्चे का भी
रखे ख्याल सरकार
वे विलुप्त होने की कगार पे हैं

परिन्दों से ही पूछ लो
क्या उन्हें उड़ना
सरकार ने सिखाया है..?

क्या उनके दुनके में
रत्ती भर भी योगदान है सरकार का
जंगल में
बिना सरकारी अस्पताल के
एक बाघिन ने
आज ही दिया जन्म
तीन बच्चों को
एक हाथी के बच्चे ने
आज ही सीखा है नदी में तैरना

बिना सरकारी योगदान के
पार कर गया नील गायों का झुण्ड
एक खौफ़नाक बहती नदी

सरकार का काम नहीं है
कि वो रहे चिन्तित

उन जर्जर पुलों के लिए
जिन्हें लाँघते है हर रोज
ग़रीब गुरबा लोग

सरकार के पास नहीं है फुर्सत
हर ग़रीब आदमी की
चू रही छत का
रखती रहे वह ख्याल
और भी बहुत से काम है
जो करने हैं सरकार को

मसलन रोकनी है महँगाई
भेजनी है वहाँ सेना
जहाँ लोग बनने ही नहीं दे रहे हैं
सेज

सरकार को चलाना है देश
वह चलाता है पैसों से
और पैसा है बेचारे अमीरों के पास
आज ही सरकार
करेगी गुज़ारिश अमीरों से
कि वे इस देश को
ग़रीबी में डूबने से बचाए

देश की भलाई के लिए
अमीर तस्करों तक के आगे
फैलाएगी अपनी झोली
बदले में देगी
उन्हें थोड़ी-सी रियासतें

क्योंकि देश कोई रिक्शा तो नहीं
जो फेफड़ों की ताक़त के दम पे चलें
वह तो चलता है पैसों से
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हम


हम शहद बाँटते हैं
मधुमक्खियों की तरह
हज़ारों मील लम्बी और कठिन है
हमारे जीवन की भी यात्राएँ

उन्हीं की तरह
रहते हैं हम अपने काम में मगन
उन्हीं की तरह धरती के
एक-एक पुल की गंध और रस का
है पता हमें
वाकिफ़ हैं हम
धरती की नस-नस से

आपके मन और देह को रिझाता हुआ
आपकी जिव्हा पे
हमारी ही मेहनत का
है ये मीठा स्वाद

ध्यान रहे हम
डंक भी मारते हैं
ज़हर बुझा डंक
कोई यूँ ही हमारे छत्ते पे
मारे अगर पत्थर
वैसे हम मधुमक्खियाँ भर नहीं
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बीज

बीज हूँ मैं
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे खेतों में
पेड़-पौधों की फुनगियों से सजा
धरती की नसों में करवट बदलता
तुम्हारे सपनों में फलता
बीज हूँ मैं
मुझे तुम्हारे पास लाए हैं
तुम्हारे पुरखे
कभी-कभी मैं
ख़ुद ही हवा-पानी के संग
डोलता हुआ आ गया

कभी पँछियों की बीट में
कभी मवेशियों की पूँछ से चिपका
कभी कामगारों की पीठ
मुझे ले आई तुम्हारी देहरी पे

बूढ़ी दादी ने मुझे संभाले रखा
मिट्टी और बाँस की पेड़ियों में
मुझ तक नहीं पहुँचने दिया घुणों को

तुम्हारे संग बहती
हवा-पानी नदी में रचा बसा
तुम्हारा सबसे बड़ा सखा
बीज हूँ मैं

चाहता हूँ मैं रहूँ
तुम्हारे विचारों में
तुम्हारी ख़ुशियों में
मैं भी लडूँ
तुम्हारी विपदा में
तुम्हारे हाथों की ताक़त बनकर

बीज हूँ मैं
मैं प्यार हूँ
हवा हूँ
पानी हूँ
पुरखों की एक मात्र निशानी हूँ
मैं हूँ तो तुमसे दूर है
महाजन की टेड़ी नज़र

मैं हूँ तो
बची हुई है
तुम्हारे ज़िन्दा रहने की ख़बर

मैं हूँ तो
सजते रहेंगे गाँव हाट में
छोटी-छोटी ख़ुशियों के मेले

मैं हूँ तो
ज़रा-सा भीगने पर
पुलक से भर जाती है
परती धरती

मैं हूँ तो
सीधी रहेगी तुम्हारी पीठ

मैं हूँ तो
हरी रहेगी तुम्हारी दी

बीज हूँ मैं
मुझे मत बिसराना
किसी लालच में पड़कर
गिरवी मत रखना
मैं तुम्हारा ईमान हूँ
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कविता


कविता वहीं से करती है
हमारे संग सफ़र शुरू
जहाँ से लौट जाते हैं
बचपन के अभिन्न दोस्त
अपनी-अपनी दुनिया में

जहाँ से माँ करती है हमें
दूर देश के लिए विदा

जिस मोड़ पर
अपनी ऊँगली छुड़ाकर
अकेले चलने के लिए
कहते हैं पिता

ठीक वहीं से करती है
हमारे संग कविता
अपना सफ़र शुरू
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3 टिप्‍पणियां:

  1. सुरेश सेन 'निशांत' मेरे भी पसंदीदा कवि है जिन्हें पढ़ना मैं पसंद करता हूं. भाई प्रदीप मिश्र ने उनकी कविताओं पर उम्दा टिप्पणी लिखी है. दोनों को बधाई

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  2. badhiya kavitaye !!!!!!!!!!!!! nishant ji ko badhai >

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रदीप जिलवाने जी आपको धन्यवाद मेरी टिप्पणी पढ़ने के लिए। सत्यनारायण इन्दौर में खूब सर्जनात्मक काम कर रहा है। मैं उसके साथ हूँ फिर भी बधाई। मैं नाम छुपाकर टिप्पणी करवाने को बहुत सार्थक नहीं मानता हूँ और न ही यह नई पहल है। बिना नाम डाले बहुत सारे कवियों की कविताओं को मिला देना और फिर उन पर चर्चा करना या कवि को पहचानना बहुत पहले से होता आ रहा है। इसकी शुरूआत दरअसल लगभग दो-ढाई दशक पहले हुई थी जब छन्दमुक्त कवियों पर आरोप लगा था कि सब एक जैसी कविताएं लिखते हैं। जहाँ तक आलोचना की बात है- अगर कवि के नाम से वह प्रभावित होता है तो उसके आलोचना का कोई मतलब नहीं है। मेरे लिए तो इसका कोई अर्थ नहीं है। मुझे नागर्जून की कुछ कविताएं पसंद नहीं है तो नहीं हैं। भले ही नागर्जुन ने लिखा हो। शमशेर और त्रिलोचन की बहुत सारी कविताएं मुझे खराब लगतीं हैं और ठप्पे से मैं उनको खराब कहता हूँ। राजेश जोशी को भले ही लोग परफारमर कहें लेकिन मेरी नजर में हिन्दी कविता में आज का सबसे बड़ा कवि राजेश जोशी है। चंद्रकांत देवताले को साहित्य अकादेमी नहीं मिला, लेकिन उनके आगे बहुत सारे साहित्य अकादेमी पानेवाले पानी भरते नजर आते हैं। धूमिल लाउड होंगे लेकिन उनकी कविताओं कला पक्ष मुझे बहुत सशक्त लगती है। केदारनाथ सिंह कई जगह लिजलिजे लगते हैं। बावजूद इसके सत्यनाराण के इस पहल का मैं स्वागत करता हूँ और अपने तईं पूरी तरह से उनके साथ हूँ। कम से कम कविता के साथ वह गम्भीर है। उसके सपने में एक सुन्दर दुनिया जिसे मैं भी पसन्द करता हूँ।

    -प्रदीप मिश्र

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