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सत्यनारायण पटेल हमारे समय के चर्चित कथाकार हैं जो गहरी नज़र से युगीन विडंबनाओं की पड़ताल करते हुए पाठक से समय में हस्तक्षेप करने की अपील करते हैं। प्रेमचंद-रेणु की परंपरा के सुयोग्य उत्तराधिकारी के रूप में वे ग्रामांचल के दुख-दर्द, सपनों और महत्वाकांक्षाओं के रग-रेशे को भलीभांति पहचानते हैं। भूमंडलीकरण की लहर पर सवार समय ने मूल्यों और प्राथमिकताओं में भरपूर परिवर्तन करते हुए व्यक्ति को जिस अनुपात में स्वार्थांध और असंवेदनशील बनाया है, उसी अनुपात में सत्यनारायण पटेल कथा-ज़मीन पर अधिक से अधिक जुझारु और संघर्षशील होते गए हैं। कहने को 'गांव भीतर गांव' उनका पहला उपन्यास है, लेकिन दलित महिला झब्बू के जरिए जिस गंभीरता और निरासक्त आवेग के साथ उन्होंने व्यक्ति और समाज के पतन और उत्थान की क्रमिक कथा कही है, वह एक साथ राजनीति और व्यवस्था के विघटनशील चरित्र को कठघरे में खींच लाते हैं। : रोहिणी अग्रवाल

नयी पहल

श्री मनीष वैद्य की कविताएँ




इस बार हम युवा पत्रकार, काहनीकार श्री मनीष वैद्य की कविताएँ प्रकाशित कर है । मनीष ऎसे कवि हैं जो कविताएँ लिखते तो हैं, पर पत्रिकाओं में प्रकाशन के लिए भेजते नहीं है। समाकालीन हिन्दी की अनेक पत्रिकाओं में उनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी है। इस बार उन्होंने बिजूका को प्रकाशन के लिए पाँच कविताएँ दी है, जिन्हें बिजूका के पाठको के लिए हम प्रकाशित कर रहे हैं.. उम्मीद है एक कहानीकार और पत्रकार की कविताएँ अपको पसंद आयेगी।
बिजूका

श्री प्रदीप मिश्र की टिप्पणी


इन कविताओं को एक संवेदनशील सुरूचिपूर्ण व्यक्ति की अभिव्यक्ति की तरह से देखा जा सकता है। जहाँ पर कवि होने की संभावना पूरी तरह से मौजूद है। जब हम पढ़ते हैं - पहाड़ कंपकंपाया डर से / बूढ़ी औरत / भर न ले / उसे अपनी तगारी में, तो एक अपेक्षा बनती है और संतोष मिलता है। लेकिन कविता के इस तापमान से समन्वय करते दूसरे बंधों की अनुपस्थिती कवि से और परिश्रम और स्पष्ट जीवन विवेक की मांग करते हैं।
स्त्री कविता में बिम्ब विधान बहुत पुराना है । भाषागत समस्या भी है जैसे इन पंक्तियों में - नदी से पहाड़ / बहुत ऊँचा / नज़र ही नहीं आता । नज़र ही नहीं आता में एक सवाल उठता है कि क्या नज़र नहीं आता, पहाड़ तो दिख रहा है । मुझे लगता यहाँ पर कुछ संशोधन की गुंजाइश है। इसी तरह से - और कभी / वही होती चट्टान / जिसपर पछीटी जाती वही – यहाँ पर वही की पुनरावृत्ति ठीक नहीं है। अंत के शब्द को किसी अन्य पर्याय में बदले पर कविता और समृद्धहोती है । जबकि प्रयोग अच्छा है कि - वही होती चट्टान / जिसपर पछीटी जाती वही । पछीटने का श्रेष्ठ उपयोग चंद्रकांत देवताले की औरत कविता में मिलता है। पहाड़ चढ़ते हुए कविता में अधूरापन है। हाँपती कोई शब्द नहीं होता है, हाँफती होना चाहिए। पहाड़ एक अच्छी कविता है। बूढ़ी औरत कविता में व्याकरण और मूल्य दोनों का संकट है। पहाड़ की स्वीकृति सामान्य अर्थों में सकारात्मक है। यहाँ पर बूढ़ी औरत अपने बच्चों को उन जीवन संघर्षों से बचाने की बात कर रही है, जो उनके जीवन के लिए जरूरी हैं । इन कविताओं को पढ़ते हुए आभास होता है कि कवि के पास अनुभव और शब्दों की कमी है।
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श्री मनीष वैद्य की कविताएँ


स्त्री


पहाड़ से नदी
बहुत छोटी
पतली धार की तरह

नदी से पहाड़
बहुत ऊँचा
नज़र ही नहीं आता

नदी किनारे पर
चट्टान पर
कपड़े पछीटती स्त्री

कभी पहाड़ बन जाती
कभी नदी
और कभी
वही होती चट्टान
जिसपर पछीटी जाती वही
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पहाड़ चढ़ते हुए


पहाड़ चढ़ते हुए
मैंने उससे पूछा
इतनी जद्दोजहद
के बाद
क्या तुम्हें उम्मीद है दुख की ..?
उसने कहा- नहीं
मैंने विस्मय से उसे देखा
वह बढ़ रही थी
हाँपती हुई
ऊँचाई की ओर….

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पहाड़


खिड़की की झिर्रियों से
जब कभी झाँकती
पहाड़ बहुत ऊँचा
और दुर्गम नज़र आता

ब्याह की पहली रात से
बरसों बाद तक
एक दिन
दहलीज लाँघकर
चढ़ गई
पहाड़ वहाँ नहीं था
एक ढ़ेर भर था
मिट्टी
और पथ्तर का…
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बूढ़ी औरत


थरथर हाथों में
कुदाल उठाए
एक बूढ़ी औरत
खोद रही है
पहाड़ का सीना
ताकि
बच्चों को नहीं चढ़ना पड़े पहाड़
सर-सीधे रास्ते
लौट आएँ वे
शहरों से
पहाड़ कंपकंपाया डर से
बूढ़ी औरत
भर न ले
उसे अपनी तगारी में
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पहाड़ी स्त्रियाँ


वे जीती हैं
अपनी ज़िन्दगी
पहाड़ से ऊँचे दुखों को काटने की कोशिश में
अपने बच्चे में चिन्हती है वे
आदिम अनजाने स्पर्श की गंध
लम्बी दूरी उतरकर
वे पूछती है डाक बाबू से
यह जानते हुए कि
नहीं आएगी चिट्ठी
वे अकेले नहीं
प्रेम की सज़ा पाने वाली
सदियों से इसी तरह छली जाती रही वे
प्रेम के नाम पर
फिर भी प्रेम झरता है
वहाँ अब भी…
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4 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा कलाम पेश किया है आपने ।

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  2. मनीष जी को इतनी सुंदर और बेहतरीन कविताओं के लिए बहुत-बहुत बधाइंया.. मनीष जी आपकी कविताएं मानवीय संवेदनाओं के भीतर संवेदना से जूझकर एक लडाई की ओर चलती नजर आती है. जाहिर है ये लडाई या तो अपने भीतर चल रही उस दुनिया की हो सकती है जो अपने रचाव के लिए कई-कई पहाड लांघती रहीं हो या फिर उस नदी की तरह रही है जो पहाडो से लडकर अपना रास्ता खोजने के लिए जंग की तैयारी कर रही है...बहरहाल आपकी इन कविताओं में पहाड, बूढी औरत, मुझे बहुत ही अच्छी लगीं...

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  3. MANISHJI,
    aapko in chhoti-chhoti kintu sandeshprad kavitaon ke liye badhai.
    aage bhi aapse aise hi kavitaon ki apeksha hai.
    mujhe aapki "budhi aurat" wali kavita bahut pasand aai.
    DHANYAWAD.

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